शनिवार, जुलाई 04, 2020

नाश्ते के साथी

सुबह जब फ़्लफ़ीजी को नाश्ता दिया जाता है तो हमलोग भी उस समय  सवेरे की चाय का मज़ा ले रहे होते हैं साथ में और भी अतिथिगण की मौजूदगी हमारी सुबह को तरन्नुम से भर देती है।जंगल बैब्लर,मैना और भी बहुत सी चिड़ियों की चहचहाट तो भोर  होते ही सुनने को मिलती है पर इन सबमें सबसे धृष्ट या कह लें सबसे निर्भीक होता है कौआ।फ़्लफ़ी इधर खाना खा रहा होता है कौवों की जमघट लग जाती है।सब उसे घेर कर बैठे हैं कि कब वह खाना ख़त्म करे और कब वह सब बचे हुए पर टूट पड़ें।
आज हमने बड़े ध्यान से देखा।देखिए कैसे एक कौवा औरों से अधिक साहसी है और वह फ़्लफ़ी के क़रीब पहुँच जाता है उसे हिम्मत बांधनी पड़ती है।उनकी भाव भंगिमा मज़ेदार कहानी कहती है।एक कौवा औरों से आगे बढ़ता है ज़मीन पर कुछ रोटी के टुकड़े हैं जिन पर उसकी दृष्टि जमी हुई है पर वह आसपास को और फ़्लफ़ी को भी देख रहा है फ़्लफ़ी खाना खाने में मगन है पर वह,बल्कि सारे कौवे इस बात के लिए तैयार हैं कि जैसे उसने सिर उठाया तो तुरंत उड़ जाएँ ।वह धीरे धीरे करके तिरछे खिसकता हुआ पास आता है गर्दन टेढ़ी कर फ़्लफ़ी को देखता है फुर्ती से चोंच में एक टुकड़ा पकड़ खिसक जाता है
आसपास उसके प्रतियोगी भी हैं । हम देख रहे हैं कि एक और कौवा पहले वाले से होड़ लग रहा है।
सबकी क्रिया,प्रतिक्रिया,मुद्राएँ सम्मोहित करती हैं।फ़्लफ़ी जी तो अपना नाश्ता करने में इतना व्यस्त है की उसे इन सब से कोई दिलचस्पी नहीं कि आसपास क्या हो रहा है।हममे भी नहीं।उसके बग़ल में बैठकर हम विडीओ बना रहे थे पर उसने हमें देखा तक नहीं।कौवे उससे डर डर कर उसके आसपास बैठे थे या पास आने का दुस्साहस कर रहे थे।वह  इस बात से बेख़बर था या बेपरवाह।दूसरी ओर कौवे उसकी  ओर ध्यान से देख रहे थे,प्रतीक्षा में,कुछ हिम्मती, कुछ धैर्यवान,कुछ दबंग,कुछ प्रतिस्पर्धात्मक।
आज इनका एक विडीओ बना लिया।फ़्लफ़ी जैसे ही खाना ख़त्म करके बैठता है सब उसके बचे खाने की ओर इकट्ठा हो जाते है।हमलोग भी उसका डिब्बा लॉन में रखकर कुछ और रोटी डाल देते हैं वह भी एक अलग मनोरंजक दृश्य होता है
देखें सुबह सवेरे का यह दृश्य इस video में



शुक्रवार, अप्रैल 10, 2020

एक विचलित पुकार



तुम ऊपर से देख रहे होगे न 
इन काले बादलों के बीच से कहीं
 नीचे फैले शांत कोलाहल को 
रुई से बादलों में स्थिर अडिग 
नीचे सब डगमग डगमग 
उस  फीकी रोशनी की लकीर के बीच से कहीं 
नीचे स्याह,मलिन तुम्हारी दुनिया  
पेड़ तुम्हारे,हवा तुम्हारी 
नीचे एक काला साया?
कितना ठहरा  कितना अविचल 
नीचे कितना विचलित, बोझिल। 



शाम को एक बहुत सुन्दर फोटो खींची थी। वैसे भी केरल में आप कैमरा कहीं भी घुमा दीजिये,एक अप्रतिम तस्वीर उतर जायेगी। उस पर किसी के अनुरोध पर कुछ पंक्तियाँ लिखने पर,इस परेशान समय में यही निराशाजनक विचार आये। पर चित्र इतना सुन्दर और प्रकृति इतनी अनुपम है कि इस पर कुछ positive लिखने का भी खुद से वादा है। 

