मंगलवार, सितंबर 03, 2013

और किसके नाम हो सकता था यह 100वा चिट्ठा !

2006  से इस ब्लॉग की शुरुआत हुई थी।हिन्दी ब्लॉग जगत में हरकत होनी तब शुरू ई हुई थी।  कुछ चंद लोग थे ,एक परिवार सा लगता था. नारद मुनि का साथ था अब तो महासागर है, कुछ पुराने अभी भी चले आ रहे है ,बहुत रास्ते में रुक गए , कुछ बेतहाशा दौड़ते जा रहे हैं। मेरा भी यह प्रयास  कभी तेज़ कभी बिलकुल ही अनमना  सा    चलता जा  रहा  है। रुक जाता है ,ठहरता है ,पर पूर्णविराम अभी तक नहीं लगा । स्थिति वैसे पूर्ण विराम जैसी ही है।   अब तक सिर्फ 99 चिट्ठे लिखे,वह भी बेतरतीब। कभी कुछ अच्छा लगा तो लिख दिया,कभी कुछ संजो कर रखने का दिल करा तो यहाँ सुरक्षित रख दिया. गाहे बगाहे कुछ याद आया तो यहाँ डाल  दिया। अर्धशतक ही पूरा हुआ काफी देर में। इसे यहाँ देखें  http://poonammisra.blogspot.in/2008/02/blog-post_27.html
 सोचा था सौंवीं पोस्ट एक ख़ास मौके पर लिखूँगी। पिछ्ले साल अपने मम्मी पापा की शादी की पचासवीं वर्षगाँठ पर।  आयी चली गयी। नए साल के इरादों की तरह ,इरादा  तो पुख्ता था  ,बस यहाँ चिट्ठे में तब्दील नहीं हो पाया।
इस बार अपने जन्मदिन पर कुछ दिन माँ पापा के साथ बिताये.लम्बे अरसे के बाद ४-५ दिन साथ रहने का मौक़ा मिला. गर्मी के बाद बरसात होने पर जैसे फूलों में आयी चमक, हरियाली और हरी, सूखे गले से गट गट नीचे उतरता पानी ,उपवास  के बाद नमक का स्वाद , दिनों से अपने आप को संभालता  नदी से टूटता बाँध।
दोपहर में मम्मी के रुपहले हो चले बालों को सहलाते , उनसे बातें करते।  पापा को टीवी के सामने छोड़ ,गर्ल्स टॉक !चाय की चुस्की और हर चुस्की से ताज़ा होती उनकी बेहिसाब चाय पीने की पुरानी  आदत। अब सुनने में  कठिनाई होती है ,तो एक डायरी साथ में। जो उनको पकड़ में नहीं आता वो उसमें लिखना। जाने से पहले उसके पन्ने पलटे।  बचपन में उस समय पत्थर की फिसलती फर्श पर लेट कर हम दो बहनों को अ ,आ और a ,b c की शुरुआत  कराने से लेकर उनकी नवीनतम ख्वाहिश। चाहती हूँ तुम्हें टीवी पर देखना ! गुनगुनाते रहती हैं  लोकगीत।  राम विवाह के  स्नेहास्क्त किस्से बहुत ही तन्मयता से गाती तो नहीं पर बड़े भाव से उन्हें बाचती हैं।  जैसे वह सामने ही हों।  बहुत प्यारे हैं उन्हें लोकगीत खासतौर से जनक की राम की खातिरदारी।  आवाज़ में वो दम नहीं , शब्द भी भूल चुकीं हैं ,पर फिर भी रिकोर्ड कर लिया उनका गाना……निहुरे निहुरे परसें जनकजी,धोतिया मईल हो जाई की हाँ जी ;धोतिया  तो हमरे धोबी कर धीन्हो , ऐसे सजन कहाँ पाएं की हाँ जी। कभी फिर ऐसा मौक़ा मिला तो उनसे सारे गीत गवाऊंगी । टेप कर लूंगी। उनका अंदाज़ अलग है। बचपन में क्लब जाने से ,ब्रिज और बैडमिन्टन के शौक को छोड़कर एक बड़े परिवार को संभालना ,रसोई में न जाने वाली भाई की दुलारी  बहन ,शादी  के बाद सास की भी प्यारी हो गयी।  