बुधवार, जून 04, 2008
सलाम काबुल- २ (बुज़काशी )
सलाम काबुल -१
यह एक रोचक रिपोर्ट है इसी से सम्बंधिंत ।
http://www.iwpr.net/?p=arr&s=f&o=344606&apc_state=henparr
भारतीय चैनलों के अलावा यह सीरियल दरी (वहाँ की भाषा ) में डब कर के जाते हैं। हाँ, पर जहाँ भी पोशाकें उनकी मर्यादा की सीमाओं को तोड़ने लगती हैं,उन पर फज़िनेस कर दी जाती है। अमिताभ बच्चन और शाहरुख़ खान पसंद किए जाते हैं ।दुकानों पर हमने तुलसी,मिहिर ,शाहरुख खान के पोस्टर देखे।
भारत वहाँ के पुनः निर्माण में बड़े पैमाने पर लगा है। इसलिए वहाँ की जनता में भारत और भारतीयों के प्रति बेहद आदर और सौहाद्र है। गर्मजोशी से स्वागत होता है।
गुरुवार, मई 29, 2008
काबुल फ़िर से २००८
गुरुवार, मार्च 27, 2008
जोधा अकबर
साढ़े तीन घंटे की को मैंने ०-१० के स्केल पर ७.५ नम्बर दिया । फिल्म के सेट की शानो शौकत पसंद आयी .भव्य सेट जिसमें राजसी राजपूत महलों और मुगलिया दरबार का शाही अंदाज़ दोनों दिखाने में फिल्म के कर्ता धर्ता सफल रहे। ह्रितिक रोशन ने अच्छा अभिनय किया खासतौर पर जहाँ नज़ाकत से करना था।शाही अन्दाज़ भी अच्छे से निभाया। दो तीन जगह तो खासा प्रभावित किया जैसे कि जब वो जोधा से पहली बार मिले। हाँ ऐश्वर्या ने भी अपने अभिनय का अलग अन्दाज़ पेश किया। मुझे लगता उनके अभिनय ,उनके बोलने के तरीके, उनके नृत्य में कुछ ज़्यादा लटके झटके होते हैं। पर उन सबके विपरीत इस फिल्म में उन्होंने अपने संतुलित अभिनय से प्रभावित किया। एक राजपूतानी की गरिमा को बखूबी निभाया । ह्रितिक और ऐश्वर्या की जोडी में भी सामंजस्य अच्छा है। कुछ दृशय तो बहुत ही अच्छे लगे । जब जोधा अपना बनाया खाना चखती हैं और अकबर का कहना कि वह उसकी झूठी थाली में ही खायेंगे । तलवार की जुगलबंदी ,जोधा का सूरजमल के साथ दृशय ,ऐश्वर्य और इला अरुण के बीच का तनाव । अकबर जब आदम खान के समक्ष जोधा का सम्मान करता है तो लगा पति हो तो ऐसा। लडाई के दृश्यों में कुछ ऊब सी लगने लगती थी। कभी कभी यह भी लगता था जैसे निर्देशक कभी कभी जोधा अकबर के प्रेम को उतना न्याय नहीं दे पाए क्योंकि वह साथ में उस समय के राजनीतिक और ऐतिहासिक परिवेश को भी उतना ही महत्व देना चाह्ते थे जितना प्रेम कथा को। एक राजनीतिक सौदा कैसे प्यार में बदल गया इसका अहसास, जैसे जैसे फिल्म आगे चलती है ,होता जाता है। लेकिन यह बात है कि एक ऐसे बादशाह् को जो सब धर्मों की इज्जत करता था,प्यार से दिलों को जीतना चाह्ता था और बहुत ही सुलझे विचारों का था , उसके लिये जोधा का ज़िन्दगी में शरीक होना ,उसके व्यक्तित्व में नया आयाम ला देता है।
पूनम सिन्हा को पहली बार पर्दे पर देखा अकबर की वालिदा हमीदा बानो कि किरदार में।कितनी सुन्दर हैं।हम सब की नज़र पडी अकबर के चारों और घूमते खूंखार पहरेदारों पर . कलाकारों का चयन अच्छा था।मुझे पोशाकें पसंद आयीं ,वास्तविक लग रही थीं ।वैसी ही जैसे कि हमारे जहन में होती हैं जब हम उस समय के बारे में सोचते हैं । जोधा के गहने ,क्या कहने। " कहने को जश्ने बहारा " गुनगुनाते हुए बाहर आए ।
देखने के बाद अच्छा लगा लेकिन कुछ कमी सी भी लगी जैसे कुछ और हो सकता था.