मंगलवार, मार्च 17, 2020

अत्तुकल भगवती का पोंगाला महोत्सव








हमारा देश है धरोहर की अनंत खान। हर जगह के अपने रिवाज़,हर क्षेत्र की अपनी परम्पराएँ। सबसे आश्चर्य यह की हम दूसरे  क्षेत्र और प्रांतों के  बहुत ही लोकप्रिय त्योहारों और प्रथाओं से कितने अनभिज्ञ और बेखबर  रहते हैं।
इस समय त्रिवेन्द्रम या फिर तिरुवनंतपुरम में रहने की वजह से यहाँ के सामान्य जीवन से परिचय हो रहा है।  उत्तर भारतीय हैं  सो होली की तैयारियों और उसके साथ जुड़े जोश और उमंग में ही मन रमा हुआ था। यहाँ पर होली की न तो दफ्तरों में छुट्टी है और न ही उसके प्रति कोई उत्साह। पर हाँ, सड़क पर एक दो दिन पहले निकले तो देखा दोनों तरफ ईंटें रखी हैं। सिर्फ एक या दो सड़कों पर नहीं पूरे शहर में। कौतूहल जागना स्वाभाविक ही था। पूछताछ की तो पता चला यह पोंगाला की तैयारी है।
आस्था है,श्रद्धा है और लोकमान्यताएं हैं। सब कुछ मिल जाता है तो उभर कर आती हैं प्रथाएं और ऐसी उपासना जो बिकुल अनोखी है।
अत्तुकल  भगवती का मंदिर प्रसिद्ध  पद्मनाभस्वामी मंदिर से कोई दो किमी की दूरी पर है। यहाँ की भगवती देवी के बारे में बहुत से कथाएं हैं। मानते हैं की मदुरई  में कन्नगी नाम की एक महिला थीं। उनके धनी व्यापारी पति का एक नर्तकी से रिश्ता जुड़ गया और वह उस पर अपना धन लुटाने लगे। अन्ततः वह जब कंगाल हो गए  तो कन्नगी के पास वापस आ गए । वह राजा के दरबार में कन्नगी की  एक पायल बेचने पहुंचे। भाग्य का खेल उसी समय रानी की पायल चोरी हो गयी थी और व्यापारी कोवलन को चोर मानकर राजा ने उन्हें मृत्युदंड दे दिया। इस अन्याय से क्रोधित  कन्नगी दूसरे पैर की पायल लेकर राजा के दरबार पहुँची। कन्नगी ने अपनी पायल तोड़कर दिखाई जिसके अंदर माणिक भरा हुआ था जबकि रानी के पायल में मोती थे। क्रोधित कन्नगी ने मदुरई को शाप दे दिया और शहर जलने लगा। कन्नगी फिर कोडुन्गल्लुर चली  गयीं। वहाँ जाते हुए रास्ते में वह अत्तुकल में रुकीं। एक वृद्ध से मदद माँगी और रात जब वह उनके भोजन की तैयारी कर रहे थे तो गायब हो गयीं । पर उस व्यक्ति को स्वप्न में सन्देश दिया कि वहाँ  वह  एक मंदिर बनायें और उस स्थान को भी तीन रेखाओं से निशान बनाकर चिन्हित कर दिया। मंदिर बना और साथ शुरू हो गयीं यह परम्पराएँ। इस मंदिर से जुड़ीं और भी कथाएं हैं। पोंगाला के मायने होते हैं उफान आकर उबलना।स्त्रियां मीठे चावल यानी पायसम बनाकर देवी से अपने लिए वरदान मांगती हैं।
    पर यह तो नौवें दिन की गतिविधि है। दरअसल पोंगाला दस दिन का त्यौहार है और शुरू होता है फरवरी-मार्च में कार्तिका नक्षत्र के दिन। दस दिन चलने वाले इस त्यौहार का चरम  रूप होता है नौवें दिन जब पूरम नक्षत्र और पूर्णिमा होती है। मंदिर में नौ दिनों तक भजन,देवीगीत और कन्नगी की कथा चलती रहती है। महिलाएं कुछ दिन पहले से ही अपने चूल्हे की जगह सुरक्षित कर लेती हैं। तीन ईंटों का चूल्हा बनता है। पहले कभी मंदिर के आसपास ही यह होता रहा होगा। पर अब तो पूरे शहर में दस बारह किमी की दूरी पर भी लोग चूल्हा लगा लेते हैं। श्रद्धा और  भक्ति की मिसाल है यह।मंदिर के आसपास की जगह पर तो बहुत दिनों से लोग अपना अधिकार जमा लेते हैं। दूर -दूर से स्त्रियां आती हैं। प्रवासी भारतीय भी इसे मनाने के लिए इस समय केरल पहुँच जाते हैं। स्त्रियां उस दिन व्रत रखती हैं,सूती नयी साड़ी अथवा सेतु मुंडू पहनती हैं और सवेरे चार- पांच बजे से ही अपने चुने हुए स्थान पर पहुँचने लग जाती हैं। दरअसल इस समय सड़कों पर बहुत भीड़ होती है। घर के लोग उन्हें वहां पहुंचाने जो आते हैं। नए बर्तन या तो मिट्टी के या स्टील,एल्युमीनियम के ही चूल्हे पर चढ़ेंगे।यह पोंगाला साड़ी भी दुकानदार बहुत कम कीमत पर रखते हैं जिससे गरीब से गरीब भी यह पूजा कर सके। कई जगह कपडे खरीदने जाओ तो चावल या बर्तन साथ में दे दिए जाते हैं। मकसद बस इतना कि इस सामूहिक आयोजन करने से कोई वंचित न रह जाए। और क्या चाहिए देवी को। उनकी पूजा में सब मिल जाएँ। चारों और फैले सुख और समृद्धि।
       हम सवेरे नौ बजे के करीब पोंगाला और उससे जुड़ी तैयारियाँ देखने पहुंच गए। साथ लिया अस्वथि को जो यहाँ की रहने वाली हैं और जिन्होंने मुझे इस परंपरा की बारीकियों से परिचित कराया। आभार है उनका। एम्बुलेंस के अलावा कोई गाड़ी उन सडकों पर नहीं थी। लोग पैदल चल रहे थे। कई जगह लोगों के खाने-पीने और पानी के इंज़मात थे । सभी दुकनें  खुली थीं। सब घरों के दरवाज़े खुले थे।  पूरे शहर में किनारे चूल्हे बने हैं और बर्तन चढ़े हुए हैं। यहाँ तक की लोगों  ने घरों के सामने की जगह पर,मंदिर के परिसर में,किसी सामूहिक भवन के परिसर में भी चूल्हे बना रखे थे। मस्जिद हो या चर्च सब स्थानों पर आज पानी की व्यवस्था थी और सब हाथ बढ़ा रहे थे।  धर्म से ऊपर उठकर यह शायद एक सांस्कृतिक आयोजन था जिसमें हर केरलवासी हिस्सेदार होता है। आग अभी नहीं जली है। वह तो तभी जलेगी जब देवी का पोंगाला बनना  शुरू होगा। धीरे धीरे हम मंदिर की ओर  बढे। बड़ी अचम्भे की बात थी कि इतने बड़े आयोजन के बावजूद सबकुछ बहुत व्यवस्थित और शिष्ट। हमने सोचा मंदिर के पास भीड़ होगी और वहाँ  तक पहुँचना मुश्किल होगा। पर सड़कें खाली ही थीं। बस किनारे सब लोग धैर्य से शुभ मुहूर्त की प्रतीक्षा कर रहे थे। कई चूल्हों के पास केले के पत्ते  पर चावल,अगरबत्ती,नारियल आदि रखा हुआ। दिया जला हुआ है। माना जाता है कि  इस समय उस चूल्हे पर देवी बैठी हैं। सब अपने साथ चावल और अन्य सामान लाये थे। सिर्फ मीठे चावल ही नहीं प्रसाद के रूप में इस समय लोग और भी पकवान बनाते हैं। सबमें चावल होता है जैसे मंदा पुट्टु ,थिराली अप्पम और करवाना। थराली अप्पम तो चावल का आटा ,गुड़ और नारियल को ताज़े तेज पत्ते में बाँध कर भाप पर पकाया जाता है। कोई बहुत कुछ बनाता है,कोई सिर्फ पोंगाला। किसी ने  मन्नत माँगी है तो वह पाँच छह चूल्हे भी जलाती हैं।
अब हम मंदिर के द्वार तक पहुँच गए थे। मंदिर के बाहर बहुत खाली जगह है पर उस समय सब जगह यह पवित्र चूल्हे बने हुए थे। मुहूर्त का समय था दस बजकर बीस मिनट पर। मंदिर के गर्भगृह की रसोई में चूल्हा जला,उसकी आग से बाहर मंदिर के ही प्रांगण में बना ईंटों का चूल्हा जलाया गया जिसपर देवी का प्रसाद चढ़ेगा। उसी आग से फिर सैकड़ों चूल्हे जलने लगे। दूर बैठी श्रद्धालुओं के लिए लाऊडस्पीकर पर घोषणा हो रही थी।  वैसे तो मंदिर के चूल्हे की लकड़ी से ही  सबको अपना चूल्हा जलाना होता है पर दूरी के कारण यह संभव नहीं।
 उधर मंदिर भी देवी दर्शन के लिए खुल गया और जो लोग पोंगाला नहीं बना रही थीं वह सब दर्शन के लिए पंक्तिबद्ध हो गयीं। बाहर निकले तो सब ओर धुआँ  और सब ओर  उबलते पानी में चावल डालतीं महिलाएं। सबके चेहरे पर श्रद्धा और पूजा का भाव। हाथ जोड़ नतमस्तक सब  देवी से अपने और अपने परिवार के कल्याण और हित की प्रार्थना करती जा रही थीं। जिसका पोंगाला उबल जाता वह और भी भक्ति  भाव से प्रार्थना करती और मुंह से कुछ ध्वनि निकालती। चूंकि दो तीन पतली-पतली सूखी नारियल की टहनियों  की आग से ही पकाना है इसलिए इसमें समय लगता है।
देवी को प्रसाद या नैवेद्यम अर्पण करने का भी मुहूर्त है। दोपहर दो बजकर बीस मिनट पर जब देवी को प्रसाद चढ़ाया जाएग तब सबका पोंगाला उतरेगा और तब स्त्रियां भी प्रसाद ले सकती हैं।  उसके बाद जब मंदिर के चूल्हे की आग को पानी से बुझाया जाता है तो उसी पानी से बाकी सब चूल्हे भी बुझते  हैं। सबका बंदोबस्त दुरुस्त है। सब प्रबंध है। मंदिर से पानी पहुँचाने का भी। अब सब अपने घर जा सकते हैं। और फिर शुरू होता है वापसी का काफिला। पोंगाला का प्रसाद घर पहुंचकर सबको दिया जाता है।


इस त्योहार में कई अन्य अनुष्ठान भी हैं जैसे कुथियोट्टम जो तेरह साल से कम उम्र के लड़कों द्वारा किया जाता है  और लड़कियों की तलपोलि।  इस दस दिवसीय त्योहार का समापन होता है देवी को पहले दिन पहनाई गयी "कप्पु" या चूड़ी  उतार कर और "कुरुति तर्पणम" के यज्ञ से।
पर जो अद्भुत है और बिलकुल अनूठी वह है पोंगाला बनाने की यह परम्परा।आस्था की अग्नि में अपने अहम को जलाकर अपना मन देवी को अर्पित करती हैं। हर मनुष्य का अंतर्मन पवित्र है  पर वह लालच,अहंकार,क्रोध वगैरह से दब गया है। उबलते चावल इस बात का प्रतीक हैं कि यह सब प्रवृत्तियां भाप बन कर उड़ जाती हैं और मनुष्य फिर से दिव्य और पवित्र हो जाता है।