ऐसी रसोई की अब तक कोई और खाने का स्वाद हम लोगों पर नहीं चढ़ा। ऐसा घर कि  कोई दुविधा होने पर आँख बंद कर बस माँ का ध्यान करो ,उनका घर रखने का सलीका याद करना भर रास्ता सुझा देता है । याद दिलाया कैसे उन्होंने बचपन में फ्रोकें सिलीं थीं। सबका नाम परियों  वाली फ़्रोक ,रोस (गुलाब) वाली फ्रोक , बुनाई की सिलाइयों में जाड़े के धूप की गर्मी को बाँध कर रखना। बातें क्या ख़तम होंगी? न यादें न बातें !अब जब सब बच्चों का घर बस गया है ,सब के अपने किस्से,अपनी जिम्मेदारियाँ ,मिलना जुलना कम ,सुनायी देना कम ,तो यह सब बात करके ही पिछले दिनों से अविच्छेदता  बनी रहती है। एक निरंतरता का एहसास होता है. उन्हें भी  मुझे भी। पापा का उनके लिए समर्पित गीत, 'कहीं एक मासूम नाज़ुक सी लड़की ,बहुत खूबसूरत ,मगर सांवली सी ……'
   पापा भी आ गए।" मम्मी बिटिया की बातें चलती ही जा रही हैं !अरे उसको कुछ आराम कर लेने दो। घर आयी है ,सोने दो , काम मत करवाना , पैर दबवाओगी  ज़रूर।"  "अरे यह खुद ही दबा रही है ,मैंने नहीं कहा ", मम्मी कहती हैं। माँ  के पैर दबाने में ही मेरे जीवन की सार्थकता है और दबवाने में उनकी। सुख का चरमोत्कर्ष !  पापा मितव्ययी ,अंतर्मुखी। सो हम  सब के लिए प्यार भी अन्दर की गहराई तक।  हमेशा अभिव्यक्त करने वालों से कम नहीं , शायद और भी भावुक और भी पैशनेट। पर शब्दों में नहीं बाँधा। शब्दों की असमर्थता है। उतनी गहराई जो सिर्फ वही महसूस कर सकते हों या उस प्यार को  पाने वाले । एक छवि है उनकी। …दफ़्तर से आकर ,चाय पीकर सीधे किचन गार्डन  में चले जाना। या फिर सवेरे एक घंटे तक अखबार पढ़ना। नेशनल पैनासोनिक पर  बेगम अख्तर को "ऐ मुहब्बत तेरे अंजाम पे  रोना आया" का टेप चलता ही जाता ,या फिर एक ही टीवी जिस पर दूरदर्शन के शास्त्रीय संगीत के सारे नृत्य सारे संगीत के प्रोग्राम देखते। टीवी पर उनका एकाधिकार। पर हम साथ देखते क्रिकेट,चित्रहार और विम्बलडन। बनारस की मिट्टी है तो शास्त्रीय संगीत से प्यार है।खिलाड़ी हैं तो वोलीबॉल था, कुश्ती थी।   होली में मम्मी की भाभी के साथ उनकी होली ख़ास होती थी। याद है मामी अलग से इंतज़ार करतीं अपने इस सबसे छोटे और उम्र में बहुत छोटे बेटे जैसे नंदोई का. वह भी अलग अलग तरीकों से उन्हें चुपके  से रंग लगाने की तैयारी  करते। अनुशासन कड़ा  था ,पर जोर से आवाज़ नहीं उठती।
      फिर भी  बात करते करते  भावुक हो गए। बोले तुम लोगों को बड़े ही नहीं होना चाहिए था।चारों का बचपन कितना अच्छा था ! लैब में माइक्रोस्कोप से देखते हुए उनकी एक फोटो है , बहुत प्यारा ।  लम्बे ,गोरे ,हैंडसम। कैप पहन जब वह मुझे यूनिवर्सिटी छोड़ने जाते तो साथ की लडकियां  क्या अपने उम्र के लड़कों को छोड़ पापा को देखतीं।  प्यार का प्रदर्शन उन्हें पसंद नहीं। पर प्यार प्रदर्शन और शब्दों का मोहताज नहीं।

