गुरुवार, फ़रवरी 12, 2026

"उतनी दूर मत ब्याहना बाबा!


https://youtu.be/WW0Dtr3BusY?si=X1odWo00wO3I0o0s

फिर वही रील्स देखते हुए एक बहुत ही शानदार वीडियो सामने आया।  निर्मला पुतुलजी कविता पाठ कर रही थीं।  कविता थी "उतनी दूर मत ब्याहना बाबा!" अद्भुत कविता और हर स्त्री के मन को झकझोरती कविता। शादी के बाद न सिर्फ अपने घर,अपने परिवार,अपने गाँव,अपने माहौल से दूर जाने की पीड़ा है बल्कि यह भी भय कि कैसा होगा नया परिवेश। लेकिन इस आदिवासी लड़की  के आग्रह में छुपा है गाँव से प्यार,सरल जीवन का मोह और विवाह के बाद की भौगोलिक और भावनात्मक दूरी की आशंका।इतनी परतों में कविता लिखी है।  एक लड़की की संवेदनाओं के अलावा ग्रामीण जीवन की शुद्धता के साथ साथ वहां की कमियों पर भी बात करती है। सुनिए और सराहिये इसके विभिन्न पहलुओं को।  

निर्मला पुतुलजी झारखण्ड की भूमि की प्रसिद्ध आदिवासी कवियित्री हैं जो संथाली और हिंदी दोनों में लिखती हैं।उनका सशक्त लेखन आदिवासी समाज की आवाज़ को लोगों तक पहुंचाती हैं। 

बाबा!
मुझे उतनी दूर मत ब्याहना
जहाँ मुझसे मिलने जाने ख़ातिर
घर की बकरियाँ बेचनी पड़े तुम्हें

मत ब्याहना उस देश में
जहाँ आदमी से ज़्यादा
ईश्वर बसते हों

जंगल नदी पहाड़ नहीं हों जहाँ
वहाँ मत कर आना मेरा लगन

वहाँ तो क़तई नहीं
जहाँ की सड़कों पर
मन से भी ज़्यादा तेज़ दौड़ती हों मोटरगाड़ियाँ
ऊँचे-ऊँचे मकान और
बड़ी-बड़ी दुकानें
उस घर से मत जोड़ना मेरा रिश्ता
जिस में बड़ा-सा खुला आँगन न हो
मुर्ग़े की बाँग पर होती नहीं हो जहाँ सुबह
और शाम पिछवाड़े से जहाँ
पहाड़ी पर डूबता सूरज न दिखे

मत चुनना ऐसा वर
जो पोचई और हड़िया में डूबा रहता हो अक्सर
काहिल-निकम्मा हो
माहिर हो मेले से लड़कियाँ उड़ा ले जाने में
ऐसा वर मत चुनना मेरी ख़ातिर

कोई थारी-लोटा तो नहीं
कि बाद में जब चाहूँगी बदल लूँगी
अच्छा-ख़राब होने पर
जो बात-बात में
बात करे लाठी-डंडा की
निकाले तीर-धनुष, कुल्हाड़ी
जब चाहे चला जाए बंगाल, असम या कश्मीर
ऐसा वर नहीं चाहिए हमें

और उसके हाथ में मत देना मेरा हाथ
जिसके हाथों ने कभी कोई पेड़ नहीं लगाए
फ़सलें नहीं उगाईं जिन हाथों ने
जिन हाथों ने दिया नहीं कभी किसी का साथ
किसी का बोझ नहीं उठाया
और तो और!
जो हाथ लिखना नहीं जानता हो ‘ह’ से हाथ
उसके हाथ मत देना कभी मेरा हाथ!

ब्याहना हो तो वहाँ ब्याहना
जहाँ सुबह जाकर
शाम तक लौट सको पैदल
मैं जो कभी दुख में रोऊँ इस घाट
तो उस घाट नदी में स्नान करते तुम
सुनकर आ सको मेरा करुण विलाप

महुआ की लट और
खजूर का गुड़ बनाकर भेज सकूँ संदेश तुम्हारी ख़ातिर
उधर से आते-जाते किसी के हाथ
भेज सकूँ कद्दू-कोहड़ा, खेखसा, बरबट्टी
समय-समय पर गोगो के लिए भी
मेला-हाट-बाज़ार आते-जाते
मिल सके कोई अपना जो
बता सके घर-गाँव का हाल-चाल
चितकबरी गैया के बियाने की ख़बर
दे सके जो कोई उधर से गुज़रते
ऐसी जगह मुझे ब्याहना!

उस देश में ब्याहना
जहाँ ईश्वर कम आदमी ज़्यादा रहते हों
बकरी और शेर
एक घाट पानी पीते हों जहाँ
वहीं ब्याहना मुझे!