मंगलवार, अप्रैल 30, 2019

चाँदनी चौक की आध्यात्मिकता से परिचय

जब शाहजहाँ आगरा छोड़ दिल्ली बसने चले तो यमुना के तट पर मिली उन्हें माकूल जगह एक नया घरोंदा बनाने की। लाल किले का निर्माण शुरू हुआ और आबाद होने लगी आसपास की बस्ती। लोग आने लगे तो पालनहारी का आशीर्वाद मिले यह भी ज़रूरी था। यही मजमून था बीते रविवार की पैदल यात्रा का। दिल्ली कारवां  से ताल्लुक रखने वाले युवा जोश पर बुज़ुर्गाना शऊर लिए आसिफ खान देहलवी जब हमें "Spiritual Chandni Chowk" की सैर पर ले गए तो परत-दर-परत खुलती कहानियों ने हमें एक रूहानी कूची से रंग दिया।
             उर्दू बाजार से शुरू हुआ उर्दू मंदिर जो बाद में लाल मंदिर या दिगंबर जैन मंदिर के नाम से जाना गया दिल्ली का सबसे पुराना जैन मंदिर है। बस्ती है,व्यापार भी होना लाजिमी है। सो गुजरात से आये जैन-अग्रवाल व्यापारियों को यहाँ बसने की जगह दी गयी और उन्ही में से एक ने अपने खेमे में तीर्थंकर की प्रतिमा रखी और इसी ने अब इस मंदिर का स्वरूप ले लिए। दिलचस्प है कि इसी से जुड़ा एक चिड़ियों का अस्पताल है जो हम उस दिन नहीं देख पाए। जैन धर्म की सब जीवित प्राणियों के प्रति सहृदयता का प्रतीक। जैन मंदिर से लगा हुआ है गौरीशंकर मंदिर। कभी दिल्ली पर मराठा राज भी था और तब अप्पा गंगाधर ने यह शिव मंदिर बनवाया। नदी तट पर तब लाल किला नहीं था और अनेक शिवलिंग स्थापित थे। लोग स्नान कर इन पर जल चढ़ाते और फिर दिनचर्या शुरू होती।चांदी  के आधार पर शिवलिंग पर जल चढ़ता जा रहा है,सुविधा के लिए स्टील के लोटे रखे हैं। मन्त्र जपते, शिव  स्तुति करते भक्ति का ही सब ओर रंग है।
        दिल्ली की कहानी है रक्त-रंजित। सत्ता के गलियारे मज़हब,जात-पांत,उम्र,पेशा किसी की भी इज़्ज़त नहीं करते और हर युग में दिल दहला देने वाले किस्सों से दिल्ली का इतिहास भरा हुआ है। सिख गुरुओं की शहादत हो या मुग़ल बादशाह के छोटे मासूम बच्चों का कत्ल--यह सबका साक्षी रहा है। प्यार से बसाया गया शाहजहांबाद और उससे भी अधिक मुहब्बत से जहाँआरा बेगम ने चांदनी चौक तामील किया। कूचा,कटरा,कलान,बाड़ा बहुतेरी कहानियां सुनीं उस दिन। हवेलियां थीं,व्यापार था,चाँद के खेलने के लिए तालाब था,शाम को सैर की सहूलियत के लिए पानी डालते भिश्ती थे। और इन सब को पाकीज़गी की चादर उढ़ाये यह सब धर्म स्थल थे। सीसगंज गुरुद्वारा में श्रद्धा से सेवा कर रहे लोगों को चप्पलें सौंपीं,पवित्र कुए का पानी पीया और ऊपर जाकर शांत चित्त हो  मत्था टेका और सबकुछ रब पर छोड़ दिया।गुरु तेगबहादुर की शहादत के स्थल पर बने गुरूद्वारे में बहुत शक्ति है।
           सटी हुई है सुनहरी मस्जिद।यहाँ सुनी दास्तान नादिर शाह की जिसने कान के पास से गुज़रे एक आवरा तीर से नाराज़ हो कत्ले-आम का हुक्म दिया और यहीं से खड़े होकर वह खूनी मंजर देखता रहा। मुहम्मद शाह रंगीला का समय था और जब वह वापस गया तो सात किमी लंबा कारवाँ था लुटे हुए और उपहार में दिए गए सामान का। साथ में था तख़्त-ए -इ ताउस(Peacock throne) और कोहिनूर हीरा और सोने की चिड़िया कहा जाने वाले  हिन्दुस्तान को ख़ाक में  मिला देने वाला अंजाम। सड़क पार था एक गिरिजाघर 'बैप्टिस्ट चर्च '। आपको इतिहास से वही परिचय करा सकता है जो अतीत को वर्तमान से जोड़ता रहे। इसीलिये जब उन तीन लड़कियों के बारे में आसिफ ने हाल का ही किस्सा सुनाया जो चर्च के बंद दरवाज़े के बाहर से एक दरख्वास्त कर रही थीं कि दरवाज़ा खोल दो बस नमाज़ पढ़नी है तो और उन्हें अंदर दाखिल किया गया तो इबादत और भी संजीदा हो गयी। 1814 में बना यह चर्च दिल्ली के सबसे पुराने गिरिजाघरों में से है। यहीं कहानी सुनी वज़ीर खानम की और यही दास्ताँ सुनते हुए गिरिजाघर के बाहर बजती घंटियों में सदियों पहले हुई कोई प्रार्थना गूंजने लगी।
              सुनते-सुनाते उन तंग रास्तों पर जहां अब चांदनी चौक रेडेवेलप्मेंट का काम चल रहा है  हम आगे बढ़े।रास्ते में जलेबी खाई। वैसे भी चाँदनी चौक का इतिहास यहाँ के खानपान को भी समेटे हुए है और हर दुकान बादशाह सलामत के समय से चली आ रही मालूम होती है। हमारे लखनऊ की नाज़ुक जलेबियों की तरह नहीं, यह तो ठोस अपना वजन दिखाती जलेबी,कह लें जलेबा, थी। बेड़मी,कचौड़ी,नगोड़ी हलवा ---भूखे भजन न होय गोपला!
       हमारा यह सफर खत्म होना था इस जगह के सबसे मशहूर बाशिंदे की दहलीज पर। बहादुर शाह ज़फर और 1857 की बगावत के समय के मिर्ज़ा ग़ालिब  गली कासिम जान में दालान में बैठकर खत और शेर लिखते। हवेली के कुछ भाग को अब संभालकर रखा गया है पर सामने महराबदार दरवाज़े का आधा हिस्सा ग़ालिब के नाम और आधा किसी कारखाने के नाम किया हुआ है।
        हमारी इस "spiritual walk " के शुरू में एक नक्शा निकाल बहुत बारीकी से हमें परिचय कराया गया था एक ग़मगीन बाशाह के सपने से -लाल किले के ठीक सामने -उर्दू बाज़ार से,कोतवाली से,टाउन हॉल से, चांदनी चौक से मिर्ज़ा ग़ालिब की देहरी तक इतिहास के कई पड़ाव का सफर किया और साथ ही इबादत की कई सूरतें देखीं। इबादत की हर सड़क पहुंचाती सब एक जगह हैं। हवाओं में जब अर्धमगधी में मंत्रोच्चारण,अज़ान,जय भोलेनाथ,शबद के मीठे बोल और चर्च से आते गीतों के सम्मिलित स्वर गूंजते होंगे तो कितना पावन हो जाता होगा यहाँ का हर कोना। मिर्ज़ा ग़ालिब को ही कह लेने दें :
       
    " न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता
      डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता"









