इस बार के जन्मदिन का किस्सा मज़ेदार है।आजकल सबके अलग-अलग ह्वाट्सऐप ग्रुप हैं…. घर परिवार का तो है ही;इसके अलावा स्कूल ग्रुप कोलेज ग्रुप,ऑफिस ग्रुप, साथ की पोस्टिंग वाला ग्रुप, आफिस की महिला सहकर्मियों का ग्रुप, और ऐसे ही तमाम समूह।मेरा भी है।अनेक समूहों में से एक स्कूल के दोस्तों का है जहाँ शायद मैं सबसे सक्रिय हूँ।आख़िर पाँच साल की उम्र में हममें से कई लोग किंडरगार्टेन में साथ साथ ही बिब लगाकर पहली बार स्कूल आए थे।और अब तक साथ हैं।
फ़लसफ़े
गुरुवार, सितंबर 10, 2026
जन्मदिन-2026
गुरुवार, फ़रवरी 12, 2026
"उतनी दूर मत ब्याहना बाबा!
https://youtu.be/WW0Dtr3BusY?si=X1odWo00wO3I0o0s
फिर वही रील्स देखते हुए एक बहुत ही शानदार वीडियो सामने आया। निर्मला पुतुलजी कविता पाठ कर रही थीं। कविता थी "उतनी दूर मत ब्याहना बाबा!" अद्भुत कविता और हर स्त्री के मन को झकझोरती कविता। शादी के बाद न सिर्फ अपने घर,अपने परिवार,अपने गाँव,अपने माहौल से दूर जाने की पीड़ा है बल्कि यह भी भय कि कैसा होगा नया परिवेश। लेकिन इस आदिवासी लड़की के आग्रह में छुपा है गाँव से प्यार,सरल जीवन का मोह और विवाह के बाद की भौगोलिक और भावनात्मक दूरी की आशंका।इतनी परतों में कविता लिखी है। एक लड़की की संवेदनाओं के अलावा ग्रामीण जीवन की शुद्धता के साथ साथ वहां की कमियों पर भी बात करती है। सुनिए और सराहिये इसके विभिन्न पहलुओं को।
निर्मला पुतुलजी झारखण्ड की भूमि की प्रसिद्ध आदिवासी कवियित्री हैं जो संथाली और हिंदी दोनों में लिखती हैं।उनका सशक्त लेखन आदिवासी समाज की आवाज़ को लोगों तक पहुंचाती हैं।
बाबा!
मुझे उतनी दूर मत ब्याहना
जहाँ मुझसे मिलने जाने ख़ातिर
घर की बकरियाँ बेचनी पड़े तुम्हें
मत ब्याहना उस देश में
जहाँ आदमी से ज़्यादा
ईश्वर बसते हों
जंगल नदी पहाड़ नहीं हों जहाँ
वहाँ मत कर आना मेरा लगन
वहाँ तो क़तई नहीं
जहाँ की सड़कों पर
मन से भी ज़्यादा तेज़ दौड़ती हों मोटरगाड़ियाँ
ऊँचे-ऊँचे मकान और
बड़ी-बड़ी दुकानें
उस घर से मत जोड़ना मेरा रिश्ता
जिस में बड़ा-सा खुला आँगन न हो
मुर्ग़े की बाँग पर होती नहीं हो जहाँ सुबह
और शाम पिछवाड़े से जहाँ
पहाड़ी पर डूबता सूरज न दिखे
मत चुनना ऐसा वर
जो पोचई और हड़िया में डूबा रहता हो अक्सर
काहिल-निकम्मा हो
माहिर हो मेले से लड़कियाँ उड़ा ले जाने में
ऐसा वर मत चुनना मेरी ख़ातिर
कोई थारी-लोटा तो नहीं
कि बाद में जब चाहूँगी बदल लूँगी
अच्छा-ख़राब होने पर
जो बात-बात में
बात करे लाठी-डंडा की
निकाले तीर-धनुष, कुल्हाड़ी
जब चाहे चला जाए बंगाल, असम या कश्मीर
ऐसा वर नहीं चाहिए हमें
और उसके हाथ में मत देना मेरा हाथ
जिसके हाथों ने कभी कोई पेड़ नहीं लगाए
फ़सलें नहीं उगाईं जिन हाथों ने
जिन हाथों ने दिया नहीं कभी किसी का साथ
किसी का बोझ नहीं उठाया
और तो और!