गुरुवार, मार्च 13, 2008
मेरा अपने से क्या रिश्ता है
और न जाने कितने रिश्ते निभाते हैं हम
पर अपने से कोई रिश्ता बनाया है क्या हमने
कभी ख़ुद से कुछ निभाया है हमने ?
सब रिश्ते बेमानी हैं अगर
ख़ुद को नहीं पहचाना है हमने
भाई बहन ,माँ बाप,पति, पत्नी,
पिता,पुत्र, पुत्री,मित्र,सहेली
दोस्त
सबका वजूद तभी है
जब हम हैं ।
अगर अपनी पहचान झूठी है
तों रिश्तों की सच्च्चाई क्या है ?
शनिवार, मार्च 08, 2008
नाम में क्या रखा है
एपल कंप्यूटर के संस्थापक स्टीव जोब्स को सेब बहुत पसंद थे। उनको अपनी कंपनी का नाम नत्थी कराने में तीन महीने का विलम्ब हो गया .जब उनके साथी कोई वाजिब नाम नहीं सुझा पाए तो उन्होंने अपनी कंपनी का नाम रखा एप्पल कम्प्यूटर्स।
CISCO सुनने से लगता है किसी का परिवर्णी शब्द होगा पर वास्तव में यह सान फ्रांसिस्को से लिया गया है।
LOTUS का नाम लिया गया है योग के पद्मासन यानी लोटस मुद्रा से।
माइक्रोसॉफ्ट बना है माइक्रोकमप्यूटर और सॉफ्टवेर के हिस्सों को जोड़कर ।
मोटोरोला के पाल गल्विन ने कारों के लिए रेडियो बनाने शुरू किए और उस समय की लोकप्रिय कम्पनी वित्रोला के नाम पर रख दिया मोटोरोला।
गूगल का नाम इस विचार से बना की इससे कितनी जानकारी खोजी जा सकती है.शायद गूगोल यानी की १ के बाद सौ शून्य.जब सेर्गे बरीं और लैरी पेज ने एक निवेशक को यह प्रोजेक्ट बताया तो उन्हें चेक मिला गूगल के नाम से और गूगल महाराज के क्या कहने !
याहू बनाया था गलिवार्स ट्रेवलस के प्रसिद्ध लेखक जोनाथन स्विफ्ट ने उन जीवों के लिए जो देखने में अरूचिकर हैं और जिन्हें मुश्किल से मनुष्य कहा जा सकता था। याहू के प्रवर्तकों जेरी यांग और डेविड फिलो का मानना था की वे याहू हैं!
ह्यूलेट पैकर्ड के संस्थापक बिल ह्यूलेट और डेव पैकर्ड ने सिक्का उछाल कर इस बात का निर्णय कर लिया की कम्पनी का नाम ह्यूलेट पैकर्ड हो या पैकर्ड ह्यूलेट .और कौन जीता यह तो पता ही है!