मंगलवार, अप्रैल 23, 2019

मेरी अपनी गिलहरी

गर्मी तेज़ है। जैसी ही सर्दियां कम हुईं मैंने चिड़ियों और अन्य जीव जंतुओं के लिए एक बड़े से मिट्टी के बर्तन में पानी रख दिया था।आगे पीछे दोनों।बड़े इतरा कर मैं कहती हूँ  दिल्ली के एक ख़ास इलाके में रहती हूँ। घर की चारदीवारी के अंदर ही बहुत से पेड़ हैं। पशु पक्षियों दोनों का ही खेला लगा रहता है। चिड़िया चहचाती हैं,गिलहरी इधर उधर व्यस्तता में दौड़ती रहती है,बन्दर जब आते हैं तहस-नहस तो होना ही है।सिर उठाकर आसमान की ओर देखती हूँ तो एक पेड़ पर तोतों का ही राज है। बोलते,चहचहाते फुर्र से उड़कर कभी इधर कभी उधर,इस डाल उस पात।एक ऊंचा शायद  खजूर का पेड़ है जिसकी चोटी पर बाज बैठा है।तीखी नज़र से सब पर निशाना है उसका।और उसके विपरीत बरामदे में रखे पौधों पर एक नन्हीं सी चिड़िया पंख फड़फड़ाते हुए मंडरा रही है। बाहर कुर्सी मेज लगाकर इन्हें देखने में इतना आनंद आता है मानो सब मेरे ही हों। सिवाय बंदरों के। न वो मेरी सुनते हैं न कदर करते हैं। घंटों बैठ कर देख सकती हूँ इन सब को। आज सवेरे टहल रहे थे तो बगीचे में चिड़ियों के दाने पर गिलहरी का कब्ज़ा देखा। वैसे मैंने चिड़िया को चुगते हुए कभी नहीं देखा। ऐसा संयोग नहीं बन पाया। गिलहरी,क्या पता महादेवी वर्मा की गिल्लू की कोई वंशज होगी, बड़े इत्मीनान से नन्हे पैरों से दौड़ती आयी और उस पेड़ से लटकी थाली से सवेरे का नाश्ता करने लगी। मैंने भी आज उसे कैमरे में बटोरने की ठान ली थी। दबे पाँव गयी ... वैसे मेरा सिर्फ वहम है कि मैं दबे पाँव जाती हूँ। चिड़िया हो चाहे गिलहरी इन्हें दूर से ही आहट मिल जाती है।आज मेरे ऊपर कुछ मेहरबान थी या फिर कुछ विश्वास हो चला। मेरे करीब जाने पर वह भागी तो पर आसपास ही रही। कुछ किटकिट कर के खाती फिर मैं जैसे ही क्लोज़-अप के लिए एक कदम आगे बढ़ाती वह झटपट पत्तियों में भाग जाती। बहुत देर तक हमारा यही खेल चलता रहा और मैं उसका खाना रिकॉर्ड करती रही। काश गिल्लू की तरह वह भी मेरे साथ बैठती या मेरे कंधे पर चढ़ जाती। ऊके लिए मुझे उसी पेड़ के नीचे पड़ाव डालना पड़ेगा। वैसे यह भी है कि इतनी गिलहरियों में पहचानूँगी कैसे। नज़दीक आने नहीं देतीं,न आती हैं और दूर से सब एक जैसी। पर हैं सब बहुत नटखट। कितनी बार मैंने इन्हें एक दूसरे के पीछे भागते हुए देखा। पर जब वह दाना खाती हैं तो ह्रदय को बहुत खुशी मिलती है। 



बुधवार, जनवरी 09, 2019

माटी की बानी

  अपनी मिट्टी से प्रेम का  बंधन
अथाह,अगाध,अनादि,अनंत-आभार ,
जिसे हम कहते हैं हम,सब इस माटी का है
संस्कार,संस्कृति,कृति,दृष्टि
सब इस माटी की है।
मोहक,सम्मोहक,गुंजित,तरंगित
माटी के रंग अनेक।
पृथक विलक्षण,अद्भुत इंद्रधनुष।



मिट्टी के हैं बोल अमोल,क्या कहती,क्या  सुनती है। 
कहती है जो खुशबू मेरी,और कहीं न मिलती है । 
बारिश की वह पहली बूँदें,जब मिलती हैं कण कण से 
सोंधी सोंधी महक लिए, यह रची बसी  है रग रग में ।  

गगरी देखो,देख सुराही,देखो गाँव  की डगर डगर    
मन में तेरे गहरे बसे हैं,दूर कहीं हो फिर भी अगर।
इस माटी से जुड़ा हुआ है  जीवन का हर तार तेरा
माटी की बानी गूंजे है,झंकार करे हर साज तेरा। 

इकतारा बज उठता है पकी फसल के लहराने से
घूम घूम फ़कीर बावले,भक्ति के प्रेम तराने से।
फगवा गाते गली गली जब घूमे है टोली मस्तानी
माटी की बानी बोले है और राधा हो जाए दीवानी।

पुरखों की धरोहर संजो ली हर ताने बाने के धागे में,
पैरों की थिरकन में या फिर लोक कथा दुहराने में।
तन इसका मन भी इसका माथे पर इसका तिलक अनंत
माटी की बानी बोले है, वही आदि है वही है अंत।

गुरुवार, मार्च 08, 2018

महिला दिवस पर ख़ास

हम हैं तो दुनिया हैं,
हम हैं तो रंग हैं ,
हम है तो जीवन चक्र है
हम हैं तो सहारे हैं।
 हम से ही परम्परा है
 हम से ही नवीनता है
हम से ही स्थिरता है
हम से ही हैं नयी उड़ानें।
हम से  रास्ते के उजाले हैं
हम में अंधेरों के गलियारे हैं।
हम से कायम हैं रिश्ते बहुत
हम से अपना रिश्ता है अहम बहुत ।
हम से रसोई की आग है
हम कर सकते हैं काज बहुत।
हम दिल के हाथों मजबूर हैं
हम दिल के बहुत मज़बूत हैं।
हम से ही हमारी पहचान है
हम नारी हैं ,
हमारी आवाज़ है,
हमारी आशा  है ,
हमारी शक्ति है,
हमारी सोच है
हमारा सम्मान है।

शुक्रवार, जनवरी 19, 2018

हमारे सिम्बाजी

कल रात सिम्बा नहीं रहा। वहां चला गया जहाँ उसे कोई कष्ट नहीं होगा। बीमार और कष्ट में तो वह कुछ महीनों से था पर पिछले एक महीने से अपने आप उठने में असमर्थ था। उसके पिछले पैर अशक्त हो गए थे और उसे उठाना पड़ता था। उसकी विवशता बहुत दुखदायी थी।पर उठाने  के बाद वह वही पुराना जोशीला सिम्बा हो जाता,हर चीज़ को सूंघना,बिस्किट खाने की ज़िद करना,रसोई के दरवाज़े पर बैठ खाने का इंतज़ार  करना या हमारी गोद  में सिर रख देना।  पिछले दो दिन से अचानक उसके सामने के पैर  भी जवाब दे गए और जब हमने डॉक्टर को दिखाया तो उन्होंने ने कहा इसका जीवन काल यही तक है। उसे एक हफ्ते का समय दिया और हमें सलाह दी कि हम सिम्बा को उसके कष्ट से मुक्ति दिलाने के लिए  उनकी मदद से सुला दें। यह एक ऐसा निर्णय था जो हम ले पाने में बिलकुल असमर्थ थे। यह जानते हुए कि इसमें उसकी भलाई  ही  है। पर विशाल दिल वाले यह भांप जाते हैं। बीमारी हालत में भी सिम्बा हमारी कश्मकश को समझ गया और शाम को कुछ कष्ट और तकलीफ के बाद  रात में ही वह हमें छोड़ गया। ग्यारह साल बाद आज पहला सवेरा उसके बिना। उसके भौकने  की आवाज़ का भ्रम होता है,रात में उसके होने का आभास बना रहा। परिवार के सदस्यों को खालीपन लग रहा है पर सबसे अधिक लग रहा है  हमारे साथ रहने वाले सफरुद्दीन को जो पिछले छह साल से उसकी देखभाल अपने बच्चे से भी बढ़ कर करता। उससे बातें करता,उसे डांटता,उसके घाव की सफाई करता,दवा खिलाता घुमाने ले जाता,नहलाता। छुट्टी  से लौट कर आता तो स्टेशन से  सीधे पहले सिम्बा से मिलता। उसे घुमाने ले जाता फिर सामान रखता। जो भी हमारे घर आता सिम्बा से प्यार करने पर मजबूर हो जाता। दो साल पहले वह  सिम्बा से सिम्बाजी हो गए ,वरिष्ठ सदस्य होने के नाते।
आभार है उसका हमारे जीवन को अपने प्यार, अपनी उपस्थिति से भरने का और अंत में भी हमें महफूज़ रखने का।


यह नीचे का लेख नवम्बर 2016   में लिखा था पर व्यस्तता के कारण यहां डाल  नहीं पायी ! आज उसकी याद में नम  आँखों से उसे समर्पित !  