सौंवाँ  चिट्ठा  अपने माता पिता के  लिए , जिनके त्याग ,परिश्रम ,प्यार ,हुनर ,शख्सियत  ,शौक , मूल्य सबकुछ  मेरे लिए प्रेरणा स्रोत ,मेरे जीवन का सहारा हैं।


शुक्रवार, मई 24, 2013

कुछ तुम सीखो ,कुछ हम सीखें

कुछ दिन पहले एक मौक़ा मिला . इलाहाबाद के एक प्रतिष्ठित स्कूल में भौतिक विज्ञान के शिक्षक पद के लिए इंटरव्यू  था. एक पद कक्षा दस के लिए और एक पद ,कक्षा ११ और 1२ के लए खाली था. साक्षात्कार   के लिए ४ -४  अभ्यर्थी .सभी भौतिक विज्ञान में स्नातकोत्तर थे. अनेक सवाल पूछे गये. शुरुआत हुई ,१५ तक किसी मनचाहे विषय परपढ़ाने  का एक छोटा डेमोंस्त्रेशन से. पढ़ाने  का कोई भी तरीका वह अपना सकते थे , हर तरह की मदद स्कूल उपलब्ध करा देता . पर अफसोस , ४ में से किसी ने भी ऐसे तरीका नहीं अपनाया जिससे विषय रूचिकर हो जाए .एक उम्मीदवार ,जो कक्षा बारह को पढ़ाते  भी हैं ,ने वही पुराने तरीके से , अपनी प्रदर्शन शुरू किया. उनका विषय था न्यूटन के  तीन नियम . उन्होंने ने घिसे पिटे तरीके से बिना ब्लेक्बोर्ड से सर उठाये पढ़ाना शुरू कर दिया . हम ऊंघने लग गए . बच्चों को, जिनके लिए सब बिलकुल नया  होगा , क्या समझ में  आता होगा . बड़ा खेद हुआ कि  विज्ञान की पढ़ाई क्या बिना उदाहरण दिए , सिर्फ समीकरण लिखकर हो सकती है ?
एक निवेदक से पूछा गया की आप बाहर देखें और कोई भी एक ऐसी चीज़ ,क्रिया बताएं जिसमें भौतिकी का कोई भी नियम लग रहा है. उनका जवाब था ,उनको ऐसा कुछ नहीं दिख रहा  . हाथ उठाने से लेकर दरवाज़ा खोलने,सूरज के प्रकाश की गति से लेकर ,कण कण के ब्रॊनियन मोशन ,कुछ भी कहा जा सकता था . यह क्या विज्ञान पढाएंगे ? और जो पढाएंगे तो उसमें कितने विद्यार्थियों में रुचि उत्पन्न होगी और कितनों  को मूल नियमों की महत्ता समझ आयेगी .उनका ज्ञान सिर्फ रट कर,इम्तिहान  पास करने भर तक सिमट जाएगा ?कोई बच्चा सवेरे शीशे में अपना प्रतिबिम्ब देखेगा और उत्साह से बोलेगा कि  आज यही तो हमें पढ़ाया गया था ? रात आसमान में तारे देखकर कोई विद्यार्थी सवेरे आकर  पूछे की तारों का रहस्य क्या है? इस  अनंत आकाश की सीमाएं क्या हैं? और अगर पूछेगा तो क्या कोई शिक्षक उसे उत्तर देंगे , कौतूहल को बढ़ावा देंगे? क्या समझाने की बजाए उससे बोलेंगे ,आओ हम एक साथ मिलकर इसका पता लगायें .एक रात सब बाहर आसमान के नीचे बैठें और ऊपर चलते हुए तारों के साथ दोस्ती करें ?
  एक और  मोहतर्मा से हाल  में रूस में हुए उल्का पात की जानकारी चाही ,तो वह इस घटना से अनभिज्ञ  थीं . पर यह सिर्फ विज्ञान के अध्यापकों  की समस्या नहीं है।अन्य विषयों के लिए आये पदाभिलाषी भी इसी तरह से अपने विषय वस्तु  को सामन्य जनजीवन से जोड़ने में असमर्थ दिखे. सिर्फ किताब से देखते हुए पढ़ाना , ब्लेक्बोर्ड एक दो महत्त्वपूर्ण तथ्य लिख देना भर पढ़ाना नहीं होता .
अगर शिक्षक अपने काम के प्रति इमानदार है तो वह कोशिश  करेगा की उसके कक्षा का कम से कम एक विद्यार्थी बाद में कह सके की फलां अध्यापक की वजह से उसमें  इस विषय को आगे पढ़ने की लालसा जागी ,या उसकी अरूचि रुचि में बदल गयी .   