बुधवार, फ़रवरी 27, 2008
शतक ,दोहरा शतक और अर्द्ध शतक
सोचती हूँ ऐसा क्या है की औरों के शतक , दुहरे शतक बन गए और अपना अर्ध शतक भी न बना.बाक़ी खेल रहे हैं एक दिवसीय मैच और मैं अभी भी वही पुराने लहजे में टेस्ट मैच! और टेस्ट मैच में भी कुछ श्रीकांत की तरह बैटिंग कर रहे है और मैं हूँ गावस्करनुमा या फ़िर रवि शास्त्रीनुमा। गावस्कर ने कमसेकम शतक तो बनाए।
कछुआ चाल है ,खरामा खरामा बढ़ रही है। बीच बीच में अपने कवच के अन्दर घुस कर फ़िर हौले से बाहर कि दुनिया देखी । आगे पीछे कोई ख़तरा तो नहीं और फिर बढे आगे।
सोचिये मैंने पहली पोस्ट लिखी थी फरवरी २००६ में .तब से दो साल के अंतराल पर लिख पायी कुल ४० पोस्ट्स । सोचती हूँ क्या कारण है।
समयाभाव तो सबसे पहले नंबर पर है ।फुरसत कम , काम ज्यादा ...किसी काम को न करने का सबसे सस्ता टिकाऊ बहाना!! लेकिन समयाभाव के साथ साथ अभाव है उत्प्रेणन का.एक जूनून का कि न सिर्फ़ कुछ लिखूं बल्कि बहुत उत्कृष्ट लिखूं। आलस का घर है यह मन मेरा.कौन इतनी मेहनत करे ,इस बारे में सोचने का कि अब किसा विषय पर लिखा जाए ,एक रूपरेखा तैयार की जाए और फ़िर टंकण .तौबा करो.वैसे भी मुझे कौन सा गोल्ड मेडल लाना है चिट्ठा लेखन में। और यह जो सब सर्वश्रेष्ट चिट्ठे आदि के अभियान है.....उहूँ यहाँ भी वही ऑफिस जैसी रेटरेस .न बाबा मुझे नही पसंद .अपना चिट्ठा बनाया अपनी रफ़्तार से लिखेंगे। नायाब तरीके है अपनी अकर्मण्यता को उचित ठहराने के लिए ।
सृजनात्मक आलस भी है.बुद्धि लगानी पड़ेगी सोचने में कि क्या लिखें कैसे लिखें । रचनात्मकता की अंतर्जात सीमाएं है जिससे बंधी हूँ कि बस इतना ही सोच सकती हूँ, इतना ही लिख सकती हूँ.अभिव्यक्ति की परिधि है छोटी और कई बार विचार ,कल्पना और भाव को व्यक्त करने में असमर्थ हो जाती हूँ .ऐसे समय न सिर्फ़ अपने सीमित भाषा ज्ञान पर क्रोध आता है बल्कि असहाय महसूस करती हूँ। विषय असीमित हैं,रुचियाँ भी कम नहीं ,ज्ञान का विस्तार है शायद औरों की अपेक्षा कम पर फ़िर भी कामलायक,उम्र के चालीस से ज्यादा बसंत देखने के बाद अनुभव भी विविध है.फ़िर क्या हो सकता है?
चिट्ठा जगत में आए दो साल हो गए अभी तक टिकी हूँ शायद यह भी एक उपलब्धि ही है.दो साल पूरे करने पर "थ्री चियर्स "!!!
गुरुवार, फ़रवरी 21, 2008
गुमसुम
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MARLOW.: .....An impudent fellow may counterfeit modesty; but I'll be hanged if a modest man can ever counterfeit impudence.