इस महीने हमने एक विशिष्ट जन्मदिन मनाया। हमारा  सिम्बा दस   साल का हो गया । वो फर का गोला अब बूढा हो चला। कुत्तों के लिहाज़ से दस  साल वृद्धावस्था है। खास कर उस जैसे बड़ी कद काठी वाली नस्ल के लिए जिनकी उम्र कम ही होती है।अब उसकी हरकतों में भी बुढ़ापा झलकता है। रात में कराहता है। कई कई बार उठता है। वो हमारे ही कमरे में सोता है और मैं महसूस करती हूँ कि वह बहुत चहलकदमी कर रहा है। कई बार मेरे सिरहाने अपना मुंह रख देता है। मनुष्यों की तरह ही हर कुत्ते की अपनी अलग आदतें और व्यक्तित्व होता है। सिम्बा कभी बिस्तर पर सोना नहीं चाहता। उसका अपना एक गद्दा है और अगर रात में वह नहीं बिछा है तो वह दरवाज़े पर खड़ा होकर या तो इंतज़ार करेगा या फिर शिकायत भरी दृष्टि से हमें देखेगा। उसको लोगों के साथ रहना अच्छा तो लगता है पर अपना एकांत भी प्यारा है। लिहाज़ा वह कुछ देर पास बैठने के बाद या फिर प्यार दिखाने के बाद  दूर चला जाता है। यही हाल होता है जब घर में मेहमान आये हों। हम अगर उसे घर आने वाले हर आगंतुक से न मिलवाएं तो वह नाराज़ हो जाता है। इसमें परेशानी यह होती कि है हर मेहमान सिम्बा की नज़दीकी से सहज नहीं होता। जबकि वह है कि  सिर्फ सूंघ कर सबसे जान पहचान कर एक किनारे बैठ जाता है। वह सेंट बर्नार्ड है जो देखने में भारी भरकम होते हैं पर दिल के बहुत कोमल। उसे देखकर लोग डर जाते हैं। पर उस सफ़ेद और काले बाल वाले भीमकाय शरीर में धड़कता दिल बहुत प्यारा है। उस प्यार का इज़हार भी पल पल  में करता रहता है। आप कहीं भी बैठे  हों अचानक  आपकी गोद में एक गुदगुदी सी होगी। धीरे से एक नाक ,फिर एक सिर आपकी गोद में आएगा और फिर पूरा शरीर उसमें बैठने की कोशिश कर रहा होगा। सोचिये एक ५५-६० किलो का वजन किसी भी तरह उसमें समाने की कोशिश कर रहा हो।  अगर आप उसे सहलाते नहीं तो वह पंजा मारकर आपको अपने होने का एहसास दिलाएगा । यह स्नेह खाना खाने के बाद और भी मुखर हो जाता है। अभी तो वह सिर्फ गोद में सिर रख देता है या पास आ कर सटता जाता है। पर एक साल पहले तक वह अपनी गीली दाढी लिए ऊपर ही चढ़ जाता था। और दो पैरों पर खड़ा सिम्बा हम से लम्बा ही है। वह उछल कर हमारे कन्धों पर अपने आगे के दोनों पैर टिका देता और चाहता कि हम उस सहलाएं या गले लगाएं । हम सब सावधान रहते हैं उसे प्यार वाले मूड देखते थे तो जाते  या तो ज़मीन पर पैर जमा देते। नहीं तो गिरना पक्का था।
     मुझे याद आ रहा है। वह तीन महीने का था जब  हमारे पास आया था। उस समय परिस्थितयां ऐसी विषम हीं कि मैं उसे घर में लाने के निर्णय से बिलकुल  सहमत  नहीं थी और नाराज़ भी। पर कुछ ही महीनों में  वह  झबरीले  पिल्ला  दिल में आकर बैठ गया। वह  इस बात से ज़रा भी निरूत्साहित  नहीं था कि मैं उससे रूखा व्यवहार कर रही हूँ।  वह पूंछ हिलाते प्यार के लिए पहुँच ही जाता। तब से  वह परिवार का सदस्य है और अपने को हमसे अलग नहीं मानता। वह  हमारी हर गतिविधि में शामिल होता है। अगर बाहर जा रहे हों तो पहले कार के पास खड़ा हो जाता है। यह मुमकिन नहीं कि उसे हर जगह ले जाया जाए पर उसे घर छोड़ते हुए जितनी निराशा उसे होती उससे कहीँ अधिक दुःख हम सबको। खासकर जब हमें कहीं शहर से बाहर जाना होता है । उस तक यह बात पहुँचाना असंभव है की हम अमुक दिन वापस आएंगे। वह भी  मुँह लटकाकर बैठ जाता है और  उसकी पूँछ  पैरों के बीच छुप जाती है। अगर उसने कहीं सूटकेस देख लिया तो उसकी बैचैनी का कोई अंत नहीं।  वह उसी के पास बैठा या लेटा रहेगा। वैसे अगर घर में किसी की तबीयत खराब होती है तो भी वह उस सदस्य के पास से  नहीं हटता है।
   सेंत बर्नार्ड नस्ल के कुत्ते स्विट्ज़रलैंड में पाये जाते हैं और उनके बारे में मशहूर है कि वह पहाड़ों में बर्फ में दबे लोगों को खोजने में बहुत मदद करते थे।इनकी सूंघने की शक्ति बहुत विक्सित है और यह बर्फ में बहुत नीचे दबे लोगों का भी सूंघ कर पता लगा सकते हैं। एक से डेढ़ फुट ऊंचा,लंबे बालों वाला ,शक्तिशाली और वजनदार  यह कुत्ता बहुत ही नरम,वफ़ादार और दोस्ताना मिजाज़ का होता है। इसके बाल काले और सफ़ेद होते हैं या फिर भूरे और सफ़ेद होते हैं। हमारा सिम्बा काला और सफ़ेद है। उसे देख कर लगता कि वह अपना कम्बल साथ ले कर चल रहा हो। उसकी दुम काफी घनी और दमदार है और अगर सिम्बा ने खुशी से पूंछ घुमाई तो समझ लीजिये कि आसपास रखी चीज़ें तो ज़रूर टूटेंगी।
    एक बड़ी दिलचस्प बात यह भी है कि उसे भुट्टे खाने का बड़ा शौक है। वह बड़े चाव से खाता है और अगर हम भुट्टा खा रहे हैं तो वह घर में वह कहीं भी है ,दौड़ा चला आएगा। इसलिए जब भी भुट्टा आता है उसके लिए अलग से एक आता है। वैसे वह दूध रोटी  ,दही,पनीर का पानी और मटन पसंद करता है। उसकी एक अच्छी आदत है  कि वह बड़े ही अनुशासित तरीके से अपने नियत समय , खाने वाली जगह पर ही खाना खाता है। सवेरे छह बजते ही वह अपनी नाक मेरे मुंह के पास सटा देता है। हमारा मॉर्निंग अलार्म वह ही है। चलो मुझे बाहर निकालो , घुमाओ और मेरा खाना दो।
   हमें लगता है कि हमारी दिनचर्या उसी के इर्द गिर्द घूमती है। थोड़ी देर के लिए  दिखाई न पड़े तो उसकी खोज शुरू हो जाती है। सब लोग ऑफिस से लौटने पर सबसे पहले उसको सहलाते हैं नहीं तो वह अपने भौंकने के अंदाज़ से नाराज़गी जता देता है। कोई कितना भी  परेशान हो ,परिवार के इस सदस्य का दुलार हर पीड़ा को हल्का कर देता है। प्यार भी बिलकुल अथाह और बेशर्त। वह बूढा होने पर भी बच्चा है ,हमारी भाषा न बोल पाने के बावजूद सर्वाधिक अभिव्यंजक है और सच तो यह है कि उसके बिना सब कुछ अधूरा लगता है।
     

रविवार, जुलाई 09, 2017

हम फिदाए लखनऊ


लखनऊ है तो महज़ गुम्बद-ओ मीनार नहीं,सिर्फ एक शहर नहीं,कूचा ओ बाज़ार नहीं,
इसके दामन में मोहब्बत के फूल खिलते हैं, इसकी गलियों में फरिश्तों के पते मिलते हैं,
'लखनऊ हम पर फ़िदा, और हम फिदाए लखनऊ 
क्या है ताकत आसमां की, जो छुडाये लखनऊ

