शुक्रवार, जून 20, 2008

सलाम काबुल-३

टिप्पणियों से हौसलाफजई हुई है...तशक्कुर . इसके जवाब में बड़ा ही मीठा सा " काबिले तशक्कुर नीस्त " सुनने को मिलता है. यह जवाब मुझे इतना मीठा लगता है की कहना नहीं भूलती .और आप भी शुक्रिया या तश्क्कुर का जवाब ऐसे पाएँगे सबकी ज़बान से... मिलने पर असलाम वालेकुम के बाद एक सिलसिला आपकी खैरियत पूछने का ।खूबस्ती, खाने-खैरतस्ती ,चतुरस्ति . और आप बोलेंगे खूब हस्तम चतुर हस्तम। अपना दाँया हाथ सीने पर रखकर स्वागत करते हैं लोग.


दिल्ली से काबुल के लिये एयर इंडिया की उडानें हैं जो बुधवार को छोड हर दिन जाती हैं.फिलहाल यह सवेरे .४० पर दिल्ली अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से चलती हैं.सफर तकरीबन पौने दो घंटे का है. आपको वीसा लेना पडेगा .वैसे अफगानिस्तान की दो और विमान सेवायें भी हैं काम एयर और आरियाना जो शायद ज़्यादा सस्ती हैं पर भरोसेनमंद नहीं .दिल्ली से किराया लगभग १४००० के आसपास है ( आने जाने का,इकोनमी क्लास! )
आइये कुछ काबुल की सैर हो जाए



















काबुल की सबसे खूबसूरत जगह है "बाग़े बाबुर " जहाँ मुगल बादशाह बाबर का मकबरा है .बाबर समरकन्द से काबुल आये और फिर वहाँ से हिन्दुतान का रुख किया.पर हिन्दुस्तान का मौसम उन्हें पसन्द नहीं था.उनकी ख्वाहिश थी कि उन्हें उनके प्यारे काबुल में ही दफ़न किया जाए. उनकी इच्छा थी कि उन्हें आसमान के नीचे बिना ज़्यादा लाग लपेट के दफनाया जाए .सो उनकी कब्र भी खुले आसमन के नीचे है .सिर्फ चारों ओर बहुत ही सुन्दर जाली है।





तकरीबन २५ एकड़ में बने इस बाग़ को बाबर ने बनवाया था.गृह युद्ध में यह भी काबुल के अन्य स्थलों की तरह यह भी क्षतिग्रस्त हो गया था. इसके पीछे पहाड़ हैं जहाँ से गोले दागे जाते थे.इस बाग़ में बारूदी सुरंगे भी बिछाई गयीं.



अब आगा खान ट्रस्ट ,और संयुक्त राष्ट्र की मदद से इसको पुनः उसी रूप में लाया जा सका है.कहते हैं मुग़ल काल के बागों की विशिष्ट चारबाग नुमा रचना इसी बाग़ पर आधारित है .






यहाँ शाहजहाँ द्वारा बनायी गयी एक मस्जिद है













यह फोटो रेस्टोरेशन के काम से पहले की है और इसमें गोलों के निशान साफ़ नज़र आ रहे हैं.चित्र आभार http://www.bbc.co.uk/

बुधवार, जून 04, 2008

सलाम काबुल- २ (बुज़काशी )




बुज़काशी अफगानिस्तान का पारम्परिक राष्ट्रीय खेल है । यह घोडों पर सवार होकर खेला जाता है। घुड़सवारों की टीमें होती हैं और बीच में सफ़ेद रंग से एक गोला (दायरे- हलाल) बना दिया जाता है । एक बकरी को मारकर धड़ अलग कर उसके शरीर को बीच में रख देते हैं.घुड़सवार उस मृत बकरे, वजन १०० किग्र के आसपास होता है , को उठा कर उस गोले में डाल देते हैं। जाहिर है दूसरी टीम इस कार्य में उनका विरोध करती है और बकरा छीनने की कोशिश करते हैं। गोल करने वाले सवार की टीम को हर गोल पर इनाम मिलता है । इनाम वहाँ मौजूद विशिष्ट व्यक्ति देते हैं। इस खेल में कौशल है उन घोडों का जिनको खासतौर से बुज़कशी के लिए तैयार किया जाता है और सवारों का.यह काफी रफ खेल होता है जिस में घुड़सवार चाबुक चलने में कोई संकोच नही करते।
पुनश्च: बकरे १०० किग्रा का होता है यह पढ़कर अमित खूब हँसे और बोले बकरा है या हाथी। और वहाँ पर कोई भीम नही है की घोडे पर चढ़कर दौड़ते हुए १०० किग्र उठा ले .पर मैंने कहीं पढा था की यह १०० किग्र तक हो सकता है .सो लिख दिया.बरहाल बकरा कितना भी मोटा किया गया हो २५,३०,५० किग्रा का होगा।




