गुरुवार, मार्च 08, 2018

महिला दिवस पर ख़ास

हम हैं तो दुनिया हैं,
हम हैं तो रंग हैं ,
हम है तो जीवन चक्र है
हम हैं तो सहारे हैं।
 हम से ही परम्परा है
 हम से ही नवीनता है
हम से ही स्थिरता है
हम से ही हैं नयी उड़ानें।
हम से  रास्ते के उजाले हैं
हम में अंधेरों के गलियारे हैं।
हम से कायम हैं रिश्ते बहुत
हम से अपना रिश्ता है अहम बहुत ।
हम से रसोई की आग है
हम कर सकते हैं काज बहुत।
हम दिल के हाथों मजबूर हैं
हम दिल के बहुत मज़बूत हैं।
हम से ही हमारी पहचान है
हम नारी हैं ,
हमारी आवाज़ है,
हमारी आशा  है ,
हमारी शक्ति है,
हमारी सोच है
हमारा सम्मान है।

शुक्रवार, जनवरी 19, 2018

हमारे सिम्बाजी

कल रात सिम्बा नहीं रहा। वहां चला गया जहाँ उसे कोई कष्ट नहीं होगा। बीमार और कष्ट में तो वह कुछ महीनों से था पर पिछले एक महीने से अपने आप उठने में असमर्थ था। उसके पिछले पैर अशक्त हो गए थे और उसे उठाना पड़ता था। उसकी विवशता बहुत दुखदायी थी।पर उठाने  के बाद वह वही पुराना जोशीला सिम्बा हो जाता,हर चीज़ को सूंघना,बिस्किट खाने की ज़िद करना,रसोई के दरवाज़े पर बैठ खाने का इंतज़ार  करना या हमारी गोद  में सिर रख देना।  पिछले दो दिन से अचानक उसके सामने के पैर  भी जवाब दे गए और जब हमने डॉक्टर को दिखाया तो उन्होंने ने कहा इसका जीवन काल यही तक है। उसे एक हफ्ते का समय दिया और हमें सलाह दी कि हम सिम्बा को उसके कष्ट से मुक्ति दिलाने के लिए  उनकी मदद से सुला दें। यह एक ऐसा निर्णय था जो हम ले पाने में बिलकुल असमर्थ थे। यह जानते हुए कि इसमें उसकी भलाई  ही  है। पर विशाल दिल वाले यह भांप जाते हैं। बीमारी हालत में भी सिम्बा हमारी कश्मकश को समझ गया और शाम को कुछ कष्ट और तकलीफ के बाद  रात में ही वह हमें छोड़ गया। ग्यारह साल बाद आज पहला सवेरा उसके बिना। उसके भौकने  की आवाज़ का भ्रम होता है,रात में उसके होने का आभास बना रहा। परिवार के सदस्यों को खालीपन लग रहा है पर सबसे अधिक लग रहा है  हमारे साथ रहने वाले सफरुद्दीन को जो पिछले छह साल से उसकी देखभाल अपने बच्चे से भी बढ़ कर करता। उससे बातें करता,उसे डांटता,उसके घाव की सफाई करता,दवा खिलाता घुमाने ले जाता,नहलाता। छुट्टी  से लौट कर आता तो स्टेशन से  सीधे पहले सिम्बा से मिलता। उसे घुमाने ले जाता फिर सामान रखता। जो भी हमारे घर आता सिम्बा से प्यार करने पर मजबूर हो जाता। दो साल पहले वह  सिम्बा से सिम्बाजी हो गए ,वरिष्ठ सदस्य होने के नाते।
आभार है उसका हमारे जीवन को अपने प्यार, अपनी उपस्थिति से भरने का और अंत में भी हमें महफूज़ रखने का।


यह नीचे का लेख नवम्बर 2016   में लिखा था पर व्यस्तता के कारण यहां डाल  नहीं पायी ! आज उसकी याद में नम  आँखों से उसे समर्पित !  

इस महीने हमने एक विशिष्ट जन्मदिन मनाया। हमारा  सिम्बा दस   साल का हो गया । वो फर का गोला अब बूढा हो चला। कुत्तों के लिहाज़ से दस  साल वृद्धावस्था है। खास कर उस जैसे बड़ी कद काठी वाली नस्ल के लिए जिनकी उम्र कम ही होती है।अब उसकी हरकतों में भी बुढ़ापा झलकता है। रात में कराहता है। कई कई बार उठता है। वो हमारे ही कमरे में सोता है और मैं महसूस करती हूँ कि वह बहुत चहलकदमी कर रहा है। कई बार मेरे सिरहाने अपना मुंह रख देता है। मनुष्यों की तरह ही हर कुत्ते की अपनी अलग आदतें और व्यक्तित्व होता है। सिम्बा कभी बिस्तर पर सोना नहीं चाहता। उसका अपना एक गद्दा है और अगर रात में वह नहीं बिछा है तो वह दरवाज़े पर खड़ा होकर या तो इंतज़ार करेगा या फिर शिकायत भरी दृष्टि से हमें देखेगा। उसको लोगों के साथ रहना अच्छा तो लगता है पर अपना एकांत भी प्यारा है। लिहाज़ा वह कुछ देर पास बैठने के बाद या फिर प्यार दिखाने के बाद  दूर चला जाता है। यही हाल होता है जब घर में मेहमान आये हों। हम अगर उसे घर आने वाले हर आगंतुक से न मिलवाएं तो वह नाराज़ हो जाता है। इसमें परेशानी यह होती कि है हर मेहमान सिम्बा की नज़दीकी से सहज नहीं होता। जबकि वह है कि  सिर्फ सूंघ कर सबसे जान पहचान कर एक किनारे बैठ जाता है। वह सेंट बर्नार्ड है जो देखने में भारी भरकम होते हैं पर दिल के बहुत कोमल। उसे देखकर लोग डर जाते हैं। पर उस सफ़ेद और काले बाल वाले भीमकाय शरीर में धड़कता दिल बहुत प्यारा है। उस प्यार का इज़हार भी पल पल  में करता रहता है। आप कहीं भी बैठे  हों अचानक  आपकी गोद में एक गुदगुदी सी होगी। धीरे से एक नाक ,फिर एक सिर आपकी गोद में आएगा और फिर पूरा शरीर उसमें बैठने की कोशिश कर रहा होगा। सोचिये एक ५५-६० किलो का वजन किसी भी तरह उसमें समाने की कोशिश कर रहा हो।  अगर आप उसे सहलाते नहीं तो वह पंजा मारकर आपको अपने होने का एहसास दिलाएगा । यह स्नेह खाना खाने के बाद और भी मुखर हो जाता है। अभी तो वह सिर्फ गोद में सिर रख देता है या पास आ कर सटता जाता है। पर एक साल पहले तक वह अपनी गीली दाढी लिए ऊपर ही चढ़ जाता था। और दो पैरों पर खड़ा सिम्बा हम से लम्बा ही है। वह उछल कर हमारे कन्धों पर अपने आगे के दोनों पैर टिका देता और चाहता कि हम उस सहलाएं या गले लगाएं । हम सब सावधान रहते हैं उसे प्यार वाले मूड देखते थे तो जाते  या तो ज़मीन पर पैर जमा देते। नहीं तो गिरना पक्का था।
     मुझे याद आ रहा है। वह तीन महीने का था जब  हमारे पास आया था। उस समय परिस्थितयां ऐसी विषम हीं कि मैं उसे घर में लाने के निर्णय से बिलकुल  सहमत  नहीं थी और नाराज़ भी। पर कुछ ही महीनों में  वह  झबरीले  पिल्ला  दिल में आकर बैठ गया। वह  इस बात से ज़रा भी निरूत्साहित  नहीं था कि मैं उससे रूखा व्यवहार कर रही हूँ।  वह पूंछ हिलाते प्यार के लिए पहुँच ही जाता। तब से  वह परिवार का सदस्य है और अपने को हमसे अलग नहीं मानता। वह  हमारी हर गतिविधि में शामिल होता है। अगर बाहर जा रहे हों तो पहले कार के पास खड़ा हो जाता है। यह मुमकिन नहीं कि उसे हर जगह ले जाया जाए पर उसे घर छोड़ते हुए जितनी निराशा उसे होती उससे कहीँ अधिक दुःख हम सबको। खासकर जब हमें कहीं शहर से बाहर जाना होता है । उस तक यह बात पहुँचाना असंभव है की हम अमुक दिन वापस आएंगे। वह भी  मुँह लटकाकर बैठ जाता है और  उसकी पूँछ  पैरों के बीच छुप जाती है। अगर उसने कहीं सूटकेस देख लिया तो उसकी बैचैनी का कोई अंत नहीं।  वह उसी के पास बैठा या लेटा रहेगा। वैसे अगर घर में किसी की तबीयत खराब होती है तो भी वह उस सदस्य के पास से  नहीं हटता है।
   सेंत बर्नार्ड नस्ल के कुत्ते स्विट्ज़रलैंड में पाये जाते हैं और उनके बारे में मशहूर है कि वह पहाड़ों में बर्फ में दबे लोगों को खोजने में बहुत मदद करते थे।इनकी सूंघने की शक्ति बहुत विक्सित है और यह बर्फ में बहुत नीचे दबे लोगों का भी सूंघ कर पता लगा सकते हैं। एक से डेढ़ फुट ऊंचा,लंबे बालों वाला ,शक्तिशाली और वजनदार  यह कुत्ता बहुत ही नरम,वफ़ादार और दोस्ताना मिजाज़ का होता है। इसके बाल काले और सफ़ेद होते हैं या फिर भूरे और सफ़ेद होते हैं। हमारा सिम्बा काला और सफ़ेद है। उसे देख कर लगता कि वह अपना कम्बल साथ ले कर चल रहा हो। उसकी दुम काफी घनी और दमदार है और अगर सिम्बा ने खुशी से पूंछ घुमाई तो समझ लीजिये कि आसपास रखी चीज़ें तो ज़रूर टूटेंगी।
    एक बड़ी दिलचस्प बात यह भी है कि उसे भुट्टे खाने का बड़ा शौक है। वह बड़े चाव से खाता है और अगर हम भुट्टा खा रहे हैं तो वह घर में वह कहीं भी है ,दौड़ा चला आएगा। इसलिए जब भी भुट्टा आता है उसके लिए अलग से एक आता है। वैसे वह दूध रोटी  ,दही,पनीर का पानी और मटन पसंद करता है। उसकी एक अच्छी आदत है  कि वह बड़े ही अनुशासित तरीके से अपने नियत समय , खाने वाली जगह पर ही खाना खाता है। सवेरे छह बजते ही वह अपनी नाक मेरे मुंह के पास सटा देता है। हमारा मॉर्निंग अलार्म वह ही है। चलो मुझे बाहर निकालो , घुमाओ और मेरा खाना दो।
   हमें लगता है कि हमारी दिनचर्या उसी के इर्द गिर्द घूमती है। थोड़ी देर के लिए  दिखाई न पड़े तो उसकी खोज शुरू हो जाती है। सब लोग ऑफिस से लौटने पर सबसे पहले उसको सहलाते हैं नहीं तो वह अपने भौंकने के अंदाज़ से नाराज़गी जता देता है। कोई कितना भी  परेशान हो ,परिवार के इस सदस्य का दुलार हर पीड़ा को हल्का कर देता है। प्यार भी बिलकुल अथाह और बेशर्त। वह बूढा होने पर भी बच्चा है ,हमारी भाषा न बोल पाने के बावजूद सर्वाधिक अभिव्यंजक है और सच तो यह है कि उसके बिना सब कुछ अधूरा लगता है।
     