लखनऊ कह लें या नखलऊ........ अवध के नवाबों ने बड़े नाज़ से इस शहर को आबाद किया। उनके हर शौक की निशनियां यहां बिखरी हैं । बड़ा इमामबाड़ा की भूलभलैया  में छिपी है  नवाब आसफ-उद -दौला की वह कहानी जो अकाल में जनता की मदद के लिए स्वयं उसको बनाने में जुट  गए। वह भावना दिलचस्प है जो नवाबी खानदान से जुड़े लोगों की  शाख़  में गुस्ताखी लाये बिना उनकी ज़रूरतों को पूरा करने का उपाय ढून्ढ लाई । लखनऊ  में हर मोड़ पर उस ज़माने की इमारतें रास्ता रोके खड़ी हैं। छोटा इमामबाड़ा, रूमी दरवाज़ा, छत्तर मंज़िल ,रेजीडेंसी,बारादरी,दिलकुशा ,शाहनजफ का इमामबाड़ा ऐसे कितने ही अद्भुत स्मारक चिन्ह लखनऊ को एक अलग पहचान देते हैं।  अंग्रेज़ों  की बसाई छावनी के गिरिजाघर हों या आज का हज़रतगंज स्थित बृहत् केथेड्रल ,सब इस शहर को चार चाँद लगाते हैं। वैसे चाँद की चाँदनी की बात करें तो यहाँ के नज़ाकत और नफासत वाली हवाओं के लिए वह भी बहुत गर्म हैं। यहाँ तो हज़रतगंज में शाम की सैर करने पर भी ज़ुखाम हो जाने के चर्चे हैं ! शाम -ए -अवध का मज़ा उठाना हो तो  गंजिंग करना अनिवार्य है। मेफेयर का ज़माना अब नहीं रहा। उसका मलाल हमेशा रहेगा।  जनपथ है,रॉयल कैफ़े है ,शुक्लाजी की चाट है ,रामआसरे की मिठाई है , हनुमान मंदिर है। राम आडवाणी की पुस्तकनिधि है, रोवर्स के सामने  भीड़  है, खियामल की साड़ियां हैं।
  पर अगर असली खरीदारी करनी है तो चौक की गलियों में आरी,जाल ,मूरी ,फंदा,टेपची और न जाने कितने कमाल दिखाती चिकनकारी को देखिये। वैसे अमीनाबाद का गड़बड़झाला और नजीराबाद भी कम नहीं। कुछ आगे है लखनऊ का सबसे पुराना बाजार नक्खास। यहाँ अब भी  चिड़ियों का एक अनूठा बाज़ार लगता है।  लखनऊ का नाम लेते ही बहुत से नाम तुरंत याद आ जाते हैं। चिकन की महीन कशीदाकारी तो है ही , साथ में कितनी और कलाओं का पर्याय है यह शहर। यहाँ हर शौक को परिष्कृत कर एक ललित कला का रूप दे दिया गया । पहले आप और आदाब के इंतहाई अदब के साथ साथ यहाँ मशहूर हैं नफासत के कई किस्से। नवाब साहब का दाँत टूट गया  तो उनके खानसामा ने तुरंत गल जाने वाले गलावटी कबाब पेश  किये । ज़रा सोचिये इसमें सौ से भी अधिक मसालों  का इस्तेमाल होता है। क्या आपने जरकुश और बओबीर का  नाम  सुना है कभी ? क्या चन्दन को मसाले की तरह सोचा है कभी ?इसका मज़ा लेना हो तो टुंडे कबाबी के  यहाँ जाइये। कोयलों की  धीमी आंच पर घंटों पकता खाना  दम पुख्त के नाम से मशहूर  है और इससे  शुरू हुई लज़ीज़ पकवानों की एक अलग ही श्रृंखला।  पर शाही रसोई के बाहर भी यहाँ के खाने का मज़ा बेमिसाल है। अमीनाबाद की प्रकाश कुल्फी , वहीं पीछे कबरवाली दुकान की कचौड़ियां या दोपहर बाद लगता तिवारी की चाट  का ठेला  ...यहाँ का हर निवाला एक सवेदनशील ह्रदय की अभिव्यक्ति है।
जिस शहर में नवाब अपने निष्कासन  की पीड़ा  ठुमरी में व्यक्त करें ,वहां सुरों का राज न हो यह नामुमकिन है। " बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाये" सुनकर फूटफूट कर रोने का दिल करता है।  गायकी का ज़िक्र आये और लखनऊ का हर बाशिंदा बेगम अख्तर से  राब्ता न बनाए यह हो ही नहीं सकता । बेगम साहिबा जब "ए मुहब्ब्त तेरे अंजाम पर रोना आया " गातीं तो हर लखनऊ वाला  शाम पर रोने के किस्से याद करता है।  वह शाम जो  कत्थक के लखनऊ घराने के थिरकते पैरों के घुंघरुओं से खनक जाती है ।   या वो शामें जो नीचे गोमती की लहरों और ऊपर  अठखेलियां करती पतंगों पर कुर्बान हैं ।
कहते हैं लखनऊ की सड़कें मंज़िल तक नहीं पहुंचाती हैं। वो खुद ही मंज़िल  होती हैं।  इसीलिये मुस्कराइए की आप लखनऊ में हैं।
तहज़ीब कोई मेरी नज़र में जंचेगी क्या
मेरी निगाहे शौक ने देखा है लखनऊ।



मंगलवार, मार्च 07, 2017

मेरे घर आयी खुशी की बहार

आज शाम बहुत सी मुस्कराहटें
इधर उधर से उड़ती हुईं
मेरी बगिया में आईं।
कुछ हंसती चहकती  अंदर आईं
कुछ सकुचाती मुस्कराहट थी ,कुछ खामोश
कुछ में सहमा सा डर था,कुछ में दिल्लगी
पर मुस्कराहटें सब थीं।
फूलों,कलियों,पेड़ के दरख्तों ,वो वहां टिकी साईकिल,उधर
रखा एक छाता

एक एक कर सब पर बैठ गयी थीं मुस्कानें।

धीरे धीरे खुशबू की तरह सब और फ़ैल गयी मुस्कानें।
बगिया  तो चहक उठी,महक उठी
चंचल हो उठी,बावरी हो गयी
देख सब मुस्कानें।
किसी मुस्कान में पीताम्बर बसा
किसी ने ओढी थी हरी चुनरिया
उन्मुक्त हंसी में बदली एक मुस्कान ,एक ने खिलखिला  कर दिया जवाब।
लिहाज़ के बंधन   में बंधी पर फूटने को बेताब  एक मुस्कान दिखी
कुछ हरी घास पर बिखरी मुस्कानें थीं,कुछ उत्सुक निहारती  मुस्कानें थीं।
हाथ थामें मुस्कानें थीं,कुछ भागती मुस्कानें थीं,
दिल का दरवाज़ा खोल झांकती मुस्कानें थीं।
मेरी,उसकी,इसकी,किसकी  सबकी आँखों से झलकती मुस्कानें थीं।

आज शाम इधर उधर से
बहुत सी मुस्कानें मेरी बगिया में आईं
बगिया मदहोश है
और मेरी मुस्कान
सब मुस्कानों का रंग चुरा
हो गयी है  उमंग से लबरेज़  मुस्कान ।
   

शुक्रवार, फ़रवरी 26, 2016

DELHI 6

किसी भी शहर के बारे में शायद ही हममें से किसी को पूरी जानकारी नहीं होती है। और अगर वह शहर दिल्ली हो जिसके परत दर परत खोलते जानते कई ज़माने गुज़र जायेंगे तो आप जितना जानेंग उससे कहीं अधिक अनजान रह जाएंगे।दिल्ली को जानने पहचानने के एक मुहिम चल रही है "डेल्ही वॉक फेस्टिवल "  के रूप में। एक हफ्ते में इस शानदार शहर के अलग अलग पहलुओं को जानने पहचानने का अवसर है।  चुनाव करना मुश्किल था कि कहाँ का रुख करें?   दिन भर आप चलते तो नहीं रह सकते !
मैंने चुना चांदनी चौक की राह को । "ट्रेडस ऐंड ट्रेज़रस ऑफ़ चाँदनी चौक " के ज़रिये हमें पुरानी दिल्ली की इस धरोहर से परिचित करा रहे थे युवा वास्तुविद रोहन पाटणकर। वैसे मुझे भीड़भाड़ से काफ़ी  बेचैनी होती है खासतौर से बाज़ार की भीड़ से। चुनाव करने में यह भी एक विचार था कि वैसे तो मैं यहां जाऊँगी नहीं ,चलो एक ग्रूप में ही इसके दर्शन हो जाएं। करीब पौने चार बजे जब हम चांदनी चौक मेट्रो क गेट नंबर ५ पर उनसे मिले तो उनके उत्साह ने हमें भी जोश से भर दिया। भीड़ तो थी ही पर हम उसमें भी अपने झुण्ड के साथ आगे बढ़ते गए। 
चांदनी चौक व्यावसायिक लहज़े से दिल्ली का प्रमुख केंद्र है। थोक व्यापार के लिया विशेष जाना जाता है। इसकी मुख्य सड़क के एक सिरे पर है फतेहपुरी मस्जिद और दूसरे पर लाल किला।  किसी ज़माने पर यहाँ सड़कके बीच एक नहर थी और कहते हैं इसमें पड़ती चांदनी की चमक से ही इस जगह का नाम पड़ा।वह भी क्या दृश्य रहा होगा। दिल्ली की यही विशेषता है। जगह जगह आपकी कल्पना को अतीत में जाने के लिए बाध्य कर देती है। वह भी बहुत ही शानदार इमारतों के ज़रिये । पर इस बार हमारा ध्यान इन इमारतों पर नहीं बल्कि यहां के कारोबार पर है। फतेहपुरी मस्जिद की ओर  चलते हुए हम एक जगह रुक कर सड़क के उस पार देखते हैं।  इलाहाबाद बैंक की इमारत दिखी। आसपास दुकानों से घिरी यह ईमारत बड़े अकेली सी अपनी कुछ कहानी कहती दिखी । रोहन ने वादा किया यहां की सबसे पुरानी और बड़ी हवेली दिखाने का।  हवेली थी लाला चूनामल की। एक साधारण से दिखनेवाले दरवाज़े से इसका प्रवेश है ,पर अंदर इसमें १२० कमरे हैं।नीचे दुकानें और ऊपर लम्बाई में फैले कमरे होंगे शायद। एक पुरानी घड़ी भी दिखी।  क्या वह १८५७ का समय दिखा रही है जब लाला चुनामल ने अंग्रेज़ों का साथ दे कर दौलत कमाई।  उनके वंशज अब भी यहाँ रहते हैं। 
लाला चूनामल की हवेली


