मंगलवार, जनवरी 25, 2011

अंडमान यात्रा ..काला पानी जहाँ आज़ादी के सिपाही को मिला धरती पर नर्क

५७२ द्वीपों में सिर्फ ३८ ही आबाद हों. बाकी सब जगह सिर्फ जंगल ही जंगल. अंडमान -निकोबार द्वीप समूह ऐसा ही है जहां प्रकृति  की छटा हर तरफ बड़ी ही उदारता  से दिखाई देती है. बड़ी ही नरमी से बात करने वाले लोग, आराम से चलती ज़िंदगी ,समुद्र का साथ ,पेड़ों से दोस्ती ,इस जगह को नायाब बना गयी है. पहले दिन रोस टापू का दौरा किया और शाम को सेल्युलर  जेल यानी भयावह काला पानी . दिन में इसे हमने अगले दिन देखा. ह्रदय में इतना तूफ़ान ,इतनी तड़प  इसे देखते समय महसूस हुई कि बयान करना मुश्किल  है  . भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद अंग्रेजों ने यहाँ ऐसा जेल बनाया जिससे बाहर निकलना नामुमकिन था. समुद्र के किनारे ,जंगलों के बीच मुख्य भारत से दूर ,उन्होंने स्वंत्रता संग्राम के सेनानियों  को यहाँ अपने घर परिवार से दूर निर्वासित किया. १८९६ में इस जेल का निर्माण शुरू हुआ और इसमें काम करने वाले वही बहादुर सिपाही  और आसपास के टापू पर बने जेलों के बंदी थे  ,जिन्हें आजीवन कारावास की सजा के तौर पर यहाँ भेजा गया था. १९०६ में यह बनकर तैयार हुआ . इसका नक्शा इस तरह का था कि एक  मध्य बुर्ज को केंद्र मानकर सात खंड बाहों जैसे बाहर निकलते  हैं. एक खंड का पिछवाडा दूसरे खंड के सामने है जिससे कैदीयों की  आपस में कोई भी बातचीत न हो  सकें. अब तो सिर्फ तीन खंड ही बचे हैं. इसके दो खंड पहले अंग्रेजों ने गिरवा दिए और दो बाद में भारतीय सरकार ने. पर अब इसे राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा दिया गया  है . कारागार बनाने वालों का मानना था कि
"prison regime must be punitive and humiliating even more dreadful than hangman`s noose" so as to employ deterrence through fear both against those subjected to it and for the `potential dangers`
इसके अन्दर पहुँचने पर दोनों तरफ कमरा है जिसमें वहां जिन वीरों ने समय बिताया था और उस जेल के विषय में  प्रदर्शनी है. वहां पर दिए गए कष्टों को हम रात के शो में देख चुके थे.उनकी तसवीरें देखकर दिल दहल गया . पैरों में पड़ने वाली बेड़ियाँ,सजा के तौर पर पहनाई जाने वाले  बोरे के कपडे आदि. वहां से निकल कर अन्दर पहुंचे कारावास के प्रांगण  में. नज़र पडी कोड़े मारने वाली जगह पर. यहाँ पर कैदियों को बांधकर कोड़े मारे जाते. बीच में बना था एक कोल्हू. बैल की जगह  यहाँ के  बंदी   उसमें बांधे जाते और तेल निकालते . सामने एक ऊंची कुर्सी पर दरोगा बैठ कर उनको  चौकसी रखता . कई लोग इस में घायल हो जाते.  आखिर स्वतंत्रता के लिए अपना सब कुछ बलिदान करने वालों को इतना अपमान असह्य हो जाता . यही तो अँग्रेज  चाहते थे. बौद्धिक और शारीरिक स्तर पर स्वतंत्रता  के वीरों  को तोड़ देना.राजनीतिक कैदियों,हाथ में कलम से लड़ाई  करने वालों,  युवा अवस्था में पदार्पण कर रहे साहसी क्रांतिकारियों  के साथ अमानवीय ,अविश्वसनीय क्रूर व्यवाहार होता था.








तीन मंजिला जेल ,कालकोठरी की एकाकी सजा के लिए बना था.
बुर्ज से चारों ओर पहरा आसानी से दिया जाता था .एक भाग केदूसरे मंजिल पर वह कमरा भी देखा जिसमें वीर  सावरकर को रखा गया था. इस कमरे से सीधे वह जगह दिखती थी जहाँ मृत कैदियों का अंतिम संस्कार होता था. शायद वीर सावरकर को मानसिक यंत्रणा देने के लिए ही उन्हें इस कक्ष में रखा गया. नीचे आकर फिर देखा वह स्थान जहाँ फांसी दी जाती थी . उसे देखकर खौफ सा लग गया . न जाने क्यों उस की फोटो खींचने में हाथ कांपने लगे. काला पानी  के कारावास को देखकर एहसास हुए कि जिन्होंने अपनी जवानी ,अपनी ज़िंदगी आज़ादी के लिए कुर्बान कर दी , उनकी दी गयी विरासत को हम कितनी लापरवाही से रख रहे हैं. एक दिन पहले आपस में यह बहस छिड़ी थी कि क्यों ब्रिटिश काल के नामों को बदल कर हम हिन्दुस्तानी नाम दे रहे हैं. एक बार को मुझे भी लगा कि नाम नहीं बदलने चाहिए,वह भी हमारा इतिहास है ,अच्छा  या बुरा. पर फिर काला पानी के उस स्मारक को देख कर लगा कि जिन्होंने इतनी असह्य  तकलीफें हमारे देशवासियों को दीं ,उनके नाम पर अपने   देश में क्यों कोइ जगह,कोइ सड़क,कोइ शहर ,कोइ स्टेशन रहे.



      

मंगलवार, जनवरी 18, 2011

अंडमान की यात्रा ..जहाँ अभी भी नैसर्गिक सौन्दर्य रिझाता है.

इस वर्ष तय हुआ कि साल की शुरुआत कहीं सैर सपाटे करते हुए,घर से दूर करेंगे.सो पहुँच गए ठण्ड से निजात पाने पोर्ट ब्लेर , भारत का एक खूबसूरत शहर .वैसे तो इंडियन एरलाईन के कारण शुरुआत काफी  रोमांचक हुई ,यहाँ तक  की ऐसा लग रहा था कि हमें   घर वापस जाना होगा. हवाई अड्डे पहुँचने पर बताया गया कि जिस प्लेन में हमारा टिकट है वह तो भर चुकी  है और हमें बैठाया नहीं जाएगा. लेकिन उस में भी एक मोड़ था.हमारे ६ सदस्य के परिवार दल के तीन सदस्यों को उन्होंने बोर्डिंग कार्ड दे दिया था . तो आधा परिवार चेन्नई में और आधा दिल्ली में.खैर कुछ बहसबाजी कर हम बाकी तीन भी चेन्नई पहुँच गए , रात के बारह बजे.
पर सवेरे  पोर्ट ब्लेर का जहाज समय पर चला और हम ८ बजे के करीब एक सुन्दर हरे  भरे शहर में पहुंचे.सर्किट हॉउस में ठहराने का प्रबंध था .फिर शुरू हुआ प्राकृतिक सौन्दर्य और इतिहास के संगम का सफ़र . दोपहर बाद हम गए पोर्ट ब्लेर से कुछ  किमी दूर   रॉस टापू. एबरडीन जेटी  से ही यह ऐतिहासिक द्वीप दिखाई पड़ता है. वहां के लिए जहाज जाते हैं और उसी दिन वापस भी आना पड़ता है.आख़िरी जहाज ४.३० बजे हमें वापस ले आया. अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में ५७२ द्वीप हैं जिनमें सिर्फ ३८ ही आबाद हैं. बाकी जंगल ही जंगल.
रॉस टापू पर पहुँचते ही लगा कि हम इतिहास के पन्ने पलट रहे हैं. जहाज से उतारते ही एक जापानी युद्ध काल का  बन्कर दिखा.
रॉस आईलैंड का इतिहास रोचक है. १८५७ के स्वतंत्रता संग्राम के बाद अंग्रेजों ने  स्वतंत्रता सेनानियों और बंदियों को अंडमान भेजने का निर्णय किया . रॉस आइलैंड को संचालन केंद्र बनाया गया और यहाँ चीफ कमिशनर का दफ्तर बना . आज रॉस टापू एक दम वीराना है. भारत की नौसेना का यहाँ एक अड्डा है और उस ने यहाँ एक छोटा म्युसियम बना है. पर एक ज़माना   था जब यहाँ  चहल पहल थी  और चीफ कमिश्नर का खूबसूरत   बंगले में  बॉलरूम  था ,एक सुन्दर चर्च ,वाटर ट्रीटमेंट प्लांट , अस्पताल,छापाखाना ,बाज़ार,बेकरी आदि सब थे. अब सिर्फ इनके खँडहर दिखाई पड़ते हैं. लेकिन खंडहर बताते हैं इमारत की बुलंदियों की कहानी . शानदार चर्च  अब टूट फूट गया है. इमारतों के खँडहर में वहां पाए जाने  वाले वृक्ष की जड़ों ने जकड लिया . जैसे कि बीते ह्युए कल से बदला ले रहे  हों  , भारतीयों  पर किये गेये ज़ुल्मों का.
 एक कब्रिस्तान भी दिखा .अंग्रेजों के ज़माने में पूर्व का पेरिस कहा जाता था यह टापू. १९४२ में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापानियों ने अन्य अंडमान के द्वीपों की तरह  यहाँ भी कब्जा कर लिया और १९४५ में यह वापस अंग्रेजों के पास आया. जापानी आवास के समय नेताजी भी यहाँ पधारे थे और यहाँ के मुख्यालय पर भारतीय झंडा लहराया था . लेकिन १९४५ के बाद अंग्रेजों ने इसे त्याग ही दिया और पोर्ट ब्लेर में अपना मुख्यालय  स्थापित किया.