सलाम काबुल -१

इस बार फ़िर गर्मी की छुट्टियों में काबुल जाने का कार्यक्रम बना। अफगानिस्तान का नाम सुनते ही लगता है की अरे यह भी कोई जगह हुई जाने की । दिल्ली से एयर इंडिया की उड़ान है सवेरे ७.४० पर। १ घंटे ४५ मिनट का सफर है और जब तक आप सवेरे की टूटी हुई नींद पूरी करते हैं,जहाज काबुल के ऊपर पहुँच जाता है। छोटा सा हवाई अड्डा है .कुछ जान पहचान होने के कारण अमित हमें हवाई जहाज की सीढी के पास ही मिल गए । निकलते समय वहां के लाउंज में एक अफगानी महिला अधिकारी से मुलाक़ात हुई.उनसे हुई बातचीत से ही पता चलता है भारत (हिन्दुस्तान ) के प्रति अफगाननिवासियों का प्रेम और भारत से उनकी आशाएं.शायद ५ मिनट की मुलाक़ात में उन्होंने गुजारिश की काबुल में इंडियन स्कूल फ़िर से खोले जाएँ। भारतीय वहाँ सबसे लोकप्रिय विदेशी हैं । लोग हिन्दी बखूबी समझते हैं और काफी लोग उर्दू बोल लेते हैं। भारतीय टीवी सीरियल का वहाँ बोलबाला है। एक टैक्सी चालक का कहना है तुलसी अगर यहाँ चुनाव में खडी हो जाएँ तो राष्ट्रपति चुन ली जायेंगीं!! अतिश्योक्ति ,पर इससे इन सास बहू वाले धारावाहिक की लोकप्रियता का अंदाजा लगाया जा सकता है।
यह एक रोचक रिपोर्ट है इसी से सम्बंधिंत ।
http://www.iwpr.net/?p=arr&s=f&o=344606&apc_state=henparr
भारतीय चैनलों के अलावा यह सीरियल दरी (वहाँ की भाषा ) में डब कर के जाते हैं। हाँ, पर जहाँ भी पोशाकें उनकी मर्यादा की सीमाओं को तोड़ने लगती हैं,उन पर फज़िनेस कर दी जाती है। अमिताभ बच्चन और शाहरुख़ खान पसंद किए जाते हैं ।दुकानों पर हमने तुलसी,मिहिर ,शाहरुख खान के पोस्टर देखे।



भारत वहाँ के पुनः निर्माण में बड़े पैमाने पर लगा है। इसलिए वहाँ की जनता में भारत और भारतीयों के प्रति बेहद आदर और सौहाद्र है। गर्मजोशी से स्वागत होता है।





गुरुवार, मई 29, 2008

काबुल फ़िर से २००८


खँडहर कहते हैं इमारत की बुलंदियों की कहानी
काबुल का दारुल अमन (शान्ति का घर) जो एक समय यहाँ के राजा का महल था .१९२० में यहाँ के राजा अमानुल्लाह खान ने इसको बनवाया था और उनका इरादा था अफगानिस्तान में प्रजातंत्र स्थापित करना । नब्बे के दशक में यह शानदार इमारत मुजाहिदीन की लड़ाई में ध्वस्त हो गयी.अब यह बेजार पडी है .कुछ हिस्से NATO द्वारा चेक पोस्ट के लिए इस्तेमाल होते हैं।


गुरुवार, मार्च 27, 2008

जोधा अकबर

बोर्ड की परीक्षाएँ खत्म हुईं और प्रोग्राम बना जोधा अकबर देखने .फिल्म तो पिछले महीने रिलीस हो गई थी पर इम्तिहान के चलते देखने का मौका अब मिला। देखने का मुझे बहुत शौक नहीं है और ह्रितिक रोशन , ऐश्वर्य राय दोनों ही मुझे कोई ख़ास नहीं सुहाते पर आशुतोष गोवारिकर की फिल्म थी सो देखना था .वैसे भी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर बनी फिल्में मुझे पसंद हैं ।
साढ़े तीन घंटे की को मैंने ०-१० के स्केल पर ७.५ नम्बर दिया फिल्म के सेट की शानो शौकत पसंद आयी .भव्य सेट जिसमें राजसी राजपूत महलों और मुगलिया दरबार का शाही अंदाज़ दोनों दिखाने में फिल्म के कर्ता धर्ता सफल रहे। ह्रितिक रोशन ने अच्छा अभिनय किया खासतौर पर जहाँ नज़ाकत से करना था।शाही अन्दाज़ भी अच्छे से निभाया। दो तीन जगह तो खासा प्रभावित किया जैसे कि जब वो जोधा से पहली बार मिले। हाँ ऐश्वर्या ने भी अपने अभिनय का अलग अन्दाज़ पेश किया। मुझे लगता उनके अभिनय ,उनके बोलने के तरीके, उनके नृत्य में कुछ ज़्यादा लटके झटके होते हैं। पर उन सबके विपरीत इस फिल्म में उन्होंने अपने संतुलित अभिनय से प्रभावित किया। एक राजपूतानी की गरिमा को बखूबी निभाया । ह्रितिक और ऐश्वर्या की जोडी में भी सामंजस्य अच्छा है। कुछ दृशय तो बहुत ही अच्छे लगे । जब जोधा अपना बनाया खाना चखती हैं और अकबर का कहना कि वह उसकी झूठी थाली में ही खायेंगे । तलवार की जुगलबंदी ,जोधा का सूरजमल के साथ दृशय ,ऐश्वर्य और इला अरुण के बीच का तनाव । अकबर जब आदम खान के समक्ष जोधा का सम्मान करता है तो लगा पति हो तो ऐसा। लडाई के दृश्यों में कुछ ऊब सी लगने लगती थी। कभी कभी यह भी लगता था जैसे निर्देशक कभी कभी जोधा अकबर के प्रेम को उतना न्याय नहीं दे पाए क्योंकि वह साथ में उस समय के राजनीतिक और ऐतिहासिक परिवेश को भी उतना ही महत्व देना चाह्ते थे जितना प्रेम कथा को। एक राजनीतिक सौदा कैसे प्यार में बदल गया इसका अहसास, जैसे जैसे फिल्म आगे चलती है ,होता जाता है। लेकिन यह बात है कि एक ऐसे बादशाह् को जो सब धर्मों की इज्जत करता था,प्यार से दिलों को जीतना चाह्ता था और बहुत ही सुलझे विचारों का था , उसके लिये जोधा का ज़िन्दगी में शरीक होना ,उसके व्यक्तित्व में नया आयाम ला देता है।
पूनम सिन्हा को पहली बार पर्दे पर देखा अकबर की वालिदा हमीदा बानो कि किरदार में।कितनी सुन्दर हैं।हम सब की नज़र पडी अकबर के चारों और घूमते खूंखार पहरेदारों पर . कलाकारों का चयन अच्छा था।मुझे पोशाकें पसंद आयीं ,वास्तविक लग रही थीं ।वैसी ही जैसे कि हमारे जहन में होती हैं जब हम उस समय के बारे में सोचते हैं । जोधा के गहने ,क्या कहने। " कहने को जश्ने बहारा " गुनगुनाते हुए बाहर आए ।
देखने के बाद अच्छा लगा लेकिन कुछ कमी सी भी लगी जैसे कुछ और हो सकता था.