आगे  था कटरा नील जहाँ नाम के अनुरूप पहले तो रंगन का काम होता था पर अब वह बन गया है कपड़ों की दुकानों केंद्र। यहां हमने सड़क पार की और पहुँच " गांधी क्लॉथ मार्केट " . यहां थान के थान कपडे बिकते हैं। रोहन हमें यहां कि गलियों में ले जाते हैं। दोनों तरफ कपड़ों के थान हैं। गलियों से गुज़रते अचानक ही एक चबूतरे क पास आकर रुकते हैं।  रोहन इस चबूतरे को लेकर उत्तेजित हो जाते हैं। बताते हैं कि बेतरतीब ढंग से हुए निर्माण की वजह से यह चबूतरा इतना छोटा रह गया है। वरना यह काफी बड़ा होना चाहिय। वैसे हम मुख्य सड़क से सिर्फ ५० मेटर ही अंदर हैं ,पर गलियों के जाल और अनियमित इमारतों की वजह से काफी दूरी।  यहां के नगर नियोजन और सरचना के बारे कुछ जानकारी मिली। आगे बढे फतेहपुरी मस्जिद के ओर। जूते चप्पल उत्तर कर हाथ में पकड़ लिए और अंदर आकर इस मस्जिद की भव्यता देखी। बाहर के शोरगुल के बिलकुल बगल में पर लगता है जैसे कोसों दूर-एकदम

शांत !  पता चला कि कभी इस मस्जिद को अंग्रेज़ों ने लाला चूनामल को उन्नीस हज़ार रुपये में बेच दिया था। बाद में सरकार ने उन्हें चार गाँव देकर मस्जिद वापस खरीद ली  और मुसलमानों को दे दी। उस ज़माना के किस्से विचित्र थे। 


फतहपुरी मस्जिद और चांदनी चौक
  फतेहपुरी मस्जिद के उत्तर मैं भी एक दरवाज़ा है जो निकलता है खरी बाउली के ओर। गली बताशा और पान की कुछ थोक दुकानों को पार करते हुए हम से एक छोटे दरवाज़े से हम अंदर गलियों क जाल में घुस गए।  इन्हीं तंग गलियों में दिखीं हर तरह के मसलों की बोरियां। चांदनी चौक की प्रसिद्धि  का यह भी एक बहुत बड़ा हिस्सा है.एशिया का सबस बड़ा "स्पाईस मार्केट "  जहाँ हर किस्म के मसाले ,सूखे मेवे और न जाने क्या क्या मिलते हैं। तरह तरह के मसालों के गंध ने हमें नाक पर रूमाल रखने पर मजबूर कर दिया . खांसते खांसते , ठेलों और बोरियों के बीच से बचते बचते हम बढे सीढ़ियां की ओर . अँधेरे में ,पतली सीढ़ियाँ हम चढ़ते गए .सांस फूलने लगे  इससे पहले ही हम पहुँचे हैरान कर देने वाली छत पर.हमें विश्वान नहीं हुआ कि हम अब फतेहपुरी मस्जिद के पीछे कीओर चुके थे। खुली छत पर सामने देखा तो संध्या वेला का आसमान था। लज्जारूणिमा लिए गगन और बल्ब की रोशनी से जगमाती एक सड़क जो दूर क्षितिज पर  एक धुंधले लाल किले  से लहराते बलखाते हुए जा कर मिल जाती है। इस "वॉक " का चरम अनुभव था यह दृश्य।  नीचे मार्कट की चहल पहल ,एक ओर  मस्जिद का आँगन ,बगल में खरी बाउली की सड़क और साथ में एक विशेषज्ञ की रोचक टिप्पणियाँ . भीड़-भाड़ और कई धक्कों के बाबजूद एक दिलचस्प दिन का बिलकुल माकूल अंत . और जो सबसे बड़ी बात हुई वह यह कि चांदनी चौक दुबारा देखने की लालसा और हिम्मत दोनों आ गयी।  लालसा उसके अन्य पहलुओं को जानने की और हिम्मत यहाँ आकर खरीदारी करनी की . आभार   दिल्ली घुमाने वालों का !

शुक्रवार, जनवरी 29, 2016

बदल गयी है दुनिया कैसे

बदल गयी है दुनिया कैसे , कैसे अजब नज़ारे हैं
आसमान में धुंधले अब तो, दिखते भी सितारे हैं।

हर तरफ है धुआं फैला हर तरफ कुछ मैला है
हर इंसान को दिखता जब सिर्फ पैसों का थैला है !

अभी सड़क बनी नहीं कि पड़ने लगीं दरारें हैं
तारकोल जैसा भी हो लालच की खूब मिसालें हैं  

पैर तले ज़मीन खिसक गयी ऊपर खूब प्रदूषण है
फेफडे बोले हाय राम यह कैसा गजब कुपोषण है

आक्सीजन के नाम पर  अंदर, आता विष प्रवाह है
क्या होती थीं साँसे  जानें ,अब लेते हम सिर्फ आह  हैं !

जान जाने के भी  देखो कितने नए नये तरीके हैं
मनचले पियक्क्ड़ की गाड़ी  कितनो को घसीटे है!

कुछ कमाल दिखाती है अपना ,नकली दवा की बोतल भी
बाकी हाथ बटाने आयी ,भोजन में हुई मिलावट भी।

हमने भी मारी एक कुल्हाड़ी ज़ोर से अपने  पैरों पर
बलि चढ़ गया चलना फिरना ,कम्प्यूटर के चेहरों पर। 

बदल गयी है दुनिया कैसे कैसे अजब नज़ारे हैं
अपनी ही फोटो खींचे सब ,बस अपने ही सहारे हैं !

शुक्रवार, जनवरी 01, 2016

नया कैलेंडर

पुराने कैलेंडर को उतार लगने जा रहा है
अब एक नया कैलेंडर 
पिछले पर बहुत हिसाब किताब लिखे  हैं 
कुछ खास काम लिखे हैं। 
कब कामवाली छुट्टी से वापस आएगी ,
कब गैस  जल्दी ख़त्म हो गयी  
किस महीने ज़्यादा चली 
कब किसी के घर दावत है 
घर की दावत का मेनू क्या है।    
किस की अंतिम तारीख है 
कब कहीं बाहर जाना है। 
हर महीने का छिट्ठा  कैलंडर 
हो गया अब कबाड़ है। 
फिर भी  एक बार पलट कर देखना 
कुछ आहें भर ,कुछ खिसियाना।  
नया कैलेण्डर टांग दिया 
हर पन्ना एकदम कोरा है। 
बस पहली तारीख में एक शब्द लिखा 
प्रसन्न 
बाकी साल में कुछ भी हो 
हर महीने की हर तारीख में कुछ भी लिख जाये 
पलट कर साल की शुरुआत देखेंगे 
और कोरे पन्ने पर मुस्कान 
खिंच जाएगी ! 





