कल एक सुखद आश्चर्य हुआ .अनूप शुक्लाजी से बातचीत हुई. मोबाइल बजा तो देखा कानपुर का नम्बर है.चूंकि मैं कोइ दो साल कानपुर में भी रह चुकी हूं तो लगा किसी पुराने परिचित ने याद किया.देखिये हमारी भी सोच...एक सीमित दायरे से बाहर ही नहीं निकलती.लगे दिमागी घोडे दौड्ने कि कौन हो सकता है.अपने जानने वालों की सूची स्कैन करी तो कानपुर में ऐसा कोई नहीं मिला जो मुझे फोन करे. खैर फोन उठाया और फोन करने वाले का परिचय सुना तो एकबारगी विश्वास नहीं हुआ.
कहना न होगा कि अनूपजी से बात करना न सिर्फ बहुत अच्छा लगा बल्कि उपयोगी भी.यह चिट्ठा उसी का परिणाम है.उनको हमारे कविताएं लिखने पर आपत्ति है.हमारे ही नहीं सारे कवियों के.कहते हैं आजकल नारदजी को कुछ ज़्यादा कविताएं सुनाई जा रही हैं.जिसको देखो वही कवि का जामा पहन लेता है.आखिर हमलोग कब तक झेलते रहेंगे आप सबको.कुछ गद्य लिखिये, कुछ लेख-वेख हो जाये . कविता का क्या है.समझने वाले तुरन्त समझ जाते हैं और न समझ्ने वाले पाँच बार पडकर भी ... जीतेन्द्रजी की तरह और भी लोग हैं जो कविता को देखकर घबरा जाते हैं .
नारदजी कुछ कहें और हम न सुनें,ऐसे तो हालात नहीं.नदी में रहकर मगर से बैर कैसा.सो ठान लिया कि अब कुछ लेख लिखे जाएं.पर अनूपजी जो बात आपसे कही थी वह तो अभी भी सच है.समयाभाव .कविता का क्या है.कुछ दिल ने मह्सूस किया,बच्चों का टिफिन पैक करते कुछ पंक्तियां भी पैक हो गईं , आफिस पहुँचे ,दो कामों के बीच टाइप किया,और तीसरा कोइ काम करते करते पोस्ट कर दिया. बाकी का काम नारद्जी के जिम्मे .जिसको पढना पढे, और जिसको नहीं पढना वो आगे बढ जाये,पर एक नज़र डालने के बाद! लेख का क्या किया जाए.टिफिन जल्दी पैक हो जाता है और तब तक लेख की आत्मा तक पास नहीं फटकती.अब सोचा है कि कुछ रास्ता तो निकालना होगा . तो अब अभियान -गद्य चालू हो गया है. नाश्ता बनाते, आफिस का काम करते ,बच्चों का होमवर्क कराते....बस यहीं तक सीमित रखते हैं ,गद्य की भाव-भंगिमा के बारे में सोचना . किस समय पर प्रस्तुति की रचना हुई है यह आप उसकी खुशबु से समझ जाइयेगा. मिज़ाज में थोडी सख्त ,तो जानिये बच्चों को पढा रहे थे, कुछ मसालेदार्,चटपटी तो रसोई में, अनमनी सी,बेजान तो आज हो गई खटपट घर में और कोमल , नाज़ुक सी तो दिखाई दिया है इंद्रधनुष.