("She Stoops to Conquer" Oliver Goldsmith )
हौले से परदा हटाकर ,वो झांकती है । ललचाता है उसका भी मन। हाय कैसे वह झट से जो मन में आता है बोल देती है। क्या विश्वास से चलती है.ज़रा भी हिचकिचाहट नही, है उसे न कोई संकोच। फट जाकर बात कर लेती है।
कैसे फुर्ती से उसने अपनी टीचर को जवाब दे दिया.क्या दोस्ताना तरीके से वह बात करती है अपने बास से.आँखें बंद कर वो सोचने लगी। पर तब भी नहीं ला पायी वो तफ्री वाला अंदाज़ .तफ्री में भी तो है.... त और फ्री !! वो है की अपने सपनों में भी सिमटी ,सकुचाती।
दिल के एक छोटे से कोने में बैठती है उसकी यह परछाई । कभी कभी बाहर झांक कर हिम्मत करना चाहती है पर तुरंत फिर वही अपना सीप .उसे लगता है पर्दा हटाएगी तो कयामत हो जाएगी.लोग कुछ कहेंगे तो उसका जवाब दे पाएगी क्या .अपने तारीफों के पुल बांधना ...न बाबा .काम करो और आगे बढो । कैसे कहे वह अपने मुंह से की उसने कितना काम कर दिया। नुकसान तो बहुत है न कहने से .घर में भी और आफिस में भी.पर यह परदे के पीछे से झांकती लड़की बाहर ही नहीं आती।
आई तो थी एक दो बार .पर दो वाक्य से ज़्यादा बोलने पर लाल होते गाल उसे वापस भेज देते. हाँ काम की बात करनी हो तो उसका जवाब नहीं.क्या क्या नही जानती। पर" स्माल टोक " . उफ़, क्या मुसीबत है .
सपने में तो कुछ भी सोचा जा सकता है। पर वहाँ पर भी क्यों लगता है उसे की यह उसके बस का नहीं .कुछ तो सलीका होगा की पर्दा हटा सके थोडा सा ही सही .
गुरुवार, फ़रवरी 07, 2008
मुलाकात मकबूल फिदा हुसैन से
सिर पर हाथ फेरा.मैंने भी शुक्रिया किया और सूरज कुंड के उस मेले का यह अमोल तोहफा संभाल कर रख लिया.कहना न होगा वह शाल पहनने के काम तो फिर न आया .पर यह घटना सुनाते समय और वह क्षणिक मुलाक़ात को याद करने के लिए में बडे बाल सुलभ उत्साह से उसे दिखाती हूँ ।
सोमवार, जनवरी 21, 2008
संदेस
कुछ ख्वाबों को भेजा है
पास तुम्हारे।
रात के अंधेरे में
चाँद पाएगा एकाकी तुम्हें
रखेगा हौले से ख्वाब मेरे
तुम्हारी पलकों पर
और जवाब में लाएगा
वो तुम्हारी सिहरन
हलकी सी मुस्कान की
वो मिसरी
नमी तुम्हारे आँखों
के कोरों की
मैं चाँद को निहारती
चाँदनी को हथेली में मलती
तुम्हारे सपनों को ढालूंगी
अपनी आँखों में।
शनिवार, दिसंबर 29, 2007
लखनऊ हम पर फ़िदा-2
'लखनऊ हम पर फ़िदा, और हम फिदाए लख्ननऊ
क्या है ताकत आसमां की, जो छुडाये लखनऊ.'
मुझे याद है युनिवर्सिटी के ज़माने में जब हमें होली या विदाई समारोह में 'टाइटिल' देने होते थे तो शेर-ओ-शायरी का बडा सहारा रहता था.आखिर इस शहर की रवायत ही ऐसी है.
महबूबा को खत लिखा तो इस उम्मीद के साथ
'सियाही आँख की लेकर मैं नामा तुमको लिखता हूँ
कि तुम नामे को देखो और तुम्हं देखें मेरी आँखें'
लेकिन इतना करने के बाद भी उधर से कोई आवाज़ दे ऐसा ज़रूरी नहीं .
'नामावर तू ही बता,तूने तो देखे होंगे
कैसे होते हैं वह खत ,जिनका जवाब आता है.'
हाय रे किस्मत,वो पढते भी हैं और आँखें भी चुराते हैं.