गुरुवार, मार्च 13, 2008

मेरा अपने से क्या रिश्ता है

कितने रिश्ते बनाते हैं हम
और न जाने कितने रिश्ते निभाते हैं हम
पर अपने से कोई रिश्ता बनाया है क्या हमने
कभी ख़ुद से कुछ निभाया है हमने ?

सब रिश्ते बेमानी हैं अगर
ख़ुद को नहीं पहचाना है हमने
भाई बहन ,माँ बाप,पति, पत्नी,
पिता,पुत्र, पुत्री,मित्र,सहेली
दोस्त
सबका वजूद तभी है
जब हम हैं ।
अगर अपनी पहचान झूठी है
तों रिश्तों की सच्च्चाई क्या है ?

शनिवार, मार्च 08, 2008

नाम में क्या रखा है

कहने को तो नाम में क्या रखा है । अपनी पहचान तो उसी से होती है।और आजकल तो सही नाम रखने के लिये न्यूमारालोजी का सहारा भी लिया जाता है। पर विश्व की सबसे सफल कंपनियों के नाम के पीछे की कहानी काफी रोचक है। गौरतलब है कि उनमें से किसी ने ज्योतिष या न्युमेरोलोजी का सहारा नहीं लिया पर सफलता के शिखर पर हैं.

एपल कंप्यूटर के संस्थापक स्टीव जोब्स को सेब बहुत पसंद थे। उनको अपनी कंपनी का नाम नत्थी कराने में तीन महीने का विलम्ब हो गया .जब उनके साथी कोई वाजिब नाम नहीं सुझा पाए तो उन्होंने अपनी कंपनी का नाम रखा एप्पल कम्प्यूटर्स।

CISCO सुनने से लगता है किसी का परिवर्णी शब्द होगा पर वास्तव में यह सान फ्रांसिस्को से लिया गया है।

LOTUS का नाम लिया गया है योग के पद्मासन यानी लोटस मुद्रा से।


माइक्रोसॉफ्ट बना है माइक्रोकमप्यूटर और सॉफ्टवेर के हिस्सों को जोड़कर ।

मोटोरोला के पाल गल्विन ने कारों के लिए रेडियो बनाने शुरू किए और उस समय की लोकप्रिय कम्पनी वित्रोला के नाम पर रख दिया मोटोरोला।

गूगल का नाम इस विचार से बना की इससे कितनी जानकारी खोजी जा सकती है.शायद गूगोल यानी की १ के बाद सौ शून्य.जब सेर्गे बरीं और लैरी पेज ने एक निवेशक को यह प्रोजेक्ट बताया तो उन्हें चेक मिला गूगल के नाम से और गूगल महाराज के क्या कहने !

याहू बनाया था गलिवार्स ट्रेवलस के प्रसिद्ध लेखक जोनाथन स्विफ्ट ने उन जीवों के लिए जो देखने में अरूचिकर हैं और जिन्हें मुश्किल से मनुष्य कहा जा सकता था। याहू के प्रवर्तकों जेरी यांग और डेविड फिलो का मानना था की वे याहू हैं!

ह्यूलेट पैकर्ड के संस्थापक बिल ह्यूलेट और डेव पैकर्ड ने सिक्का उछाल कर इस बात का निर्णय कर लिया की कम्पनी का नाम ह्यूलेट पैकर्ड हो या पैकर्ड ह्यूलेट .और कौन जीता यह तो पता ही है!

बुधवार, फ़रवरी 27, 2008

शतक ,दोहरा शतक और अर्द्ध शतक

कई चिट्ठे पढे जिनमें सौंवी पोस्ट या दो सौंवी पोस्ट का ज़िक्र हुआ और जश्न मना। बधाई उन सबको जो यह मील के पत्थर गाड़ पाये। कई तो घर से निकले मेरे काफी बाद पर इन स्टेशनों पर उनकी रेलगाडी पहुँच गई बहुत पहले । यहाँ तो ट्रेन मालगाडी की तरह रुक रुक कर आगे बढ़ रही है.सुस्ताती ज़्यादा समय है ,चलती कम । और अन्य तेज़ रफ्तार वाली गाड़ियों के लिए रुक जाती है.कई बार तो पटरी से उतरी हुई लगी। पर यह ऐसा ट्रैक है की वापस पटरी पर लाना मुश्किल नहीं।

सोचती हूँ ऐसा क्या है की औरों के शतक , दुहरे शतक बन गए और अपना अर्ध शतक भी न बना.बाक़ी खेल रहे हैं एक दिवसीय मैच और मैं अभी भी वही पुराने लहजे में टेस्ट मैच! और टेस्ट मैच में भी कुछ श्रीकांत की तरह बैटिंग कर रहे है और मैं हूँ गावस्करनुमा या फ़िर रवि शास्त्रीनुमा। गावस्कर ने कमसेकम शतक तो बनाए।