वहां पहुंचकर , नौसेना सबसे एक रजिस्टर में नाम दर्ज करवाती है और २० रुपये प्रवेश शुल्क है. घूमते रहे और देखते रहे इतिहास को. पेड़ों की भरमार तो है ही,लगता ही नहीं यहाँ कोई रहता है. हिरन के झुण्ड घूमते नज़र आयेंगे और अगर आप हाथ बढ़ाकर बिस्किट दें तो कभी अपनी झिझक छोड़ कर  आपके नज़दीक भी आ जाते हैं..
चर्च की पीछे की तरफ है एक छुपा   हुआ समुद्र तट  'फेरार बीच' .कम लोग वहां तक जाते हैं इसलिए बड़ा अच्छा लगा वहां बैठना .समुद्र में लटकती पेड़ की एक शाखा पर हम डगमगाते, डरते जा बैठे. पेड़ों के बीच पगडंडियों  पर,खंडहरों के इर्द गिर्द  घूमते वापस जाने का समय हो गया . सोच कर लगा कि कैसे एक भरा पूरा कस्बा अब सिर्फ सैलानी आँखों  की कौतुहल का विषय रह गया है .

गुरुवार, नवंबर 04, 2010

दीपावली की शुभकामनायें

हर आँगन हो जगमग ,दीपमय,प्रकाशमय

रोशन हर चेहरा , बाहर भी ,अन्दर भी

दिल से दिल जुडें, मुस्कान से बिखरे मुस्कान
...
दीपों की लरी समेटे , ज़मीन,आसमान,समंदर भी

दीपावली की शुभकामनायें

बुधवार, अक्टूबर 13, 2010

घुमंती बेन पहुंची कुतुब मीनार्

मैंने अपनी दोनों बाँह से उस लोहे के खम्बे को जकड लिया है और यह मांग रही हूँ कि मुझे ऐसे ही विश्व विरासत स्थल देखने को मिलते रहे !"


अरे घुमंती बेन यह किस खम्बे की बात कर रही हैं ? और क्या किसी खम्बे को अपनी बाहों में जकड लेने से कोई भी इच्छा पूरी हो जाती है?

हाँ,इस लौह स्तम्भ के बारे में तो यही प्रसिद्ध है कि अगर अपने हाथ पीछे कर के कोई इस लौह स्तम्भ के पूरा घेर ले और एक हाथ दूसरे को छू तो वह जो माँगता है वह उसे मिल जाता है.

अच्छा ऐसी बात है तब तो फिर हम लोगों को भी उस जगह ले चलिए.

ले तो चलूँ .पर अब वहां उस स्तम्भ को  बाहर से घेर दिया गया है जिससे कि इसे नुक्सान न पहुंचे .
 पर वह जगह है कौन सी?

बहुत प्रसिद्ध ,.तुम सबने ज़रूर नाम सुना होगा.

अरे पहेलियाँ क्यों बुझा रही हैं .बताइये तो ?

यह स्तम्भ है हमारे देश कि राजधानी दिल्ली में क़ुतुब मीनार !

पर क़ुतुब मीनार क्या लोहे की  बनी है?

नहीं रे,अब इस बार तुम्हें क़ुतुब मीनार की सैर कराऊंगी तो सब पता चल जाएगा !

यह भी एक विश्व विरासत स्थल है तो चलो देखें दिल्ली की सबसे ऊंची मीनार और जाने उसकी कहानी .

सन ११९० में अफ़गान मुहम्मद घुर ने भारत पर आक्रमण किया और दिल्ली के राजा पृथ्वीराज चौहान को हराकर यहाँ पर अपनी शासन स्थापित किया. मुहम्मद गोरी तो वापस जहां से आया था वहां चला गया ,पर अपने राज्य की देखभाल की ज़िम्मेदारी अपनी सेना के प्रमुख क़ुतुबुद्दीन ऐबक को सौंप दी. यह बाद में दिल्ली का सुलतान बन गया . क़ुतुब मीनार का निर्माण इन्होने  ही शुरू करवाया था. इनके दो मकसद थे ,एक तो इतनी ऊंची मीनार बना कर अपने साथ आये सिपाहियों के हौसले बुलंद करना और दूसरा पराजित लोगों के बीच अपनी धाक ज़माना. इसलिए लाल इंटों से बनी यह मीनार दूर दूर तक दिखाई पड़ती है . अब तो अगर दिल्ली का नाम लो तो सबसे पहले याद आती है क़ुतुब मीनार .मुझे तो लगा कि उन्हीं के नाम पर इसे क़ुतुब मीनार कहते हैं ,पर इसमें भी एक राय यह है कि बग़दाद से एक बहुत ही मशहूर संत,ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी ,भारत में बस गए थे और इल्तुतमिश उनके बहुत भक्त थे,इसलिए इस मीनार को उनके नाम से जाना जाता है .वैसे तो क़ुतुब का मतलब है धुरी और इस मीनार को बनवाकर कुतुबुद्दीन ऐबक भारत में इसे इस्लाम की धुरी के लिहाज़ से बनवा रहे थे.

 दक्षिण दिल्ली में महरौली के पास हम मेट्रो से उतरे और पैदल ही चल पड़े इसे देखने. टिकट लिया और साथ में इसके बारे में जानकारी देता एक उपकरण " ओडियो गाइड ". इसको हमने अपने कान में लगाया और इस जगह की बहुत सी बातें उस में रिकोर्ड थीं जिससे हम इस जगह को देखने और समझने में बहुत सुविधा हुई. क़ुतुबुद्दीन ऐबक ने इस मीनार को ११९९ में बनवाना शुरू किया. ७२.५ मीटर ऊंची यह मीनार उनके बाद इल्तुतमिश ने पूरी करवाई और इसमें ३ मंजिल और जोडें. पर अभी तो यह पांच मंजिला इमारत है . हुआ यह कि इतनी ऊंची ईमारत पर दो बार बिजली गिरी और उसकी ऊपर की मंजिल ध्वस्त हो गयीं. फ़िरोज़ शाह तुगलक ने फिर से ऊपर की मंजिल बनवाई और उसे पांच मंजिला कर दिया. इतनी ऊंची मीनार हमें गर्दन टेढ़ी कर के ही देखनी पड़ती है. फिर भी ऊपर का भाग साफ़ नहीं दिखता. हाँ यह पता चलता है कि पहले की तीन मंजिलें लाल ईंट की हैं और ऊपर की संगमरमर की.इसके बाद भी यह मीनार कई बार टूटी.भूचाल से भी इसको नुकसान पहुंचा और बाद के सुल्तान सिकंदर लोदी ने इसकी मरम्मत कराई . अंग्रेजों के ज़माने में भी इसकी ऊपर की छतरी गिर गयी. एक मेजर स्मिथ को इसकी मरम्मत का काम दिया गया.उन्होंने कुछ ऐसी तरह की छतरी ऊपर लगाई कि वह बाकी मीनार से बिलकुल मेल नहीं खाती थी. इसको वाइसराय लोर्ड हार्डिंग ने उतरवा दिया और यह अभी भी वहां एक किनारे रखी दिखी ',स्मिथ'स फोली '(स्मिथ की बेवकूफी) के नाम से ! कुछ लोगों का मानना है कि यहाँ बनी कुव्वत -उल-इस्लाम मस्जिद में नमाज़ अदा करने के लिए मुआज़्ज़िन अज़ान देते थे. लेकिन फिर उतने ऊपर हर दिन चढ़कर जाना काफी मुश्किल जान पड़ता है. आखिर ३७९ सीढियां जो हैं ! पर अब तो अफसोस कि क़ुतुब मीनार के अन्दर जाना बिलकुल मना है. काफी साल पहले यहाँ पर्यटक ऊपर तक चढ़ सकते थे पर फिर एक बार १९८० के दशक में स्कूली बच्चों का एक दल इसको देखने आया. अचानक बिजली गुल हो गयी और बच्चे घबरा गए . भगदड़ मच गयी और काई बच्चे इसी में मर गए.तब से अन्दर जाने की मनाही हो गयी है. नहीं तो यह सीडियां हर मंजिल पर बनी बालकनी पर खुलती थीं और अंत में ऊपर बने प्लेटफार्म पर ख़त्म होतीं. अपने दादा दादी या नाना नानी से पूंछो ,वह बताएँगे कि देव आनंद और नूतन पर एक गाना ' दिल का भंवर करे पुकार..' इसकी सीड़ियों पर फिल्माया गया था ! मीनार पर कुरान शरीफ की आयतें खुदी हुई हैं और साथ ही बहुत बारीक नक्काशी भी देखने को मिली.

क़ुतुब मीनार के परिसर में और भी कई इमारतें हैं. इनमें सबसे प्रमुख है कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद जो कुतुबुद्दीन ऐबक ने ही बनवाई थी .