'खत ग़ैर का पढते थे ,जो टोका तो वो बोले
अखबार का पर्चा है खबर देख रहे हैं '
याद आया वो कॉलेज के दिन जब छुपछुप कर उन्हीं पर नज़रें रहती थीं ,पर जैसे ही वो इधर देखते आँखें आसमान पर या किताबों पर गड जातीं ?
यह उम्मीद भी बेमिसाल है
' बरसों से कानों पे है क़लम इस उम्मीद पर
लिखवाएं मुझसे खत ,मेरे खत के जवाब में '
लेकिन जब खत पडा जाता है तब के लिये हिदायतें हैं
'नामे को पढना मेरे,ज़रा देखभाल के,
कागज़ पर रख दिया है,कलेजा निकाल के'
बुधवार, दिसंबर 19, 2007
लखनऊ हम पर फ़िदा
गोया पहुँचे यहाँ की प्रसिध्द किताबों की दुकान युनिवर्सल बुकसेलर्स.इसकी कई शाखाएं हैं . अलीगंज के कपूरथला कॉम्प्लेक्स में मिली यहाँ के मशहूर लेखक योगेश प्रवीण की लिखी किताबें . अभी तो पढना शुरू किया है.चिकन कारी के बारे में,बेगम अख्तर की गायकी के बारे में,कबाब ,रेख्ती, ठुमरी ....बहुत कुछ. पता चल रहा कि संजय दत्त की नानी जद्दन बाई इसी शहर की थीं.अब बस करना यह है कि एक कैमरा लो और जो पढती जा रही हूँ ,उस जगह जा कर कैमरे में कैद करो.खयाल नेक है खयाली पुलाव न बन जाए .
गुरुवार, दिसंबर 13, 2007
चीं चीं चैं चैं
बेटी को श्यामक दावर के डांस क्लास में भरती का दिया है.अपनी भी ड्यूटी लगी है.ले जाओ ,एक घंटे बैठी रहो . जब वैसे ही कितनी बातें करती हूँ खुद से तो सोचिये एक घंटे बैठे ठाले क्या क्या सोच डाला .मुझे बहुत अच्छी लगती हैं लडकियां .कितनी चुलबुली हैं .कितनी उत्साहित हैं .कितनी कॉनफिडेंट . सच यह उम्र होती ही ...चटपट चटपट बातें करने की,खिलखिलाने की, गिगल करने की .अरे वह चुपचाप क्यों खडी है.चलो जाओ दोस्त बनाओ, हंसी पर रोक मत लगाओ .बोलने पर बंदिश नहीं .मुस्कराहट भी कितनी नाज़ुक सी है सबकी .शायद मिल्स एंड बून पडती होंगी .पर यह क्या एक के हाथ में सिडनी शेलडन .आजकल के बच्चे ज़्यादा जल्दी बडे हो जाते हैं .
डांस इंसट्रक्टर आया .अनजाने में सब थोडा इतरा रही हैं . कोई कट कर अलग से कुछ कहने लगी .एक फुसफुसाहट हुई " हे कूल डयूड मैन.हीस गाट एन ऐटिटयूड "! और फिर कनखियों से इधर उधर देख कर गिगल .
और कपडे ...स्टाइलिश. वह हल्की गुलाबी केपरी क्या जंच रही है . स्कर्ट अच्छी है पर ज़रा छोटी .जैसे जैसे उम्र बडती है स्कर्ट की लम्बाई भी बडती है.याद आया कभी मम्मी ने मेरी शॉर्ट स्कर्ट को लंबा कर दिया और मैं कितना नाराज़ हुई थी उनसे.क्या मस्ती है और बेफिक्री भी.
'ओह कम ऑन यार .डोन्ट बी अ स्पोइल स्पोर्ट .वी'ल हेव फन'
'बट माय माँ'स गोना मर्डर भी इफ आई'म लेट .'