कछुआ चाल है ,खरामा खरामा बढ़ रही है। बीच बीच में अपने कवच के अन्दर घुस कर फ़िर हौले से बाहर कि दुनिया देखी । आगे पीछे कोई ख़तरा तो नहीं और फिर बढे आगे।

सोचिये मैंने पहली पोस्ट लिखी थी फरवरी २००६ में .तब से दो साल के अंतराल पर लिख पायी कुल ४० पोस्ट्स । सोचती हूँ क्या कारण है।
समयाभाव तो सबसे पहले नंबर पर है ।फुरसत कम , काम ज्यादा ...किसी काम को न करने का सबसे सस्ता टिकाऊ बहाना!! लेकिन समयाभाव के साथ साथ अभाव है उत्प्रेणन का.एक जूनून का कि न सिर्फ़ कुछ लिखूं बल्कि बहुत उत्कृष्ट लिखूं। आलस का घर है यह मन मेरा.कौन इतनी मेहनत करे ,इस बारे में सोचने का कि अब किसा विषय पर लिखा जाए ,एक रूपरेखा तैयार की जाए और फ़िर टंकण .तौबा करो.वैसे भी मुझे कौन सा गोल्ड मेडल लाना है चिट्ठा लेखन में। और यह जो सब सर्वश्रेष्ट चिट्ठे आदि के अभियान है.....उहूँ यहाँ भी वही ऑफिस जैसी रेटरेस .न बाबा मुझे नही पसंद .अपना चिट्ठा बनाया अपनी रफ़्तार से लिखेंगे। नायाब तरीके है अपनी अकर्मण्यता को उचित ठहराने के लिए ।

सृजनात्मक आलस भी है.बुद्धि लगानी पड़ेगी सोचने में कि क्या लिखें कैसे लिखें । रचनात्मकता की अंतर्जात सीमाएं है जिससे बंधी हूँ कि बस इतना ही सोच सकती हूँ, इतना ही लिख सकती हूँ.अभिव्यक्ति की परिधि है छोटी और कई बार विचार ,कल्पना और भाव को व्यक्त करने में असमर्थ हो जाती हूँ .ऐसे समय न सिर्फ़ अपने सीमित भाषा ज्ञान पर क्रोध आता है बल्कि असहाय महसूस करती हूँ। विषय असीमित हैं,रुचियाँ भी कम नहीं ,ज्ञान का विस्तार है शायद औरों की अपेक्षा कम पर फ़िर भी कामलायक,उम्र के चालीस से ज्यादा बसंत देखने के बाद अनुभव भी विविध है.फ़िर क्या हो सकता है?
चिट्ठा जगत में आए दो साल हो गए अभी तक टिकी हूँ शायद यह भी एक उपलब्धि ही है.दो साल पूरे करने पर "थ्री चियर्स "!!!

गुरुवार, फ़रवरी 21, 2008

गुमसुम

HASTINGS: You have lived very much among them. In truth, I have been often surprised, that you who have seen so much of the world, with your natural good sense, and your many opportunities, could never yet acquire a requisite share of assurance.....

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MARLOW.: .....An impudent fellow may counterfeit modesty; but I'll be hanged if a modest man can ever counterfeit impudence.

("She Stoops to Conquer" Oliver Goldsmith )

हौले से परदा हटाकर ,वो झांकती है । ललचाता है उसका भी मन। हाय कैसे वह झट से जो मन में आता है बोल देती है। क्या विश्वास से चलती है.ज़रा भी हिचकिचाहट नही, है उसे न कोई संकोच। फट जाकर बात कर लेती है।

कैसे फुर्ती से उसने अपनी टीचर को जवाब दे दिया.क्या दोस्ताना तरीके से वह बात करती है अपने बास से.आँखें बंद कर वो सोचने लगी। पर तब भी नहीं ला पायी वो तफ्री वाला अंदाज़ .तफ्री में भी तो है.... और फ्री !! वो है की अपने सपनों में भी सिमटी ,सकुचाती।

दिल के एक छोटे से कोने में बैठती है उसकी यह परछाई । कभी कभी बाहर झांक कर हिम्मत करना चाहती है पर तुरंत फिर वही अपना सीप .उसे लगता है पर्दा हटाएगी तो कयामत हो जाएगी.लोग कुछ कहेंगे तो उसका जवाब दे पाएगी क्या .अपने तारीफों के पुल बांधना ...न बाबा .काम करो और आगे बढो । कैसे कहे वह अपने मुंह से की उसने कितना काम कर दिया। नुकसान तो बहुत है न कहने से .घर में भी और आफिस में भी.पर यह परदे के पीछे से झांकती लड़की बाहर ही नहीं आती।

आई तो थी एक दो बार .पर दो वाक्य से ज़्यादा बोलने पर लाल होते गाल उसे वापस भेज देते. हाँ काम की बात करनी हो तो उसका जवाब नहीं.क्या क्या नही जानती। पर" स्माल टोक " . उफ़, क्या मुसीबत है .

सपने में तो कुछ भी सोचा जा सकता है। पर वहाँ पर भी क्यों लगता है उसे की यह उसके बस का नहीं .कुछ तो सलीका होगा की पर्दा हटा सके थोडा सा ही सही .