रविवार, जुलाई 09, 2017

हम फिदाए लखनऊ


लखनऊ है तो महज़ गुम्बद-ओ मीनार नहीं,सिर्फ एक शहर नहीं,कूचा ओ बाज़ार नहीं,
इसके दामन में मोहब्बत के फूल खिलते हैं, इसकी गलियों में फरिश्तों के पते मिलते हैं,
'लखनऊ हम पर फ़िदा, और हम फिदाए लखनऊ 
क्या है ताकत आसमां की, जो छुडाये लखनऊ

लखनऊ कह लें या नखलऊ........ अवध के नवाबों ने बड़े नाज़ से इस शहर को आबाद किया। उनके हर शौक की निशनियां यहां बिखरी हैं । बड़ा इमामबाड़ा की भूलभलैया  में छिपी है  नवाब आसफ-उद -दौला की वह कहानी जो अकाल में जनता की मदद के लिए स्वयं उसको बनाने में जुट  गए। वह भावना दिलचस्प है जो नवाबी खानदान से जुड़े लोगों की  शाख़  में गुस्ताखी लाये बिना उनकी ज़रूरतों को पूरा करने का उपाय ढून्ढ लाई । लखनऊ  में हर मोड़ पर उस ज़माने की इमारतें रास्ता रोके खड़ी हैं। छोटा इमामबाड़ा, रूमी दरवाज़ा, छत्तर मंज़िल ,रेजीडेंसी,बारादरी,दिलकुशा ,शाहनजफ का इमामबाड़ा ऐसे कितने ही अद्भुत स्मारक चिन्ह लखनऊ को एक अलग पहचान देते हैं।  अंग्रेज़ों  की बसाई छावनी के गिरिजाघर हों या आज का हज़रतगंज स्थित बृहत् केथेड्रल ,सब इस शहर को चार चाँद लगाते हैं। वैसे चाँद की चाँदनी की बात करें तो यहाँ के नज़ाकत और नफासत वाली हवाओं के लिए वह भी बहुत गर्म हैं। यहाँ तो हज़रतगंज में शाम की सैर करने पर भी ज़ुखाम हो जाने के चर्चे हैं ! शाम -ए -अवध का मज़ा उठाना हो तो  गंजिंग करना अनिवार्य है। मेफेयर का ज़माना अब नहीं रहा। उसका मलाल हमेशा रहेगा।  जनपथ है,रॉयल कैफ़े है ,शुक्लाजी की चाट है ,रामआसरे की मिठाई है , हनुमान मंदिर है। राम आडवाणी की पुस्तकनिधि है, रोवर्स के सामने  भीड़  है, खियामल की साड़ियां हैं।
  पर अगर असली खरीदारी करनी है तो चौक की गलियों में आरी,जाल ,मूरी ,फंदा,टेपची और न जाने कितने कमाल दिखाती चिकनकारी को देखिये। वैसे अमीनाबाद का गड़बड़झाला और नजीराबाद भी कम नहीं। कुछ आगे है लखनऊ का सबसे पुराना बाजार नक्खास। यहाँ अब भी  चिड़ियों का एक अनूठा बाज़ार लगता है।  लखनऊ का नाम लेते ही बहुत से नाम तुरंत याद आ जाते हैं। चिकन की महीन कशीदाकारी तो है ही , साथ में कितनी और कलाओं का पर्याय है यह शहर। यहाँ हर शौक को परिष्कृत कर एक ललित कला का रूप दे दिया गया । पहले आप और आदाब के इंतहाई अदब के साथ साथ यहाँ मशहूर हैं नफासत के कई किस्से। नवाब साहब का दाँत टूट गया  तो उनके खानसामा ने तुरंत गल जाने वाले गलावटी कबाब पेश  किये । ज़रा सोचिये इसमें सौ से भी अधिक मसालों  का इस्तेमाल होता है। क्या आपने जरकुश और बओबीर का  नाम  सुना है कभी ? क्या चन्दन को मसाले की तरह सोचा है कभी ?इसका मज़ा लेना हो तो टुंडे कबाबी के  यहाँ जाइये। कोयलों की  धीमी आंच पर घंटों पकता खाना  दम पुख्त के नाम से मशहूर  है और इससे  शुरू हुई लज़ीज़ पकवानों की एक अलग ही श्रृंखला।  पर शाही रसोई के बाहर भी यहाँ के खाने का मज़ा बेमिसाल है। अमीनाबाद की प्रकाश कुल्फी , वहीं पीछे कबरवाली दुकान की कचौड़ियां या दोपहर बाद लगता तिवारी की चाट  का ठेला  ...यहाँ का हर निवाला एक सवेदनशील ह्रदय की अभिव्यक्ति है।
जिस शहर में नवाब अपने निष्कासन  की पीड़ा  ठुमरी में व्यक्त करें ,वहां सुरों का राज न हो यह नामुमकिन है। " बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाये" सुनकर फूटफूट कर रोने का दिल करता है।  गायकी का ज़िक्र आये और लखनऊ का हर बाशिंदा बेगम अख्तर से  राब्ता न बनाए यह हो ही नहीं सकता । बेगम साहिबा जब "ए मुहब्ब्त तेरे अंजाम पर रोना आया " गातीं तो हर लखनऊ वाला  शाम पर रोने के किस्से याद करता है।  वह शाम जो  कत्थक के लखनऊ घराने के थिरकते पैरों के घुंघरुओं से खनक जाती है ।   या वो शामें जो नीचे गोमती की लहरों और ऊपर  अठखेलियां करती पतंगों पर कुर्बान हैं ।
कहते हैं लखनऊ की सड़कें मंज़िल तक नहीं पहुंचाती हैं। वो खुद ही मंज़िल  होती हैं।  इसीलिये मुस्कराइए की आप लखनऊ में हैं।
तहज़ीब कोई मेरी नज़र में जंचेगी क्या
मेरी निगाहे शौक ने देखा है लखनऊ।



