गुरुवार, फ़रवरी 21, 2008

गुमसुम

HASTINGS: You have lived very much among them. In truth, I have been often surprised, that you who have seen so much of the world, with your natural good sense, and your many opportunities, could never yet acquire a requisite share of assurance.....

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MARLOW.: .....An impudent fellow may counterfeit modesty; but I'll be hanged if a modest man can ever counterfeit impudence.

("She Stoops to Conquer" Oliver Goldsmith )

हौले से परदा हटाकर ,वो झांकती है । ललचाता है उसका भी मन। हाय कैसे वह झट से जो मन में आता है बोल देती है। क्या विश्वास से चलती है.ज़रा भी हिचकिचाहट नही, है उसे न कोई संकोच। फट जाकर बात कर लेती है।

कैसे फुर्ती से उसने अपनी टीचर को जवाब दे दिया.क्या दोस्ताना तरीके से वह बात करती है अपने बास से.आँखें बंद कर वो सोचने लगी। पर तब भी नहीं ला पायी वो तफ्री वाला अंदाज़ .तफ्री में भी तो है.... और फ्री !! वो है की अपने सपनों में भी सिमटी ,सकुचाती।

दिल के एक छोटे से कोने में बैठती है उसकी यह परछाई । कभी कभी बाहर झांक कर हिम्मत करना चाहती है पर तुरंत फिर वही अपना सीप .उसे लगता है पर्दा हटाएगी तो कयामत हो जाएगी.लोग कुछ कहेंगे तो उसका जवाब दे पाएगी क्या .अपने तारीफों के पुल बांधना ...न बाबा .काम करो और आगे बढो । कैसे कहे वह अपने मुंह से की उसने कितना काम कर दिया। नुकसान तो बहुत है न कहने से .घर में भी और आफिस में भी.पर यह परदे के पीछे से झांकती लड़की बाहर ही नहीं आती।

आई तो थी एक दो बार .पर दो वाक्य से ज़्यादा बोलने पर लाल होते गाल उसे वापस भेज देते. हाँ काम की बात करनी हो तो उसका जवाब नहीं.क्या क्या नही जानती। पर" स्माल टोक " . उफ़, क्या मुसीबत है .

सपने में तो कुछ भी सोचा जा सकता है। पर वहाँ पर भी क्यों लगता है उसे की यह उसके बस का नहीं .कुछ तो सलीका होगा की पर्दा हटा सके थोडा सा ही सही .

गुरुवार, फ़रवरी 07, 2008

मुलाकात मकबूल फिदा हुसैन से

मकबूल फ़िदा हुसैन के बारे में एक पोस्ट पढी .मुझे भी एक वाक़या याद आया जब मैंने उनसे औटोग्राफ लिया था.बात १९९३ की है.फरीदाबाद का मशहूर सूरज कुंड मेला चल रह था.थक हार कर शाम को हम बाहर निकले तो मेरी नज़र पडी एक लंबे गोरे हैंडसम शख्स पर .सफ़ेद बाल और सफ़ेद दाढी .ध्यान से देखा तो नंगे पाँव .दिमाग में कुछ पढा हुआ याद आया.कहीं पढा था कि एम ऍफ़ हुसैन जूते नहीं पहनते .वो कुछ आगे तेज़ी से चलते जा रहे थे और मैं भीड़ में फंसी.पर फिर भी दौड़ लगाई और पहुँची उनके पास। औटोग्राफ के लिए कागज़ ढूँढने लगी पर साथ में तो बटुवा भी नहीं था.तुरंत अपना शाल आगे बढ़ा दिया .पर अब कलम नहीं. हुसैन साहब ने मुस्कराकर अपने झोले से पेन निकाली और मेरे पीले शाल के कोने में अपने ह्स्ताक्षर कर दिए।
सिर पर हाथ फेरा.मैंने भी शुक्रिया किया और सूरज कुंड के उस मेले का यह अमोल तोहफा संभाल कर रख लिया.कहना न होगा वह शाल पहनने के काम तो फिर न आया .पर यह घटना सुनाते समय और वह क्षणिक मुलाक़ात को याद करने के लिए में बडे बाल सुलभ उत्साह से उसे दिखाती हूँ ।