अपने घर से दूर अफ़गान सैनिकों के लिए सबसे पहले दो मस्जिद बनवाई गयीं,एक दिल्ली में और एक अजमेर में.दिल्ली की यह मस्जिद  भारत की पहली मस्जिद है. इस जगह पहले २७ हिन्दू और जैन मंदिर थे जिन्हें तोड़ कर यह मस्जिद खड़ी की गयी. अभी भी यहाँ की दीवारों पर उन मंदिरों के हिस्से देखने को मिलते हैं. कई खम्बे उन्हीं मंदिरों के हैं. वैसे तो यह सब अब बस खँडहर ही हैं पर देखने में बहुत ही रूचिकर. वहीं पास में है इल्तुतमिश का मकबरा मस्जिद में जाने के लिए एक बड़ा दरवाज़ा भी है जो बाद में अलाउद्दीन खिलजी ने  बनवाया.यह है अलाई दरवाज़ा .अलाउद्दीन खिलजी क़ुतुब मीनार के बगल में एक और मीनार बनवाना चाहते थे जो उससे भी ज़्यादा शानदार हो,सो उन्होंने अलाई मीनार का निर्माण शुरू करवाया. पर उसकी पहली मंजिल बनते हुए ही उनकी मृत्यु हो गयी और फिर किसी और राजा ने इसे ख़त्म नहीं किया. अलाउद्दीन खिलजी ने वहां पर पीछे की तरफ एक मदरसा भी बनवाया और उनका मकबरा उसी के पास है.

तुम लोग सोच रहे होगे कि यह सब तो घुमंती बेन तो लगता है सफ़र पूरा कर चुकी हैं पर उस लौह स्तम्भ का तो कुछ अता पता ही नहीं है! उसको भी मैंने देखा.वहीं मस्जिद के आँगन में. यह पहले उन्हीं मंदिरों में खड़ा था जिन्हें गिरा दिया गया था. कहते हैं कि यह खम्भा चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के समय बनाया गया था . सबसे आश्चर्य तो यह कि यह ९८% लोहा है लेकिन फिर भी इतनी शताब्दियों  बाद भी इसमें जंक नहीं लगी है यह एक बहुत ही रहस्यमय बात तो है ही साथ ही उस ज़माने के लुहारों की योग्यता के बारे में भी हमें अंदाजा लगता है. वो अपने काम में इतने निपुण थे कि आज भी यह लौह स्तभ वैसा ही है. ७.२ मी ऊंचा यह खम्भा एक दम चिकना है.इस पर ब्राह्मी लिपि में संस्कृत में कुछ लिखा हुस दिखा.अपने ऑडियो गाइड से पता चला कि यह भगवान विष्णु के ध्वज स्तम्भ के रूप में राजा चन्द्र ने बनवाया था .इस खम्बे की धातु को देखकर यह भी अंदाजा लगाया जाता है कि शायद किसी और जगह से यहाँ लाया गया .दिल्ली के राजा अनंगपाल,जिनका नाम भी इस खम्बे पर खुदा है , इसे मध्य प्रदेश में उदयगिरी से ले कर आये थे.बहरहाल मेरा यह सपना  कि अपनी हाथ से इसका घेरा नापूँ, अधूरा ही रह गया क्योंकि उसे हम जैसे लोगों से बचाने के लिए अब उसके चारों तरफ एक बेडा बना दिया गया है. वैसे जो सबसे रोचक कहानी है वह यह कि महाभारत के समय भीम ने इस को यहाँ उठाकर गाड़ दिया था .यह सापों के राजा के सिर पर गडी हुई है क्योंकि सांपो के राजा ने अर्जुन को काट लिया था

गुरुवार, अगस्त 26, 2010

सबाएदी ..लाओ में आपका स्वागत है !

दक्षिण पूर्वी एशिया में म्यन्मार, थाईलेंड,वियतनाम ,कम्बोडिया और चीन के बीच स्थित  लाओ या फिर लाओस .दिल्ली से बैंगकॉक  और फिर वहां से  लाओ एरलाईन के विमान से पाक्से .पाक्से लाओ के दक्षिण के प्रांत चम्पासक की राजधानी है और वहां का एक प्रमुख शहर .'से' नदी पर स्थित  होने के कारण इसका नाम है पाक्से . लेकिन यहाँ पर एक और नदी 'मेकोंग ' भी बहती है जो लाओ की सबसे बड़ी नदी  है .

मीकोंग़ पर  अस्ताचल सूरज


मेकोंग  नदी पर पुल जापानी सहायता से बनाया गया है सवेरे उठकर यहाँ बहुत से लोग टहलते या जोग करते दिखे.


होटल के कमरे से शहर  का दृश्य .










जहां भी जाएं भारतीय मिल ही जायेंगे.यहाँ पर मिला निजाम रेस्तारांत जो एक तमिल भाई ने वहां खोला था और उसे चला रहा था नेपाल का रहने वाला  कृष्णा.रात का भोजन यहाँ पर ही किया .


वीसा के लिए फोटो चाहिए था सो पहुँच गए इस दूकान में जहां १० मिनट में  डिजिटल तस्वीर निकाल दी.यहाँ पर रुपये के लिए चलता है " कीप "और ८००० कीप एक डॉलर के बराबर हैं. १००० कीप से कम का कोई नोट नहीं. सोचिये वहां की अर्थव्यवस्था किस हाल में है .






लाओ प्रसिद्ध है सिल्क के लिए.यहाँ के हाथ से बुने सिल्क दुनिया भर में मशहूर है. डिजाइन औ रंग देखने लायक थे.हमने भी सिल्क का कपड़ा  और एक दुपट्टा लिया .

दूसरे दिन हमें मौका मिला पाक्से करीब २८० किमी दूर एक और प्रान्त अत्तापू जाने का.लाओस अधिकांशत: ग्रामीण अंचल देश है और  यहाँ जंगल और हरियाली बहुत है. हरे भरे रास्ते को देख सुकून मिला. यहाँ जनसंख्या कम है सो दिखे कम लोग पर जो मिला मुस्करा रहा था. लकड़ी और सिल्क यहाँ के मुख्य आयात हैं.  

लाओस में बुद्ध धर्म के अनुयायी हैं सो जगह जगह बुद्ध  मंदिर देखने को मिलते हैं.पाक्से में ऐसा ही एक मंदिर .

शनिवार, अगस्त 07, 2010

दिल्ली की भागमभाग से दूर ..दो दिन कसौली में

दिल्ली की गर्मी ,भीड़,उमस...भागना है यहाँ से .पर कहाँ जाएँ. नियति ने यहाँ पहुंचा दिया .यहीं सुकून ढूढ़ना है  यहीं मुस्कान. एक सप्ताहांत ,बर्दाश्त से बाहर होती यहाँ की दौड़ भाग ने हमें भागने पर विवश पहुंचा  दिया कसौली.अतृप्त आत्माओं को मिला एक ठिकाना ,कार  की आदत डाले पाँव पैदल ऊपर नीचे चल कर झूमने लगे,आँखों ने देखा भीड़ से अलग  खुशनुमा नज़ारा ,ये हरियाली और यह रास्ता,

.इतनी हरियाली और इतनी खामोशी .जन्नत !





                                                                                                 सनसेट  पॉइंट पर सूरज डूबने का इंतज़ार .कैमरे में  कैद करना   बहुत मुश्किल है पर कोशिशें  बरक़रार है कसौली की यह जगह जहां सूर्यास्त के समय लोग इकठ्ठा हो जाते हैं .







कसौली को साफ़ सुथरा रखने में हमारी आर्मी का बहुत बड़ा योगदान है.यह एक छोटा सी छावनी ही है और हर जगह सेना  के पद छाप दीखते हैं. वायु सेना का भी एक अड्डा है .


गिल्बर्ट ट्रेल के नाम से बना एक  रास्ता जहाँ से सब हरा हरा दीखता है.










कसौली बहुत ही शांत है.कुछ करने को नहीं सिर्फ  चलते रहिये.सुबह ६.३० बजे के निकले अम्बाला,पंचकुला,कालका होते हुए कसौली पहुंचे 1 बजे. पहुँचते ही निकल पड़े सैर पर. लवर'स लेन,नेचर वाक,सनसेट पॉइंट,अंग्रेजों के ज़माने के नाम लिए बड़े बंगले .एक जगह पर खड़े होकर देखा शिमला दिखाई दिया और दूसरी ओर चंडीगढ़.बीच बीच में बारिश भी हो जाती थी, दूसरे दिन्बहुत सावरे फिर निकल पड़े सैर पर. मंकी पॉइंट यहाँ का सबसे ऊंचा स्थान है और यहीं है मनकी मंदिर.माना जाता है हनुमान जब संजीवनी लेने जा रहे थे तो  उन्होंने यहाँ पर एक पैर रखकर छलांग लगाई थी.इस पहाडी का आकार  उनके पाँव का लगता है. १००० सीडियां चढ़कर  पहुँचने पर एक सुन्दर सा मंदिर और आसपास दूर दूर का नज़ारा .मंदिर वायुसेना स्टेशन के भीतर है सो उसका रख  रखाव और भीतर जाने की अनुमति उनसे लेने पड़ती है.कैमरे मोबाईल की मनाही है.हम जब ऊपर जा रहे तो बारिश होने लगी पर जगह जगह इतने बढ़िया छप्पर नुमा छत बनी है कि हम खड़े होकर हल्की बैछार में भीगते रहे और ठंडी हवा का मज़ा लेते रहे !
मजबूरी थी कि दूसरे दिन शाम को लौटना था वरना यहाँ पर शांति से कुछ दिन और रहा जाए तो सेहत के लिए बहुत बढ़िया हो ! हो सका तो  फिर जाने का संयोग बनेगा ....