मंगलवार, मार्च 07, 2017

मेरे घर आयी खुशी की बहार

आज शाम बहुत सी मुस्कराहटें
इधर उधर से उड़ती हुईं
मेरी बगिया में आईं।
कुछ हंसती चहकती  अंदर आईं
कुछ सकुचाती मुस्कराहट थी ,कुछ खामोश
कुछ में सहमा सा डर था,कुछ में दिल्लगी
पर मुस्कराहटें सब थीं।
फूलों,कलियों,पेड़ के दरख्तों ,वो वहां टिकी साईकिल,उधर
रखा एक छाता

एक एक कर सब पर बैठ गयी थीं मुस्कानें।

धीरे धीरे खुशबू की तरह सब और फ़ैल गयी मुस्कानें।
बगिया  तो चहक उठी,महक उठी
चंचल हो उठी,बावरी हो गयी
देख सब मुस्कानें।
किसी मुस्कान में पीताम्बर बसा
किसी ने ओढी थी हरी चुनरिया
उन्मुक्त हंसी में बदली एक मुस्कान ,एक ने खिलखिला  कर दिया जवाब।
लिहाज़ के बंधन   में बंधी पर फूटने को बेताब  एक मुस्कान दिखी
कुछ हरी घास पर बिखरी मुस्कानें थीं,कुछ उत्सुक निहारती  मुस्कानें थीं।
हाथ थामें मुस्कानें थीं,कुछ भागती मुस्कानें थीं,
दिल का दरवाज़ा खोल झांकती मुस्कानें थीं।
मेरी,उसकी,इसकी,किसकी  सबकी आँखों से झलकती मुस्कानें थीं।

आज शाम इधर उधर से
बहुत सी मुस्कानें मेरी बगिया में आईं
बगिया मदहोश है
और मेरी मुस्कान
सब मुस्कानों का रंग चुरा
हो गयी है  उमंग से लबरेज़  मुस्कान ।
   

शुक्रवार, फ़रवरी 26, 2016

DELHI 6

किसी भी शहर के बारे में शायद ही हममें से किसी को पूरी जानकारी नहीं होती है। और अगर वह शहर दिल्ली हो जिसके परत दर परत खोलते जानते कई ज़माने गुज़र जायेंगे तो आप जितना जानेंग उससे कहीं अधिक अनजान रह जाएंगे।दिल्ली को जानने पहचानने के एक मुहिम चल रही है "डेल्ही वॉक फेस्टिवल "  के रूप में। एक हफ्ते में इस शानदार शहर के अलग अलग पहलुओं को जानने पहचानने का अवसर है।  चुनाव करना मुश्किल था कि कहाँ का रुख करें?   दिन भर आप चलते तो नहीं रह सकते !
मैंने चुना चांदनी चौक की राह को । "ट्रेडस ऐंड ट्रेज़रस ऑफ़ चाँदनी चौक " के ज़रिये हमें पुरानी दिल्ली की इस धरोहर से परिचित करा रहे थे युवा वास्तुविद रोहन पाटणकर। वैसे मुझे भीड़भाड़ से काफ़ी  बेचैनी होती है खासतौर से बाज़ार की भीड़ से। चुनाव करने में यह भी एक विचार था कि वैसे तो मैं यहां जाऊँगी नहीं ,चलो एक ग्रूप में ही इसके दर्शन हो जाएं। करीब पौने चार बजे जब हम चांदनी चौक मेट्रो क गेट नंबर ५ पर उनसे मिले तो उनके उत्साह ने हमें भी जोश से भर दिया। भीड़ तो थी ही पर हम उसमें भी अपने झुण्ड के साथ आगे बढ़ते गए। 
चांदनी चौक व्यावसायिक लहज़े से दिल्ली का प्रमुख केंद्र है। थोक व्यापार के लिया विशेष जाना जाता है। इसकी मुख्य सड़क के एक सिरे पर है फतेहपुरी मस्जिद और दूसरे पर लाल किला।  किसी ज़माने पर यहाँ सड़कके बीच एक नहर थी और कहते हैं इसमें पड़ती चांदनी की चमक से ही इस जगह का नाम पड़ा।वह भी क्या दृश्य रहा होगा। दिल्ली की यही विशेषता है। जगह जगह आपकी कल्पना को अतीत में जाने के लिए बाध्य कर देती है। वह भी बहुत ही शानदार इमारतों के ज़रिये । पर इस बार हमारा ध्यान इन इमारतों पर नहीं बल्कि यहां के कारोबार पर है। फतेहपुरी मस्जिद की ओर  चलते हुए हम एक जगह रुक कर सड़क के उस पार देखते हैं।  इलाहाबाद बैंक की इमारत दिखी। आसपास दुकानों से घिरी यह ईमारत बड़े अकेली सी अपनी कुछ कहानी कहती दिखी । रोहन ने वादा किया यहां की सबसे पुरानी और बड़ी हवेली दिखाने का।  हवेली थी लाला चूनामल की। एक साधारण से दिखनेवाले दरवाज़े से इसका प्रवेश है ,पर अंदर इसमें १२० कमरे हैं।नीचे दुकानें और ऊपर लम्बाई में फैले कमरे होंगे शायद। एक पुरानी घड़ी भी दिखी।  क्या वह १८५७ का समय दिखा रही है जब लाला चुनामल ने अंग्रेज़ों का साथ दे कर दौलत कमाई।  उनके वंशज अब भी यहाँ रहते हैं। 
लाला चूनामल की हवेली


आगे  था कटरा नील जहाँ नाम के अनुरूप पहले तो रंगन का काम होता था पर अब वह बन गया है कपड़ों की दुकानों केंद्र। यहां हमने सड़क पार की और पहुँच " गांधी क्लॉथ मार्केट " . यहां थान के थान कपडे बिकते हैं। रोहन हमें यहां कि गलियों में ले जाते हैं। दोनों तरफ कपड़ों के थान हैं। गलियों से गुज़रते अचानक ही एक चबूतरे क पास आकर रुकते हैं।  रोहन इस चबूतरे को लेकर उत्तेजित हो जाते हैं। बताते हैं कि बेतरतीब ढंग से हुए निर्माण की वजह से यह चबूतरा इतना छोटा रह गया है। वरना यह काफी बड़ा होना चाहिय। वैसे हम मुख्य सड़क से सिर्फ ५० मेटर ही अंदर हैं ,पर गलियों के जाल और अनियमित इमारतों की वजह से काफी दूरी।  यहां के नगर नियोजन और सरचना के बारे कुछ जानकारी मिली। आगे बढे फतेहपुरी मस्जिद के ओर। जूते चप्पल उत्तर कर हाथ में पकड़ लिए और अंदर आकर इस मस्जिद की भव्यता देखी। बाहर के शोरगुल के बिलकुल बगल में पर लगता है जैसे कोसों दूर-एकदम

शांत !  पता चला कि कभी इस मस्जिद को अंग्रेज़ों ने लाला चूनामल को उन्नीस हज़ार रुपये में बेच दिया था। बाद में सरकार ने उन्हें चार गाँव देकर मस्जिद वापस खरीद ली  और मुसलमानों को दे दी। उस ज़माना के किस्से विचित्र थे। 


फतहपुरी मस्जिद और चांदनी चौक
  फतेहपुरी मस्जिद के उत्तर मैं भी एक दरवाज़ा है जो निकलता है खरी बाउली के ओर। गली बताशा और पान की कुछ थोक दुकानों को पार करते हुए हम से एक छोटे दरवाज़े से हम अंदर गलियों क जाल में घुस गए।  इन्हीं तंग गलियों में दिखीं हर तरह के मसलों की बोरियां। चांदनी चौक की प्रसिद्धि  का यह भी एक बहुत बड़ा हिस्सा है.एशिया का सबस बड़ा "स्पाईस मार्केट "  जहाँ हर किस्म के मसाले ,सूखे मेवे और न जाने क्या क्या मिलते हैं। तरह तरह के मसालों के गंध ने हमें नाक पर रूमाल रखने पर मजबूर कर दिया . खांसते खांसते , ठेलों और बोरियों के बीच से बचते बचते हम बढे सीढ़ियां की ओर . अँधेरे में ,पतली सीढ़ियाँ हम चढ़ते गए .सांस फूलने लगे  इससे पहले ही हम पहुँचे हैरान कर देने वाली छत पर.हमें विश्वान नहीं हुआ कि हम अब फतेहपुरी मस्जिद के पीछे कीओर चुके थे। खुली छत पर सामने देखा तो संध्या वेला का आसमान था। लज्जारूणिमा लिए गगन और बल्ब की रोशनी से जगमाती एक सड़क जो दूर क्षितिज पर  एक धुंधले लाल किले  से लहराते बलखाते हुए जा कर मिल जाती है। इस "वॉक " का चरम अनुभव था यह दृश्य।  नीचे मार्कट की चहल पहल ,एक ओर  मस्जिद का आँगन ,बगल में खरी बाउली की सड़क और साथ में एक विशेषज्ञ की रोचक टिप्पणियाँ . भीड़-भाड़ और कई धक्कों के बाबजूद एक दिलचस्प दिन का बिलकुल माकूल अंत . और जो सबसे बड़ी बात हुई वह यह कि चांदनी चौक दुबारा देखने की लालसा और हिम्मत दोनों आ गयी।  लालसा उसके अन्य पहलुओं को जानने की और हिम्मत यहाँ आकर खरीदारी करनी की . आभार   दिल्ली घुमाने वालों का !