मंगलवार, मई 14, 2013

चिकित्सा के नए आयाम

कल एक पत्रिका में पढ़ रही थी कि  दुनिया में तीन देशों को छोड़ बाकी जगह पोलियो मुक्त हो गए हैं  .  य़ह तीन देश हैं अफगानिस्तान ,पाकिस्तान  और नाइजीरिया . अपने स्कूल के दिनों की याद आई .हमारे साथ थी तस्नीम थी जिसका पैर  पोलियो ग्रस्त  होने के कारण बंधा रहता था. पहले काफी बच्चों को देखा जो पोलियो का शिकार हो गए थे।यह जानकार खुशी हुई  की इस बीमारी से दुनिया को निदान मिल गया है.वैसे ही जैसे चेचक से. यह भी चिकित्सा विज्ञान का कमाल है ,नहीं तो कितने बच्चे इसकी चपेट में आ जाते  थे .
इसी तरह चिकित्सा का हर क्षेत्र आधुनिक दवाइयों ,तरीकों,शोध और  टेक्नोलोजी  से अधिक सक्षम,अधिक प्रभावशाली हो गया है.
          आधुनिक चिकित्सा वाकई में वरदान है. टेक्नोलोजी के ज़माने में आधुनिक चिकित्सा  प्रणाली इसका भरपूर उपयोग करती है. बिना आपरेशन के दिल के मरीजों को ठीक करना हो,या जटिल प्रसव  के दौरान माँ -बच्चे दोनों की जीवन की रक्षा .सब कुछ आज संभव है. यहाँ तक की कई निराश दम्पतियों को बच्चों का सुख अगर मिला है तो वह भी आधुनिक चिकित्सा के प्रयासों द्वारा. सरोगेट गर्भ की प्रणाली एक वरदान है.
              आज कल जो बहुत विलक्षण तकनीक मेडिकल विज्ञानं में है वह है स्टेम सेल या मूल कोशिका की . स्टेम सेल ,ने मेडिकल जगत में एक रोमांच पैदा किया है. कई  बीमारियाँ जिनका  इलाज संभव नहीं था ,वह अब साध्य हैं . कैंसर और रक्त -संबन्धित कई बीमारियाँ का इलाज हो सकता है .स्टेम सेल्स,शरीर की वह कोशिकाएं हैं ,जो विभाजित हो कर बढ़ती जाती हैं .यह शरीर के टिशू की पूर्ती कर सकते हैं  और अंगों की मरम्मत करने की  क्षमता रखते हैं। कुछ बीमारियों के इलाज के लिए ,यह रोगी के अपने शरीर से लिए जा सकते हैं,और कुछ के लिए दूसरे व्यक्ति के भी इस्तेमाल कर सकते हैं । अब तो स्टेम सेल बैंक भी हैं  और बच्चे के पैदा होने के  बाद ,उसके नाभि रज्जु यानी अम्बिलिकल कोर्ड से यह कोशिकाएं निकाल कर रख ली जाती हैं .थैलेसिमिया ,लुकेमिया  और यहाँ तक की कुछ आनुवंशिक विकारों का भी इलाज हो सकता है .
           जब तक हमें स्वयम कष्ट से न गुज़रना पड़े हम इन तरीकों और तकनीकों पर उतना ध्यान नहीं देते  ,पर मुझे  http://www.indiblogger.in/topic.php?topic=77 के "How Modern Healthcare touches life "  वाली कड़ी ने इसके बारे में सोचने पर विवश कर दिया और  इसके बारे में अधिक जानकारी , http://www.apollohospitals.com/cutting-edge.php. पर मिली . अपोलो हास्पिटल भारत में अन्तराष्ट्रीय स्तर की चिकित्सा सेवाएं और  नवीन प्रक्रियाएं लाने के अगवा हैं .
           सेहत खुदा की सबसे बड़ी नियामत है . अगर वह नहीं तो दुनिया के बाकी सुख धूल  बराबर हो जाते हैं . ऐसे में अपना  ख्याल रखना और स्वस्थ रहना ज़रूरी है. सेहतमंद व्यक्ति से खुशाल समाज बनता  है .देश के बच्चे स्वस्थ हों , महिलाएं निरोग रहे ,पुरूष निरोग रहे ,यह हमारी चिकित्सा बिरादरी का ध्येय होना चाहिए और इसके लियी आधुनिक चिकित्सा   प्रणालियाँ अपनाने और खोजने के सतत  प्रयास होने चाहिये. न सिर्फ हम निरोग दीर्घायु होंगे ,हमारी उत्पादकता बढ़ेगी और अन्तत: देश खुशहाल ,समृद्ध होगा .