रविवार, जुलाई 25, 2010

बीच वाले स्टेशन बोले रुक रुक रुक रुक...कालका से शिमला तक

अरे घुमंती बेन,क्या इतनी बार हवाई जहाज में उड़ने के बाद आपका तो ट्रेन में बैठने की आदत ही छूट गयी होगी ? है न ?"
"हवाई यात्रा का यह फायदा तो होता है कि दूर जगह हम कम समय में पहुँच जाते हैं,लेकिन रेल से सफ़र का मज़ा ही कुछ और है."
"अच्छा ,हम लोगों को लगता है कि छुक छुक कर धीरे धीरे चलती ट्रेन कितनी उबाऊ होती है."
"नहीं बिलकुल नहीं ,बल्कि रेल से सफ़र करना का यह भी फायदा होता है कि हम कितना कुछ देखते  जाते हैं.स्टेशन पर रुकी ट्रेन से उतरकर चाय पीना,भागते हुए खम्बों को गिनने की कोशिश करना,छोटे छोटे स्टेशन के नाम पढ़ना,मुझे बहुत अच्छा लगता है. रेल की बात चली है तो मैं तुम्हें ऐसी रेल यात्रा की कहानी बताऊंगी जो तुम्हें चकित कर देगी. "
क्या तुम सोच सकते  हो कि ट्रेन भी विश्व विरासत स्थल हो सकती हैं ? हमारे ही देश की कुछ रेल सफ़र हैं जो इस सूची में शामिल हैं.है न आश्चर्य   और गर्व की बात! भारत के कुछ रेल पथ हैं जो पहाडी इलाकों से हो कर जाते हैं. कालका से शिमला जाने वाली ट्रेन,दार्जिलिंग हिमालय रेल और नीलगिरी की पहाड़ रेल इन तीन रेल यात्राओं को इसमें शामिल किया गया है. तो सोचो  इनमें ऐसा कया ख़ास है जो कि दुनिया और किसी रेल यात्रा में नहीं है,और इतना ख़ास कि इन्हें विश्व विरासत माना जाता है?
वैसे तो मैं तुम लोगों किसी एक जगह की सैर करती हूँ पर इस बार मैं तुम्हें इन तीनों के बारे में थोडा थोडा बता दूंगी. 

मुझे इसके बारे में पता चला जब मैं शिमला घूमने गयी. कालका से मैं बैठ गयी नन्ही  सी प्यारी से ट्रेन "शिवालिक  एक्सप्रेस " पर और शुरू हुई मेरे लिए एक बहुत ही सुन्दर यादगार यात्रा. पता चला कि यह रेल लाइन अंग्रेजों ने बनवाई थी और वह भी १९०३ में ! सोचने लगी कि मैं जिस रास्ते से जा रही हूँ वह सौ साल से भी पुराना है .बाहर देखा तो कितना सुन्दर दृश्य था. कितने छोटे स्टेशन और कितने प्यारे से.लगता किसी कहानी से उठाकर यहाँ रख दिए गए हों. यह यात्रा तो करीब ९६ किमी लम्बी है और गाडी भी करीब २५-३० किमी  प्रति घंटे  की रफ्तार से चलती है तो हम हिमालय के मनोरम वादियों,नदियों और  चीड,देवदार हरियाली को भरपूर देख सकते हैं. पूरे रास्ते में ट्रेन १०२ सुरंगों से गुजरती है. १०२ सुरंगें .......! बाप रे.कैसे बनाया होगा यह रेल पथ? सोच कर लगता है कि वह  इंजीनियर  और कारीगर अपने काम में कितने माहिर रहे होंगे और उन्होंने कितनी मेहनत से इस रेलवे लाइन को बनाया होगा. रल चलती गयी और हम एक के बाद एक पुल पार कर रहे थे.अनुमान लगाओ कि हमने कितने पुल पार किये. ८६४ पुल.जिनको बनाना आसान काम नहीं रहा होगा वह भी उस ज़माने में जब आज की तरह की मशीनें नहीं थीं. सोलन पर आकर यह लाइन नीचे की ओर चलने लगी और मुझे लगा कि यह क्या शिमला जाने की बजाय क्या यह हमें वापस कालका उतार देगी. पर कंडाघाट तक उतरने के बाद इसने फिर ऊपर छाड़ना शुरू कर दिया.एक राज़ की बात  बताऊँ मुझे तो बहुत मिचली आने  लग  गयी थी ! आखिर इतने मोड़ भी तो थे . ९१९ मोड़ थे इस लाइन में.सुरंगों से अन्दर बाहर जाते समय कैसा कैसा लगता है. बरोग  स्टेशन पर ट्रेन रुकी  . मैंने पूछा कि यह बरोग  क्या यहाँ के गाँव का नाम है.पता चली  एक दुःख भरी कहानी .बरोग दरअसल बरोग वह इंजीनियर थे जो इस स्टेशन के पास की सुरन बनवा रहे थे.वह पहाड़ के दोनों तरफ से सुरंग खुदवाने लगे ,यह सोचकर की दोनों छोर मिल जायेंगे  .पर उन्होंने कुछ ऐसी गलती कर दी कि सुरंगें आपस में नहीं मिल पायीं. सरकार ने उनके ऊपर एक रुपये का ज़ुर्मान लगा दिया.बरोग साहब इतने शर्मसार हो गए कि उन्होंने  आत्महत्या कर ली .

बरहाल बाद में वहां के निवासी भाल्कू की मदद से सरकार ने वहां से १ किमी दूर ,दूसरी सुरंग बनवाई.यह सुरंग इस पूरे रास्ते की सबसे लम्बी सुरंग   है और इसको पार करने हमारी ट्रेन ने ३ मिनट लगाए. पुल भी तो कैसे बने हैं. आम पुलों की तरह स्टील के न होकर सारे पुल,एक को छोड़कर, ईंटों के बने हैं और इनको महराबदार  तरीके से ऐसे बनाया गया है कि यह पहाड़ की घाटियों,नदियों, छोटे बड़े खड्डे ,नाले सब  सुरक्षित तरीके से पार हो जाते हैं. शिमला पहुंचकर लगा कि तुरंत वापसी अ सफ़र शुरू कर एं जिससे कि यह रेल यात्रा मैं दुबारा कर सकूं. 

इस प्यारी सी खिलोने वाली ट्रेन पर इतना अद्भुत सफर करने क बाद मुझे लगा कि वाकई इसको विश्व विरासत स्थल में जगह मिलनी चाहिए .उस ज़माने में इतना कठिन काम इतनी कुशलता से करना आर इतना अच्छा  करना कि यह कालका शिमला रेल अभी तक चल रही है,यह हमारी धरोहर है . 



शुक्रवार, जून 25, 2010

पीपल परमारथ भजो, सुख सागर को मूल

        हमारी छत के सामने एक पीपल का पेड़ है .सर्दी पड़ने लगी और यह इतना बड़ा पेड़ सारी धूप छीनकर खड़ा है. सूरज भी उसकी पत्तियों की जाली से झांकता ,रिझाता ,खिजाता पर सामने न आता . हम अपनी कुर्सियां इधर खिसकाते , उधर खिसकाते और सोचते ,क्या पेड़ है कटवाया भी नहीं जा सकता . एक एक कतरा धूप जैसे हमसे छुपनछुपई खेलता .है पूरा जाड़ा हम मन मसोस कर रह गए कि ठीक से धूप सेंकने को नहीं मिली. शायद मौसम को हमारा ऐसा सोचना गवारा न लगा. फरवरी में देखा उसके पत्ते एक एक कर सूखने लगे. लगा कि पेड़ सूख रहा है.क्या हमारी हाय लग गयी उसे?क्या नाराज़ है वह हमसे ?पर सूखे पत्ते हवा चलने पर खनखनाते तो लगता असंख्य घंटियाँ सी बजने लगीं. इतना सुन्दर संगीत है इन सूखे पत्तों में भी. नयी पीढी को कितनी खूबसूरती से आने का आमंत्रण दे रहे हैं जाते जाते भी यह गुनगुनाते हुए जा रहे हैं. बिना पत्ते की डालियों के बीच से सूरज झाँक तो रहा था पर अब हमें धूप में बैठना की चाह नहीं. पहले हम उसे ढूंढते और वह आँख मिचौली खेलता.अब वह हमें बुलाता और हम कहते कि सर्दियाँ कम हो गयीं धूप बहुत तेज़ है !ज्यादा से ज्यादा शाम को मिल सकते हैं जब तुम भी थोड़े थके होगे और हमें भी अन्दर कमरे में ठण्ड लगेगी .


नयी कोपलें दीखने लगीं .छोटे नाज़ुक से पत्ते आहिस्ता से हवा में झूलते,चुपके से इस नयी दुनिया को देखते ,लगता हौले से ,डरते , सहमते , शर्माती हुयी सी मुस्कान से हमसे जान पहचान बढ़ा रहे हों. कहते तुम्हारे आँगन में हमीं से छाँव होगी.जब तुम सवेरे की चाय पियोगी तब हम होंगे साथ तुम्हारे . सुबह की ताज़ी हवा देंगे तुम्हें और तुम भी मेरा ख्याल रखना. सच ,पश्चिममुखी छत है सो सवेरे धूप नहीं आती .पर पीपल के पेड़ के साथ चाय पीने ,उसकी मज़बूत शाखाओं पर दिल के आकार के पत्तों को निहारना में बड़ा सुख है .चलपत्र को तो हिलना ही है ,सुख हमें मिलता है. हाँ हर सवेरे मैना का एक जोड़ा भी आ जाता है .उसने तो पीपल का हमेशा साथ दिया सर्दी में भी,पतझड़ में भी और अब जब पत्ते बड़े हो गए हैं तब तो मैना  भी चिंहुक उठी है .  