गुरुवार, फ़रवरी 07, 2008

मुलाकात मकबूल फिदा हुसैन से

मकबूल फ़िदा हुसैन के बारे में एक पोस्ट पढी .मुझे भी एक वाक़या याद आया जब मैंने उनसे औटोग्राफ लिया था.बात १९९३ की है.फरीदाबाद का मशहूर सूरज कुंड मेला चल रह था.थक हार कर शाम को हम बाहर निकले तो मेरी नज़र पडी एक लंबे गोरे हैंडसम शख्स पर .सफ़ेद बाल और सफ़ेद दाढी .ध्यान से देखा तो नंगे पाँव .दिमाग में कुछ पढा हुआ याद आया.कहीं पढा था कि एम ऍफ़ हुसैन जूते नहीं पहनते .वो कुछ आगे तेज़ी से चलते जा रहे थे और मैं भीड़ में फंसी.पर फिर भी दौड़ लगाई और पहुँची उनके पास। औटोग्राफ के लिए कागज़ ढूँढने लगी पर साथ में तो बटुवा भी नहीं था.तुरंत अपना शाल आगे बढ़ा दिया .पर अब कलम नहीं. हुसैन साहब ने मुस्कराकर अपने झोले से पेन निकाली और मेरे पीले शाल के कोने में अपने ह्स्ताक्षर कर दिए।
सिर पर हाथ फेरा.मैंने भी शुक्रिया किया और सूरज कुंड के उस मेले का यह अमोल तोहफा संभाल कर रख लिया.कहना न होगा वह शाल पहनने के काम तो फिर न आया .पर यह घटना सुनाते समय और वह क्षणिक मुलाक़ात को याद करने के लिए में बडे बाल सुलभ उत्साह से उसे दिखाती हूँ ।

सोमवार, जनवरी 21, 2008

संदेस

चाँदनी में लिपटे
कुछ
ख्वाबों को भेजा है
पास तुम्हारे।

रात के अंधेरे में
चाँद पाएगा एकाकी तुम्हें
रखेगा हौले से ख्वाब मेरे
तुम्हारी पलकों पर

और जवाब में लाएगा
वो तुम्हारी सिहरन
हलकी सी मुस्कान की
वो मिसरी
नमी तुम्हारे आँखों
के कोरों की

मैं चाँद को निहारती
चाँदनी को हथेली में मलती
तुम्हारे सपनों को ढालूंगी
अपनी आँखों में।

शनिवार, दिसंबर 29, 2007

लखनऊ हम पर फ़िदा-2

लखनऊ के रहने वालों को इस शहर से प्यार इस कदर होता है

'लखनऊ हम पर फ़िदा, और हम फिदाए लख्ननऊ
क्या है ताकत आसमां की, जो छुडाये लखनऊ.'

मुझे याद है युनिवर्सिटी के ज़माने में जब हमें होली या विदाई समारोह में 'टाइटिल' देने होते थे तो शेर-ओ-शायरी का बडा सहारा रहता था.आखिर इस शहर की रवायत ही ऐसी है.

महबूबा को खत लिखा तो इस उम्मीद के साथ

'सियाही आँख की लेकर मैं नामा तुमको लिखता हूँ
कि तुम नामे को देखो और तुम्हं देखें मेरी आँखें'

लेकिन इतना करने के बाद भी उधर से कोई आवाज़ दे ऐसा ज़रूरी नहीं .

'नामावर तू ही बता,तूने तो देखे होंगे
कैसे होते हैं वह खत ,जिनका जवाब आता है.'

हाय रे किस्मत,वो पढते भी हैं और आँखें भी चुराते हैं.
'खत ग़ैर का पढते थे ,जो टोका तो वो बोले
अखबार का पर्चा है खबर देख रहे हैं '
याद आया वो कॉलेज के दिन जब छुपछुप कर उन्हीं पर नज़रें रहती थीं ,पर जैसे ही वो इधर देखते आँखें आसमान पर या किताबों पर गड जातीं ?
यह उम्मीद भी बेमिसाल है
' बरसों से कानों पे है क़लम इस उम्मीद पर
लिखवाएं मुझसे खत ,मेरे खत के जवाब में '

लेकिन जब खत पडा जाता है तब के लिये हिदायतें हैं

'नामे को पढना मेरे,ज़रा देखभाल के,
कागज़ पर रख दिया है,कलेजा निकाल के'

बुधवार, दिसंबर 19, 2007

लखनऊ हम पर फ़िदा

एक उत्सुकता सी मन में जागी है कि जिस शहर में मैं रहती हूँ उसका इतिहास क्या है,उसका अतीत कैसा था,उसकी बुनियाद क्या थी ,उसकी शख्सियत क्या थी .वह क्या था जिसने लखनऊ को एक अलग सा परिचय दिया है .यह जो इमारतें आते जाते हम देखते हैं इनके पीछे कौन सी कहानियां है.किसने इन्हें बनवाया,क्या सपना था उनका इस शहर के बारे में . कैसा रहा होगा लखनऊ पहले का? यह जो सडक है इस पर पहले का नज़ारा कैसा था .कहाँ से आती थी और कहाँ तक जाना था? बहुत किस्से सुने है यहाँ की नज़ाकत,नफ़ासत और तहज़ीब के.'पहले आप वाला' किस्सा तो लखनऊ का नाम आते ही कोई भी बता देता है.पर यहाँ के नवाबों के शौक , उनके मिज़ाज के बारे में भी बहुत कुछ सुना है.
गोया पहुँचे यहाँ की प्रसिध्द किताबों की दुकान युनिवर्सल बुकसेलर्स.इसकी कई शाखाएं हैं . अलीगंज के कपूरथला कॉम्प्लेक्स में मिली यहाँ के मशहूर लेखक योगेश प्रवीण की लिखी किताबें . अभी तो पढना शुरू किया है.चिकन कारी के बारे में,बेगम अख्तर की गायकी के बारे में,कबाब ,रेख्ती, ठुमरी ....बहुत कुछ. पता चल रहा कि संजय दत्त की नानी जद्दन बाई इसी शहर की थीं.अब बस करना यह है कि एक कैमरा लो और जो पढती जा रही हूँ ,उस जगह जा कर कैमरे में कैद करो.खयाल नेक है खयाली पुलाव न बन जाए .