शुक्रवार, जनवरी 29, 2016

बदल गयी है दुनिया कैसे

बदल गयी है दुनिया कैसे , कैसे अजब नज़ारे हैं
आसमान में धुंधले अब तो, दिखते भी सितारे हैं।

हर तरफ है धुआं फैला हर तरफ कुछ मैला है
हर इंसान को दिखता जब सिर्फ पैसों का थैला है !

अभी सड़क बनी नहीं कि पड़ने लगीं दरारें हैं
तारकोल जैसा भी हो लालच की खूब मिसालें हैं  

पैर तले ज़मीन खिसक गयी ऊपर खूब प्रदूषण है
फेफडे बोले हाय राम यह कैसा गजब कुपोषण है

आक्सीजन के नाम पर  अंदर, आता विष प्रवाह है
क्या होती थीं साँसे  जानें ,अब लेते हम सिर्फ आह  हैं !

जान जाने के भी  देखो कितने नए नये तरीके हैं
मनचले पियक्क्ड़ की गाड़ी  कितनो को घसीटे है!

कुछ कमाल दिखाती है अपना ,नकली दवा की बोतल भी
बाकी हाथ बटाने आयी ,भोजन में हुई मिलावट भी।

हमने भी मारी एक कुल्हाड़ी ज़ोर से अपने  पैरों पर
बलि चढ़ गया चलना फिरना ,कम्प्यूटर के चेहरों पर। 

बदल गयी है दुनिया कैसे कैसे अजब नज़ारे हैं
अपनी ही फोटो खींचे सब ,बस अपने ही सहारे हैं !

शुक्रवार, जनवरी 01, 2016

नया कैलेंडर

पुराने कैलेंडर को उतार लगने जा रहा है
अब एक नया कैलेंडर 
पिछले पर बहुत हिसाब किताब लिखे  हैं 
कुछ खास काम लिखे हैं। 
कब कामवाली छुट्टी से वापस आएगी ,
कब गैस  जल्दी ख़त्म हो गयी  
किस महीने ज़्यादा चली 
कब किसी के घर दावत है 
घर की दावत का मेनू क्या है।    
किस की अंतिम तारीख है 
कब कहीं बाहर जाना है। 
हर महीने का छिट्ठा  कैलंडर 
हो गया अब कबाड़ है। 
फिर भी  एक बार पलट कर देखना 
कुछ आहें भर ,कुछ खिसियाना।  
नया कैलेण्डर टांग दिया 
हर पन्ना एकदम कोरा है। 
बस पहली तारीख में एक शब्द लिखा 
प्रसन्न 
बाकी साल में कुछ भी हो 
हर महीने की हर तारीख में कुछ भी लिख जाये 
पलट कर साल की शुरुआत देखेंगे 
और कोरे पन्ने पर मुस्कान 
खिंच जाएगी ! 





गुरुवार, सितंबर 24, 2015

कुछ नए मेहमान घर आये

एक दिन सवेरे  चाय बनाने रसोई में गयी तो  दो आँखों को  खिड़की  से झांकते हुए   देखा।  हरी आँखों में कौतूहल था और थोड़ा  भय भी। मैं चाय बनाने में लग गयी।   क़ुछ देर बाद देखा  चार आँखें   अंदर ताक रही थीं। याद  आया कुछ दिन पहले एक बिल्ली   को तीन छोटे बच्चों के साथ घूमते देखा था। लगता है उन्हें मेरा पिछवाड़ा रास आ गया। सोचने लगी कि दो बच्चे तो  यह  रहे पर  तीसरा कहाँ है ?फिर  रोज़  की   तरह  पीछे का दरवाज़ा खोला तो पैर में एक नरम सा एहसास हुआ और फिर दूर भागती तीसरी बच्ची  भी दिख गयी।  बाकी दोनों भी तब तक दूर भाग  गयी थीं।  तब से अब यह रोज़ का नियम हो गया है। जब भी पीछे का दरवाज़ा खोलती हूँ तो यह तीनों  जाली से सटकर  बैठी मिलती हैं।   उस दिन उनकी म्याऊं म्याऊं सुनकर मैंने एक रोटी और दूध पीछे रख दिया था। यह भी एक नियम हो गया है। सवेरे दूध रोटी न पाकर उनकी म्याऊं की आवाज़ में पहले थोड़ी मिन्नत का स्वर आता है और फिर थोडी देर बाद झिड़की और फिर गुस्सा। वैसे मैंने देखा है कि दूध रोटी मिलने पर वह तुरंत दौड़ कर उसके पास जाती हैं पर थोड़ा सा चखने  भर का खाने के बाद वहां से हट जायेंगीं। उसके बाद वह खाना शाम तक ही ख़त्म होता  है।
अब तो यह तीनों हम सब के लिये  मनोरंजन का साधन हैं।  सामने की ओर  बड़ा सा लॉन होने की वजह से हम पीछे कम ही बैठते हैं। न के बराबर। पर अब सवेरे सबसे पहला  काम तो उन्हें देखना होता ही है ,दिन में भी कई कई दफा हम पीछे झांक लेते हैं।  तीनों की फितरत अलग अलग ही है।  दो तो भूरी और सफ़ेद हैं और एक काली और सफ़ेद।  इनमें से एक तो काफी निडर है। यह" कैमरोन  डायज़" है जो  हमें देख कर भागती नहीं है और हम कई बार उसे पकड़ कर उठा चुके हैं।  बाकी दोनों तो दूर छिटक जाती हैं।  यह हम समझ नहीं पा रहे है कि यह पहली बिल्ली निर्भीक है या फिर थोड़ी बुद्धू भी। दूसरी भूरी बिल्ली "ड्रू बेरीमोर"सबसे शर्मीली लगी  और बहुत दूर भाग जाती है। काली वाली जिसे हम "हेली बेरी" कहते  हैं कुछ मध्य दूरी पर रहती है। उसको  भी एक बार पकड़ा था पर वह पंजा चलाने लगी।
अभी कुछ हफ्ते ही हुए हैं और  अब यह बड़ी हो रही हैं। पर इनको घर के अंदर आने की इजाज़त नहीं है।  हम कई बार अंदर से इनके आपस के खेल देखते हैं। पेड़ पर चढ़ना और फिर एक दूसरे  को गिराना।  एक दूसरे  को  चैन से बैठने नहीं देतीं। एक अगर लेटी  हुई है तो दूसरी दौड़ते हुए आएगी उसके ऊपर चढ़ने।  पीछे एक सहजन का ऊंचा पेड़ है.पहले  उन्हें देखती थी उस पर चढ़ने की कोशिश करते हुए। अब तो फुर्ती से चढ़  जाती हैं।  यह फुर्ती तब बहुत दिखी जब एक कुत्ता अंदर घुस आया।  क्या गजब तेजी से सब किसी किसी पेड़ पर चढ़  गयीं।  काली वाली पेड़  तक नहीं  पहुँच पायी तो रसोई की खिड़की पर ही बैठ गयी। कुत्ता भी क्यों भागता ? उसे तो रात की दावत के सपने दिखाई पड़ने लगे।  खैर बाहर निकल कर मैंने उसे भगाया और इन तीनों की सांस में सांस आई। हो सकता है मेरी नेक नियती पर भी कुछ भरोसा हो गया हो। आशचर्य की बात तो यह है कि हम जब अपने कुत्ते सिम्बा को बाहर निकालते हैं तब यह नहीं भागती। पहले तो थोड़ा सावधान मुद्रा में उसको भांपती हैं,थोड़ा पीछे हटती हैं पर भागती नहीं है। सिम्बा भी उन्हें सूंघ कर ,परिचय बढ़ाकर अपने में मस्त हो जाता है।मिलकर खुश ही होता है क्योंकि उसकी पूंछ ज़ोर से हिलने लगती है। गोल गोल भी घूमी जो कि सिर्फ खास दोस्तों के लिए ही घूमती है।
कैमरोन  डायज़ 
सहजन का पेड़ तो फिर भी इनकी भागदौड़ सह लेता  है पर मेरा छोटा सा मीठी नीम का पेड़ तो अभी पतला सा ही है। यह जब उस पर धमा चौकड़ी मचाती हैं तो उस पेड़ की पतली कमर क्या हिचकोले लेती है ! लगता है अब टहनी टूटी तब टूटी. इनमें से एक ऊपर चढ़ेगी तो दूसरी नीचे से उसे खींचेगी। उसको नीचे गिराकर खुद ऊपर चढ़ जाएगी। यही सिलसिला चलता रहता है। एक दिन मैंने अपनी 'ड्रू बेरीमोर' को देखा 'हेली बेरी के साथ मुक्केबाजी कर रही थी।  उसको दो घूंसे ऐसे लगाए कि हमारी प्यारी हेली वहां से भाग ही गयी। यह सब अंदर से देखने पर बड़ा मज़ेदार लगता है। कई बार सोचा कि बाहर निकल कर इसे फिल्म कर लें। पर जैसे ही बाहर निकलो यह सब अपना खेला छोड़  खाने की आस में आसपास घूमने लग जाती हैं। वैसे शायद अब वह मेरे काले आईपेड से परिचित हो गयी होंगी ,क्योंकि मैं अक्सर उसे हाथ में लेकर पीछे निकलती हूँ।  इनकी हर अदा को कैमरे में उतारने के लिए। मैंने इन्हें आपस में लाड प्यार करते भी देखा है. शायद माँ  की कमी महसूस होती होगी क्योंकि एक दूसरे  के सीने में मुंह घुसाकर दूध पीने वाली मुद्रा में भी इन्हें देखा है य़ा फिर एक दूसरे को सहलाते  हुए। कभी तीनों एक दूसरे  के ऊपर लद  कर सो जाती हैं।
वैसे वो दरवाज़े के बाहर से ही अभी तक घर के अंदर बड़ी उत्सुकता वाली दृष्टि से देखती हैं। पर आज काली वाली ने थोड़ी हिम्मत दिखाई। मैंने जैसे दरवाज़ा खोला वह पैर के बीच से अंदर पहुँच गयी. पर संकोच था या फिर सिम्बा को अंदर बैठे देख सहम गयी। तुरंत  वापस आ गयी। दिन पर दिन यह बड़ी होती जा रहीं है। अब अपना  शिकारऔर खाना  खुद दूंढ़ेंगीं। मैंने इन्हें खेत को पंजों से कुरेदते देखा है। मेरे किचन गार्डेन का एक छोटा सा हिस्सा इनके खोदने  से खराब हो गया है।  हो सकता है चूहे वगैरह कुछ कम हो गए हों। जो भी हो इन तीनों बिल्लियों ने हमारा दिल तो जीत ही लिया है। एक से दोस्ती हो गयी है.बाकी  दोनों का भरोसा जीतना है। जब मैं तीनों को अपनी गोदी  में उठकर एक फोटो खिचवाऊंगी तब बात बनेगी इस दोस्ती की !