सोमवार, जनवरी 21, 2008

संदेस

चाँदनी में लिपटे
कुछ
ख्वाबों को भेजा है
पास तुम्हारे।

रात के अंधेरे में
चाँद पाएगा एकाकी तुम्हें
रखेगा हौले से ख्वाब मेरे
तुम्हारी पलकों पर

और जवाब में लाएगा
वो तुम्हारी सिहरन
हलकी सी मुस्कान की
वो मिसरी
नमी तुम्हारे आँखों
के कोरों की

मैं चाँद को निहारती
चाँदनी को हथेली में मलती
तुम्हारे सपनों को ढालूंगी
अपनी आँखों में।

शनिवार, दिसंबर 29, 2007

लखनऊ हम पर फ़िदा-2

लखनऊ के रहने वालों को इस शहर से प्यार इस कदर होता है

'लखनऊ हम पर फ़िदा, और हम फिदाए लख्ननऊ
क्या है ताकत आसमां की, जो छुडाये लखनऊ.'

मुझे याद है युनिवर्सिटी के ज़माने में जब हमें होली या विदाई समारोह में 'टाइटिल' देने होते थे तो शेर-ओ-शायरी का बडा सहारा रहता था.आखिर इस शहर की रवायत ही ऐसी है.

महबूबा को खत लिखा तो इस उम्मीद के साथ

'सियाही आँख की लेकर मैं नामा तुमको लिखता हूँ
कि तुम नामे को देखो और तुम्हं देखें मेरी आँखें'

लेकिन इतना करने के बाद भी उधर से कोई आवाज़ दे ऐसा ज़रूरी नहीं .

'नामावर तू ही बता,तूने तो देखे होंगे
कैसे होते हैं वह खत ,जिनका जवाब आता है.'

हाय रे किस्मत,वो पढते भी हैं और आँखें भी चुराते हैं.
'खत ग़ैर का पढते थे ,जो टोका तो वो बोले
अखबार का पर्चा है खबर देख रहे हैं '
याद आया वो कॉलेज के दिन जब छुपछुप कर उन्हीं पर नज़रें रहती थीं ,पर जैसे ही वो इधर देखते आँखें आसमान पर या किताबों पर गड जातीं ?
यह उम्मीद भी बेमिसाल है
' बरसों से कानों पे है क़लम इस उम्मीद पर
लिखवाएं मुझसे खत ,मेरे खत के जवाब में '

लेकिन जब खत पडा जाता है तब के लिये हिदायतें हैं

'नामे को पढना मेरे,ज़रा देखभाल के,
कागज़ पर रख दिया है,कलेजा निकाल के'

बुधवार, दिसंबर 19, 2007

लखनऊ हम पर फ़िदा

एक उत्सुकता सी मन में जागी है कि जिस शहर में मैं रहती हूँ उसका इतिहास क्या है,उसका अतीत कैसा था,उसकी बुनियाद क्या थी ,उसकी शख्सियत क्या थी .वह क्या था जिसने लखनऊ को एक अलग सा परिचय दिया है .यह जो इमारतें आते जाते हम देखते हैं इनके पीछे कौन सी कहानियां है.किसने इन्हें बनवाया,क्या सपना था उनका इस शहर के बारे में . कैसा रहा होगा लखनऊ पहले का? यह जो सडक है इस पर पहले का नज़ारा कैसा था .कहाँ से आती थी और कहाँ तक जाना था? बहुत किस्से सुने है यहाँ की नज़ाकत,नफ़ासत और तहज़ीब के.'पहले आप वाला' किस्सा तो लखनऊ का नाम आते ही कोई भी बता देता है.पर यहाँ के नवाबों के शौक , उनके मिज़ाज के बारे में भी बहुत कुछ सुना है.
गोया पहुँचे यहाँ की प्रसिध्द किताबों की दुकान युनिवर्सल बुकसेलर्स.इसकी कई शाखाएं हैं . अलीगंज के कपूरथला कॉम्प्लेक्स में मिली यहाँ के मशहूर लेखक योगेश प्रवीण की लिखी किताबें . अभी तो पढना शुरू किया है.चिकन कारी के बारे में,बेगम अख्तर की गायकी के बारे में,कबाब ,रेख्ती, ठुमरी ....बहुत कुछ. पता चल रहा कि संजय दत्त की नानी जद्दन बाई इसी शहर की थीं.अब बस करना यह है कि एक कैमरा लो और जो पढती जा रही हूँ ,उस जगह जा कर कैमरे में कैद करो.खयाल नेक है खयाली पुलाव न बन जाए .