कभी हम भी तो ऐसे ही थे.क्या इनको विशवास होगा अगर मैं बताऊँ कि यह सब एक 'डेजा वू ' की तरह है. यह सफेद बालों वाली आंटी भी ऐसी ही भाषा बोलती थीं .
ओहो मुझे भी जॉइन कर लेना था.कुछ नहीं तो कायदे से हाथ पैर मारना ही आ जाता .एक अपनी ही उम्र के दंपति को क्लास में जाते देखा .गम हुआ ...मैं भी तो सीख सकती थी.अरे कहाँ ...अकेले क्या मज़ा .पतिदेव साथ होते. हाँ लौट कर आएंगे तो ज़रूर सीखूँगी .वैसे हम दोनों ही के पास 'टू लेफ्ट फीट ' हैं. पर उससे क्या. नाचना है तो नाचेंगे ही. बच्चे बोलते थे हम आप लोगों को 'डिस ओन ' कर देंगे अगर आप लोग नाचने पहुँचे .'डिसओन 'करने में बिल्कुल अव्वल.जब देखो तब .आपलोग मेरे दोस्तों के सामने ऐसे कपडे पहन कर जाओगे ....'डिस ओन ' की धमकी .हाथ मत पकडना बाज़ार में...हम लोग डिस.......... हल्की मुस्कान आ गयी .नज़र एक ओर गयी तो देखा एक लडकी मुझे घूर रही थी .मैं सकपका गयी . सठिया गई ?
ड्रेस डिज़ाइनर आ गई .सरगर्मियां बढ गईं.रंग के चुनाव ,डिज़ाइन,क्या नहीं है ....सोचने को .माहौल गर्म हो गया .डिसकशन तू तू मैं मैं बनने जा रहा है .'शी इस सच अ बि....
'हेलो ,क्या कहा'
''कुछ नहीं !'
चलो यार .हम लोग सर से बात करते हैं.सम पीपल अरे एक्टिंग टू प्राइसी'
सर भी आ गए.डांस इंसट्रक्टर .....ताली बजा कर उसने सबका ध्यान खींचा.मैं सोचती उसकी ज़रूरत ही नहीं थी .आधी तो वैसे ही उसे देख रही थीं.कैसे उसने तुरन्त कमान अपने हाथ में ले ली.बहुत खूब.सारी चीं चीं चैं चैं बन्द. चलो मेरे भी ने का समय हुआ.अब अन्दर की चीं चीं चैं चैं किसी और विषय पर.
शुक्रवार, दिसंबर 07, 2007
रांग नम्बर
"हैलो!"
"हैलो.....?"
"अरे भाई आगे भी बोलिये !किससे बात करनी है?"
"जी आपसे"
"मुझसे?"
"जी."
"अरे कुछ नाम पता होगा ."
"जी आप ही का नाम है.
"अच्छा ....?"
"मेरे नाम वाले तो बहुतेरे हैं.शायद नम्बर गलत लग गया..आपका."
"नहीं.अबकी सही लगा ."
"कैसे पता?"
"आप तक जो पहुँच गया"
"तो क्या काम है मुझसे?"
"जी,आपका नाम जानना था..."
"अभी तक तो पता था ."
"पर अब याद नहीं."
"बडी कमज़ोर याददाश्त है.जब याद आ जाए तब दुबारा फोन कर लीजियगा"
और मैंने फोन रख दिया .
"हैलो !"
हैलो!"
"हैलो.....?"
आप कहाँ से बोल रही हैं?"
"आपने कहाँ फोन किया ?"
"आप कहाँ से बोल रही हैं?(अब की आवाज़ ज़रा ज़ोर देकर आई)
"आपने कहाँ फोन किया ?"(मैंने भी आवाज़ कडक की)
"लोग बताते ही नहीं कहाँ से बोल रहे हैं"
फोन कट जाता है.
मोबाइल पर मोबाइल से फोन आया ...फिर भी
"हैलो !"
"हैलो!"