गुरुवार, अक्टूबर 02, 2014

स्वच्छता दिवस पर कुछ ख़ास


कुछ दिनों पहले घर की साफ़ सफाई पर कुछ 5 -6 मिनट की  एक लघु प्रस्तुति की थी। उस पावर पॉइंट प्रस्तुत को वीडियो में रूपांतरित किया पर पार्श्व  स्वर का  चित्रों  के साथ तालमेल नहीं बैठ पाया।  बहरहाल ,स्वच्छता दिवस के सन्दर्भ में , अभी तो इसे यहां पर डाल  दे रही हूँ।  फिर बाद में इसका तालमेल बैठाकर ,सही करूंगी।












रविवार, सितंबर 21, 2014

कल आज और कल

         जीवन का एक अध्याय दूसरे  से कितना भिन्न हो सकता है ,यह कल्पना से भी परे  की बात है। कल जो जीने का तरीका था आज सिर्फ एक स्मृति बन कर रह जाता है। कल आफिस और घर  की व्यस्तता सवेरे की चाय हरी होती ट्रेफिक लाइट पर आगे निकलने की होड़ में भागती हुई गाड़ियों की तरह पीना पड़ता था। अब चाय की  हर चुस्की हलक से नीचे गुज़रते हुए ,चाय की ताज़गी के इश्तिहार में नाचते हुए दाने की तरह लगती   है।आज ही कुछ हमउम्र दोस्तों के साथ बैठकर संस्कारों और महिलाओं पर राह चलते गिद्धनज़र डालते  मनचलों की बात हो रही थी। लगा कि शायद यह छेड़छाड़ अब कम हो गयी है। तभी  किसी  ने अपने सफ़ेद हो गए बालों पर हाथ फेरा,अपने  बेकाबू  होते वजन पर ध्यान दिया और समझ में आया की इस हाल  में कौन छेड़ेगा भला। पर हाँ अपने युवावस्था के दिन का भी ख्याल तुरंत आ गया। याद आ गया,कि राह चलते, ट्रेन में जाते,कालेज जाते हम सबने कितने फिकरे,कितनी  छेड़छाड़ और कितनी ही भद्दी नज़रों का सामना किया है। फिर भी मुस्कुराते हुए अपनी पढ़ाई,अपनी नौकरी, अपनी ज़िंदगी जी। याद करते हुए यह भी एक आह निकली कि हाय यह आंटी का सम्बोधन कितना तकलीफदेह होता है।कोई  बीस से तीस साल के उम्र के दरमियान,दीदी से आंटी बन जाना भी जीवन का एक दुखद किन्तु अनिवार्य दस्तूर है। एक बड़ा झटका लगता है जब पहली  बार कोई आंटी कहकर सम्बोधित करता है!और अब उम्र के इस मोड़ पर शायद अस्तित्व इस आँटी के सम्बोधन में लिपट कर रह गया है।
         इसी कमबख्त बढ़ती कमर ने एक और पहले  की खुशनुमा स्मृति ताज़ा कर दी।वह दिन जब खाने के ऊपर कोई पाबंदी न थी।जब हर कौर के साथ कैलरी नहीं जुडी थीं। जब छरहरी काया पर बेइख़्तियार बढ़ते  वज़न का  मनहूस साया न था।वो समय था जब ठेले पर लगी चाट,आलू टिक्की और पानी के बताशे पर ज़बान फिसल जाती थी,समोसे पर मन मचल जाता और मीठे की मक्खी बनने पर कोई रोक नहीं। अब उबली सब्ज़ियाँ और सूप,संतुलित आहार और अगर कुछ मीठा खा लिया तो उससे बनी चर्बी को कम करने के तरीके ढूंढता  यह  परेशान मन !अब हर निवाला चर्बी का सवाल लेकर ही मुंह में जाता है।
        बढ़ती उम्र में कहीं खो गया वह पहले प्यार की लाली देने वाला मीठा एहसास।जब  उसका हाथ छू भर जाए के बस ख़याल से ही साँसों में एक महक आ जाती,जब कोई संगीत अपने आप बजने लगता और लगता गालों पर फैलती लाली का राज कोई न जाने। जब मिल्स एंड बून के टॉल,डार्क,हैंडसम नायक को आँखें ढूँढतीं।अब टूटे रिश्तों, पेचीदा नातों,दफ़न हुए एहसासों,मर्यादों की रखवाली और हकीकत  की सीमाओं  से हुए मोहभंग का अंजाम  है कि  उस तरुणाई की अंगड़ाई की जगह ले ली  एक परिपक्व प्यार ने जहां ठहराव है ,जहां ज़िम्मेदारियाँ हैं  पर सपनों में अनुभव की  सीलन है। युवा आत्मविश्वास का दर्प, आगे बहुत सा समय  होने का आभास और "प्यार सिर्फ प्यार" की सरलता पर विशवास ,यह तो अब सिर्फ आँखें मूँद कर पीछे देखने पर ही  दिखता है।
     तब जीवन में आगे कदम  रखने की अधीरता थी,अब हर आगे रखे कदम पर दस बार पीछे मुड़कर देखने की जैसे बेबस  बाध्यता हो गयी है !बदलना दस्तूर है,बदलाव के साथ अभ्यस्त होना समझदारी  पर बदलते दौर पर आहें भरना एक जायज़ अधिकार !