बुधवार, मई 08, 2013

मायावी सफ़र

इस बार एक हफ्ते  में जो सफ़र किया वह  दिलचस्प था।  पांच दिन में ग्वालियार-आगरा -दिल्ली  जाना था और फिर वापस इलाहाबद। पर कुछ छोटी छोटी घटनाएं ऐसी हुईं  जो दिल को छू गईं। पिछले  चिट्ठे में मेट्रो के सुखद अनुभव का ज़िक्र था। एक और दिलचस्प मुलाक़ात हुई आगरा से दिल्ली जाते हुए।
आगरा से सवेरे ट्रेन पकड़ी जबलपुर एक्सप्रेस।  अपने फर्स्ट क्लास वाले कूपे में पहुंचे तो देखा एक अधेड़ उम्र की महिला को एक युवक बड़े आदर से बैठा रहा था औए निकलते  हुए 'टेक केर' बोल कर उतर गया । सामान  वगैरह रखकर,अपनी सीट  पर बैठे  तो एक नीली आँखों वाली,गोरी ,करीब साठ के आसपास की एक चुस्तदुरुस्त  महिला से नज़र मिली।  एक हल्की सी मुस्कान से मैंने उनको हेलो किया और अपना सामान लगाने में व्यस्त हो गयी।  पहले पड़े बिस्तरे को उठाने जब रेलवे  का कर्मचारी आया,तो हमने उससे दो साफ़  बिस्तर  की सिफारिश की।
"भैया,दो बिस्तर दे देजीये।  "
"दो नहीं तीन !"पीछे से आवाज़ आयी।
 तीन कहने के लहजे ने हमें पीछे मुड़कर देखने पर मजबूर कर दिया।  हिन्दी तो थी पर भारत की नहीं।   हिन्दी में विदेशी ज़बान का स्वाद  था।  बैठकर फिर ध्यान से देखा।  हो सकता है पंजाब की हों और बाहर रह रहीं हों।   थोड़ा और गौर किया तो  नाक नक्श  विदेशी ही लगे,हाँ हिन्दुस्तान की गर्मी में तपे  हुए।
        इतने में उन्हीं ने कौतूहल से पूछा,आप क्या भारतीय हैं या विदेशी। मैं तो सकपका गई। आजतक  मेरे भारतीय होने पर किसी ने शक नहीं किया था। आश्चर्य  से उन्हें देखा तो उन्होंने सफाई देते हुए कहा,आप की हेयर स्टील से लगा आप भारतीय नहीं है।  खैर इस वाक्य से बातचीन के दरवाज़े खुल गये।  मैंने उनसे यही सवाल किया कि आप देखने में तो विदेशी मूल की हैं,पर हिन्दी साफ़ सुथरी बोलती हैं। पता चला,वह फिनलेंड की रहने वाली हैं पर पिछले कोई सत्तरह साल से आगरा में रहती हैं। वहां माया नाम का होटल चलाती हैं। भारत आना कैसे हुआ,तो बताया की उन्हें चूहों से बहुत डर  लगता था। फिनलेंड की हैं पर शायद नौ या दस साल की उम्र से जर्मनी में रहती थीं। वहीं किसी ने किताब दी जिसमें बीकानेर के करनी माता मंदिर का ज़िक्र था जहां चूहों को  पूजा जाता है। वह बताती हैं की वह जर्मनी से यहाँ आयीं और उनका चूहों का फोबिया ख़तम हो गया। तब से  वह नियमित भारत  आतीं हैं और ताजमहल से तो इतनी प्रभावित थीं कि हर दौरे में वह एक बार आगरा ज़रूर जातीं।  यहीं ताजमहल के पास उनकी दोस्ती एक परिवार से हुई जो एक असफल गेस्ट हाउस चलाते थे।वैसे तो यह महिला एक नर्स थीं पर भ्रमण वगैरह से मिली जानकारी से इन्होने उनके साथ मिलकर,वहां पर एक अच्छा  होटल बनाने की कल्पना की !वह बड़े फख्र के साथ बताती हैं कि अब उन लोगों ने एक दूसरा होटल भी खोल लिया है,"रे ऑफ़ माया", जो डीलक्स श्रेणी में आता है।
          बड़ा दिलचस्प लगा उनकी बातें सुनकर। एक  विदेशी महिला,जो उत्सुकता पूर्वक भारत आयीं अपनी बीमारी की  हद तक के भय  का इलाज ढूँढतेऔर यहीं की होकर रह गईं। पिछले करीब चौदह साल से वह यहाँ पर हैं। उनसे बातचीन करते हुए लगा उनको हमारे देश और समाज की अच्छी पकड़ हो गयी है। कहती हैं उन्होंने हिन्दी सीखी,पर उनकी शिक्षिका ने इतनी शुद्ध हिन्दी सिखाई कि वह जब बोलती थीं तो लोग हंस पड़ते।  वैसे भी उन्हें आगरा की बोली बिलकुल नापसंद है।  बताती हैं लोग बिना गाली दिए बात ही नहीं करते।
          वह कभी ओरछा घूमने गयी थीं और वहां एक गाँव में बच्चों की भुखमरी  की हालत देखी तो वहां एक स्कूल खोल दिय।  स्कूल भी वह और लोगों के साथ मिलकर चलाती हैं। .आज वह बेहद परेशान थीं स्कूल के उनके साथी,उनके होटल के मुनाफे पर  नज़र गडाए थे और पुलिस में उन पर धोखेबाजी  की शिकायत   करना चाहते हैं।  दुखी थीं और इतनी मुश्किलों को देख उन्होंने स्कूल बंद करने का निश्चय कर लिया था।
         बातचीन का सिलसिला दिल्ली तक चलता रहा। नाम तो पूछा नहीं पर पता चला की इलाज के लिए बेटे के पास जर्मनी जा रहीं थीं।  इस रोचक  नेकदिल साहसी महिला को सलाम और हाँ उनसे बातचीत करना प्रेरणादायी ज़रूर लगा !

P.S. :आजकल अंतरजाल के होने से कुछ भी छुपा नहीं है।   गूगल किया और उनका नाम पता चल गया।  नाम है इवा माया  स्चुल्त !
http://www.artconsulting.net/en/art_for_life/blog/2010-02-25/india-orchha-maya-school-project

गुरुवार, मई 02, 2013

मेट्रो का तजुर्बा

         अभी कुछ दिन पहले दिल्ली जाना हुआ . राजधानी से पुराना नाता है. नौकरी की शुरुआत वहीं से हुई और कोई १५  साल वहां बिताए हैं .इस बार कई जगह जाना था ,सो मेट्रो का सहारा लिया गया. कितना सरल, कितना आरामदेह साधन है. बाहर भी कुछ देशों में घूमने का मौक़ा मिला है और वहां की मेट्रो या सबवे  से मैं खासा प्रभावित हूँ . शहर के किसी कोने से कहीं भी जाना हो, झट टिकट लो,साफ़ सुथरी ट्रेन में बैठो और मंजिल पहुँचते देर नहीं लगती . यहाँ से उतरो,वहां से चढो ।न कार का झंझट,न पार्किंग का तनाव.
इस बार दिल्ली पहुंचकर,तय हुआ की कार छोड़ ,इस बार मेट्रो से ही सारे सफर तय किये जायेंगे .वैसे भी शनिवार  -इतवार थे .कार बुलाकर,ड्राइवर की छुट्टी क्यों बर्बाद की जाये ,यह भी सोच थी .