"संजय से बात करनी है?"
"यहाँ कोई संजय नहीं है . नंबर चेक कर लीजिये ."
"आपका क्या नम्बर है?"
"आपने जो मिलाया है."
"पर आपका नम्बर क्या है?"
"जो भी है कम से कम संजय का तो नहीं है."
"आप उससे बात करवा सकती हैं?"
"ज़रूर करवा देती ,लेकिन उसका पता ठिकाना नहीं मालूम."
"नम्बर तो यही था ......?आपका नम्बर क्या है ?"
"याद नहीं "
मैं ही फोन काट देती हूँ.
शनिवार, सितंबर 29, 2007
नाम से तेरे आवाज़ मैं न दूँगा
मंगलवार, सितंबर 25, 2007
बेटी
शनिवार, सितंबर 01, 2007
शुक्रवार, जुलाई 27, 2007
साया
कदमों के निशां तुम्हारे मिटाते चल रहे हैं हम
पीछे मुडकर न देखना कभी जो राह छोड दी तुमने
तुम्हारे माज़ी को दामन में समेटते चल रहे हैं हम.
तुम न डरना किन्हीं काले सायों से कभी
रुसवाई को तुमसे जुदा करते चल रहे हैं हम
गुरुवार, जुलाई 12, 2007
जिन्दा बसीत खूब बसीत
डर ,आशंकाओं पर एक कौतूहल लिये हुए हम काबुल के लिये रवाना हुए.हवाई जहाज तो पूरा भरा हआ है . देखकर आश्चर्य हुआ कि इतनी तादाद भारतीय में वहाँ जा रहें हैं .बहुत से अफगानी भी थे.फिर काबुलीवाला याद आया और याद आया कि हमारा तो बहुत पुराना रिश्ता है . अमिताभ बच्चन और श्रीदेवी की खुदा गवाह का ज़िक्र काबुल में कइ बार किया गया. काबुल हवाई अड्डा छोटा सा है . दिल्ली से करीब पौने दो घंटे का सफर है. काफी सामान है हमारे पास कुल २३ अदद .संभालना मुश्किल पर मदद के लिये लोग हैं.सामान की कौन देखभाल करे.हम तो आँखें फाडे देख रहे थे एक अलग दुनिया को.हिन्दी या कहिये उर्दु समझने वालों की कमी नहीं.हिन्दी बोलने वालों का काम आराम से चल सकता है. पर फ़ि्ज़ा में एक सहमापन है.लगता है खुल कर हंसेगे तो कोई गोली लग जाएगीागर जिधर अपनी नज़र घुमाइये और ए के ४७ के दर्शन हों तो हिसी तो दूर तक नहीं फटकती .हमने तो ए के ४७ का नाम संजय दत्त के ही संदर्भ में ही सुना था .अब देखा वो क्या चीज़ है जिसके लिये संजय दत्त अदालत का रास्ता नाप रहे हैं .एक फोटो भी खिचवा लिया उसके साथ पर वो आगे की किश्त है. भारत से जाने पर दो चीज़ें तुरन्त नज़र आती हैं.रास्ता में कम से लोग .यहाँ की भीड नहीं दिखाई पडती.और यहाँ के रंग नहीं हैं वहाँ.सडक पर औरतें न के बराबर हैं और जीवन में रंग तो हमीं से होता है.हर जगह बदूकें दिखना आम बात है.पुनःनिमार्ण का काम चल रहा है .आयातित कारें हैं इसलिय बडी कारें खूब दिखती हैं.हर घर हर भवन की दीवारें ऊँची ऊँची हैं.आभास होता है एक बन्द से परिवेश का.हमारे घर पर पहरा है सिपाहियों का.खूब हस्त खाने खैरत हस्ती? हालचाल कुशल मंगल पूछकर हम सकुशल अपने घर में घुस गए .बाहर के कैदखाने से दूर अपनी दुनिया बसाने.