गुरुवार, दिसंबर 13, 2007

चीं चीं चैं चैं

कितना बोलते हैं हम अपने आपसे.यह अंदर का संवाद है कभी खत्म नहीं होता .जब देखो बातें किसी भी चीज़ पर,कहीं भी .सवेरे उठेते ही,दिन मे ,ऑफिस में . कुछ भी कर रहे हों अन्दर के 'सी पी यू' की 'प्रोसेसिंग ' चलती ही रहती है.
बेटी को श्यामक दावर के डांस क्लास में भरती का दिया है.अपनी भी ड्यूटी लगी है.ले जाओ ,एक घंटे बैठी रहो . जब वैसे ही कितनी बातें करती हूँ खुद से तो सोचिये एक घंटे बैठे ठाले क्या क्या सोच डाला .मुझे बहुत अच्छी लगती हैं लडकियां .कितनी चुलबुली हैं .कितनी उत्साहित हैं .कितनी कॉनफिडेंट . सच यह उम्र होती ही ...चटपट चटपट बातें करने की,खिलखिलाने की, गिगल करने की .अरे वह चुपचाप क्यों खडी है.चलो जाओ दोस्त बनाओ, हंसी पर रोक मत लगाओ .बोलने पर बंदिश नहीं .मुस्कराहट भी कितनी नाज़ुक सी है सबकी .शायद मिल्स एंड बून पडती होंगी .पर यह क्या एक के हाथ में सिडनी शेलडन .आजकल के बच्चे ज़्यादा जल्दी बडे हो जाते हैं .
डांस इंसट्रक्टर आया .अनजाने में सब थोडा इतरा रही हैं . कोई कट कर अलग से कुछ कहने लगी .एक फुसफुसाहट हुई " हे कूल डयूड मैन.हीस गाट एन ऐटिटयूड "! और फिर कनखियों से इधर उधर देख कर गिगल .
और कपडे ...स्टाइलिश. वह हल्की गुलाबी केपरी क्या जंच रही है . स्कर्ट अच्छी है पर ज़रा छोटी .जैसे जैसे उम्र बडती है स्कर्ट की लम्बाई भी बडती है.याद आया कभी मम्मी ने मेरी शॉर्ट स्कर्ट को लंबा कर दिया और मैं कितना नाराज़ हुई थी उनसे.क्या मस्ती है और बेफिक्री भी.
'ओह कम ऑन यार .डोन्ट बी अ स्पोइल स्पोर्ट .वी'ल हेव फन'
'बट माय माँ'स गोना मर्डर भी इफ आई'म लेट .'
कभी हम भी तो ऐसे ही थे.क्या इनको विशवास होगा अगर मैं बताऊँ कि यह सब एक 'डेजा वू ' की तरह है. यह सफेद बालों वाली आंटी भी ऐसी ही भाषा बोलती थीं .
ओहो मुझे भी जॉइन कर लेना था.कुछ नहीं तो कायदे से हाथ पैर मारना ही आ जाता .एक अपनी ही उम्र के दंपति को क्लास में जाते देखा .गम हुआ ...मैं भी तो सीख सकती थी.अरे कहाँ ...अकेले क्या मज़ा .पतिदेव साथ होते. हाँ लौट कर आएंगे तो ज़रूर सीखूँगी .वैसे हम दोनों ही के पास 'टू लेफ्ट फीट ' हैं. पर उससे क्या. नाचना है तो नाचेंगे ही. बच्चे बोलते थे हम आप लोगों को 'डिस ओन ' कर देंगे अगर आप लोग नाचने पहुँचे .'डिसओन 'करने में बिल्कुल अव्वल.जब देखो तब .आपलोग मेरे दोस्तों के सामने ऐसे कपडे पहन कर जाओगे ....'डिस ओन ' की धमकी .हाथ मत पकडना बाज़ार में...हम लोग डिस.......... हल्की मुस्कान आ गयी .नज़र एक ओर गयी तो देखा एक लडकी मुझे घूर रही थी .मैं सकपका गयी . सठिया गई ?
ड्रेस डिज़ाइनर आ गई .सरगर्मियां बढ गईं.रंग के चुनाव ,डिज़ाइन,क्या नहीं है ....सोचने को .माहौल गर्म हो गया .डिसकशन तू तू मैं मैं बनने जा रहा है .'शी इस सच अ बि....
'हेलो ,क्या कहा'
''कुछ नहीं !'
चलो यार .हम लोग सर से बात करते हैं.सम पीपल अरे एक्टिंग टू प्राइसी'
सर भी आ गए.डांस इंसट्रक्टर .....ताली बजा कर उसने सबका ध्यान खींचा.मैं सोचती उसकी ज़रूरत ही नहीं थी .आधी तो वैसे ही उसे देख रही थीं.कैसे उसने तुरन्त कमान अपने हाथ में ले ली.बहुत खूब.सारी चीं चीं चैं चैं बन्द. चलो मेरे भी ने का समय हुआ.अब अन्दर की चीं चीं चैं चैं किसी और विषय पर.