सोमवार, मई 24, 2010

वेनिस .. - The only place where you can get seasick by crossing the street




इन्द्रधनुष के नन्हें पाठकों को इस बार में वेनिस घुमाने ले गयी

"घुमंती बेन, लगता है आइस्लेंड के ज्वालामुखी ने आपके घुमक्कड़ पैरों पर रोक लगा दी है. "
"हम्म ! ऐसा कभी हो सकता है क्या ? २१ अप्रेल से यूरोप के हवाई अड्डे दुबारा खुल गए और मैंने भी तुरंत टिकट कटाया और पहुँच गयी एक और विश्व विरासत स्थल देखने ! इस बार मैं एक ऐसी जगह पहुँची जहाँ एक पूरा का पूरा शहर ही विश्व विरासत स्थल है. इस शहर के बारे में जितना कहा जाये कम है. जानते हो इसे कितने नामों से जाना जाता है... " फ्लोटिंग सिटी " मतलब तैरता शहर;'पुलों का शहर' ,'क्वीन ऑफ़ अद्रियातिक' ; 'नहरों का शहर' .यह शहर है इटली का बहुत ही प्रसिद्ध समुद्र तट पर बसा वेनिस , जहाँ घरों के पिछवारे खुलते हैं पानी की लहरों में और सड़क की जगह है नहरें. तमाम छोटे बड़े पुलों से भरा है यह अनूठा शहर .अद्रियातिक समुद्र(Adriatic sea ) के तट पर समुद्र के कम गहराई वाले भाग ,लगून(lagoon) , पर बसा यह शहर ११७ टापुओं को मिलाकर बना है और इन छोटे छोटे टापू में सडकों का काम करती हैं समुद्री नहरें . मैं तो वेनिस मैं न ठहर कर यहाँ से कुछ २० किमी दूर एक छोटे शहर मेस्त्रे में ठहरी थी. वहां से हर दिन सवेरे बस पकड़ कर वेनिस आ जाती और आराम से दिन भर घूमती. बस हमें शहर के एक तरफ , पिआज़ाले रोमा , पर उतार देती और फिर हम पार करते एक बड़ी नहर यानी ग्रांड केनाल . वेनिस को भू भाग से जोड़ने के लिए तीन बड़े पुल बने हैं.. हमारे बस स्टॉप के पास था 'पोंते दी रिआल्तो ' जिसे पार करके हम पहुंचे वेनिस शहर. यह शायद दुनिया का एकमात्र ऐसा शहर है जहाँ कोई कार नहीं,कोई बस नहीं.जिसको घूमना है वह पैदल जाए या फिर नाव से ! हाँ यहाँ घूमने के लिए शहर का नक्शा साथ में रखना ज़रूरी है. गलियों के बीच घूमते घूमते खो गए तो? वैसे तो लोग बहुत ही मददगार हैं पर इतने सैलानी यहाँ आते हैं कि सबकी मदद करते रहना भी थोडा मुश्किल हो जाता है. अगर नहर से घूमना है तो उसके लिए यहाँ पर मिलती हैं अलग किस्म की नावें .सबसे मशहूर नाव है गोंडोला , जो एक लम्बी,पतली काले रंग की नाव होती है. इनके नाविकों को कहते हैं गोंड़ोलियर यह हमारे कश्मीर के शिकारा की तरह बहुत सजाई जाती हैं.लेकिन अब यह या तो सैलानियों को घुमाने के काम आती हैं या फिर शादी या कोई और समारोह के समय. सड़क पर चलने वाली बस की तरह वहां पर भी नहर पर नाव ली बस चलती हैं जिन्हें कहते हैं वेपोरेती . या फिर जैसे हम लोगों के पास अपनी कार,स्कूटर या साइकिल होती है वैसे ही यहाँ लोग नाव रखते हैं !
वेनिस पहुँचते ही हमने अपना घूमना शुरू कर दिया और गलियों से होते हुए पहुँच गए एक छोटे खुली जगह पर .यहाँ हर जगह ऐसा होता है गलियाँ खुलती हैं छोटे या बड़े चौकनुमा जगह पर.यह बड़ी सी खुली जगह होती है जहाँ दुकानें,खाने की जगह वगैरह होती हैं.लोग यहाँ मिलते हैं,बैठकर गप्प करते हैं.ऐसी छोटे खुले चौक को कहते हैं केम्पियेलो और बड़े को केम्पो. ग्रेंड कनेल के अलावा पूरा शहर नहर के जाल सा है इसलिए हर जगह दिख जायेंगे छोटे छोटे पुल. ज़रा सोचिए वेनिस में कुल ४५५ छोटे पुल हैं ! बहुत खूबसूरत दृश्य होता है ,पुल पर खड़े हो कर आसपास देखना .घर के दरवाज़े पर लपलपाता पानी , नहर किनारे कुछ कुर्सियां,मेज़ और लोग बैठकर यहाँ खाने का मज़ा ले रहे हैं ,कभी एक गोंडोला दिख गया ,कभी छोटी नाव. खास तौर से रात में जब रोशनी पानी में प्रतिबिंबित होती है तो लगता है रोशन शहर तैर रहा हो .घूमते हुए मुझे लगा कि यहाँ के घर और भवन बने कैसे होंगे? आखिर पानी में इनकी नींव कैसे रखी गयी?
पता चला कि यहाँ के घर और इमारतें वास्तव में लकड़ी के ढेर के ऊपर बने हैं.सदियों पहले यह लकड़ी स्लोवेनिया नाम के देश से यहाँ लाई गयी . समुद्र में यह उस सतह तक नीचे उतारी गयी जहां रेत और हल्की मिट्टी के बाद सख्त चिकनी मिट्टी यानि क्ले है .पानी में नीचे ऑक्सीजन न होने के कारण लकड़ी सडती नहीं है. फिर समुद्री पानी में कई तरह के तत्व होते हैं जिससे यह लकड़ी भी एकदम सख्त हो जाती है. इस लकड़ी के ऊपर फिर इमारत की नींव बनी और ताज्जुब की बात यह है कि सदियों बाद भी यह इमारतें ढही नहीं हैं. ऐसे शहर में सबसे ज्यादा डर होता है कि धीरे धीरे शहर समुद्र में डूब जाएगा. वेनिस में यह खतरा हमेशा रहता है. अभी भी समुद्र की लहरें जब ऊंची हो जाती हैं तब पानी इन भवनों के अन्दर आ जाता है . इनकी नींव तो मजबूत है पर घरों के अन्दर पानी भर जाने से वहां की इंटों को नुक्सान को पहुँच रहा है. और भवनों को भी !
वेनिस की सबसे प्रमुख जगह है पियाज़ा सेन मार्को .यह वहां का सबसे बड़ा चौक है . यहाँ है सेंत मार्क बेसिलिका जो एक बहुत बड़ा चर्च है और वेनिस के पुराने ज़माने के मुखिया ,जिन्हें "दोगे" कहते थे ,का महल .यह दो शानदार इमारतें ग्रेंड केनाल के पास स्थित हैं और इन्हें घूमने में काफी समय लग गया. यहाँ दोगे के महल में था एक पुल जिसका नाम है आहों का पुल या फिर ब्रिज ऑफ़ साईस(bridge of sighs) , जो महल को कारागार से जोड़ता है. इस पुल को पार करते समय बंदी आख़िरी बार वेनिस को देख पाते और इसलिए एक छोटी खिड़की से समुद्र को देखकर आहें भरते थे.
वेनिस में घूमते रहना ही एक बड़ा दिलचस्प अनुभव है क्योंकि हर नुक्कड़ पर आपको कोई भवन, कोई चर्च कोई म्यूज़ियम मिल जाता है. कुछ नहीं तो यहाँ की दुकानों,का मज़ा लीजिये.पुल पर खड़े होकर नाव का आना जाना देखिये और खो जाइए यहाँ के इतिहास में. वेनिस में एक बहुत प्रिय त्यौहार होता है " कार्निवल " .इसमें लोग तरह तरह के मुखौटे लगा कर भाग लेते हैं. इसको तो मैं नहीं देख पायी लेकिन इस समय यहाँ इतनी भीड़ हो जाती है कि पैर रखने की जगह नहीं होती !
"लगता है मुझे फिर से वहां की सैर करनी होगी. लेकिन यह त्यौहार तो मार्च महीने के आसपास होता है.उससे पहले तो पूरा साल पड़ा है खुद घूमने और तुम लोगों को घर बैठे घुमाने का."

गुरुवार, मार्च 25, 2010

यहाँ "अ पिंच ऑफ़ साल्ट" की जगह कहते हैं ..अ माइन ऑफ़ साल्ट ....एक नमक की खान ऐसी भी

यह श्रृंखला बाल पत्रिका इन्द्रधनुष के नन्हें पाठकों के लिए है जिसे मैं अपने चिट्ठे पर भी डाल देती हूँ.वैसे संपादिका की कैंची अभी चलनी बची है.इसलिए भूल चूक लेनी देनी !