जो हाथ लिखना नहीं जानता हो ‘ह’ से हाथ
उसके हाथ मत देना कभी मेरा हाथ!
ब्याहना हो तो वहाँ ब्याहना
जहाँ सुबह जाकर
शाम तक लौट सको पैदल
मैं जो कभी दुख में रोऊँ इस घाट
तो उस घाट नदी में स्नान करते तुम
सुनकर आ सको मेरा करुण विलाप
महुआ की लट और
खजूर का गुड़ बनाकर भेज सकूँ संदेश तुम्हारी ख़ातिर
उधर से आते-जाते किसी के हाथ
भेज सकूँ कद्दू-कोहड़ा, खेखसा, बरबट्टी
समय-समय पर गोगो के लिए भी
मेला-हाट-बाज़ार आते-जाते
मिल सके कोई अपना जो
बता सके घर-गाँव का हाल-चाल
चितकबरी गैया के बियाने की ख़बर
दे सके जो कोई उधर से गुज़रते
ऐसी जगह मुझे ब्याहना!
उस देश में ब्याहना
जहाँ ईश्वर कम आदमी ज़्यादा रहते हों
बकरी और शेर
एक घाट पानी पीते हों जहाँ
वहीं ब्याहना मुझे!
उसी के संग ब्याहना जो
कबूतर के जोड़े और पंडुक पक्षी की तरह
रहे हरदम साथ
घर-बाहर खेतों में काम करने से लेकर
रात सुख-दुख बाँटने तक
चुनना वर ऐसा
जो बजाता हो बाँसुरी सुरीली
और ढोल-माँदल बजाने में हो पारंगत
वसंत के दिनों में ला सके जो रोज़
मेरे जूड़े के ख़ातिर पलाश के फूल
जिससे खाया नहीं जाए
मेरे भूखे रहने पर
उसी से ब्याहना मुझे!
(निर्मला पुतुल)
मंगलवार, फ़रवरी 03, 2026
बड़की भौजी
"इटरनेट की गलियों में घूमते हुए कभी-कभी कोई ऐसा मोती हाथ लग जाता है, जो दिल को छू ले। मुझे भी ऐसा ही एक अनमोल मोती मिला — जनकवि कैलाश गौतम जी की कविता ‘बड़की भौजी’। पहले इसे एक रील में सुना और फिर जाकर पढ़ा। मैं न तो साहित्य का विद्यार्थी हूँ और न ही कोई लेखक, इसलिए जब इस तरह की लोकप्रिय और प्रसिद्ध रचनाएँ मेरे सामने आती हैं तो लगता है खजाना मिल गया । इतने सहज भाव, इतनी सादगी और फिर भी कितनी -कितनी गहराई — यही इस कविता की खूबसूरती है।
"कैलाश गौतम जी पूर्वांचल और भोजपुरी भाषा के अद्भुत कवि हैं। उनकी कविताएँ पढ़ना और सुनना ऐसा लगता है जैसे गाँव की खुशबू, खेत-खलिहान की सरसराहट और आँगन की चहल-पहल हमारे भीतर उतर रही हो। उनकी रचनाएँ हमें याद दिलाती हैं कि साहित्य तभी जीवंत होता है जब उसमें लोकजीवन की आत्मा बसती है।"
हमारे आसपास हर परिवार में कोई न कोई ‘बड़की भौजी’ ज़रूर होती है, जो अपनी हँसी और अपनापन से पूरे माहौल को जीवंत बना देती है।"
जब देखो तब बड़की भौजी हँसती रहती है
हँसती रहती है कामों में फँसती रहती है ।
झरझर झरझर हँसी होंठ पर झरती रहती है
घर का खाली कोना भौजी भरती रहती है ।।
डोरा देह कटोरा आँखें जिधर निकलती है
बड़की भौजी की ही घंटों चर्चा चलती है ।
ख़ुद से बड़ी उमर के आगे झुककर चलती है
आधी रात गए तक भौजी घर में खटती है ।।
कभी न करती नखरा-तिल्ला सादा रहती है
जैसे बहती नाव नदी में वैसे बहती है ।
सबका मन रखती है घर में सबको जीती है
गम खाती है बड़की भौजी गुस्सा पीती है ।।
सोमवार, मार्च 17, 2025
हमने भी देखी है ऋतु बसंत की
देखी है बगिया फूलो से लदी
देखी है होली कई रंग से भरी
देखी हैं महबूबा बड़े नखरों वाली
देखी है गालों पर फैलती लाली
अबीर देखा गुलाल देखा,देखे बहुत धमाल भी
उसने जो हाँ कर दी, देखा ऐसा कमाल भी।
देखी है शामों की रौनक
देखी है जीवन ऋतु बड़ी मोहक
देखी है झूमते आँगन की छटा
देखी रसोई के खटपट की अदा
सपनों देखे ढेरों-ढेरों,सच होते भी देखा है
पतझड़ के मौसम में अब तो खाली हाथ भी देखा है।
क्या खोया क्या पाया है,क्या हिसाब लगाना है
जो याद रहा सो याद रहा, क्या भूलना क्या भुलाना है।
वो भी दिन थे अपने दिन थे,अपना एक रंगीला संसार
अपनी कूची अपने रंग थे, मेरी अपनी बसंत बहार!