गुरुवार, दिसंबर 13, 2007

चीं चीं चैं चैं

कितना बोलते हैं हम अपने आपसे.यह अंदर का संवाद है कभी खत्म नहीं होता .जब देखो बातें किसी भी चीज़ पर,कहीं भी .सवेरे उठेते ही,दिन मे ,ऑफिस में . कुछ भी कर रहे हों अन्दर के 'सी पी यू' की 'प्रोसेसिंग ' चलती ही रहती है.
बेटी को श्यामक दावर के डांस क्लास में भरती का दिया है.अपनी भी ड्यूटी लगी है.ले जाओ ,एक घंटे बैठी रहो . जब वैसे ही कितनी बातें करती हूँ खुद से तो सोचिये एक घंटे बैठे ठाले क्या क्या सोच डाला .मुझे बहुत अच्छी लगती हैं लडकियां .कितनी चुलबुली हैं .कितनी उत्साहित हैं .कितनी कॉनफिडेंट . सच यह उम्र होती ही ...चटपट चटपट बातें करने की,खिलखिलाने की, गिगल करने की .अरे वह चुपचाप क्यों खडी है.चलो जाओ दोस्त बनाओ, हंसी पर रोक मत लगाओ .बोलने पर बंदिश नहीं .मुस्कराहट भी कितनी नाज़ुक सी है सबकी .शायद मिल्स एंड बून पडती होंगी .पर यह क्या एक के हाथ में सिडनी शेलडन .आजकल के बच्चे ज़्यादा जल्दी बडे हो जाते हैं .
डांस इंसट्रक्टर आया .अनजाने में सब थोडा इतरा रही हैं . कोई कट कर अलग से कुछ कहने लगी .एक फुसफुसाहट हुई " हे कूल डयूड मैन.हीस गाट एन ऐटिटयूड "! और फिर कनखियों से इधर उधर देख कर गिगल .
और कपडे ...स्टाइलिश. वह हल्की गुलाबी केपरी क्या जंच रही है . स्कर्ट अच्छी है पर ज़रा छोटी .जैसे जैसे उम्र बडती है स्कर्ट की लम्बाई भी बडती है.याद आया कभी मम्मी ने मेरी शॉर्ट स्कर्ट को लंबा कर दिया और मैं कितना नाराज़ हुई थी उनसे.क्या मस्ती है और बेफिक्री भी.
'ओह कम ऑन यार .डोन्ट बी अ स्पोइल स्पोर्ट .वी'ल हेव फन'
'बट माय माँ'स गोना मर्डर भी इफ आई'म लेट .'
कभी हम भी तो ऐसे ही थे.क्या इनको विशवास होगा अगर मैं बताऊँ कि यह सब एक 'डेजा वू ' की तरह है. यह सफेद बालों वाली आंटी भी ऐसी ही भाषा बोलती थीं .
ओहो मुझे भी जॉइन कर लेना था.कुछ नहीं तो कायदे से हाथ पैर मारना ही आ जाता .एक अपनी ही उम्र के दंपति को क्लास में जाते देखा .गम हुआ ...मैं भी तो सीख सकती थी.अरे कहाँ ...अकेले क्या मज़ा .पतिदेव साथ होते. हाँ लौट कर आएंगे तो ज़रूर सीखूँगी .वैसे हम दोनों ही के पास 'टू लेफ्ट फीट ' हैं. पर उससे क्या. नाचना है तो नाचेंगे ही. बच्चे बोलते थे हम आप लोगों को 'डिस ओन ' कर देंगे अगर आप लोग नाचने पहुँचे .'डिसओन 'करने में बिल्कुल अव्वल.जब देखो तब .आपलोग मेरे दोस्तों के सामने ऐसे कपडे पहन कर जाओगे ....'डिस ओन ' की धमकी .हाथ मत पकडना बाज़ार में...हम लोग डिस.......... हल्की मुस्कान आ गयी .नज़र एक ओर गयी तो देखा एक लडकी मुझे घूर रही थी .मैं सकपका गयी . सठिया गई ?
ड्रेस डिज़ाइनर आ गई .सरगर्मियां बढ गईं.रंग के चुनाव ,डिज़ाइन,क्या नहीं है ....सोचने को .माहौल गर्म हो गया .डिसकशन तू तू मैं मैं बनने जा रहा है .'शी इस सच अ बि....
'हेलो ,क्या कहा'
''कुछ नहीं !'
चलो यार .हम लोग सर से बात करते हैं.सम पीपल अरे एक्टिंग टू प्राइसी'
सर भी आ गए.डांस इंसट्रक्टर .....ताली बजा कर उसने सबका ध्यान खींचा.मैं सोचती उसकी ज़रूरत ही नहीं थी .आधी तो वैसे ही उसे देख रही थीं.कैसे उसने तुरन्त कमान अपने हाथ में ले ली.बहुत खूब.सारी चीं चीं चैं चैं बन्द. चलो मेरे भी ने का समय हुआ.अब अन्दर की चीं चीं चैं चैं किसी और विषय पर.

शुक्रवार, दिसंबर 07, 2007

रांग नम्बर

"हैलो !"
"हैलो!"
"हैलो.....?"
"अरे भाई आगे भी बोलिये !किससे बात करनी है?"
"जी आपसे"
"मुझसे?"
"जी."
"अरे कुछ नाम पता होगा ."
"जी आप ही का नाम है.
"अच्छा ....?"
"मेरे नाम वाले तो बहुतेरे हैं.शायद नम्बर गलत लग गया..आपका."
"नहीं.अबकी सही लगा ."
"कैसे पता?"
"आप तक जो पहुँच गया"
"तो क्या काम है मुझसे?"
"जी,आपका नाम जानना था..."
"अभी तक तो पता था ."
"पर अब याद नहीं."
"बडी कमज़ोर याददाश्त है.जब याद आ जाए तब दुबारा फोन कर लीजियगा"
और मैंने फोन रख दिया .