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शुक्रवार, मार्च 21, 2014

बसंत आयो मोरे अंगना

पेटूनिया 
चंचल पग दीपशिखा के धर
गृह मग वन में आया वसंत।
सुलगा फागुन का सूनापन

सौंदर्य शिखाओं में अनंत।
सौरभ की शीतल ज्वाला से
फैला उर-उर में मधुर दाह
आया वसंत भर पृथ्वी पर

स्वर्गिक सुंदरता का प्रवाह।
(सुमित्रानन्दान पंत )

 वसन्त ऋतु क्या आयी हवा में एक स्निग्धता  सी फ़ैल गयी । फागुन की बहार जैसे शिशिर की ठण्ड से थोड़ी सिहरन लेती है ,आगत ग्रीष्म से थोड़ी नरमी उधार ले लेती है ,और उसमें फूलों के रस की मादकता डाल  कर  ऐसी बयार बन जाती  है कि ह्रदय में एक  हूक सी उठती है ,एक प्रीतमयी व्याकुलता सी  छा जाती  है  । 
ऐसे में फूलों ,बगीचों  में घूमना एक स्वर्गिक आनंद देता है।  नीम के पेड़ से पत्तियां झड़ रही  हैं ,पीपल का विशाल वृक्ष सूना हो गया है ,पर  बसन्ती हवा के आवेश में  आम  तो बौरा ही गया ।  सब अपने अपने तरीके से नवजीवन के लिए तैयार हो रहे हैं।  मैं देख रही हूँ घर में नीम्बू और मौसमी  पेड़ है उसमें भी चिकने नए पत्ते और छोटे छोटे फूल निकले  हैं। 
वसंत का जादू जब छाया तो अपने बगीचे में घूम घूम कर आँखों से उसका रस पीना ,उसे अपने भावों में समाना ,इस मधुमास का मदिर पान करना ,यही  तो मादकता की पराकाष्ठा है।

इस बार जनवरी और फरवरी में हो रही बेमौसम बारिश ने लाख प्रयत्न किया , बसंत के रंग में भंग डालने का ,पर  उन्मादित फाल्गुनी पवन को रोक  नहीं पाया ।  वह तो हर विपरीत स्थिति से निकल कर अपना सौंदर्य बिखेरने पर आमदा है। 

मधुमक्खी और डाहलिया 
इसलिए तो बगिया के कोने कोने में पुष्पों की बहार है ,भंवरों की  गुनगुन से हवाएं गुंजित हैं ,तितलियों के नरम पंख से वातावरण  भी  सतरंगी हो चला  है।  हर फूल ने  मुझसे कुछ कहा।  पीले मार्गरीट ने हँसते रहना का सन्देश दिया , गेन्दा  और नेस्तर्शियम ने खुल कर जीवन जीने का आभास दिलाया , कोमल दयनथस और उसके पीछे झूमते दिलेर कैलेंडयुला  ने मन मोह लिया  ।  उधर डाहलिया का सुडौल  शिष्ट लावण्य  लुभाता है तो पैंसी का नटखट बन्दर वाला रूप   भी मुस्कराने पर विवश कर देता है। हर फूल सम्मोहित  करता है ,हर शाख की चंचलता विभोर करती है ,हर नन्ही कोपल  देख मन पुलकित हो जता है। यह फाल्गुनी  वैभव ,यह बासंती चादर  ओढ़े यह  पात पात यह डाल डाल , यह आग लगाते  ढाक  पलाश, यह मन को सहलाते रजत तुषार । यह सब बसंत का बवरापन है। 




बस अभी कली फूल बनने को है 
मैं ऋतुओं में न्यारा वसंत
मै अग-जग का प्यारा वसंत।
मेरी पगध्वनि सुन जग जागा
कण-कण ने छवि मधुरस माँगा।
नव जीवन का संगीत बहा
पुलकों से भर आया दिगंत।
मेरी स्वप्नों की निधि अनंत
मैं ऋतुओं में न्यारा वसंत।
(महादेवी वर्मा )








आइस प्लांट 



रविवार, मार्च 09, 2014

जादू की पुड़िया

जादू की पुड़िया है ,जीवन का यह खेला 
 जिसको भी देखो वह  आया अकेला 
 फिर यह साथ दिखता कैसे  यह रेला 
 लोगों की भीड़ है रिश्तों का एक  मेला !
   
 
इस जादू की पुड़िया में  होता कुछ गजब है  
आते सब इंसान है जुड़ जाता एक मज़हब है 
इंसानियत के मतलब हो जाते बेसबब हैं 
दिल की दूरियों के सबब  होते  कुछ अजब हैं !
 
 
इस जादू की पुड़िया में न जाने कैसे  राज हैं 
कोई निकला भिखारी ,किसी के सिर  पर ताज है 
कोई काले रंग  की दौलत पर भी  करता बड़ा  नाज़ है 
कोई करता कड़ी मेहनत  पर किस्मत नाराज़ है !


 जादू की पुड़िया के  करतब कर देते  दंग  हैं   
माँ  के पेट में  सब के पलने का एक ही  ढंग  है
दुनिया में बेटा आये तो भर जाए सात रंग है
और बेटी होकर निकले तो सब रंग बेरंग हैं ?


जादू की पुड़िया यह जीवन कैसा  तमाशा  है
कहीं  बदलते  रिश्तों से आती हुई   हताशा है
कहीं  फैलता  तिमिर लाता सिर्फ निराशा  है
पर जादू तो जादू है ,दिखा सकता भोर सी आशा है !


 

बुधवार, फ़रवरी 19, 2014

बेकरारी

बसंत की दोपहरी कुछ  अलग सी है
जब हवा छूकर कहती है 
किसी के  साथ की आस हो 
दिल  कुछ गुनगुनाए 
कभी ठंडी एक बयार ,
कभी  गर्म हवा का  झोंका
न करार दे,
 न बेकरारी  ही बने  रहने दे। 
 पैरों तले घास की नमी
और दिल में घुसती
 हवा के साथ आयी
प्यार की गर्मी।
करार भी देती है
और बेकरारी भी। 
  
 

मंगलवार, दिसंबर 31, 2013

नया साल

बीते साल को मुड़कर देखा , हँसते देखा ,रोते देखा
मौला के रहम को देखा ,इंसानों  के करम  को  देखा।

आपस के मसलों को लेकर  बंटती सांझी ज़मीन को देखा
पैसे की लालच  के पीछे  लुटती हुई   ज़मीर को देखा

हिम्मत  बांधे एक हुजूम को सडकों पर उतरते देखा
सत्ता के बंद गलियारों में नयी हवा को घुसते देखा।

काले सूतों  से बुने संतों के भगवा  कपड़ों को देखा
भोग विलास के पायदानों पर लुढ़कती हुई गरिमा को देखा।

 मानव के अतिक्रमण पर  पर्वतों के प्रतिशोध को देखा
 प्रकृति के बेपरवाह  हनन  पर मानव के भी  विरोध को देखा।

धरती पर  अमंगल के बढ़ते हुए  कदमों को देखा
दूर गगन में  मंगल खोजते देश के काबिल हाथों को  देखा


देखे हुए कई सपनों को टूट टूट कर  बिखरते देखा
बिखरे  हुए टुकड़ों को फिर से ख्वाबों में बुनते देखा।

बीते साल के कई  क्षणों  में  इतिहास बन जाते  देखा
इतिहास बने कई लोगों को सुपुर्दे-खाक होते हुए  देखा।


देखें यह एक  नया साल अब क्या क्या रंग दिखाता है
कितनी आशाओं ,कितनी उम्मीदों को परवान चढ़ाता है।




सोमवार, दिसंबर 16, 2013

'sabaaeedee '..... नमस्कार लाओ में आपका स्वागत है

थाईलेंड  ,कम्बोडिया ,वियतनाम और  चीन से घिरे इस देश में शायद सैलानी के तौर पर जाने की बात हमारे ज़हन में न आये ,पर आफिस के काम से मुझे वहां जाने का मौका मिला. दिल्ली से बेंगकोक और फिर वहां से लाओ एरलाईन से पाक्से . बंगकोक से एक छोटे एटीआर जहाज से हम पहुंचे पाक्से .हवाई अड्डा क्या था बस एक रनवे और दो कमरों की इमारत. दक्षिणी लाओ के चम्पासक प्रदेश की राजधानी है यह छोटा सा शहर . हमारे बस एक दिन का समय था सो घूमना तो ज्यादा नहीं हो पाया ..हाँ कुछ चित्र ज़रूर उतारे.

पाक्से का हवाई अड्डा जहाँ उड़ानें सिर्फ बंगकोक और लाओ की राजधानी वियांतियाँ तक जाती हैं  .



होटल के कमरे से दिखती मेकोंग नदी.यह शहर दो नदियों सी दोन औए मेकोंग के संगम पर स्तिथ है.चीन से आती हुयी मेकोंग चौड़ी है और बहुत ही सुन्दर .

सूर्यास्त .यह पुल जापानी सहायता से बनाया गया  है .सवेरे इस पुल पर टहलना और नीचे शांत बहती नदी को देखना .