उसी के संग ब्याहना जो
कबूतर के जोड़े और पंडुक पक्षी की तरह
रहे हरदम साथ
घर-बाहर खेतों में काम करने से लेकर
रात सुख-दुख बाँटने तक

चुनना वर ऐसा
जो बजाता हो बाँसुरी सुरीली
और ढोल-माँदल बजाने में हो पारंगत
वसंत के दिनों में ला सके जो रोज़
मेरे जूड़े के ख़ातिर पलाश के फूल
जिससे खाया नहीं जाए
मेरे भूखे रहने पर
उसी से ब्याहना मुझे!

(निर्मला पुतुल)




मंगलवार, फ़रवरी 03, 2026

बड़की भौजी


"इटरनेट की गलियों में घूमते हुए कभी-कभी कोई ऐसा मोती हाथ लग जाता है, जो दिल को छू ले। मुझे भी ऐसा ही एक अनमोल मोती मिला — जनकवि कैलाश गौतम जी की कविता ‘बड़की भौजी’। पहले इसे एक रील में सुना और फिर जाकर पढ़ा। मैं न तो साहित्य का विद्यार्थी हूँ और न ही कोई लेखक, इसलिए जब इस तरह की लोकप्रिय और प्रसिद्ध रचनाएँ मेरे सामने आती हैं तो लगता है खजाना मिल गया ।  इतने सहज भाव, इतनी सादगी और फिर भी कितनी -कितनी गहराई — यही इस कविता की खूबसूरती है।


"कैलाश गौतम जी पूर्वांचल और भोजपुरी भाषा के अद्भुत कवि हैं। उनकी कविताएँ पढ़ना और सुनना ऐसा लगता है जैसे गाँव की खुशबू, खेत-खलिहान की सरसराहट और आँगन की चहल-पहल हमारे भीतर उतर रही हो। उनकी रचनाएँ हमें याद दिलाती हैं कि साहित्य तभी जीवंत होता है जब उसमें लोकजीवन की आत्मा बसती है।"

 हमारे आसपास हर परिवार में कोई न कोई ‘बड़की भौजी’ ज़रूर होती है, जो अपनी हँसी और अपनापन से पूरे माहौल को जीवंत बना देती है।"


जब देखो तब बड़की भौजी हँसती रहती है
हँसती रहती है कामों में फँसती रहती है ।
झरझर झरझर हँसी होंठ पर झरती रहती है
घर का खाली कोना भौजी भरती रहती है ।।

डोरा देह कटोरा आँखें जिधर निकलती है
बड़की भौजी की ही घंटों चर्चा चलती है ।
ख़ुद से बड़ी उमर के आगे झुककर चलती है
आधी रात गए तक भौजी घर में खटती है ।।

कभी न करती नखरा-तिल्ला सादा रहती है
जैसे बहती नाव नदी में वैसे बहती है ।
सबका मन रखती है घर में सबको जीती है
गम खाती है बड़की भौजी गुस्सा पीती है ।।

(कैलाश गौतम)


सोमवार, मार्च 17, 2025

हमने भी देखी है ऋतु बसंत की

देखी है बगिया फूलो से लदी 

देखी है होली कई रंग से भरी 

देखी हैं महबूबा बड़े नखरों वाली

देखी है गालों पर फैलती लाली 

अबीर देखा गुलाल देखा,देखे बहुत धमाल भी 

उसने  जो हाँ कर दी, देखा ऐसा कमाल भी।


देखी है शामों की रौनक

देखी है जीवन ऋतु  बड़ी मोहक

देखी है झूमते आँगन की छटा 

देखी रसोई के खटपट की अदा 

सपनों देखे ढेरों-ढेरों,सच होते भी देखा है 

पतझड़ के मौसम में अब तो खाली हाथ भी देखा है।

क्या खोया क्या पाया है,क्या हिसाब लगाना है

जो याद रहा सो याद रहा, क्या भूलना क्या भुलाना है।

वो भी दिन थे अपने दिन थे,अपना एक रंगीला संसार 

अपनी कूची अपने रंग थे, मेरी अपनी बसंत बहार!



सोमवार, मार्च 10, 2025

जलन-2

 हमें बहुत बातों पर बहुत लोगों से जलन होती है। एक जलन की बात तो हो चुकी है। एक और राज की बात है जिससे मुझे लोगों से जलन होती है। उन लोगों से जो कैमरा देखते ही झट से एक सुंदर सी मुद्रा बना लेते हैं। जिनको कैमरे से इश्क है,जिनसे कैमरा मुहब्बत करता है,जिनकी हर अदा पर वह फिदा है और जो कैमरे के साथ एक सहज संवाद स्थापित कर लेते हैं। जिनकी बातचीत होती है उससे और बड़ी सहजता से वह एक दूसरे को समझते हैं।