शुक्रवार, दिसंबर 07, 2007

रांग नम्बर

"हैलो !"
"हैलो!"
"हैलो.....?"
"अरे भाई आगे भी बोलिये !किससे बात करनी है?"
"जी आपसे"
"मुझसे?"
"जी."
"अरे कुछ नाम पता होगा ."
"जी आप ही का नाम है.
"अच्छा ....?"
"मेरे नाम वाले तो बहुतेरे हैं.शायद नम्बर गलत लग गया..आपका."
"नहीं.अबकी सही लगा ."
"कैसे पता?"
"आप तक जो पहुँच गया"
"तो क्या काम है मुझसे?"
"जी,आपका नाम जानना था..."
"अभी तक तो पता था ."
"पर अब याद नहीं."
"बडी कमज़ोर याददाश्त है.जब याद आ जाए तब दुबारा फोन कर लीजियगा"
और मैंने फोन रख दिया .


"हैलो !"
हैलो!"
"हैलो.....?"
आप कहाँ से बोल रही हैं?"
"आपने कहाँ फोन किया ?"
"आप कहाँ से बोल रही हैं?(अब की आवाज़ ज़रा ज़ोर देकर आई)
"आपने कहाँ फोन किया ?"(मैंने भी आवाज़ कडक की)
"लोग बताते ही नहीं कहाँ से बोल रहे हैं"
फोन कट जाता है.


मोबाइल पर मोबाइल से फोन आया ...फिर भी
"हैलो !"
"हैलो!"
"संजय से बात करनी है?"
"यहाँ कोई संजय नहीं है . नंबर चेक कर लीजिये ."
"आपका क्या नम्बर है?"
"आपने जो मिलाया है."
"पर आपका नम्बर क्या है?"
"जो भी है कम से कम संजय का तो नहीं है."
"आप उससे बात करवा सकती हैं?"
"ज़रूर करवा देती ,लेकिन उसका पता ठिकाना नहीं मालूम."
"नम्बर तो यही था ......?आपका नम्बर क्या है ?"
"याद नहीं "
मैं ही फोन काट देती हूँ.

शनिवार, सितंबर 29, 2007

नाम से तेरे आवाज़ मैं न दूँगा


नाम से मेरे वो कभी पुकारता न था मुझे


नाम लेने भर से सिहर जाता हूँ मैं


सोचो हाल कैसा होगा जब मिलूँगा तुझे


मिलने के नाम से घबरा जाता हूँ मैं .