सोमवार, मार्च 10, 2025
जलन-2
हमें बहुत बातों पर बहुत लोगों से जलन होती है। एक जलन की बात तो हो चुकी है। एक और राज की बात है जिससे मुझे लोगों से जलन होती है। उन लोगों से जो कैमरा देखते ही झट से एक सुंदर सी मुद्रा बना लेते हैं। जिनको कैमरे से इश्क है,जिनसे कैमरा मुहब्बत करता है,जिनकी हर अदा पर वह फिदा है और जो कैमरे के साथ एक सहज संवाद स्थापित कर लेते हैं। जिनकी बातचीत होती है उससे और बड़ी सहजता से वह एक दूसरे को समझते हैं।
यह भी एक हुनर है जो हमे न आया। न बचपन में, न ही युवावस्था
में और न ही अब बुढ़ापे की दहलीज़ पर। मेरी बचपन की एक तस्वीर है जहाँ एक बहुत सुंदर से बाग में हम कुछ भाई बहन को
फ़ोटो खींचने के लिए इकट्ठा किया गया था।सभी बच्चों को सजाया-संवारा गया।सुन्दर पोशाकें पहनाई गयीं। बाकायदा फोटोग्राफर को घर बुलाया जाता था। लेकिन जब फ़ोटो निकला तो बाकी सब तो
बहुत सलीके से खड़े हैं और हम हैं कि चेहरे पर दहशत का भाव लिए भागे जा रहे हैं।
उसी में अब देखती हूँ तो एक दो बड़े भाई बहनों के चेहरे पर गुस्सा भी छलकता दिख रहा
है। और सही भी है। उस समय आज की तरह तो था नहीं की सैकड़ों फ़ोटो लेते रहो और delete करते
रहो।
मुझे तो जैसे ही फोटग्राफर की आवाज सुनाई पड़ी,”सब लोग सामने देखो, इसमें देखो
अभी चिड़िया उड़ेगी” और मैं फुर्र से उढ़ने
को तैयार हो जाती। अच्छा यह चिड़िया वाला फंडा भी अब बदल चुका है। पहले चिड़िया उड़ती
थी और हम सावधान हो जाते। फिर आया smile please का ज़माना। यही वह जादुई शब्द
जिनसे हम समझ जाते कि फोटोग्राफर तैयार है आप भी मुस्कराहट के साथ तैयार हो जाएँ। उसके
बाद तबदीली हुई, और “smile,please” की जगह ली,”say cheese” ने। और अभी हाल भी हमने
सुना 123 go! यह गो क्या है!बात जम नहीं रही। आजकल के बच्चे
go कहते हैं पर उसमें कोई दम नहीं है। चीज़ या स्माइल प्लीज
वाली झटक नहीं है। और चिड़िया तो खैर अलग ही level था।
चाहे चिड़िया देखो या चीस कहो हम हमेशा ही कैमरे के सामने भगोड़े रहे हैं। फिर
किसी ने समझाया कि यह फोटो नहीं ली जा रही हैं यह तो memories create की जा रही हैं। यह उन पलों को भविष्य के लिए सँजोने का तरीका है। बात
न तो आप की है,न कैमरे की,न आप कैसे लगते हैं फ़ोटो में। बात खास पलों की यादें
बनाने की है। और सिर्फ खास पल ही नहीं किसी भी मौके को समेट कर रखने की है। बस यही सोचकर आप
फ़ोटो खिंचवाने में झिझकना छोड़ दें। यहाँ, वहाँ,जहाँ,तहाँ,ऐसे वैसे,कैसे-कैसे बस क्लिक
क्लिक का साथ दें। आगे चलकर इन्हें देखना बहुत खुशी देगा। बात में दम था। वाजिब