यह भी एक हुनर है जो हमे न आया। न बचपन में, न ही युवावस्था में और न ही अब बुढ़ापे की दहलीज़ पर। मेरी बचपन की एक तस्वीर है जहाँ एक बहुत सुंदर से बाग में हम कुछ भाई बहन को फ़ोटो खींचने के लिए इकट्ठा किया गया था।सभी बच्चों को सजाया-संवारा गया।सुन्दर पोशाकें पहनाई गयीं। बाकायदा फोटोग्राफर को घर बुलाया जाता था। लेकिन जब फ़ोटो निकला तो बाकी सब तो बहुत सलीके से खड़े हैं और हम हैं कि चेहरे पर दहशत का भाव लिए भागे जा रहे हैं। उसी में अब देखती हूँ तो एक दो बड़े भाई बहनों के चेहरे पर गुस्सा भी छलकता दिख रहा है। और सही भी है। उस समय आज की तरह तो था नहीं की सैकड़ों फ़ोटो लेते रहो और delete करते रहो।

मुझे तो जैसे ही फोटग्राफर की आवाज सुनाई पड़ी,”सब लोग सामने देखो, इसमें देखो अभी चिड़िया उड़ेगी” और मैं फुर्र  से उढ़ने को तैयार हो जाती। अच्छा यह चिड़िया वाला फंडा भी अब बदल चुका है। पहले चिड़िया उड़ती थी और हम सावधान हो जाते। फिर आया smile please का ज़माना। यही वह जादुई शब्द जिनसे हम समझ जाते कि फोटोग्राफर तैयार है आप भी मुस्कराहट के साथ तैयार हो जाएँ। उसके बाद तबदीली हुई, और “smile,please” की जगह ली,”say cheese” ने। और अभी हाल भी हमने सुना 123 go! यह गो क्या है!बात जम नहीं रही। आजकल के बच्चे go कहते हैं पर उसमें कोई दम नहीं है। चीज़ या स्माइल प्लीज वाली झटक नहीं है। और चिड़िया तो खैर अलग ही level था।

चाहे चिड़िया देखो या चीस कहो हम हमेशा ही कैमरे के सामने भगोड़े रहे हैं। फिर किसी ने समझाया कि यह फोटो नहीं ली जा रही हैं यह तो memories create की जा रही हैं। यह उन पलों को भविष्य के लिए सँजोने का तरीका है। बात न तो आप की है,न कैमरे की,न आप कैसे लगते हैं फ़ोटो में। बात खास पलों की यादें बनाने की है। और सिर्फ खास पल ही नहीं किसी भी मौके को समेट कर रखने की है। बस यही सोचकर आप फ़ोटो खिंचवाने में झिझकना छोड़ दें। यहाँ, वहाँ,जहाँ,तहाँ,ऐसे वैसे,कैसे-कैसे बस क्लिक क्लिक का साथ दें। आगे चलकर इन्हें देखना बहुत खुशी देगा। बात में दम था। वाजिब लगी। तब से हमने भी कैमरे से दुश्मनी छोड़ थोड़ी सी दोस्ती कर ली। दोस्ती बहुत अधिक नहीं है,क्योंकि कैमरा सामने आते ही मुस्कान कुछ अजीब सी चिपकाई हुई सी हो जाती है। सहज होना क्या होता है अभी तक न आया। पर हाँ मेमोरीस क्रीऐट हो रही हैँ, आज से दो चार साल बाद पुनः इन पलों को जीने के लिए। तस्वीर के पीछे छुपी कहानियाँ भी याद करने के लिए।

हर तस्वीर वो नहीं होती जो दिखती है। एक विडिओ कुछ दिन पहले देखा था जिसमें एक छोटी बच्ची रो रही है। शायद किसी बात की जिद कर रही थी। जैसे ही उसने देखा कि सामने कैमरे को देखा रोना छोड़ मुस्करा दी। ऐसी ही कई मुसकराहटें कैद हो जाती हैँ कैमरे में जो सिर्फ कैमरे के लिए हैँ। हमारी भी की ऐसी फ़ोटो हैँ जो तब खींची गई जब हम बिल्कुल एक दूसरे से नाराज हैँ। पर फ़ोटो में क्या प्यार छलक रहा है! बातचीन बंद है इसकी एक शिकन भी फ़ोटो पर नहीं पड़ी और क्या तारीफ़ों के पुल बांधे गए लवली जोड़ी पर! made  for each other! #couplegoals. यही सब कहानियाँ होती हैँ स्मृतियों की। कुछ हंसी के क्षण,कुछ प्रसन्नता को कैद करना,कभी दुखते हृदय के बावजूद मुस्कराना। कभी यह भी लगता है कि आजकल खुश दिखाना खुश रहने से ज्यादा ज़रूरी हो गया है।