मंगलवार, सितंबर 25, 2007

बेटी

माँ की गोद में सिर छुपा दिया .उसने भी सिर पर हाथ फेरा ,हौले से मुस्कुराई और हम एक अंतरंग चुप्पी में बैठ गए.सोच रही हूँ मैं ......मेरी बेटी खेल रही है वहीं आसपास कहीं .वह हम दोनों को देखती है ,मुस्कुराती है ,और एक अनकही समझदारी से वापस खेलने लग जाती है .कह गई, मैं भी तो इसी साझेदारी में शामिल हूँ.लुका छुपी खेल रहे हैं और वह कहीं अँधेरे कमरे में छुप जाती है.अचानक वह अँधेरा ही उसे डरा देता है.चिल्लाती है वो और मैं उसे अपने गले से लगा लेती हूँ.ज़ोर से भींचती हूँ और वह अपनी नन्हीं बाँहें मेरे गले में डालकर हंस देती है.उसकी हँसी पर मेरी जान निछावर है.चलो फिर खेलें ....वो कहती है.अगर फिर डर लग गया तो.आप हैं न ...! मैं भी आपके साथ रोटी बनाऊँगी .मम्मी सिर दर्द कर रहा है क्या.मैं दबा दूँगी बिल्कुल ठीक हो जाएगा .सोचती हूँ सारी पूँजी बाँटूगी इसके साथ.जो कुछ मेरी माँ ने सिखाया मुझे.क्या वाकई सिखाया था.नहीं तो.फिर न जाने कैसे वो सब चीज़े मुझे भी आ गई जो मेरी माँ करती थी.उसी की तरह घर की देखभाल .कढाई,बुनाई....सिलाई.किताबों का शौक .उसी अंदाज़ से बुकमार्क लगाना.माँ से पूछा मैंने यह सब सिखाया कब आपने.मुझे तो याद नहीं.और वो हंस दी .बोली .....सिखाया नहीं तुम्हारी मदद ली थी सिर्फ .

बडी हो गई मेरी बेटी अब. दोस्त है वह . सिर भी दबाती है और दिल का हाल भी सुनती है.डांट भी देती है.मीठी सी झिडकी उसकी .हम दोनों आपस में कुछ गुपचुप करते हैं .मदर्स डे पर कार्ड देती है और फ्रेंशिप डे पर बाँधती है फ्रेंड्शिप बैंड.नानी क्या ममा हमेशा तुम्हारी बात मानती थी.और मम्मी हंस देंगी .ऐसा कभी हुआ है कि बच्चे मां बाप की हर बात माने.और मुझे जीभ दिखाती है,बिल्कुल मेरी तरह .मेरी गोद में सिर छुपा लेती है बिल्कुल मेरी तरह .

शनिवार, सितंबर 01, 2007

हमतुम


तुम्हारे नाम के साथ जोड लिया
जब से है नाम अपना
ऐसा लगता है सच होने लगा
देखा हुआ हर सपना

तुम साँस लेते हो तो चलती है
घुली हुई साँसें हमारी
दुनिया को देखा था पहले भी कभी
अब जो देखा तो नज़रें तुम्हारीं


शुक्रवार, जुलाई 27, 2007

साया

देखो नक्शे कदम पर तुम्हारे ऐसे चल रह हैं हम
कदमों के निशां तुम्हारे मिटाते चल रहे हैं हम

पीछे मुडकर न देखना कभी जो राह छोड दी तुमने
तुम्हारे माज़ी को दामन में समेटते चल रहे हैं हम.

तुम न डरना किन्हीं काले सायों से कभी
रुसवाई को तुमसे जुदा करते चल रहे हैं हम

गुरुवार, जुलाई 12, 2007

जिन्दा बसीत खूब बसीत

इस बार गर्मी की छुट्टियां काबुल में बितानी है.घर का मुखिया वहीं पर है. बच्चे अपने दोस्तों से बताने में हिच्किचा रहे हैं .अफगानिस्तान भी कोई जगह है जाने की.पापा से कहिये इंग्लैंड ,सिंगापुर का प्रोग्राम बनाएं.ज़रा बाहर पेड को हिलाओ शायद पैसे टपक पडें ,पापा का जवाब है.काबुल तो जाना ही है.पापा वहां अकेले पडे है. किस हाल में रहते हैं इसकी खोज खबर भी लेनी है.मन में डर था कि न जाने वहाँ का क्या हाल होगा.आए दिन सुसाइड बाम्बरस की खबर पडने को मिलती है.