उफ्फ,क्या फीका खाना है ! अरे क्या नमक डालना भूल गए ? '
'नहीं .आपको ज्यादा नमक पसंद होगा.'
'या फिर हो सकता है मैं नमकीन हो गयी हूँ !'
'मतलब?'
'अरे मैं इस बार ऐसी जगह से आयी हूँ जहां कोई भी जाए तो नमकीन हो जाए .'
'अब पहेलियाँ मत बुझाइए .बताये इस बार आपके घुमंतू पैर कहाँ गए !'
'तुम्हें पता है नमक कहाँ से मिलता है.लोग सोचते हैं समन्दर के पानी से.है न ?'
"मुझे तो यही पता था ."
लेकिन इस बार मैं देख कर आयी नमक की खान .और वह भी ९०० साल पुरानी !यूरोप के देश पोलैंड में वीयलीच्का के पास यह नमक की खान . यह खान सिर्फ खान ही नहीं है पूरी एक अलग दुनिया है. यहाँ पर काम कर रहे मजदूरों ने इन नमक की दीवारों पर नक्काशी की है,मूर्तियाँ बनाईं हैं,तराश कर कमरे ,चर्च तक बनाया है !है न एकदम अनोखी जगह ?
११ वी शताब्दी से लेकर २००७ तक यहाँ पर नामक निकाला जाता था .पर अब वहां पर पानी भर जाने से वहां पर खनन बंद कर दिया गया . वैसे तो यह खान ३०० कीमी लम्बी है और नौ तलों में फ़ैली हुई है पर सैलानियों को लिए सिर्फ ३ तले और ३.५ कि मी ही दिखाते हैं.वह भी तो देखने में पाँव दुःख जाते हैं ! खुदाई करते करते जब मजदूर थक जाते थे तो यहाँ नमक के पत्थरों पर खुदाई करते. इसी खुदाई से बन गयी यह अनूठी जगह . उन्होंने सुरंगें बनाईं,छोटी कोठरियां बनाईं ,मूर्तियाँ तो हैं ही ,इमारतें भी हैं. इन में अधिकतर मूर्तियाँ या तो वहां के देवी देवताओं की हैं या फिर प्रसिद्ध व्यक्तियों की .यीशु मसीह (Jesus) के जीवन और उनके शिष्यों , बाइबिल ,वहां के महान संतों ,पोप पर आधारित हैं यहाँ की मूर्तियाँ . इनके आलावा यहाँ नमक के खनन में इस्तेमाल किये गए औजार भी रखे हैं. बाद में दुनिया के मशहूर कलाकारों ने जा कर भी वहां मूर्तियाँ तराशी .तुम लोग जानते हो कि नमक सफ़ेद होता है,है न? हम लोग भी सोच रहे थे कि अन्दर जाने पर सब कुछ एकदम सफ़ेद दिखेगा . पर यह नमक के पत्थर स्लेटी रंग के होते हैं.इसलिए यह सारी प्रतिमाएं सफ़ेद न होकर स्लेटी रंग की हैं. जब इनको रोशनी दिखाओ तब पता चलता है कि यह नमक के क्रिस्टल के बने हैं. हम लोगों को इस दौरे में २० नमक की गुफाएं दिखाई गयीं. गलियारों,छोटे छोटे कमरों,सुरंगों,गड्ढों के बीच ज़मीन की अन्दर इतने नीचे देख कर बड़ा आश्चर्य होता है.और उससे ज्यादा ताज्जुब होता है यह जानकर कि यह सब हाथों से बनाए गए हैं. ज़रा इस दीवाल पर जीभ से चाटिए. ओह बिलकुल नमकीन ! बीच बीच में कई जगह छोटे चर्च जिन्हें चेपल कहते हैं बनाए गए हैं.खान मजदूरों ने अपने खतरे वाले काम के बीच में भगवान को याद करने के लिए इन्हें बनाया ! नीचे खान में घूमते हुए हमें एक बहुत ही छोटी सुरंग से ले जाया गया.लेकिन सुरंग के ख़त्म होते ही हमें दिखा एक बहुत ही शानदार चर्च ,संत किंगा का चर्च. इस चर्च की एक एक चीज़ नमक से बनी है. चाहे वह वेदी (altar) हो ,मूर्तियाँ हों ,या फिर छत पर टंगे झाड़ फानूस . यहाँ की फर्श तक नमक से बनी है.तुम्हें ऐसा लग रहा होगा कि यह तो सिर्फ चर्च का नमूना होगा ,दिखाने के लिए. लेकिन ऐसा नहीं है यहाँ पर प्रार्थना सभा भी होती हैं और संगीत समारोह भी ! इस चर्च को बनाने में ३० साल लगे और यह दो भाइयों ने बनाया . दाद देनी पड़ेगी उनके हुनर,मेहनत और समर्पण की. इन खान में ही नीचे तीन नमक की झील भी हैं. पहले तो यहाँ पर नाव विहार भी किया जाता था पर अब बंद है.

घूमते घूमते करीब डेढ़ घंटे बाद हमें जब थकान महसूस होने लगी तब हमें ले जाया गया "वार्स्जावा " कमरे में. यह कमरा ऐसा है कि यहाँ नाटक भी दिखाई जाते,संगीत सभा भी होती,नाच गाना होता. इसके बाद हम देखने गए इन नमक की खान के बीच बना आजयबघर या म्युसियम .यह पोलेंड का मशहूर क्रेकौव सोल्ट वर्क्स म्युसियम है .चौदह कोठरियां में बना यह म्युसियम अपने आप में अनूठा है.यहाँ इस खान में नमक निकालने के लिए जिन औजारों ,वस्तुओं,मशीन, प्रकाश के उपकरण आदि का प्रयोग हुआ था उन सबके यहाँ पर रखा गया है. इसको देखने से खनन के इतिहास के बारे में अच्छी खासी जानकारी मिल जाती है. यह भी पता चलता है कि विज्ञानं और तकनीक की मदद से कैसे इन सब में सुधार हुआ.पुराने ज़माने के खान मजदूरों को काम करते हुए दिखाते हुए चित्र ,पुराने मशीनों के नमूने,और यहाँ तक कि ३५० साल पहले यह खान कैसी थी उसका भी एक मॉडल रखा है !खुदाई के समय मिले पत्थर आदि भी यहाँ रखे हैं.इनसे वहां के क्षेत्रफल के भूगर्भ के बारे में जानकारी मिलती है.

यहाँ तक पहुँचते हम इतना थक गए और इतने नमक्सार हो गए थे कि यह सोचकर हिम्मत हार गयी कि अब पैदल ऊपर तक जाना पड़ेगा .पर यह क्या.वहां तो एक लिफ्ट थी जो हमें ऊपर ले गयी . पर फिर हमें पता चला कि यह नामक के पत्थर अस्थमा से पीड़ित लोगों के लिए बड़े फायदेमंद होते हैं. इसलिए वहां नीचे एक सनातोरियम(sanatorium) भी है जहाँ मरीज़ रह सकते हैं और इलाज करा सकते हैं.
वहां घूम कर मुझे लगता है कि मैं ही पूरी खारी हो गयी हूँ. वैसे तो वहां की सुन्दरता और चकित करने वाले दृश्य देखकर ही समझ में आ सकते हैं . चलो अब मुझे कुछ मीठा खिलाओ .वहां से आने के बाद मैं चीटें की तरह सिर्फ मीठा ही खा रही हूँ !

मंगलवार, फ़रवरी 23, 2010

द ग्रेट बेरियर रीफ......





iन्द्रधनुष के बाल पाठकों को घुमंती बेन घर बैठे दुनिया की सैर करा रही हैं। इस बार वह उनको इस अनुपम जगह की सैर कराती हैं।



घुमंती बेन ने अपने शोल को क़स कर भींचा और कांपते हुए बोलीं , "बाप रे । पता होता की यहाँ इतनी ठण्ड है तो मैं कुछ दिन बाद आती ।आखिर जाड़े में गर्मी के मौसम का मजा ले रही थी ! "

मैंने पुछा, "वो कैसे ?"

घुमंती बोलीं,'अरे तुम्हें पता है न की हमारी धरती के दक्षिणी गोलार्ध में मौसम उत्तरी गोलार्ध के एकदम उल्टा होता है।जब यहाँ ठण्ड पड़ती है 'तब वहां गर्मी का मौसम होता है ।

'ओहो तो आप गर्म जगह से आ रही हैं !'

"हाँ,इस बार मैं ऑस्ट्रेलिया घूमने गयी थी।वहां भी एक विश्व विरासत स्थल देखा जो बहुत ही सुन्दर और अद्भुत है ।ऑस्ट्रेलिया के उत्तरी पूर्व समुद्र तट पर "द ग्रेट बैरियर रीफ "

द ग्रेट बेरियर रीफ असल में आस्ट्रलिया के समुद्र में तट से कुछ दूर पर एक लंबा टीला सा है.पर इसको छोटा मोटा टीला मत समझना ।यह तो २६०० किमी लंबा है .यानी एक पर्वतश्रेनी जैसी है पर है समुद्र में ! और यह बनी है पत्थरों से नहीं पर..........सुनकर चौंक जाओगे ! जीवित समुद्री जीवों से. यह जीव हैं मूंगा या कोरल .कोरल एक बहुत ही छोटा समुद्री जानवर होता है जिसको देखकर ऐसा लगता है कि यह कोई पौधा होगा. लेकिन करोड़ों करोड़ों कोरल मिलकर एक रीफ बना देते हैं.यह जीव जब मर जाते हैं तो चूने की चट्टा बन जाते हैं .बड़े आश्चर्य की बात तो यह है कि यह छोटे छोटे जीव मिलकर इतनी बड़ी चट्टान बना दिए कि यह हमें अन्तरिक्ष से भी दिखाई पड़ती है!यह विश्व में सबसे बड़ी सजीव रचना है।