खैर, पलों को कैद कर लिया गया है तो मुड़कर देखने का भी एक खास मज़ा है। यह सब कई बार साझा होते थे अल्बम के पन्ने पलटने पर। यह भी एक बड़ा ही आनंददायक और मजेदार कार्यक्रम होता । जब भी कोई रिश्तेदार या मित्र घर आए तो अल्बम निकाले जाते और फ़ोटो के पीछे की कहानियाँ सुनाई जातीं। कब घूमने गए क्या-क्या हुआ, क्या हो रहा था जब फलां फ़ोटो ली गई। अब डिजिटल फोटो हैँ तो साथ बैठकर एलबम के पन्ने पलटने का सुख लुप्त हो गया है। हाँ तुरत-फुरत कोई भी तस्वीर मिल तो जाती है पर एक साथ बैठकर चाय की चुस्की की तरह उनका लुत्फ उठाना अब एक गायब होता एहसास है।

अब memories क्रीऐट हो जाती हैँ,मोमेंट्स capture हो जाते हैँ,छोटे-छोटे पल,नन्हीं सी एक हंसी,कुछ क्षण की मुलाकातें या फिर जीवन के बेहद महत्त्वपूर्ण मौके,शादी-ब्याह,जन्मदिन,बैठकें,सैर सपाटे,.. सब लेखा-जोखा मिल जाएगा, अनंत अनंत तक। पर अगर किसी को ऐसा लग रहा है कि इतनी फ़ोटो खींचने पर फोटोग्राफर की बड़ी पूछ होती है तो भूल जाइए जनाब। यह ज़माना है मोबाईल फोटोग्राफी। यहाँ हर कोई बेजोड़ कैमरामैन है, हर कोई बेहतरीन तस्वीरें लेने में माहिर है और कोई फोटो खींचने के लिए नहीं है तो सेल्फ़ी तो है ही। हाथ लंबा करें और सेल्फ़ी खींचे। यह भी एक कला है। और अब तो उन लोगों से भी बड़ी ईर्ष्या होती है जो सेल्फ़ी लेने में माहिर हैँ। सोचिए मुझे डाह होती है उनसे जो चटपट फ़ोटो खिंचवाने के लिए राजी हो जाते हैँ,जिनकी तस्वीर सुंदर उतरती है, और अब तो मेरी ईर्ष्या का एक विशेष वर्ग है उन लोगों का जो फटाफट सेल्फ़ी ले लेते हैँ। हम अपने ही सनम हैँ। अब तो हम कई सेल्फ़ी-समूह में दिखाई देते हैँ,पर अपनी सेल्फ़ी, न बाबा। जो मुस्कान कैमरे के सामने वैसे भी तनावयुक्त, बेढंगी होती थी वह सेल्फ़ी में तो तीनों लोकों के सारे दुखों का भार कंधों पर लादे रहने के भाव से ओतप्रोत होती है।

यह थी एक डाह कथा जहाँ एक ईर्ष्या पर काबू पाया तो दूसरी उपजने लगी। फिर भी तस्वीरें लेना न छोड़ें। वर्तमान को भविष्य तक संजो कर रखने का यह सुगम पथ है ।

डाह की आह ! 

गुरुवार, जनवरी 09, 2025

अरसे बाद

यह सिर्फ लखनऊ वापस आने की कहानी नहीं है। यह हर उस व्यक्ति की भावना  है जो कई बरस बाद अपने शहर या गाँव वापस जाता है। सब कुछ पहचाना सा है फिर भी वह शहर जो मेरा था वह शायद मेरे दिल में ही है।  

अरसे बाद लखनऊ आये हैं आप कैसा लग रहा है  

क्या बचपन के रास्ते वहीं होंगे इंतज़ार करते
या मुड़ गये होंगे किसी और मंज़िल की तरफ़
या मंज़िलें अब वैसी नहीं जैसी तब थीं
जब हम घूमते थे रिक्शे पर बैठकर
जब आठ आने में पहुँच सकते कहीं से कहीं
जब स्टेशन पर इक्के भी मिल जाते थे
और साइकिलें चलती थीं कारों की जगह !

जब तसल्ली से सड़क पर ही हो जाती थीं
और किनारे खड़े होकर या चौराहों पर हो सकती थीं बातें तमाम।
जब गर्मी की शामें और सर्दी की दोपहर बीतती थीं छतों पर
चिनिया बादाम खाते खाते हर पड़ोस की चाची और खाला का हाल मिल जाता था
और पतंग की पेंचों में पैग़ाम भी पहुँच जाता था !

अमीनाबाद की गलियाँ क्या वैसे ही तंग हैं
अलबत्ता हर ज़रूरत के लिए दस्तक दी जाती थी जहाँ
क्या गड़बड़झाला और
मोहन मार्केट,गणेशगंज और चौक की रौनक़ वही है
या नये ज़माने के माल्स में गुम हो गई वहाँ की
चहलक़दमी कहीं ।

गंजिंग का लुत्फ उठाते हैं लोग अभी भी क्या
या भूल गए love lane में नज़रें लड़ाना आजकल के आशिक़
अभी भी कोई कहता है बीबी पौने तीन वाले तो अरमान लेकर चले गये
या अब पहले आप का लहजा ढक्कम धुक्का में धराशायी हो गया. 