मंगलवार, सितंबर 03, 2013

और किसके नाम हो सकता था यह 100वा चिट्ठा !

2006  से इस ब्लॉग की शुरुआत हुई थी।हिन्दी ब्लॉग जगत में हरकत होनी तब शुरू ई हुई थी।  कुछ चंद लोग थे ,एक परिवार सा लगता था. नारद मुनि का साथ था अब तो महासागर है, कुछ पुराने अभी भी चले आ रहे है ,बहुत रास्ते में रुक गए , कुछ बेतहाशा दौड़ते जा रहे हैं। मेरा भी यह प्रयास  कभी तेज़ कभी बिलकुल ही अनमना  सा    चलता जा  रहा  है। रुक जाता है ,ठहरता है ,पर पूर्णविराम अभी तक नहीं लगा । स्थिति वैसे पूर्ण विराम जैसी ही है।   अब तक सिर्फ 99 चिट्ठे लिखे,वह भी बेतरतीब। कभी कुछ अच्छा लगा तो लिख दिया,कभी कुछ संजो कर रखने का दिल करा तो यहाँ सुरक्षित रख दिया. गाहे बगाहे कुछ याद आया तो यहाँ डाल  दिया। अर्धशतक ही पूरा हुआ काफी देर में। इसे यहाँ देखें  http://poonammisra.blogspot.in/2008/02/blog-post_27.html
 सोचा था सौंवीं पोस्ट एक ख़ास मौके पर लिखूँगी। पिछ्ले साल अपने मम्मी पापा की शादी की पचासवीं वर्षगाँठ पर।  आयी चली गयी। नए साल के इरादों की तरह ,इरादा  तो पुख्ता था  ,बस यहाँ चिट्ठे में तब्दील नहीं हो पाया।
इस बार अपने जन्मदिन पर कुछ दिन माँ पापा के साथ बिताये.लम्बे अरसे के बाद ४-५ दिन साथ रहने का मौक़ा मिला. गर्मी के बाद बरसात होने पर जैसे फूलों में आयी चमक, हरियाली और हरी, सूखे गले से गट गट नीचे उतरता पानी ,उपवास  के बाद नमक का स्वाद , दिनों से अपने आप को संभालता  नदी से टूटता बाँध।
दोपहर में मम्मी के रुपहले हो चले बालों को सहलाते , उनसे बातें करते।  पापा को टीवी के सामने छोड़ ,गर्ल्स टॉक !चाय की चुस्की और हर चुस्की से ताज़ा होती उनकी बेहिसाब चाय पीने की पुरानी  आदत। अब सुनने में  कठिनाई होती है ,तो एक डायरी साथ में। जो उनको पकड़ में नहीं आता वो उसमें लिखना। जाने से पहले उसके पन्ने पलटे।  बचपन में उस समय पत्थर की फिसलती फर्श पर लेट कर हम दो बहनों को अ ,आ और a ,b c की शुरुआत  कराने से लेकर उनकी नवीनतम ख्वाहिश। चाहती हूँ तुम्हें टीवी पर देखना ! गुनगुनाते रहती हैं  लोकगीत।  राम विवाह के  स्नेहास्क्त किस्से बहुत ही तन्मयता से गाती तो नहीं पर बड़े भाव से उन्हें बाचती हैं।  जैसे वह सामने ही हों।  बहुत प्यारे हैं उन्हें लोकगीत खासतौर से जनक की राम की खातिरदारी।  आवाज़ में वो दम नहीं , शब्द भी भूल चुकीं हैं ,पर फिर भी रिकोर्ड कर लिया उनका गाना……निहुरे निहुरे परसें जनकजी,धोतिया मईल हो जाई की हाँ जी ;धोतिया  तो हमरे धोबी कर धीन्हो , ऐसे सजन कहाँ पाएं की हाँ जी। कभी फिर ऐसा मौक़ा मिला तो उनसे सारे गीत गवाऊंगी । टेप कर लूंगी। उनका अंदाज़ अलग है। बचपन में क्लब जाने से ,ब्रिज और बैडमिन्टन के शौक को छोड़कर एक बड़े परिवार को संभालना ,रसोई में न जाने वाली भाई की दुलारी  बहन ,शादी  के बाद सास की भी प्यारी हो गयी।  ऐसी रसोई की अब तक कोई और खाने का स्वाद हम लोगों पर नहीं चढ़ा। ऐसा घर कि  कोई दुविधा होने पर आँख बंद कर बस माँ का ध्यान करो ,उनका घर रखने का सलीका याद करना भर रास्ता सुझा देता है । याद दिलाया कैसे उन्होंने बचपन में फ्रोकें सिलीं थीं। सबका नाम परियों  वाली फ़्रोक ,रोस (गुलाब) वाली फ्रोक , बुनाई की सिलाइयों में जाड़े के धूप की गर्मी को बाँध कर रखना। बातें क्या ख़तम होंगी? न यादें न बातें !अब जब सब बच्चों का घर बस गया है ,सब के अपने किस्से,अपनी जिम्मेदारियाँ ,मिलना जुलना कम ,सुनायी देना कम ,तो यह सब बात करके ही पिछले दिनों से अविच्छेदता  बनी रहती है। एक निरंतरता का एहसास होता है. उन्हें भी  मुझे भी। पापा का उनके लिए समर्पित गीत, 'कहीं एक मासूम नाज़ुक सी लड़की ,बहुत खूबसूरत ,मगर सांवली सी ……'
   पापा भी आ गए।" मम्मी बिटिया की बातें चलती ही जा रही हैं !अरे उसको कुछ आराम कर लेने दो। घर आयी है ,सोने दो , काम मत करवाना , पैर दबवाओगी  ज़रूर।"  "अरे यह खुद ही दबा रही है ,मैंने नहीं कहा ", मम्मी कहती हैं। माँ  के पैर दबाने में ही मेरे जीवन की सार्थकता है और दबवाने में उनकी। सुख का चरमोत्कर्ष !  पापा मितव्ययी ,अंतर्मुखी। सो हम  सब के लिए प्यार भी अन्दर की गहराई तक।  हमेशा अभिव्यक्त करने वालों से कम नहीं , शायद और भी भावुक और भी पैशनेट। पर शब्दों में नहीं बाँधा। शब्दों की असमर्थता है। उतनी गहराई जो सिर्फ वही महसूस कर सकते हों या उस प्यार को  पाने वाले । एक छवि है उनकी। …दफ़्तर से आकर ,चाय पीकर सीधे किचन गार्डन  में चले जाना। या फिर सवेरे एक घंटे तक अखबार पढ़ना। नेशनल पैनासोनिक पर  बेगम अख्तर को "ऐ मुहब्बत तेरे अंजाम पे  रोना आया" का टेप चलता ही जाता ,या फिर एक ही टीवी जिस पर दूरदर्शन के शास्त्रीय संगीत के सारे नृत्य सारे संगीत के प्रोग्राम देखते। टीवी पर उनका एकाधिकार। पर हम साथ देखते क्रिकेट,चित्रहार और विम्बलडन। बनारस की मिट्टी है तो शास्त्रीय संगीत से प्यार है।खिलाड़ी हैं तो वोलीबॉल था, कुश्ती थी।   होली में मम्मी की भाभी के साथ उनकी होली ख़ास होती थी। याद है मामी अलग से इंतज़ार करतीं अपने इस सबसे छोटे और उम्र में बहुत छोटे बेटे जैसे नंदोई का. वह भी अलग अलग तरीकों से उन्हें चुपके  से रंग लगाने की तैयारी  करते। अनुशासन कड़ा  था ,पर जोर से आवाज़ नहीं उठती।
      फिर भी  बात करते करते  भावुक हो गए। बोले तुम लोगों को बड़े ही नहीं होना चाहिए था।चारों का बचपन कितना अच्छा था ! लैब में माइक्रोस्कोप से देखते हुए उनकी एक फोटो है , बहुत प्यारा ।  लम्बे ,गोरे ,हैंडसम। कैप पहन जब वह मुझे यूनिवर्सिटी छोड़ने जाते तो साथ की लडकियां  क्या अपने उम्र के लड़कों को छोड़ पापा को देखतीं।  प्यार का प्रदर्शन उन्हें पसंद नहीं। पर प्यार प्रदर्शन और शब्दों का मोहताज नहीं।

सौंवाँ  चिट्ठा  अपने माता पिता के  लिए , जिनके त्याग ,परिश्रम ,प्यार ,हुनर ,शख्सियत  ,शौक , मूल्य सबकुछ  मेरे लिए प्रेरणा स्रोत ,मेरे जीवन का सहारा हैं।