यह आस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड प्रदेश के तट पर है और इसे देखने बहुत से सैलानी आते हैं. यह मूंगे की चट्टान या कह लो श्रृंखला करीब ३४०० छोटी छोटी चट्टानों को मिला कर इतनी लम्बी हो गयी .यह समुद्र तट के नज़दीक ही होती है .इनकी दूरी १५ किमी से लेकर २०० किमी तक होती है.इसके बीच में बड़े सुन्दर द्वीप और टापू भी हैं जहाँ हम लोगों को ले जाया गया. इनके पास के सागर में इतनी तरह के समुद्री जीव और पेड़ पौधे पाए जाते हैं जितने की दुनिया में और कही नहीं. तो फिर सोचो इस जगह को देखने में कितना मज़ा आया होगा. यहाँ की एक ख़ास बात है कि यह मूंगे तभी तक चट्टान बना सकते हैं जब तक कि यह पानी साफ़ सुथरा रहे, इसमें कोई प्रदूषण न हो,बहुत गहरा न हो और इसका तापमान थोडा गर्म हो .इन दो कारणों से,यहाँ की जैव विविधता और मूँगों का चट्टान बनाना इतनी अनुपम है कि इस जगह को विश्व विरासत स्थल बना दिया गया है और इसका ख़ास ख्याल रखा जाता है.यहाँ समुद्र के नीचे जाने के लिए स्कूबा दईविंग कर सकते हैं या फिर नीचे देखने के लिए शीशे के तले वाली नाव पर बैठ कर जा सकते हैं।

पानी के अन्दर देखने पर बहुत ही रंगीन नज़ारा दिखता है।यहाँ पर व्हेल ,डालफिन और पोर्पोईस देख सकते हैं। अन्टार्टिक की ठण्ड से भागकर 'हंच्बेक व्हेल यहाँ पर बच्चे देने आती है।यहाँ समुद्री कछुओं की ही ६ जातियां पायी जाती हैं जो अब लुप्त होती जा रही हीन।यहाँ का एक जानवर है दूगोंग जिसको समुद्री गाय कहा जाता है क्योंकि यह सिर्फ पेड़ पौधे ही खता है.यह भी धीरे धीर लुप्त होते जा रहे हैं.सोचो यहाँ १५०० से ज्यादा मछलियों की जातियां हैं और २०० तरह के पक्षी भी.

ग्रेट बेरियर रीफ के पानी में इतनी तरह के जीव जंतु और पौधे थे कि उनको गिनाना बड़ा मुश्किल है।लेकिन यहाँ पर समुद्र के अन्दर जाने में बड़ा ख़तरा है. यहाँ पाए जानेवाले कुछ जानवर तो बड़े ही विषैले होते हैं. यहाँ पायी जाने वाली बॉक्स जेली फिश के के चूने से आदमी मर भी सकता है.एक ब्लू रिंग ऑक्टोपस भी होता है जो छोटे क्रिकेट की गेंद के जैसा लगता है और बहुत सुन्दर भी.खतरा दीखते ही वह नीला चमकने लगता है और छूते ही उसका ज़हर शरीर में फ़ैल जाता है. इस ज़हर का कोई काट नहीं है.ऐसे ही कई समुद्री जीव हैं जो देखने में सुन्दर हैं लेकिन होते ज़हरीले हैं.ग्रेट बरियार घूमने बहुत ही विचित्र था॥मैंने सोचा नहीं था कि समुद्र के अन्दर और आसपास इतना सुन्दर होगा.

सोचो मैंने तुम्हें एक बार जंगल की यात्रा कराई,एक बार हवा में उड़ने वाली तितलियों के बारे में बताया और अब एक समुद्र के बारे में। है न यह धरती हमारी अनोखी। अब देखो अगली बार मैं कहाँ ले जाती हूँ।

' अब कहाँ जा रही हैं,घुमंती बेन,''अरे जब लौट कर आऊँगी तब बताऊंगी ।होगी ऐसी ही एकदम अनूठी जगह।'

सोमवार, नवंबर 23, 2009

मोनार्क तितलियों का अद्भुत प्रवास

उत्तरी अमेरिका महाद्वीप के मेक्सिको देश में एक और विश्व विरासत स्थल है . ठण्ड के मौसम में पक्षियों को गर्म देश में उड़ने के बारे में हम सबने सुना है . लेकिन तितलियाँ भी ऐसा करती हैं !

मोनार्क तितलियाँ नारंगी और काले रंग की होती हैं और संयुक्त राष्ट्र अमेरिका (USA) और कनाडा में पाई जाती हैं..लेकिन सितम्बर महीने के बाद जब वहां ठण्ड पड़ने लग जाती है तो यह झुंड की झुंड बना कर दक्षिण की ओर आ जाती हैं.मेक्सिको में सियारा मादरे पहाडों के बीच ऐसा ही एक क्षेत्र है जहाँ यह ठण्ड में आती हैं.तितलियों का इस तरह का देशप्रवास (migration) बहुत ही अद्भुत घटना है. इसलिए इस क्षेत्र को विश्व धरोहर का दर्जा दिया गया जिससे इस को सुरक्षित रखा जाये और तितलियों का सर्दियों में यहाँ आना जारी रहे.तितलियों का इस तरह से सर्दियों में आना कोई मामूली घटना नहीं है.करोड़ो करोड़ो तितलियाँ ३५०० किमी का फासला तय करती हैं.जब यह तितलियाँ एक साथ उडती हैं तो पूरा आसमान भर जाता है और इनके पंख के फडाफडाने से ऐसी आवाज़ होती है जैसे हल्की सी बारिश हो रही हो .सोचो कितना सुन्दर लगता होगा यह दृश्य .जिधर देखो उधर तितली उड़ रही है और टिपटिप बूंदों सी आवाज़ आ रही है. मेक्सिको के इस क्षेत्र को कहते हैं मोनार्क बतरफली बायोस्फियर रिज़र्व .


नवम्बर के महीने तक इनका आख़िरी झुण्ड मेक्सिको पहुँच जाता है.इनके साथ बड़ी सावधानी बरतनी पड़ती है. यह जगह हम जैसे सैलानियों के लिए नवम्बर के बाद ही खुलती है जिससे कोमल तितलियों को हमसे कोई नुक्सान न हो .मेक्सिको में पाए जाने वाले ओयामल फर के हरे पेड़ इन तितलियों के बोझ से झुक जाते हैं और नारंगी और काले दिखने लगते हैं.इन पेड़ों पर यह जाड़े भर सोती हैं और फिर फरवरी के महीने से वापस कनाडा जाना शुरू कर देती हैं.
अगस्त के अंत में और सितम्बर में जब यह तितलियाँ अपना सफ़र शुरू करती हैं, तो इतनी लम्बी दूरी तय करने में इन्हें बड़ी मेहनत करनी पड़ती है.रास्ते में तूफ़ान,तेज़ हवाएं, कार आदि से टकराकर कई तितलियाँ मर जाती हैं .कई तो थकान के कारण भी मर जाती हैं या फिर चिड़िया इन्हें खा लेती हैं. रास्ते में यह फूलों का पराग पीती हैं जिनसे इनके शरीर में चर्बी जमा होती रहे और इन्हें थकान न हो.यही चर्बी जाड़े के मौसम में इनके काम आती है जब यह सुस्त रहती हैं और खाने की तलाश में नहीं जा सकती हैं.मेक्सिको पहुँचने पर भी कई तितलियाँ बर्फ ,तूफ़ान या तेज़ हवाओं के कारण मर जाती हैं .पर फिर भी सोचो ज़रा, मेक्सिको के ओयामल जंगलों में ३० करोड़ तितलियाँ हर जाड़े में पहुँचती हैं ! हैं न अद्भुत बात?
फरवरी के मध्य में जब ठंडक कम हो जाती है तब यह तितलियाँ फिर से सक्रिय हो जाती हैं और फिर अंडे देने के लिए भी तैयार हो जाती हैं.अब शुरू होता है इनका अपने गर्मी के घरों में वापस जाने का सिलसिला . जितनी तितलियाँ जाड़े में आयी होते हैं उनमें से सिर्फ आधी ही वापस जाने के लिए जिंदा बच पाती हैं.बाकी ठण्ड या अन्य कारण से मर जाती हैं . जब यह तितलियाँ वापस जाती हैं तो रास्ते में मिल्क्वीद नाम के पौधे पर अंडे देती हैं .इनसे नयी तितलियाँ जन्म लेती हैं और वह फिर कनाडा वापस पहुँचती हैं. आश्चर्य की बात तो यह है कि जो तितलियाँ ठण्ड शुरू होने पर प्रवास शुरू करती हैं वह कोई भी गर्मी वाले घर में वापस नहीं पहुंचतीं.उनकी उम्र इन तितलियों में सबसे लम्बी होती है ,६-७ महीने की. और वापस लौटते समय मर जाती हैं. एक और आश्चर्य की बात यह है कि जो तितलियाँ वापसी के रास्ते में पैदा होती हैं उनको यह बताने वाला कोई नहीं होता कि उनका गर्मी का घर कौन सा है पर वह सही ठौर ठिकाने पर पहुँच जाती हैं. यह तितलियों १-२ महीने तक ही जीवित रहती हैं ,इसलिए वापस लौटने पर 3 से 4 पीढी बाद की तितलियाँ ही पहुँच पाती हैं.अब इनसे निकलती तीसरी चौकाने वाली बात ,कि जो तितलियाँ सितम्बर में दक्षिण की और उडेंगी उन्होंने पहले कभी यह रास्ता नहीं देखा ,न उन्हें कोई बताने वाला है कि जाना कहाँ है, पर वह सब सही जगह पहुंच जाती हैं ! यह बड़ी रहस्यमय बात है.
तो यह थी मोनार्क तितलियों के प्रवास की अति अद्भुत कहानी और प्रकृति का एक और नायाब स्वरूप.

गुरुवार, अक्टूबर 22, 2009

एमज़ोन के वर्षा वन

इन्द्रधनुष के लिए UNESCO विश्व विरासत श्रृंखला की यह पहली कड़ी है.अभी सम्पादकीय कैंची से यह गुज़रा नहीं है


मेरे एक दोस्त हैं घुमक्कड़ मियां।उनके पैरों में तो जैसे चक्करघिन्नी लगी हुई है.जब देखो अपना बैग उठाते हैं और चल देते हैं दुनिया की सैर करने. आज उनसे मुलाकात हुई तो मैंने पूछा,"अरे घुमक्कड़ मियां , अब कहाँ जाने का प्रोग्राम बना रहे हैं.मुझे लगता है अब दुनिया की कोई जगह ऐसी नहीं है जहाँ आप गए नहीं हैं!"