अरसे बाद अपने शहर आए हैं कैसा लग रहा है
कुछ पहचाना सा लगता है कुछ अनजाना सा
लगता है कि सब कुछ वही है पर फिर भी कुछ अलहदा सा लगता है
कहीं झलक दिख जाती है अपने ज़माने की,
कहीं झांकते हुए मिल जाता है पुराना नुक्कड़ कोई
कभी लगता है कि इतना कुछ बदल गया
कभी झुँझलाहट है कि ज़माने के साथ बदलता क्यों नहीं
अरसे बाद अपने शहर आए हैं
यादों के चिलमन से झांकते शहर को फिर अपना बनाने। 


गुरुवार, अप्रैल 13, 2023

जलन-१

 

बड़ी जलन होती है ।वैसे तो बहुत लोगों से बहुत बातों पर होती है पर आज जिस बात की जलन की आग है वह है उनलोगों पर जिनको भगवान ने सुरीली आवाज़ दी है ।उसी भगवान की क़सम, by God क्या जल-भुन कर राख हो जाती हूँ जब ऐसे लोगों से मिलती हूँ।और चार लोग बैठें हो, कुछ भी करने को नहीं है तो … अरे फलाने गाना सुनाओ भई। दस लोग बैठे हों .. अरे कुछ गाना-वाना हो जाये।अन्ताक्षरी खेलें।अभी कुछ दिन पहले किसी की anniversary थी .. सब शुरू हो गये … हर कोई एक एक गाना सुनाएगा।
अरे क्यों भई।आपको सुकंठ का वरदान मिला है … उनसे पूछिए जिन्हें गाने को बोलो तो मेढक सी आवाज़ निकलती है ।जब कहीं बैठो और ऐसी कोई बात शुरू हो जाये तो हमें चाहिये invisible cloak या ढूँढ लो हमें कहीं सोफ़े के नीचे।अरे हम तो सपने में भी नहीं गाते! bathroom singer के नाम पर जब bathroom में गाते गुनगुनाते हैं तो shower भी गुमसुम हो कर बंद हो जाता है ।हाय किस बाथरूम में लग गया मैं ।दीवारें भी लगता है कह रही हों हमसे यह आवाज़ गूंजी नहीं जायेंगी ।वही echo/acoustics जिससे लोग सोचते हैं वह मुहम्मद रफ़ी हो गये,लता मंगेशकर हो गये और कुछ नहीं तो हिमेश रेशमिया ही समझ लिया।पर इधर तो वो भी नहीं ।यहाँ तो बाथरूम ने भी बग़ावत कर दी।
और उधर वो लोग हैं झट गाना शुरू।जहां स्टेज दिखा,माइक पकड़े और गाना शुरू।reel बना लें गाने की। नवरात्रों में ज़ोर ज़ोर से देवी माँ की भक्ति। बेसुरों की भक्ति माँ स्वीकारेंगी कि नहीं ।आरती भी गाते हैं तो twinkle twinkle के अन्दाज़ पर निकलती है ।
चलो तुम गाने वाले फूलो फलो,गाते रहो बस हम जैसों से मत बोलो गाने को।हम जी लेंगे अपनी डाह लिये । लागि डाह.....La Dee Dah !



शुक्रवार, दिसंबर 25, 2020

एक चाय की प्याली का साथ

सवेरे उठकर अगर बस कोई एक चीज़ चाहिए तो वह है चाय। दिन की शुरुआत हो गरमा गर्म बेड टी से तो आगे का दिन लगता है अच्छा ही बीतेगा। अगर खुदा न खास्ता उसमें ज़रा सी देर हो जाए तो मूड ख़राब,अपना भी बाकी घरवालों का भी। चाय का नशा ऐसा होता है कि पूछिए मत। इस नशे को करने की सबका अपना तरीका। मैं अकेले रहा करती थी तो उठते ही मंजन वगैरह के बाद पहला काम होता चाय बनाने का। हमें चाहिए  होती दो कप चाय,अखबार के साथ। चाय भी कड़क अदरक डालकर, अच्छे से उबालकर। तो खुद दो कप चाय बनाते,बिस्तर के बगल में रखती और ताज़ा समाचार को चुस्कियों के साथ पढ़ते। इस पर भी मेरी यह पाबंदी कि चाय  हम अपने आप बनाएंगे। किसी और के हाथ की सवेरे की चाय हमें नागवार गुज़रती है । यह सिलसिला कई सालों तक चला। अपने हाथ की चाय तसल्ली से समाचार पत्र के साथ पढ़ने के लिए हमें काफी सवेरे उठना पड़ता था। दफ्तर दूर था और हमें समय पर पहुँचने के लिए  घर से जल्दी रवाना होना पड़ता था। पर क्या इस वजह से सुबह की चाय न पी जाये या उसके साथ जल्दबाजी की जाये। न जी ! उससे अच्छा है भोर होते उठो। बड़े फायदे हैं सवेरे उठने के और सबसे बड़ा चाय की हर चुस्की का सुख। 