      मेरा यह संभवतः ,मेट्रो में सफ़र का पहला या दूसरा अनुभव था। इससे पहले मैं एक बार कनात  प्लेस से चांदनी चौक तक जा चुकी हूँ . इस बार केन्द्रीय सचिवालय से मयूर विहार ,वह भी आराम से राजीव चौक पर ट्रेन बदल कर और फिर मयूर विहार से गुड़गांव  का सुखद अनुभव मिला . सप्ताहांत था,पर ट्रेन में बैठने की जगह इतनी  आसानी से फिर भी नहीं मिली . कुछ स्टेशन तो खड़े होकर जाना ही पड़ा .स्टेशन साफ़ सुथरे थे ,टिकट खिड़की पर भी कतारें जल्दी जल्दी आगे बढ़ रही थीं .मेट्रो के संचालकोँ  ने इसे   अन्तराष्ट्रीय स्तर  देने में कोई कसर  नहीं छोड़ी .अच्छा लगता था ,ट्रेनें ४ मिनट के अंतराल पर समय पर आ रही  थीं और जो रास्ता    तय करने पर पसीने निकल जाते  थे   वो अब बड़े आराम से तय    हो रहे थे . न पेट्रोल का खर्च ,न ट्रेफिक जेम में फंसे ,न यातायात सिग्नल पर .
       पर इस सफ़र में दो बड़े सुखद अनुभव् हुए. ट्रेन पर बैठने पर दिखा एक साफ़ सुथरा सा डिब्बा .सामने की सीट पर एक परिवार था,पति-पत्नी और दो ७-८ साल की बेटियाँ .बेटियाँ अल्लो चिप्स खा रही थॆन.वैसे तो यह भी नियम के खिलाफ था. पर खाने के बाद उन्होंने पेकेट वहीं नीचे फेंक दिया. अमूमन हम में में से कोई भी टोकता नहीं है,पर मेरे सामने खड़े एक युवक ने तुरंत उनसे निवेदन किया की डिब्बा इतना साफ़ है ,वह पेकेट उठा लें . महिला का कहना था की बच्चे हैं ,फेंक दिया ,क्या करें। युवक को हम सबसे समर्थन मिला और उस महिला को समझाया गया की बच्चे तो छोटे हैं पर वो और उनके पति तो नहीं .पेकेट उठाकर वह अपने बेग में रख सकती हैं और उतर कर किसी कूड़ेदान में फेंक सकती हें . बात उनकी समझ में आ गयी और उन्होंने फेंका हुआ कूदा उठाकर अपने साथ लाये बेग में रख लिया. आशा करती हूँ कि उतारकर उन्हने उसे सड़क पर नहीं बल्कि किसी कूड़ेदान में डाला होगा .युवक के विनम्र अनुरोध और देश की संपत्ति के प्रति जागरूकता पर हर्ष हुआ .

            उसके तुरंत बाद  ऐसी ही दिल को खुश करने वाली एक और  घटना हुई . हम लोग मयूर विहार फेस -१ से चढ़े  थे. बैठने की जगह तुरंत तो नहीं मिली,हाँ तीन स्टेशन बाद मुझे मिल गयी .मियांजी अभी भी खड़े हुए थे .एक स्टेशन पर दो व्यक्ति उतरे तो खड़े लोग बैठने को मुड़े . इसमें ,पतिदेव भी थे.पर उनसे पहले एक लड़का सीट पर पहुँच गया .मैं उन्हें  ,बैड  लक वाली नज़र दे ही रही थी ,कि  वह युवक उठा और उसने अमित को उस सीट पर बैठने का आग्रह किया. देखकर दिल खुश हो गया .

इन दोनों युवकों को आभार और उम्मीद है कि हमारी युवा पीढी यह जागरूकता दिखायेगी और हम सबको सिखाएगी भी . हो सकता है हमारे देश का भविष्य उज्जवल ही हो . 