"अरे दुनिया इतनी बड़ी है की कोई सौ जनम ले तो भी पूरा नहीं घूम सकता. पर तुम्हें एक राज़ की बात बताते है।"

मेरे कान खड़े हो गए."क्या,क्या?"


घुमक्कड़ मियां बोले."क्या तुमने विश्व विरासत स्थलों के बारे में सुना है?"

"नहीं"

"ह्म्म्म.....यही तो.दुनिया में कितनी सारी जगह हैं जिनके बारे मैं हम सोच भी नहीं सकते की ऐसी जगह भी हमारी धरती पर हैं।"

"संयुक्त राष्ट्र संघ (UN) के युनेस्को ने विश्व विरासत स्थल ऐसे खास स्थानों (जैसे वन क्षेत्र, पर्वत, झील, मरुस्थल, स्मारक, भवन, या शहर इत्यादि)को कहा है, जो विश्व विरासत स्थल समिति द्वारा चुने गए हैं.यह प्राकृतिक भी हो सकते हैं या फिर मानव ने इन्हें बनाया हो. पर ये इतने अनूठे और अद्भुत हैं की इन्हें बचाना और आने वाली पीढ़ी के लिए संभाल कर रखना हमारी जिम्मेदारी है."इस बार मैं ऐसी ही एक जगह की सैर कर के आया हूँ और अब से हर बार ऐसे ही किसी जगह की सैर करूंगा। ""

कहाँ से रहे हैं?"

"इस बार मैं गया था दक्षिण अमेरिका के वर्षा वन यानि एमाज़ोन नदी के रेन फोरेस्ट्स ।""

पर उन वन में ऐसा क्या है जो उन्हें हमारी विरासत की सूची में लाता है।"

घुमक्कड़ मियां बोले," बड़ी ही अद्भुत जगह है.मैं तो दंग रह गया वहां जा कर.चलो तुम्हारे साथ बाँटते हैं वहां की सैर।"

"तुम्हें पता है की एमाजोन नदी पानी के हिसाब से दुनिया की सबसे बड़ी नदी है. इसमें इतना पानी बहता है की जब यह एटलांटिक महासागर से मिलती है तो करीब २०० किमी तक महासागर का पानी ,नदी का ही होता है और यह खारा नहीं होता . इस नदी के आसपास पाए जाने वाले जंगल को वर्षा वन कहते हैं. यह जंगल इतना बड़ा है जितना की लगभग हमारा देश! यह वर्षा वन दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे घना वन हैक्या तुम सोच सके हो की इतने बड़े जंगल से हमारी धरती को कितना लाभ होता है.इसके घने पेड़ कार्बन डाइओक्साइड को सोख लेते हैं और दुनिया की २० प्रतिशत आक्सीजन इन्हीं पेड़ों से मिलती है.इसलिए इन्हें दुनिया के फेफडे कहा जाता है ! जैसे शरीर फेफडे के खराब हो जाने से बीमार हो जाता है वैसे ही इन जंगलों के कट जाने से हमारी पृथ्वी को भी बहुत नुकसान होता है. यह जो वर्षा वन है यह वैसे तो दक्षिण अमरीका के 9 देशों में फैला हुआ है ,ब्राजील,बोलीविया,पेरू,इक्योदर ,कोलंबिया,वेनेज्यूला,गयाना , सूरीनाम और फ्रेंच गयाना ।"


"घने जंगलों में घुस पाना तो बहुत मुश्किल है. मैं हैरत में पड़ गया यहाँ के जीव जंतुओं को देखकर. तब हमारे गाइड ने बताया की दुनिया में पाए जाने वाली जीव -जंतु और पेड़ों की जातियों में आधी से ज्यादा यहाँ मिलती हैं.इसी को कहते हैं बायो- डाइवर्सिटी

अच्छा क्या तुम्हें पता है की आलू कहाँ से आया ....इन्हीं वर्षा वन से. अच्छा बताओ चावल कहाँ से आया ॥इन्हीं वर्षा वन से. सोचो केला कहाँ सबसे पहले उगा होगा, या फिर अदरक,काफी,गन्ना. हाँ यह सबसे पहले यहीं से शुरू हुए थे.दुनिया में जो भी फल, फूल, सब्जी, अनाज खाया जाता है उसमें ८० प्रतिशत अमाज़ोन के वर्षा वनों से शुरू हुए.अब मुझे भी समझ में आने लगा की क्यों यह हमारी विरासत है.मेरे ब्राजीली साथी ने बताया की वहां ३००० तरह के फल मिलते हैं.विश्वास नहीं होता?

वैसे तो हम सिर्फ वर्षा वन का बहुत बहुत थोडा भाग ही देख पाए पर हमें लगा की जंगल में पेड़ -पौधे के उगने का एक नियम है. वहां पेड़ चार परतों में पाए जाते हैं. सबसे ऊँचे पेड़ जो २०० फीट तक जा सकते हैं .इन पेड़ों पर कुछ जानवर ऐसे भी रहते हैं जो इन ऊँचाइयों से नीचे नहें उतरते. इसके बाद आती है छत्री वाली परत .इन पेड़ों की छोटी अंडाकार पट्टियां होती हैं.यह जंगल की सबसे घनी और मुख्य परत है और इसी में यहाँ के फल और फूल पाए जाते हैं.इसके बाद वाले परत तक बहुत कम धूप पहुँच पाती है.इसीलिये यहाँ के पेड़ों की पत्तियां चौड़ी होती हैं. इस परत में सबसे ज्यादा कीडे मकौडे होते हैं. सतह वाली परत तक तो धूप पहुँचने का सवाल ही नहीं उठता इसलिए जंगल की ज़मीन पर सिर्फ सड़े फूल,पत्तियां पाए जाते हैं और रेंगने वाले कीडे मकौडे .



घुमक्कड़ मियां ने लम्बी सांस ली. बोले," इतनी विविधता देख मैं तो दंग रह गया भाई. यह हमारी प्रकृति कितनी धनी हैयहाँ एक एकड़ की जगह में ७५० पेड़ और १५०० तरह के पौधे मिलते हैं।"

"यह तो हुई पेड़ पौधों की बात.लेकिन यहाँ पर पशु पक्षी भी बड़े निराले और दुर्लभ किस्म के रहते हैं.यहाँ पाया जाने वाला स्कारलेट मकाउ एक तरह का बहुत ही रंगीन तोता होता है. एनाकोंडा नाम का सांप जो दुनिया का सबसे भारी सांप है.इसका वजन एक घोडे के बराबर होता है.यह जहरीला नहीं होता और एक बड़ी गाय को एक बार में निगल लेता है! अच्छा हुआ मुझे यह सांप दिखाई नहीं पड़ा ! वेम्पायर बेट दुनिया का एक ही ऐसा चम्गादड़ है जो जानवरों का खून पीता है. यक ! वहां घूमने का सबसे बढ़िया तरीका है एमज़ोन या फिर उसकी उपनदियों पर नाव से जाना . पर एमज़ोन में पाई जाती है पिरहाना नाम की मछली जो मांस खाती है .अगर आप का हाथ या कोई अंग उसकी पकड़ में गया तो वह उस खा जायेगी .ऐसे ही बहुत से जानवर इन वर्षा वन में पाए जाते हैं.ऐसी कई पक्षी और पशु जनले के अन्दर होंगे जिनके बारे में अभी तक पता ही नहीं कर पाए। "

"आओ वहां के निवासियों से भी तो तुम्हारा परिचय करायें.हाँ, इस घने जंगल में भी लोग रहते हैं जो वहां के मूल निवासी हैं.यहाँ किसी ज़माने में ६० लाख कबीले वाले इन जंगलों में रहते थे पर अब घट कर सिर्फ . लाख रह गए हैं.यह भी २१५ कबीलों में बनते हैं और आपस में १८० भाषाएँ बोलते हैं. ऐसा मानना है की इनमें ५० कबीले ऐसे हैं जिन्होंने आजतक किसी बाहर की दुनिया वाले को नहीं देखा है . जैसे जैसे हम इनके करीब पहुँचते हैं यह वन के और अन्दर जाते जा रहे हैं . शायद आज की दुनिया से इन को कोई लेना देना नहीं है.आखिर यह दुनिया ही तो है जिसने इन अनोखे जंगलों को इतना नुकसान पहुँचाया है.इन कबीलों में होते हैं इनके अपने डॉक्टर जिनका ज्ञान सिर्फ मुँह्ज़बानी है.पर इन्हें इसा वन संपदा के पेड़ों के गुणों के बारे में इतना पता होता है .एक भी ओझा के मरने से मानों एक लाइब्रेरी ख़तम हो गयी क्योंकि वह हजारों साल का ज्ञान किसी को बिना बताये चले गए

घुमक्कड़ मियां बोले,"वहां की बातों का कोई अंत नहीं. बस इतना जान लो की अगर हमने सावधानी नहीं बरती तो यह अमूल्य वन नष्ट हो जायेंगे और उनके साथ कितने पेड़ पौधे पशु -पक्षी और कबीले.इसलिए यह हमारी विरासत है जो हमें आने वाली पीढीयों को देनी है ।"

"अब मैं आराम करता हूँ और अगली बार तुम्हें सुनाऊंगा ऐसी एक और विश्व विरासत की दास्ताँ !"