चाय के साथ सबका रिश्ता बड़ा अनूठा और एक दूसरे से अलग होता है। बहुत लोग बदनाम हैं इसके दीवाने होने की वजह से। हमारे घर में मम्मी का चाय इश्क़ मशहूर था। पापा का चाय पीने का समय नियत था। हम बच्चों को चाय पीने पर सख्त रोक थी और हमने चाय पीनी शरू की नौकरी में आने पर। चाय पीने से सांवले होने का डर भी पहले बैठाया गया था। कोई ज़ोर से चुस्की लेकर चाय पीता  है,कोई बड़ी नज़ाकत से टी कोज़ी के अंदर ढंकी केटली से डाल कर। 

इसलिए चाय के नाम यह मेरा पैगाम। 


अलसाई सी सुबह  हो या शाम सुहानी 

सर्दियों की ठिठुरन  हो या  गर्म दोपहरी 

बस साथ एक चाय की प्याली हो। 


अकेले बैठे विचरता मन हो या भरी महफिल का संग 

अनमना सा लगता  हो या सजे हों कई रंग  

बस साथ एक चाय की प्याली हो। 


बगल वाली मिसेज़ शर्मा हों या दूर की कोई चाची 

दफ्तर की बातें हो या प्रेम कहानी दुहरानी 

बस साथ एक चाय की प्याली हो। 


मिटटी का एक कुल्हड़ हो  या महंगी चीनी मिट्टी 

शीशे का अदद गिलास हो या डिज़ाइनर टी सेट 

बस साथ एक चाय की प्याली हो। 


नुक्कड़ के अड्डे पर बैठे हों या किसी पांच सितारा 

घर का कोई कोना हो या हरी घास पर बिछौना 

बस साथ एक चाय की प्याली हो 


घर के कामकाज के बीच हो या फाइलों के ढेर 

 यूं ही टीवी के सामने हो या ख़बरों के फेर 

बस साथ एक चाय की प्याली हो। 


अदरक,इलायची के संग बनी हो या हलके पत्तों वाली 

चीनी मिली हो ढेर सारी या दूध बिना हो काली काली 

बस साथ एक चाय की प्याली हो। 


थक गए काम कर-कर के या बैठे हों  निठल्ले 

इम्तिहान की तैयारी हो या हाँके गप्पे शप्पे 

बस साथ एक चाय की प्याली हो। 


सारी  दुनिया साथ हमारे,या कोई भी नो हो पास 

हर उमंग से भरा हो जीवन या टूटी  हो हर आस 

बस साथ एक चाय की प्याली हो। 


कुछ मन की बातें कर लें कुछ चर्चे ज़माने पर 

सुबह की सैर पर या शाम को आना घर 

बस साथ एक चाय की प्याली हो। 


कुछ भी न हो जीवन में लगे अगर सब बेगाना 

सब कुछ निपट जाएगा सब ठीक हो जायेगा 

सिर्फ,अगर,महज,मात्र 

बस 

साथ हो  एक चाय की प्याली। 

रविवार, अगस्त 16, 2020

बटोहिया,गिरमिटिया और घर की याद

 कल स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर WhatsApp पर एक मित्र ने बटोहिया गीत का ज़िक्र किया और एक अनुपम video भी डाला।

 गीत और गान ऐसा कि दौड़ वापस अपनी जन्मभूमि को लौट जाने को विवश करे, पुरखों तक पहुँचा देने वाला गीत,आँसू बह निकले ऐसा गीत,दिल पर चोट लगे ऐसा गीत, दूर देश में गए भारतीयों के सपनों का गीत।१९वीं सदी के उत्तरार्ध के सालों में अंग्रेज़ी हुकूमत ने बहुत से भारतीय मज़दूरों को खेतों पर मज़दूरी करने के लिए मौरिशस,फ़िजी,सूरीनाम,त्रिनिदाद आदि देशों में भेज दिया।उनके साथ एक करार होता,अग्रीमेंट,जिसका अपभ्रंश होकर हुआ गिरमिट।अधिकतर पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार से गए यह मज़दूर कहलाए गिरमिटिया और गाँव,घर द्वार,रिश्ते नाते छोड़,बेहतर जीवन,कमाई,पैसे के लिए रवाना हो जाते अनजान ठिकानों के लिए।कई परिवार के साथ जाते,कइयों के परिवार पीछे छूट जाते।व्याकुल पत्नी गाती,