शनिवार, फ़रवरी 16, 2013

चलो मन गंगा जमुना तीर

            इलाहाबाद में महाकुम्भ के मौके पर होना एक दुआ कबूल होने जैसा है। हर बारह साल में होने वाला यह पर्व  श्रद्धालुओं को खींचकर ले आता है। मकर संक्रान्ति  के दिन से  इस पर्व का आरम्भ होता है और करीब दो महीने तक संगम तट पर अपना विशवास,अपनी आस्था लिए लोग यहाँ रहते हैं, स्नान करते  हैं और आत्मा की शुद्धि  की कामना करते हैं।
                        समुद्र मंथन के बाद अमृत निकलते ही देवों  और दानवों में उसे पाने के लिए लड़ाई छिड़ गयी .इंद्र के पुत्र ,जयंत,  ने गौरय्या का रूप धारण किया और अमृत वाले कुम्भ को राक्षसों से बचाने के लिए  भागे .12 साल तक वह उसे बचाकर भागते रहे .पर इस दौरान चार बार वह कलश छलका और अमृत की एक एक बूँद , प्रयाग,उज्जैन,हरिद्वार और नासिक में गिरी . ऐसा विशवास है कि हर बारह साल पर अमृत की वह बूँद इन स्थानों पर फिर से प्रकट होती है। और तब यहाँ होता है कुम्भ का पर्व,जब श्रद्धालु पावन नदियों में स्नान कर उस  अमृत बूँद से स्वयं को शुद्ध करते हैं .इसके अलावा हर 144 साल पर महाकुम्भ का आयोजन होता है और इस बार का  मेला महाकुम्भ का पर्व है। उसपर प्रयाग तो गंगा,यमुना,सरस्वती का संगम स्थल है , इसलिए तीर्थराज है।सो यहाँ के महाकुम्भ की महत्ता अधिक है।
           संगम किनारे यहाँ कुम्भ नगरी बन गयी है। क्षेत्र को कई सेक्टर में बाँट दिया गया है . गंगा के दूसरे तट को जोड़ने के लिए  पोंटून पुल बने हैं। 'इसकोन ' हो या शंकराचार्य का मठ ,उत्तरप्रदेश पर्यटन हो या फिर कोई निजी यात्रा कंपनी अनेकों शिविर लगे हैं और रहने की व्यवस्था है . पुलिस स्टेशन है,डाकघर है ,अस्पताल हैं , ट्रेन टिकट खरीदने की सुविधा है। देश भर से आये साधू संतों ने अपने आश्रम यहीं बना लिए। 13 अखाड़ों  के ध्वज लहराते दिख रहे हैं। सब तरफ बस गेरुआ रंग दिखाई देता है।सबके चेहरे पर वही श्रद्धा ,इश्वर के  प्रति भक्ति की चमक है। 14 जनवरी को जब सूर्य उत्तरायण होकर  मकर राशि में प्रवेश  करते हैं तब से आरम्भ होता है कुम्भ पर्व और  यह समाप्त होता है शिवरात्री को।करीब दो महीने तक चलने वाले इस मेले में कुछ ख़ास तिथियाँ  ऐसी होती हैं जो बहुत शुभ होती हैं और उन दिनों महा स्नान होता है। इनमें भी जो सबसे बड़ा स्नान है वह है मौनी अमावस्या का .कहते हैं इसी दिन सृष्टि की रचना हुयी थी . इस बार करोड़ लोगों ने स्नान किया।  शाही स्नान की शुरुआत   साधू संतों  के अखाड़ों  से होती  .घाट  तक पहुँचने के लिए इनका जुलूस भव्य होता है . हाँ, दिगम्बरधारी  नागा साधू तो वैसे भी सर्वाधिक  कौतूहल का विषय होते ही हैं। संगम के पानी में एक तरफ होती है इन विशेष भक्तों  की भक्ति तो दूसरी तरफ साधारण जनमानस की आस्था भी कम अटूट है। एक तरफ गेरुआ वस्त्रधारी, चन्दन तिलक लगाए ,जटाधारी , सन्यासी हैं ,जिनकी पेशवाई और रंग ढंग धार्मिक तो है ही साथ ही भव्य भी . दूसरी तरफ है जन मानस  की श्रद्धा जो उसे मीलों पैदल चल कर ,ठण्ड में, बिना सुख सुविधा के भी यहाँ आने को विवश करती है। छत्तीसगढ़ से आयी रामरती देवी हों ,  राजस्थान से भैरों सिंह या फिर नज़दीक ही वाराणसी के पांडेपुर के समस्त निवासी  .सभी की आस्था में वह बल है जो उन्हें  संगम तक पहुचने  की शक्ति देता है। बसें तो शहर के बाहर ही रोक दी गयी  हैं .अपने सर पर गठरी उठाये ,कंधे पर बैग टाँगे ,गाँव के गाँव ,उमड़  पड़े हैं। बूढ़े भी हैं,बच्चे भी हैं,युवा भी हैं  .सब गंगा मैया की जयगान करते,हाथ थामे  बढे जा रहे हैं। यहाँ तक की अमेरिका से आये जार्ज और न्यूजीलैंड से आयीं रिबेका भी यहाँ पहुंचकर  इसी भावना में सराबोर हो रहे हैं। फिर यहाँ ठन्डे पानी में नहाकर सब धन्य हो जाते हैं। माँ अपने छोटे साल भर के बच्चे को भी डुबकी  लगा कर पुण्य का भागी बना देती है .बुज़ुर्ग भी स्नान करते हुए सोचते हैं जन्म   सार्थक  हो   गया .
             नदी  का किनारा हो, सवेरे उठें तो गंगा यमुना   की  लहरों पर सूरज की किरणों   की लाली दिखे , ठन्डे बहते पानी में नहाकर  , उसी नदी में खड़े होकर सूरज को अर्ध्य दें  ,दिन में सन्त  ,महात्माओं के प्रवचन सुनें और एक कुटी में सो जाएँ।  संगम  किनारे रेत पर मडई डाल  कर माघ की शीत में  एक महीने तक कुछ   लोग   कल्पवास करते हैं।   संयम ,तप और गंगा की सेवा से आत्मा शुद्ध हो और मोक्ष मिले यह आस लिए हर साल श्रद्धालु आते हैं।बाकी मेले की चकाचौंध से अप्रभावित यह उनकी बेहद निजी,अपार विशवास लिए  साधना है। 