"हैलो !"
हैलो!"
"हैलो.....?"
आप कहाँ से बोल रही हैं?"
"आपने कहाँ फोन किया ?"
"आप कहाँ से बोल रही हैं?(अब की आवाज़ ज़रा ज़ोर देकर आई)
"आपने कहाँ फोन किया ?"(मैंने भी आवाज़ कडक की)
"लोग बताते ही नहीं कहाँ से बोल रहे हैं"
फोन कट जाता है.


मोबाइल पर मोबाइल से फोन आया ...फिर भी
"हैलो !"
"हैलो!"
"संजय से बात करनी है?"
"यहाँ कोई संजय नहीं है . नंबर चेक कर लीजिये ."
"आपका क्या नम्बर है?"
"आपने जो मिलाया है."
"पर आपका नम्बर क्या है?"
"जो भी है कम से कम संजय का तो नहीं है."
"आप उससे बात करवा सकती हैं?"
"ज़रूर करवा देती ,लेकिन उसका पता ठिकाना नहीं मालूम."
"नम्बर तो यही था ......?आपका नम्बर क्या है ?"
"याद नहीं "
मैं ही फोन काट देती हूँ.

शनिवार, सितंबर 29, 2007

नाम से तेरे आवाज़ मैं न दूँगा


नाम से मेरे वो कभी पुकारता न था मुझे


नाम लेने भर से सिहर जाता हूँ मैं


सोचो हाल कैसा होगा जब मिलूँगा तुझे


मिलने के नाम से घबरा जाता हूँ मैं .

मंगलवार, सितंबर 25, 2007

बेटी

माँ की गोद में सिर छुपा दिया .उसने भी सिर पर हाथ फेरा ,हौले से मुस्कुराई और हम एक अंतरंग चुप्पी में बैठ गए.सोच रही हूँ मैं ......मेरी बेटी खेल रही है वहीं आसपास कहीं .वह हम दोनों को देखती है ,मुस्कुराती है ,और एक अनकही समझदारी से वापस खेलने लग जाती है .कह गई, मैं भी तो इसी साझेदारी में शामिल हूँ.लुका छुपी खेल रहे हैं और वह कहीं अँधेरे कमरे में छुप जाती है.अचानक वह अँधेरा ही उसे डरा देता है.चिल्लाती है वो और मैं उसे अपने गले से लगा लेती हूँ.ज़ोर से भींचती हूँ और वह अपनी नन्हीं बाँहें मेरे गले में डालकर हंस देती है.उसकी हँसी पर मेरी जान निछावर है.चलो फिर खेलें ....वो कहती है.अगर फिर डर लग गया तो.आप हैं न ...! मैं भी आपके साथ रोटी बनाऊँगी .मम्मी सिर दर्द कर रहा है क्या.मैं दबा दूँगी बिल्कुल ठीक हो जाएगा .सोचती हूँ सारी पूँजी बाँटूगी इसके साथ.जो कुछ मेरी माँ ने सिखाया मुझे.क्या वाकई सिखाया था.नहीं तो.फिर न जाने कैसे वो सब चीज़े मुझे भी आ गई जो मेरी माँ करती थी.उसी की तरह घर की देखभाल .कढाई,बुनाई....सिलाई.किताबों का शौक .उसी अंदाज़ से बुकमार्क लगाना.माँ से पूछा मैंने यह सब सिखाया कब आपने.मुझे तो याद नहीं.और वो हंस दी .बोली .....सिखाया नहीं तुम्हारी मदद ली थी सिर्फ .

बडी हो गई मेरी बेटी अब. दोस्त है वह . सिर भी दबाती है और दिल का हाल भी सुनती है.डांट भी देती है.मीठी सी झिडकी उसकी .हम दोनों आपस में कुछ गुपचुप करते हैं .मदर्स डे पर कार्ड देती है और फ्रेंशिप डे पर बाँधती है फ्रेंड्शिप बैंड.नानी क्या ममा हमेशा तुम्हारी बात मानती थी.और मम्मी हंस देंगी .ऐसा कभी हुआ है कि बच्चे मां बाप की हर बात माने.और मुझे जीभ दिखाती है,बिल्कुल मेरी तरह .मेरी गोद में सिर छुपा लेती है बिल्कुल मेरी तरह .

शनिवार, सितंबर 01, 2007

हमतुम


तुम्हारे नाम के साथ जोड लिया
जब से है नाम अपना
ऐसा लगता है सच होने लगा
देखा हुआ हर सपना

तुम साँस लेते हो तो चलती है
घुली हुई साँसें हमारी
दुनिया को देखा था पहले भी कभी
अब जो देखा तो नज़रें तुम्हारीं


शुक्रवार, जुलाई 27, 2007

साया

देखो नक्शे कदम पर तुम्हारे ऐसे चल रह हैं हम
कदमों के निशां तुम्हारे मिटाते चल रहे हैं हम

पीछे मुडकर न देखना कभी जो राह छोड दी तुमने
तुम्हारे माज़ी को दामन में समेटते चल रहे हैं हम.