रेलिया बैरन पिया को लिए जाए रे,

रेलिया बैरन पिया को लिए जाए रे

जौन टिकसवा से बलम मोरे जैहें, रे सजना मोरे जैहें,

पानी बरसे टिकस गल जाए रे, रेलिया बैरन


तीन महीने की समुद्री यात्रा वह भी उस समय जब सम्पर्क के सुगम साधन नहीं थे।जहाज के हालात बदतर,ठूँस ठूँस कर इन्हें ले जाया जाता,जो रास्ते में मर गया उसे वहीं समंदर में फेंक दिया जाता।जो मंज़िल तक पहुँचते उनके साथ पाँच  साल का करार हुआ था।सो पाँच सालों तक बंधुआ मज़दूर,शोषित,सामान की तरह ख़रीदे-बेचे जाते,औरतों के साथ दुर्व्यवहार,अत्याचार और पाँच साल बाद भी स्वतंत्र होने ऊपर कुछ पाबंदियां। अगर कुछ उधार लिया है तो करार की अवधि बढ़ जाती। गिरमिट ख़त्म होने के बाद कुछ वापस आए पर अधिकतर वहीं बस गए। वह समय था जब सन्देश पहुँचाने में महीनों लग जाते।घर बार की कुछ खबर नहीं।बड़ी ऊहापोह की स्थिति होती। यहीं रहकर नया जीवन शुरू किया जाए।या फिर जो कमाया है उसे लेकर देस वापस जाएँ। पता नहीं यात्रा पूरी भी हो पाएगी या नहीं। यहाँ खेत के मालिक बन। अपना गाँव छोड़ नयी दुनिया बसा ली। पर हृदय तो रहा भारत में ही। गाँव की याद,रीति रिवाज,वहाँ के देवी देवता,महुआ,नीबिया के पेड़,अंबवा के बगिया,कुआँ,गंगा मैया का  किनारा,चंदा सुरुज,कागा-सुगुना सब संजो कर रखा दिल में। एक सपना भी कि कभी वापस जाएंगे। अपने घर दुवार देखेंगे,कुछ मरम्मत कराएँगे,अम्मा के आँचल की छाँव,बाबू की डाँट,बहन,परिजन सब  मिलेगे । 

पाँच साल के बाद बहुत दुविधाएँ थीं,


पांच बरस कस के कमाई के

लौटब गांव पैसा जमाइके

कुछ दिन सरनाम में रहि के भाई

धीरे-धीरे आदत पड़ जाई

अब इतना दिन मेहनत कईके

सब छोड़ छाड़ वापस के जाई

सरकार के बल खेत मिल जाई

मन के कोना में एक सपना रह जाई

इहीं रही के एक दिन गांव आपन जाई के

सात समुन्दर पार कराइके.” 


तो video में दिखाए गीत की चर्चा करें।बटोहिया का गीत सुंदर सुभूमि भैया भारत के देशवा  को १९११ में बाबू रघुबीर नारायण ने लिखा था।वैसे वह अंग्रेज़ी में लिखते थे पर बाबू राजेंद्र प्रसादजी के कहने पर उन्होंने भोजपुरी में यह गीत लिखा।महात्मा गांधी ने इसे भोजपुरी में वन्दे मातरम के समतुल्य स्थान दिया।इस विडीओ में ग्यारह देशों में बसे इन्हीं गिरमिटिया मज़दूरों के वंशजों ने स्वर दिया है भावुक,हृदय की तड़प,तरसती आँखों और अपनी धरोहर और जन्मभूमि के साथ अटूट रिश्ते का यह गीत।मोरे बाप-दादा की कहानी कहकर हर बात को विह्वल स्वरों में याद करती, अपनी जड़ों को ढूंढती, रुला देने वाली  स्वर लहरी है यह। 

पूरा गीत ऐसे है 


 
सुंदर सुभूमि भैया भारत के देसवा से

मोरे प्राण बसे हिम-खोह रे बटोहिया
एक द्वार घेरे रामा हिम-कोतवलवा से
तीन द्वार सिंधु घहरावे रे बटोहिया

जाऊ-जाऊ भैया रे बटोही हिंद देखी आउ
जहवां कुहुकी कोइली गावे रे बटोहिया
पवन सुगंध मंद अगर चंदनवां से
कामिनी बिरह-राग गावे रे बटोहिया

बिपिन अगम घन सघन बगन बीच
चंपक कुसुम रंग देबे रे बटोहिया
द्रुम बट पीपल कदंब नींब आम वृछ
केतकी गुलाब फूल फूले रे बटोहिया

तोता तुती बोले रामा बोले भेंगरजवा से
पपिहा के पी-पी जिया साले रे बटोहिया
सुंदर सुभूमि भैया भारत के देसवा से
मोरे प्रान बसे गंगा धार रे बटोहिया

गंगा रे जमुनवा के झिलमिल पनियां से
सरजू झमकि लहरावे रे बटोहिया
ब्रह्मपुत्र पंचनद घहरत निसि दिन
सोनभद्र मीठे स्वर गावे रे बटोहिया

उपर अनेक नदी उमड़ि घुमड़ि नाचे
जुगन के जदुआ जगावे रे बटोहिया
आगरा प्रयाग कासी दिल्ली कलकतवा से
मोरे प्रान बसे सरजू तीर रे बटोहिया