लगी। तब से हमने भी कैमरे से दुश्मनी छोड़ थोड़ी सी दोस्ती कर ली। दोस्ती बहुत अधिक
नहीं है,क्योंकि कैमरा सामने आते ही मुस्कान कुछ अजीब सी चिपकाई हुई सी हो जाती है। सहज होना क्या होता है अभी तक न आया। पर हाँ मेमोरीस क्रीऐट हो रही हैँ, आज से
दो चार साल बाद पुनः इन पलों को जीने के लिए। तस्वीर के पीछे छुपी कहानियाँ भी याद
करने के लिए।
हर तस्वीर वो नहीं होती जो दिखती है। एक विडिओ कुछ दिन पहले देखा था जिसमें एक
छोटी बच्ची रो रही है। शायद किसी बात की जिद कर रही थी। जैसे ही उसने देखा कि सामने कैमरे को देखा
रोना छोड़ मुस्करा दी। ऐसी ही कई मुसकराहटें कैद हो जाती हैँ कैमरे में जो सिर्फ
कैमरे के लिए हैँ। हमारी भी की ऐसी फ़ोटो हैँ जो तब खींची गई जब हम बिल्कुल एक
दूसरे से नाराज हैँ। पर फ़ोटो में क्या
प्यार छलक रहा है! बातचीन बंद है इसकी एक शिकन भी फ़ोटो पर नहीं पड़ी और क्या
तारीफ़ों के पुल बांधे गए लवली जोड़ी पर! made for each other! #couplegoals. यही सब कहानियाँ होती हैँ स्मृतियों की। कुछ
हंसी के क्षण,कुछ प्रसन्नता को कैद करना,कभी दुखते हृदय के बावजूद मुस्कराना। कभी
यह भी लगता है कि आजकल खुश दिखाना खुश रहने से ज्यादा ज़रूरी हो गया है।
खैर, पलों को कैद कर लिया गया है तो मुड़कर देखने का भी एक खास मज़ा है। यह सब कई
बार साझा होते थे अल्बम के पन्ने पलटने पर। यह भी एक बड़ा ही आनंददायक और मजेदार
कार्यक्रम होता । जब भी कोई रिश्तेदार या मित्र घर आए तो अल्बम निकाले जाते और
फ़ोटो के पीछे की कहानियाँ सुनाई जातीं। कब घूमने गए क्या-क्या हुआ, क्या हो रहा था
जब फलां फ़ोटो ली गई। अब डिजिटल फोटो हैँ तो साथ बैठकर एलबम के पन्ने पलटने का सुख
लुप्त हो गया है। हाँ तुरत-फुरत कोई भी तस्वीर मिल तो जाती है पर एक साथ बैठकर चाय
की चुस्की की तरह उनका लुत्फ उठाना अब एक गायब होता एहसास है।
अब memories
क्रीऐट हो जाती हैँ,मोमेंट्स capture हो जाते
हैँ,छोटे-छोटे पल,नन्हीं सी एक हंसी,कुछ क्षण की मुलाकातें या फिर जीवन के बेहद
महत्त्वपूर्ण मौके,शादी-ब्याह,जन्मदिन,बैठकें,सैर सपाटे,.. सब लेखा-जोखा मिल जाएगा, अनंत अनंत तक। पर अगर किसी को ऐसा लग रहा है कि इतनी फ़ोटो खींचने पर फोटोग्राफर की
बड़ी पूछ होती है तो भूल जाइए जनाब। यह ज़माना है मोबाईल फोटोग्राफी। यहाँ हर कोई बेजोड़
कैमरामैन है, हर कोई बेहतरीन तस्वीरें लेने में माहिर है और कोई फोटो खींचने के लिए नहीं है तो सेल्फ़ी तो
है ही। हाथ लंबा करें और सेल्फ़ी खींचे। यह भी एक कला है। और अब तो उन लोगों से भी
बड़ी ईर्ष्या होती है जो सेल्फ़ी लेने में माहिर हैँ। सोचिए मुझे डाह होती है उनसे