डर ,आशंकाओं पर एक कौतूहल लिये हुए हम काबुल के लिये रवाना हुए.हवाई जहाज तो पूरा भरा हआ है . देखकर आश्चर्य हुआ कि इतनी तादाद भारतीय में वहाँ जा रहें हैं .बहुत से अफगानी भी थे.फिर काबुलीवाला याद आया और याद आया कि हमारा तो बहुत पुराना रिश्ता है . अमिताभ बच्चन और श्रीदेवी की खुदा गवाह का ज़िक्र काबुल में कइ बार किया गया. काबुल हवाई अड्डा छोटा सा है . दिल्ली से करीब पौने दो घंटे का सफर है. काफी सामान है हमारे पास कुल २३ अदद .संभालना मुश्किल पर मदद के लिये लोग हैं.सामान की कौन देखभाल करे.हम तो आँखें फाडे देख रहे थे एक अलग दुनिया को.हिन्दी या कहिये उर्दु समझने वालों की कमी नहीं.हिन्दी बोलने वालों का काम आराम से चल सकता है. पर फ़ि्ज़ा में एक सहमापन है.लगता है खुल कर हंसेगे तो कोई गोली लग जाएगीागर जिधर अपनी नज़र घुमाइये और ए के ४७ के दर्शन हों तो हिसी तो दूर तक नहीं फटकती .हमने तो ए के ४७ का नाम संजय दत्त के ही संदर्भ में ही सुना था .अब देखा वो क्या चीज़ है जिसके लिये संजय दत्त अदालत का रास्ता नाप रहे हैं .एक फोटो भी खिचवा लिया उसके साथ पर वो आगे की किश्त है. भारत से जाने पर दो चीज़ें तुरन्त नज़र आती हैं.रास्ता में कम से लोग .यहाँ की भीड नहीं दिखाई पडती.और यहाँ के रंग नहीं हैं वहाँ.सडक पर औरतें न के बराबर हैं और जीवन में रंग तो हमीं से होता है.हर जगह बदूकें दिखना आम बात है.पुनःनिमार्ण का काम चल रहा है .आयातित कारें हैं इसलिय बडी कारें खूब दिखती हैं.हर घर हर भवन की दीवारें ऊँची ऊँची हैं.आभास होता है एक बन्द से परिवेश का.हमारे घर पर पहरा है सिपाहियों का.खूब हस्त खाने खैरत हस्ती? हालचाल कुशल मंगल पूछकर हम सकुशल अपने घर में घुस गए .बाहर के कैदखाने से दूर अपनी दुनिया बसाने.

मंगलवार, जुलाई 03, 2007

काबुल -पहली नज़र

खूब हस्त खूब हस्तम .खान-ए-खैरत ह्स्ती? काबुल पहुँचने पर स्वागत होता है ऐसे. तमाम तरीकों से खैरियत पूछने के बाद .हिन्दुस्तानियों से खास लगाव.तुरन्त उर्दू में बात करने को बेताब लोग.रास्ते भर एके -४७ के दर्शन .ऊँची ऊँची दीवारों के पीछे घर.न किसी का आँगन दिखे न किसी का बगीचा.तमाम जगह निर्माण का काम .एक टूटे शहर को आबाद करना है.निशान ज़खमों के.घरों की दीवारें छलनी हैं गोलीबारी से.चमन के माली ही उजाड गए जिसे .....उस गुलशन के आसुओं का बयान क्या करना .घर भी छलनी हैं ,दिल भी छलनी हैं .हाजी साहब काबुल दिखाते हुए मायूस हो जाते हैं .दरख्त भी नही छोडे किसी ने.बाग तक काट दिए .नदी बेज़ार सी बहती हुई. गवाह है तारीखों के गुम हो जाने की .पर्वत अपने शहर को न बचा पाने की बेबसी में लाचार से दिखते. सूखे . सडकों पर जहाँ खिलखिलाहट होनी चाहिए बच्चों की.....आवाज़ आती है गश्त लगाती फौजों की.