शुक्रवार, मई 24, 2013

कुछ तुम सीखो ,कुछ हम सीखें

कुछ दिन पहले एक मौक़ा मिला . इलाहाबाद के एक प्रतिष्ठित स्कूल में भौतिक विज्ञान के शिक्षक पद के लिए इंटरव्यू  था. एक पद कक्षा दस के लिए और एक पद ,कक्षा ११ और 1२ के लए खाली था. साक्षात्कार   के लिए ४ -४  अभ्यर्थी .सभी भौतिक विज्ञान में स्नातकोत्तर थे. अनेक सवाल पूछे गये. शुरुआत हुई ,१५ तक किसी मनचाहे विषय परपढ़ाने  का एक छोटा डेमोंस्त्रेशन से. पढ़ाने  का कोई भी तरीका वह अपना सकते थे , हर तरह की मदद स्कूल उपलब्ध करा देता . पर अफसोस , ४ में से किसी ने भी ऐसे तरीका नहीं अपनाया जिससे विषय रूचिकर हो जाए .एक उम्मीदवार ,जो कक्षा बारह को पढ़ाते  भी हैं ,ने वही पुराने तरीके से , अपनी प्रदर्शन शुरू किया. उनका विषय था न्यूटन के  तीन नियम . उन्होंने ने घिसे पिटे तरीके से बिना ब्लेक्बोर्ड से सर उठाये पढ़ाना शुरू कर दिया . हम ऊंघने लग गए . बच्चों को, जिनके लिए सब बिलकुल नया  होगा , क्या समझ में  आता होगा . बड़ा खेद हुआ कि  विज्ञान की पढ़ाई क्या बिना उदाहरण दिए , सिर्फ समीकरण लिखकर हो सकती है ?
एक निवेदक से पूछा गया की आप बाहर देखें और कोई भी एक ऐसी चीज़ ,क्रिया बताएं जिसमें भौतिकी का कोई भी नियम लग रहा है. उनका जवाब था ,उनको ऐसा कुछ नहीं दिख रहा  . हाथ उठाने से लेकर दरवाज़ा खोलने,सूरज के प्रकाश की गति से लेकर ,कण कण के ब्रॊनियन मोशन ,कुछ भी कहा जा सकता था . यह क्या विज्ञान पढाएंगे ? और जो पढाएंगे तो उसमें कितने विद्यार्थियों में रुचि उत्पन्न होगी और कितनों  को मूल नियमों की महत्ता समझ आयेगी .उनका ज्ञान सिर्फ रट कर,इम्तिहान  पास करने भर तक सिमट जाएगा ?कोई बच्चा सवेरे शीशे में अपना प्रतिबिम्ब देखेगा और उत्साह से बोलेगा कि  आज यही तो हमें पढ़ाया गया था ? रात आसमान में तारे देखकर कोई विद्यार्थी सवेरे आकर  पूछे की तारों का रहस्य क्या है? इस  अनंत आकाश की सीमाएं क्या हैं? और अगर पूछेगा तो क्या कोई शिक्षक उसे उत्तर देंगे , कौतूहल को बढ़ावा देंगे? क्या समझाने की बजाए उससे बोलेंगे ,आओ हम एक साथ मिलकर इसका पता लगायें .एक रात सब बाहर आसमान के नीचे बैठें और ऊपर चलते हुए तारों के साथ दोस्ती करें ?
  एक और  मोहतर्मा से हाल  में रूस में हुए उल्का पात की जानकारी चाही ,तो वह इस घटना से अनभिज्ञ  थीं . पर यह सिर्फ विज्ञान के अध्यापकों  की समस्या नहीं है।अन्य विषयों के लिए आये पदाभिलाषी भी इसी तरह से अपने विषय वस्तु  को सामन्य जनजीवन से जोड़ने में असमर्थ दिखे. सिर्फ किताब से देखते हुए पढ़ाना , ब्लेक्बोर्ड एक दो महत्त्वपूर्ण तथ्य लिख देना भर पढ़ाना नहीं होता .
अगर शिक्षक अपने काम के प्रति इमानदार है तो वह कोशिश  करेगा की उसके कक्षा का कम से कम एक विद्यार्थी बाद में कह सके की फलां अध्यापक की वजह से उसमें  इस विषय को आगे पढ़ने की लालसा जागी ,या उसकी अरूचि रुचि में बदल गयी .   

मंगलवार, मई 14, 2013

चिकित्सा के नए आयाम

कल एक पत्रिका में पढ़ रही थी कि  दुनिया में तीन देशों को छोड़ बाकी जगह पोलियो मुक्त हो गए हैं  .  य़ह तीन देश हैं अफगानिस्तान ,पाकिस्तान  और नाइजीरिया . अपने स्कूल के दिनों की याद आई .हमारे साथ थी तस्नीम थी जिसका पैर  पोलियो ग्रस्त  होने के कारण बंधा रहता था. पहले काफी बच्चों को देखा जो पोलियो का शिकार हो गए थे।यह जानकार खुशी हुई  की इस बीमारी से दुनिया को निदान मिल गया है.वैसे ही जैसे चेचक से. यह भी चिकित्सा विज्ञान का कमाल है ,नहीं तो कितने बच्चे इसकी चपेट में आ जाते  थे .
इसी तरह चिकित्सा का हर क्षेत्र आधुनिक दवाइयों ,तरीकों,शोध और  टेक्नोलोजी  से अधिक सक्षम,अधिक प्रभावशाली हो गया है.
          आधुनिक चिकित्सा वाकई में वरदान है. टेक्नोलोजी के ज़माने में आधुनिक चिकित्सा  प्रणाली इसका भरपूर उपयोग करती है. बिना आपरेशन के दिल के मरीजों को ठीक करना हो,या जटिल प्रसव  के दौरान माँ -बच्चे दोनों की जीवन की रक्षा .सब कुछ आज संभव है. यहाँ तक की कई निराश दम्पतियों को बच्चों का सुख अगर मिला है तो वह भी आधुनिक चिकित्सा के प्रयासों द्वारा. सरोगेट गर्भ की प्रणाली एक वरदान है.
              आज कल जो बहुत विलक्षण तकनीक मेडिकल विज्ञानं में है वह है स्टेम सेल या मूल कोशिका की . स्टेम सेल ,ने मेडिकल जगत में एक रोमांच पैदा किया है. कई  बीमारियाँ जिनका  इलाज संभव नहीं था ,वह अब साध्य हैं . कैंसर और रक्त -संबन्धित कई बीमारियाँ का इलाज हो सकता है .स्टेम सेल्स,शरीर की वह कोशिकाएं हैं ,जो विभाजित हो कर बढ़ती जाती हैं .यह शरीर के टिशू की पूर्ती कर सकते हैं  और अंगों की मरम्मत करने की  क्षमता रखते हैं। कुछ बीमारियों के इलाज के लिए ,यह रोगी के अपने शरीर से लिए जा सकते हैं,और कुछ के लिए दूसरे व्यक्ति के भी इस्तेमाल कर सकते हैं । अब तो स्टेम सेल बैंक भी हैं  और बच्चे के पैदा होने के  बाद ,उसके नाभि रज्जु यानी अम्बिलिकल कोर्ड से यह कोशिकाएं निकाल कर रख ली जाती हैं .थैलेसिमिया ,लुकेमिया  और यहाँ तक की कुछ आनुवंशिक विकारों का भी इलाज हो सकता है .
           जब तक हमें स्वयम कष्ट से न गुज़रना पड़े हम इन तरीकों और तकनीकों पर उतना ध्यान नहीं देते  ,पर मुझे  http://www.indiblogger.in/topic.php?topic=77 के "How Modern Healthcare touches life "  वाली कड़ी ने इसके बारे में सोचने पर विवश कर दिया और  इसके बारे में अधिक जानकारी , http://www.apollohospitals.com/cutting-edge.php. पर मिली . अपोलो हास्पिटल भारत में अन्तराष्ट्रीय स्तर की चिकित्सा सेवाएं और  नवीन प्रक्रियाएं लाने के अगवा हैं .
           सेहत खुदा की सबसे बड़ी नियामत है . अगर वह नहीं तो दुनिया के बाकी सुख धूल  बराबर हो जाते हैं . ऐसे में अपना  ख्याल रखना और स्वस्थ रहना ज़रूरी है. सेहतमंद व्यक्ति से खुशाल समाज बनता  है .देश के बच्चे स्वस्थ हों , महिलाएं निरोग रहे ,पुरूष निरोग रहे ,यह हमारी चिकित्सा बिरादरी का ध्येय होना चाहिए और इसके लियी आधुनिक चिकित्सा   प्रणालियाँ अपनाने और खोजने के सतत  प्रयास होने चाहिये. न सिर्फ हम निरोग दीर्घायु होंगे ,हमारी उत्पादकता बढ़ेगी और अन्तत: देश खुशहाल ,समृद्ध होगा .