तुम न डरना किन्हीं काले सायों से कभी
रुसवाई को तुमसे जुदा करते चल रहे हैं हम

गुरुवार, जुलाई 12, 2007

जिन्दा बसीत खूब बसीत

इस बार गर्मी की छुट्टियां काबुल में बितानी है.घर का मुखिया वहीं पर है. बच्चे अपने दोस्तों से बताने में हिच्किचा रहे हैं .अफगानिस्तान भी कोई जगह है जाने की.पापा से कहिये इंग्लैंड ,सिंगापुर का प्रोग्राम बनाएं.ज़रा बाहर पेड को हिलाओ शायद पैसे टपक पडें ,पापा का जवाब है.काबुल तो जाना ही है.पापा वहां अकेले पडे है. किस हाल में रहते हैं इसकी खोज खबर भी लेनी है.मन में डर था कि न जाने वहाँ का क्या हाल होगा.आए दिन सुसाइड बाम्बरस की खबर पडने को मिलती है.

डर ,आशंकाओं पर एक कौतूहल लिये हुए हम काबुल के लिये रवाना हुए.हवाई जहाज तो पूरा भरा हआ है . देखकर आश्चर्य हुआ कि इतनी तादाद भारतीय में वहाँ जा रहें हैं .बहुत से अफगानी भी थे.फिर काबुलीवाला याद आया और याद आया कि हमारा तो बहुत पुराना रिश्ता है . अमिताभ बच्चन और श्रीदेवी की खुदा गवाह का ज़िक्र काबुल में कइ बार किया गया. काबुल हवाई अड्डा छोटा सा है . दिल्ली से करीब पौने दो घंटे का सफर है. काफी सामान है हमारे पास कुल २३ अदद .संभालना मुश्किल पर मदद के लिये लोग हैं.सामान की कौन देखभाल करे.हम तो आँखें फाडे देख रहे थे एक अलग दुनिया को.हिन्दी या कहिये उर्दु समझने वालों की कमी नहीं.हिन्दी बोलने वालों का काम आराम से चल सकता है. पर फ़ि्ज़ा में एक सहमापन है.लगता है खुल कर हंसेगे तो कोई गोली लग जाएगीागर जिधर अपनी नज़र घुमाइये और ए के ४७ के दर्शन हों तो हिसी तो दूर तक नहीं फटकती .हमने तो ए के ४७ का नाम संजय दत्त के ही संदर्भ में ही सुना था .अब देखा वो क्या चीज़ है जिसके लिये संजय दत्त अदालत का रास्ता नाप रहे हैं .एक फोटो भी खिचवा लिया उसके साथ पर वो आगे की किश्त है. भारत से जाने पर दो चीज़ें तुरन्त नज़र आती हैं.रास्ता में कम से लोग .यहाँ की भीड नहीं दिखाई पडती.और यहाँ के रंग नहीं हैं वहाँ.सडक पर औरतें न के बराबर हैं और जीवन में रंग तो हमीं से होता है.हर जगह बदूकें दिखना आम बात है.पुनःनिमार्ण का काम चल रहा है .आयातित कारें हैं इसलिय बडी कारें खूब दिखती हैं.हर घर हर भवन की दीवारें ऊँची ऊँची हैं.आभास होता है एक बन्द से परिवेश का.हमारे घर पर पहरा है सिपाहियों का.खूब हस्त खाने खैरत हस्ती? हालचाल कुशल मंगल पूछकर हम सकुशल अपने घर में घुस गए .बाहर के कैदखाने से दूर अपनी दुनिया बसाने.

मंगलवार, जुलाई 03, 2007

काबुल -पहली नज़र

खूब हस्त खूब हस्तम .खान-ए-खैरत ह्स्ती? काबुल पहुँचने पर स्वागत होता है ऐसे. तमाम तरीकों से खैरियत पूछने के बाद .हिन्दुस्तानियों से खास लगाव.तुरन्त उर्दू में बात करने को बेताब लोग.रास्ते भर एके -४७ के दर्शन .ऊँची ऊँची दीवारों के पीछे घर.न किसी का आँगन दिखे न किसी का बगीचा.तमाम जगह निर्माण का काम .एक टूटे शहर को आबाद करना है.निशान ज़खमों के.घरों की दीवारें छलनी हैं गोलीबारी से.चमन के माली ही उजाड गए जिसे .....उस गुलशन के आसुओं का बयान क्या करना .घर भी छलनी हैं ,दिल भी छलनी हैं .हाजी साहब काबुल दिखाते हुए मायूस हो जाते हैं .दरख्त भी नही छोडे किसी ने.बाग तक काट दिए .नदी बेज़ार सी बहती हुई. गवाह है तारीखों के गुम हो जाने की .पर्वत अपने शहर को न बचा पाने की बेबसी में लाचार से दिखते. सूखे . सडकों पर जहाँ खिलखिलाहट होनी चाहिए बच्चों की.....आवाज़ आती है गश्त लगाती फौजों की.

शुक्रवार, मई 25, 2007

सालगिरह पर

दिल द्वार दस्तक दी तुमने जब
ऊषा की स्निग्ध लाली जैसे
भोर-विभोर मैं डूब गयी
अर्ध्य देती मतवाली जैसे

शान्त अमित आकाश हो तुम
मैं समा गयी विस्तार में तेरे
निढाल पडी पा आलिगन तेरा
बरस पडी मैं अंक में तेरे

ओत प्रोत मैं प्रीत में तेरी
हर अंग लगे है नया नवेला
भावों के भँवर का मंथन
नहीं सभलता अब यह रेला

दहकते गुलमोहर सा रक्तिम
हो जाए यह तन मन मेरा
तेरी आँखों का स्पर्श पाऊँ
या तेरी खुश्बू का घेरा

नि:शब्द बैठे हम दोनों
डूबते सूरज से आमुख
सहपथ की निशानियों के
कारवाँ अब हैं सम्मुख

जीवन निशा की दहलीज पर
सान्निध्य तुम्हारा मेरा सहारा
पूनम की खामोश चांदनी
देगी तुम्हें सतत उजियारा