शुक्रवार, मई 25, 2007

सालगिरह पर

दिल द्वार दस्तक दी तुमने जब
ऊषा की स्निग्ध लाली जैसे
भोर-विभोर मैं डूब गयी
अर्ध्य देती मतवाली जैसे

शान्त अमित आकाश हो तुम
मैं समा गयी विस्तार में तेरे
निढाल पडी पा आलिगन तेरा
बरस पडी मैं अंक में तेरे

ओत प्रोत मैं प्रीत में तेरी
हर अंग लगे है नया नवेला
भावों के भँवर का मंथन
नहीं सभलता अब यह रेला

दहकते गुलमोहर सा रक्तिम
हो जाए यह तन मन मेरा
तेरी आँखों का स्पर्श पाऊँ
या तेरी खुश्बू का घेरा

नि:शब्द बैठे हम दोनों
डूबते सूरज से आमुख
सहपथ की निशानियों के
कारवाँ अब हैं सम्मुख

जीवन निशा की दहलीज पर
सान्निध्य तुम्हारा मेरा सहारा
पूनम की खामोश चांदनी
देगी तुम्हें सतत उजियारा

मंगलवार, अप्रैल 17, 2007

साथ है पर फिर भी नहीं

करवटें बदलते अकेले तुम
जूझ रहे होगे तन्हाई से
पुरानी यादों से
आज के विरह से

चाह्ती हूँ कि सहारा दूँ तुम्हें
अपनी बाँहों का
अपने प्यार का
अपने विश्वास का

कुछ यादों के घेरों में
मेरा प्रवेश नहीं
वहाँ तुम हो
और तुम्हारी आह .

पर अकेले तुम नहीं
एक पीडा सबकी अपनी होती है
नितांत निज.
तुम्हारे पास तो
दो अमानत हैं और मैं

कुछ ऐसे भी हैं
जो घुलते हैं
अव्यक्त भावों में
कल के दर्द हैं
कल का आसरा नहीं

बुधवार, अप्रैल 04, 2007

क्या कहेगा कोइ अपनी पहचान किससे है
पति,बच्चों,या अपने पेशे से है.
हर रूप पहचान है मेरी
बिना एक के दूसरा अधूरा है.

लोग कहते हैं वो ढूँढ रहे हैं खुद को
मैं हर बार टूट कर बनाती हूँ खुद को.
ज़िन्दगी सफर है मंज़िल नहीं
लोहूलुहान पैरों का मरहम यहीं पर है.

यह सुख नहीं कि अपनी झलक दिखे कहीं
यह दुख भी नहीं कि कोई अपना नहीं.
तनहाई थी तो बेइंतहा साथ भी है
खुद पर भरोसा है तो साथी का हाथ भी है.

वो भी सफर के रास्ते थे जो पीछे छूट गये
रास्ता यह भी मखमली नहीं
निश्चित है तो सिर्फ
हर मोड का विस्मय.

मंगलवार, अप्रैल 03, 2007

भोर भ्रमण


दिल्ली स्थित लोधी गार्डेन का यह मनमोहक नज़ारा


यह जो ज़मीन है
न तुम न मै
बहुत विशाल है.

दूर आसमान से
धरती पर
दस्तरख्वान एक

तुम्हारी गुटरगूँ
सीताराम से
बनाए सरगम

गुरुवार, मार्च 15, 2007

खुमार

फूँक फूँक कर रख रहे थे कदम हम
हर कदम पर फ़िर यह तूफ़ान कैसा

कहते हैं वक़्त मिटा देता है ज़ख्म
हर ज़ख्म का अब तक यह निशान कैसा

बहुत संभाल कर रखा था दामन हमने
उसके हाथों में मेरा यह आंचल कैसा

बद रखा था पलकों को भींच कर हमने
फिर ख्वाबों का इनमें यह घुसपैठ कैसा

न पी है न पिलायी है कभी हमने
फिर छाया है अजब सा यह खुमार कैसा .

सोमवार, मार्च 12, 2007

कृष्ण अर्जुन

मैंने गीता पूरी कभी नहीं पढी .मुझे संस्कृत का इतना ज्ञान नहीं है कि उसका आनन्द ले पाऊँ.जो भी जानती हूँ वह बचपन में माता पिता के मुख से. खासकर "कर्मणयाधिकरस्ते....... . परिणाम के विषय में ज़्यादा सोचने या चिन्ता करने पर पापा यही दुहराते. पर गुडगाँव के एक प्रशिक्षिण कार्यक्रम के दौरान वहाँ एक प्रवक्ता ने श्लोक सुनाया.उनके द्वारा बताया गया यह श्लोक और असकी व्याख्या मुझे आज तक याद है.