जो चटपट फ़ोटो खिंचवाने के लिए राजी हो जाते हैँ,जिनकी तस्वीर सुंदर उतरती है, और
अब तो मेरी ईर्ष्या का एक विशेष वर्ग है उन लोगों का जो फटाफट सेल्फ़ी ले लेते हैँ। हम अपने ही सनम हैँ। अब तो हम कई सेल्फ़ी-समूह में
दिखाई देते हैँ,पर अपनी सेल्फ़ी, न बाबा। जो मुस्कान कैमरे के सामने वैसे भी तनावयुक्त,
बेढंगी होती थी वह सेल्फ़ी में तो तीनों लोकों के सारे दुखों का भार कंधों पर लादे रहने
के भाव से ओतप्रोत होती है।
यह थी एक डाह कथा जहाँ एक ईर्ष्या पर काबू पाया तो दूसरी उपजने लगी। फिर भी
तस्वीरें लेना न छोड़ें। वर्तमान को भविष्य तक संजो कर रखने का यह सुगम पथ है ।
डाह की आह !
गुरुवार, जनवरी 09, 2025
अरसे बाद
यह सिर्फ लखनऊ वापस आने की कहानी नहीं है। यह हर उस व्यक्ति की भावना है जो कई बरस बाद अपने शहर या गाँव वापस जाता है। सब कुछ पहचाना सा है फिर भी वह शहर जो मेरा था वह शायद मेरे दिल में ही है।
अरसे बाद लखनऊ आये हैं आप कैसा लग रहा है
क्या बचपन के रास्ते वहीं होंगे इंतज़ार करतेया मुड़ गये होंगे किसी और मंज़िल की तरफ़
या मंज़िलें अब वैसी नहीं जैसी तब थीं
जब हम घूमते थे रिक्शे पर बैठकर
जब आठ आने में पहुँच सकते कहीं से कहीं
जब स्टेशन पर इक्के भी मिल जाते थे
और साइकिलें चलती थीं कारों की जगह !
जब तसल्ली से सड़क पर ही हो जाती थीं
और किनारे खड़े होकर या चौराहों पर हो सकती थीं बातें तमाम।
जब गर्मी की शामें और सर्दी की दोपहर बीतती थीं छतों पर
चिनिया बादाम खाते खाते हर पड़ोस की चाची और खाला का हाल मिल जाता था
और पतंग की पेंचों में पैग़ाम भी पहुँच जाता था !
अमीनाबाद की गलियाँ क्या वैसे ही तंग हैं
अलबत्ता हर ज़रूरत के लिए दस्तक दी जाती थी जहाँ
क्या गड़बड़झाला और
मोहन मार्केट,गणेशगंज और चौक की रौनक़ वही है
या नये ज़माने के माल्स में गुम हो गई वहाँ की
चहलक़दमी कहीं ।
गंजिंग का लुत्फ उठाते हैं लोग अभी भी क्या
या भूल गए love lane में नज़रें लड़ाना आजकल के आशिक़
अभी भी कोई कहता है बीबी पौने तीन वाले तो अरमान लेकर चले गये
या अब पहले आप का लहजा ढक्कम धुक्का में धराशायी हो गया.
अरसे बाद अपने शहर आए हैं कैसा लग रहा है
कुछ पहचाना सा लगता है कुछ अनजाना सा
लगता है कि सब कुछ वही है पर फिर भी कुछ अलहदा सा लगता है
कहीं झलक दिख जाती है अपने ज़माने की,
कहीं झांकते हुए मिल जाता है पुराना नुक्कड़ कोई
कभी लगता है कि इतना कुछ बदल गया
कभी झुँझलाहट है कि ज़माने के साथ बदलता क्यों नहीं
अरसे बाद अपने शहर आए हैं
यादों के चिलमन से झांकते शहर को फिर अपना बनाने।
गुरुवार, अप्रैल 13, 2023
जलन-१