गुरुवार, सितंबर 24, 2015

कुछ नए मेहमान घर आये

एक दिन सवेरे  चाय बनाने रसोई में गयी तो  दो आँखों को  खिड़की  से झांकते हुए   देखा।  हरी आँखों में कौतूहल था और थोड़ा  भय भी। मैं चाय बनाने में लग गयी।   क़ुछ देर बाद देखा  चार आँखें   अंदर ताक रही थीं। याद  आया कुछ दिन पहले एक बिल्ली   को तीन छोटे बच्चों के साथ घूमते देखा था। लगता है उन्हें मेरा पिछवाड़ा रास आ गया। सोचने लगी कि दो बच्चे तो  यह  रहे पर  तीसरा कहाँ है ?फिर  रोज़  की   तरह  पीछे का दरवाज़ा खोला तो पैर में एक नरम सा एहसास हुआ और फिर दूर भागती तीसरी बच्ची  भी दिख गयी।  बाकी दोनों भी तब तक दूर भाग  गयी थीं।  तब से अब यह रोज़ का नियम हो गया है। जब भी पीछे का दरवाज़ा खोलती हूँ तो यह तीनों  जाली से सटकर  बैठी मिलती हैं।   उस दिन उनकी म्याऊं म्याऊं सुनकर मैंने एक रोटी और दूध पीछे रख दिया था। यह भी एक नियम हो गया है। सवेरे दूध रोटी न पाकर उनकी म्याऊं की आवाज़ में पहले थोड़ी मिन्नत का स्वर आता है और फिर थोडी देर बाद झिड़की और फिर गुस्सा। वैसे मैंने देखा है कि दूध रोटी मिलने पर वह तुरंत दौड़ कर उसके पास जाती हैं पर थोड़ा सा चखने  भर का खाने के बाद वहां से हट जायेंगीं। उसके बाद वह खाना शाम तक ही ख़त्म होता  है।
अब तो यह तीनों हम सब के लिये  मनोरंजन का साधन हैं।  सामने की ओर  बड़ा सा लॉन होने की वजह से हम पीछे कम ही बैठते हैं। न के बराबर। पर अब सवेरे सबसे पहला  काम तो उन्हें देखना होता ही है ,दिन में भी कई कई दफा हम पीछे झांक लेते हैं।  तीनों की फितरत अलग अलग ही है।  दो तो भूरी और सफ़ेद हैं और एक काली और सफ़ेद।  इनमें से एक तो काफी निडर है। यह" कैमरोन  डायज़" है जो  हमें देख कर भागती नहीं है और हम कई बार उसे पकड़ कर उठा चुके हैं।  बाकी दोनों तो दूर छिटक जाती हैं।  यह हम समझ नहीं पा रहे है कि यह पहली बिल्ली निर्भीक है या फिर थोड़ी बुद्धू भी। दूसरी भूरी बिल्ली "ड्रू बेरीमोर"सबसे शर्मीली लगी  और बहुत दूर भाग जाती है। काली वाली जिसे हम "हेली बेरी" कहते  हैं कुछ मध्य दूरी पर रहती है। उसको  भी एक बार पकड़ा था पर वह पंजा चलाने लगी।
अभी कुछ हफ्ते ही हुए हैं और  अब यह बड़ी हो रही हैं। पर इनको घर के अंदर आने की इजाज़त नहीं है।  हम कई बार अंदर से इनके आपस के खेल देखते हैं। पेड़ पर चढ़ना और फिर एक दूसरे  को गिराना।  एक दूसरे  को  चैन से बैठने नहीं देतीं। एक अगर लेटी  हुई है तो दूसरी दौड़ते हुए आएगी उसके ऊपर चढ़ने।  पीछे एक सहजन का ऊंचा पेड़ है.पहले  उन्हें देखती थी उस पर चढ़ने की कोशिश करते हुए। अब तो फुर्ती से चढ़  जाती हैं।  यह फुर्ती तब बहुत दिखी जब एक कुत्ता अंदर घुस आया।  क्या गजब तेजी से सब किसी किसी पेड़ पर चढ़  गयीं।  काली वाली पेड़  तक नहीं  पहुँच पायी तो रसोई की खिड़की पर ही बैठ गयी। कुत्ता भी क्यों भागता ? उसे तो रात की दावत के सपने दिखाई पड़ने लगे।  खैर बाहर निकल कर मैंने उसे भगाया और इन तीनों की सांस में सांस आई। हो सकता है मेरी नेक नियती पर भी कुछ भरोसा हो गया हो। आशचर्य की बात तो यह है कि हम जब अपने कुत्ते सिम्बा को बाहर निकालते हैं तब यह नहीं भागती। पहले तो थोड़ा सावधान मुद्रा में उसको भांपती हैं,थोड़ा पीछे हटती हैं पर भागती नहीं है। सिम्बा भी उन्हें सूंघ कर ,परिचय बढ़ाकर अपने में मस्त हो जाता है।मिलकर खुश ही होता है क्योंकि उसकी पूंछ ज़ोर से हिलने लगती है। गोल गोल भी घूमी जो कि सिर्फ खास दोस्तों के लिए ही घूमती है।
कैमरोन  डायज़ 
सहजन का पेड़ तो फिर भी इनकी भागदौड़ सह लेता  है पर मेरा छोटा सा मीठी नीम का पेड़ तो अभी पतला सा ही है। यह जब उस पर धमा चौकड़ी मचाती हैं तो उस पेड़ की पतली कमर क्या हिचकोले लेती है ! लगता है अब टहनी टूटी तब टूटी. इनमें से एक ऊपर चढ़ेगी तो दूसरी नीचे से उसे खींचेगी। उसको नीचे गिराकर खुद ऊपर चढ़ जाएगी। यही सिलसिला चलता रहता है। एक दिन मैंने अपनी 'ड्रू बेरीमोर' को देखा 'हेली बेरी के साथ मुक्केबाजी कर रही थी।  उसको दो घूंसे ऐसे लगाए कि हमारी प्यारी हेली वहां से भाग ही गयी। यह सब अंदर से देखने पर बड़ा मज़ेदार लगता है। कई बार सोचा कि बाहर निकल कर इसे फिल्म कर लें। पर जैसे ही बाहर निकलो यह सब अपना खेला छोड़  खाने की आस में आसपास घूमने लग जाती हैं। वैसे शायद अब वह मेरे काले आईपेड से परिचित हो गयी होंगी ,क्योंकि मैं अक्सर उसे हाथ में लेकर पीछे निकलती हूँ।  इनकी हर अदा को कैमरे में उतारने के लिए। मैंने इन्हें आपस में लाड प्यार करते भी देखा है. शायद माँ  की कमी महसूस होती होगी क्योंकि एक दूसरे  के सीने में मुंह घुसाकर दूध पीने वाली मुद्रा में भी इन्हें देखा है य़ा फिर एक दूसरे को सहलाते  हुए। कभी तीनों एक दूसरे  के ऊपर लद  कर सो जाती हैं।
वैसे वो दरवाज़े के बाहर से ही अभी तक घर के अंदर बड़ी उत्सुकता वाली दृष्टि से देखती हैं। पर आज काली वाली ने थोड़ी हिम्मत दिखाई। मैंने जैसे दरवाज़ा खोला वह पैर के बीच से अंदर पहुँच गयी. पर संकोच था या फिर सिम्बा को अंदर बैठे देख सहम गयी। तुरंत  वापस आ गयी। दिन पर दिन यह बड़ी होती जा रहीं है। अब अपना  शिकारऔर खाना  खुद दूंढ़ेंगीं। मैंने इन्हें खेत को पंजों से कुरेदते देखा है। मेरे किचन गार्डेन का एक छोटा सा हिस्सा इनके खोदने  से खराब हो गया है।  हो सकता है चूहे वगैरह कुछ कम हो गए हों। जो भी हो इन तीनों बिल्लियों ने हमारा दिल तो जीत ही लिया है। एक से दोस्ती हो गयी है.बाकी  दोनों का भरोसा जीतना है। जब मैं तीनों को अपनी गोदी  में उठकर एक फोटो खिचवाऊंगी तब बात बनेगी इस दोस्ती की !












गुरुवार, अक्टूबर 02, 2014

स्वच्छता दिवस पर कुछ ख़ास


कुछ दिनों पहले घर की साफ़ सफाई पर कुछ 5 -6 मिनट की  एक लघु प्रस्तुति की थी। उस पावर पॉइंट प्रस्तुत को वीडियो में रूपांतरित किया पर पार्श्व  स्वर का  चित्रों  के साथ तालमेल नहीं बैठ पाया।  बहरहाल ,स्वच्छता दिवस के सन्दर्भ में , अभी तो इसे यहां पर डाल  दे रही हूँ।  फिर बाद में इसका तालमेल बैठाकर ,सही करूंगी।