यत्र योगेश्वर: कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धर: ।

तत्र श्रीर्विजयो भूतिर् धृवा नीतिर्मतिर्मम ॥ 18:78 ॥


इसकी व्याख्या अनेकों तरह से हो सकती है.पर जो मुझे अच्छी लगी उसका सारांश यह है कि अर्जुन शारीरिक क्षमता के प्रतीक हैं और श्रीकृष्ण बुद्धि और नीति के.जहाँ बुद्धि और शारीरिक क्षमता एक्साथ होते हैं वहाँ ऐशवर्य, विजय अलौकिक शक्ति और नीति रहती है. श्रीकृष्ण के सार्थित्व करने का अर्थ है शरीर की क्षमता को बुद्धि द्वारा सही दिशा देना.सिर्फ बल ,धनुर्विद्या या पराक्रम से विजय नहीं मिल सकती. उसके लिये बुद्धि,ज्ञान, विवेक, नीति का होना आवश्यक है. उसी प्रकार बिना स्वस्थ शरीर के एवं बाहुबल के पूर्ण विजय मिलना मुश्किल है. यह दोनों एक दूसरे के पूरक हैं .

शुक्रवार, मार्च 09, 2007

अंतर्जाल

कल मैने एक किताब पढनी शुरू की, अर्नेस्ट हेमिंगवे की "फॉर हूम द बेल टोलस'.स्पेन के गृह युद्ध की पृष्ठ भूमि पर आधारित उनकी सर्वोत्तम कृति मानी जाती है.उसके आलेख के रूप में एक ब्रिटिश कवि ,जॉन डॉन ,की पंक्तियां लिखी हुई हैं , जो शीर्षक का आधार है. मुझे यह पंक्तियां बहुत पसंद हैं .लगा कि एसी बहुत सी पंक्तियां जो मुझे बार बार याद आती हैं और बहुत ज़्यादा अच्छी लगती हैं .सोचा कि क्यों न अपने फलसफे पर यह फलसफा भी डाल दूँ. सोचती हूँ एक श्रृंखला का रूप दे दूँ उन पंक्तियों को जिन्हें मैं संजो कर रखना चाह्ती हूँ.बहुत ही भिन्न स्रोतों से पर यह ऐसी पंक्तियां जो मेरे दिमाग में घूमती रहती हैं. पहली कडी में "जॉन डॉन" का यह चिन्तन . मैं जब भी इन्हें पडती हूँ , एक कंपन सी होती है.

"No man is an island,
Entireof itself.
Each is a piece of thecontinent,

A part of the main.
If a clod be washed away by the
sea,
Europe is the less.
As well as if apromontory were.
As well as if
a manor of thine own
Or of thine friend's were.
Each man's death
diminishes me,
For I am involved in mankind.
Therefore, send not to
know
For whomthe bell tolls,
It tolls for thee. "


इनको पढकर मुझे इस बात का एहसास होता है कि इस विश्व का हिस्सा हूँ सूक्ष्म ,नगण्य ही सही .पर कहीं कुछ भी हो रहा है तो वह मेरे अस्तित्व को भी प्रभावित करता है. ऐसा भाव और कई कवियों और लेखकों द्वारा दर्शाया गया है,पर यह पंक्तियां मुझे अन्दर तक छू जाती हैं. खासतौर पर उसकी अंतिम पंक्ति.

send not to know

For whom the bell tolls,

It tolls for thee. "

इस विशाल संसार में कहीं कुछ विनाश हो रहा हो तो हमारा भी एक अंश ध्वंस हो जाता है. हम भी थोडे छोटे हो जाते हैं .बडी सामायिक भी लगती है यह कविता.क्या बुश को या दुनिया के आतंकवादियों को पता है कि कहीं भी हिंसा होती है तो वह उनका भी नाश करेगी.सिर्फ किसी समाज विशेष की परस्परधीनता ही नहीं बल्कि विश्व्यापी निर्भरता के उदगार हैं यह. समाज का हर नैतिक पतन हममें से हर एक को प्रभावित करता है . कोई भी हममें से पूर्णता पृथक नहीं रह सकता है. इसकी व्याख्या बहुत बारीकी से कोई बुद्धिजीवी कर सकता है.