जाउ-जाउ भैया रे बटोही हिंद देखी आउ
जहां ऋसि चारो बेद गावे रे बटोहिया
सीता के बीमल जस राम जस कॄष्ण जस
मोरे बाप-दादा के कहानी रे बटोहिया

ब्यास बालमीक ऋसि गौतम कपिलदेव 
सूतल अमर के जगावे रे बटोहिया
रामानुज-रामानंद न्यारी-प्यारी रूपकला
ब्रह्म सुख बन के भंवर रे बटोहिया

नानक कबीर गौर संकर श्रीरामकॄष्ण
अलख के गतिया बतावे रे बटोहिया
बिद्यापति कालीदास सूर जयदेव कवि
तुलसी के सरल कहानी रे बटोहिया

जाउ-जाउ भैया रे बटोही हिंद देखि आउ
जहां सुख झूले धान खेत रे बटोहिया
बुद्धदेव पृथु बिक्रमार्जुन सिवाजी के
फिरि-फिरि हिय सुध आवे रे बटोहिया

अपर प्रदेस देस सुभग सुघर बेस
मोरे हिंद जग के निचोड़ रे बटोहिया
सुंदर सुभूमि भैया भारत के भूमि जेही
जन 'रघुबीर' सिर नावे रे बटोहिया।

(रघुवीर नारायण) 

https://drive.google.com/file/d/1_NSlh16e1ZdDjJnOOtZPeBXnFnOfwylt/view?usp=drivesd


शनिवार, जुलाई 04, 2020

नाश्ते के साथी

सुबह जब फ़्लफ़ीजी को नाश्ता दिया जाता है तो हमलोग भी उस समय  सवेरे की चाय का मज़ा ले रहे होते हैं साथ में और भी अतिथिगण की मौजूदगी हमारी सुबह को तरन्नुम से भर देती है।जंगल बैब्लर,मैना और भी बहुत सी चिड़ियों की चहचहाट तो भोर  होते ही सुनने को मिलती है पर इन सबमें सबसे धृष्ट या कह लें सबसे निर्भीक होता है कौआ।फ़्लफ़ी इधर खाना खा रहा होता है कौवों की जमघट लग जाती है।सब उसे घेर कर बैठे हैं कि कब वह खाना ख़त्म करे और कब वह सब बचे हुए पर टूट पड़ें।
आज हमने बड़े ध्यान से देखा।देखिए कैसे एक कौवा औरों से अधिक साहसी है और वह फ़्लफ़ी के क़रीब पहुँच जाता है उसे हिम्मत बांधनी पड़ती है।उनकी भाव भंगिमा मज़ेदार कहानी कहती है।एक कौवा औरों से आगे बढ़ता है ज़मीन पर कुछ रोटी के टुकड़े हैं जिन पर उसकी दृष्टि जमी हुई है पर वह आसपास को और फ़्लफ़ी को भी देख रहा है फ़्लफ़ी खाना खाने में मगन है पर वह,बल्कि सारे कौवे इस बात के लिए तैयार हैं कि जैसे उसने सिर उठाया तो तुरंत उड़ जाएँ ।वह धीरे धीरे करके तिरछे खिसकता हुआ पास आता है गर्दन टेढ़ी कर फ़्लफ़ी को देखता है फुर्ती से चोंच में एक टुकड़ा पकड़ खिसक जाता है
आसपास उसके प्रतियोगी भी हैं । हम देख रहे हैं कि एक और कौवा पहले वाले से होड़ लग रहा है।
सबकी क्रिया,प्रतिक्रिया,मुद्राएँ सम्मोहित करती हैं।फ़्लफ़ी जी तो अपना नाश्ता करने में इतना व्यस्त है की उसे इन सब से कोई दिलचस्पी नहीं कि आसपास क्या हो रहा है।हममे भी नहीं।उसके बग़ल में बैठकर हम विडीओ बना रहे थे पर उसने हमें देखा तक नहीं।कौवे उससे डर डर कर उसके आसपास बैठे थे या पास आने का दुस्साहस कर रहे थे।वह  इस बात से बेख़बर था या बेपरवाह।दूसरी ओर कौवे उसकी  ओर ध्यान से देख रहे थे,प्रतीक्षा में,कुछ हिम्मती, कुछ धैर्यवान,कुछ दबंग,कुछ प्रतिस्पर्धात्मक।
आज इनका एक विडीओ बना लिया।फ़्लफ़ी जैसे ही खाना ख़त्म करके बैठता है सब उसके बचे खाने की ओर इकट्ठा हो जाते है।हमलोग भी उसका डिब्बा लॉन में रखकर कुछ और रोटी डाल देते हैं वह भी एक अलग मनोरंजक दृश्य होता है
देखें सुबह सवेरे का यह दृश्य इस video में