          महाकुम्भ में श्रद्धा,भक्ति,धर्म कई रूप में दिखाई पड़ी . शान्ति ,शुद्धि और समृद्धि  की कामना लिए संगम स्नान कर जब लाखों , करोड़ों लोग  निहाल हो जाते हैं , तो यह सृष्टि , यह प्रकृति भी उनके संकल्प और समर्पण से तेजमय  हो जाती है।

शनिवार, जनवरी 05, 2013

आम आदमी की पार्टी बनी है।

आम आदमी  की  पार्टी बनी है। 'आप' सब उसके सदस्य हैं .जानकर एक आशा जागी है कि  शायद कुछ बदले या फिर आसपास के वातावरण को बदलने की एक शुरुआत तो हुई।वरना हम सब तो सिर्फ दोष देना जानते हैं कुछ करना नहीं। बहस चलती  रहती है कि  अरविन्द केजरीवाल जो कर रहे  हैं उससे स्थिति में  कुछ बदलाव आ सकता है या नहीं। लोकपाल बिल के अनशन की तरह हमारे देश की जटिल और कुटिल होती व्यवस्था एवं राजनीति में कुछ बदलेगा ?
पर मेरे ज़हन में एक सवाल उठता है कि अरविन्द केजरीवाल तो जो  उन्हें करना था वह कर रहे हैं पर जो आम आदमी को करना चाहिए वो क्या हम करेंगें।2014 में अगला संसदीय चुनाव होना है। अभी तक हमारा यह रोना था कि हमारे पास  विकल्प नहीं है।सब पार्टियां एक ही  तरह की हैं . सिर्फ ऊपर के लिबास अलग हैं ,पर अन्दर सबकी फितरत समान  है .वही सत्ता  का नशा, राजा प्रजा  की भावना ,चोर ,अपराधियों को टिकट ,भ्रष्टाचार और अनैतिकता को बढ़ावा . हम या तो वोट देने जाते ही नहीं या फिर हताश हो उस पार्टी को देते हैं जो सत्ता में नहीं थी और कह देते हैं एंटी इनकम्बेंसी वोट !तभी देखिये ये कौन लोग सत्ता में बार बार आते हैं। इस पार्टी के हों या उस पार्टी के ...सब का अंजाम एक ही होता है .एक घोटाला या दूसरा। राष्ट्र में बढ़ते ज़ुल्म,बच्चों, स्त्रियों,निर्बल का शोषण ,स्विस अकाउंट के बढ़ते जमा खाते और देश में बढ़ता काला धन, कोमेनवेल्थ  गेम्स से लेकर छोटी सी कोतवाली तक व्याप्त घूसखोरी की आदत , सूची लम्बी है .

पर अब हमारे सामने भी एक विकल्प आया है .  निराशावाद स्वर में हम कह सकते हैं कि यह मुट्ठी भर लोग सालों से सड़ती व्यवस्था से क्या लड़ पायेंगे .यह भी सोच सकते हैं कि क्या इनके इरादे भी इमानदार हैं या यह भी अन्दर  से वही हैं  ,बस अब लिबास और सफ़ेद हो गया है . लेकिन ज़िम्मेदारी अब आम आदमी की है . अगर हम इस सड़ी व्यवस्था से निजात चाहते हैं ,कुछ परिवर्तन लाना चाहते हैं तो अब गेंद हमारे पाले में है . अगले चुनाव में क्या आम आदमी पार्टी यह उम्मीद कर सकती है कि हम उसके उम्मीदवारों को विजयी  बनाएं ? उनके साथ प्रदर्शन पर नहीं गए,केंडल मार्च नहीं कर पाए,तो क्या चुनाव के समय तो परिवर्तन की आस को तो वोट के ज़रिये व्यक्त कर ही सकते हैं। या फिर जो इमानदार ,देश के हित के बारे में सोचने वाले लोग हैं वह सामने आयें और इस पार्टी  की  ओर   से  प्रत्याशी बनें। अगर वह बिना ज़्यादा  धन खर्च किये चुनाव लड़ते हैं तो फिर यह हमारी यानिआम आदमी की ज़िम्मेदारी बनती  है कि वोट डालते समय प्रत्याशियों की सूची को गौर से देखें और मुहर एक इमानदा  व्यक्ति के सामने लगायें। चोर,उचक्कों,अपराधिक गतिविधियों में लिप्त लोगों को जिताने से तो हम यही सन्देश दे रहे हैं की हम व्यवस्था के सामने असहाय हैं . बया छोटे शहर,गाँव हो या कस्बा ,हमें एक विकल्प मिला है और हमें इसे  आजमाना  चाहिए। यह हम अपने लिए,अपने देश के लिए और समाज के  भविष्य के लिए योगदान कर सकते हैं .  

गुरुवार, नवंबर 01, 2012

दीपावली

दीयों की जगमग से चौंधिया जाए जब आँगन मेरा
हंस कर बोले प्रतीक्षारत मैं कब से सूना
रंग रंगोली, दीप दीवाली
हर कोने की सुध बुध ले लो। 

एक दिया हो या हो लाखों  की हो  झिलमिल
राह तकती  घर की देहरी बोले मैं भी कब से यहीं
लीपी पुती सफेदी की चादर ओढ़े 
लक्ष्मी पाँव निहारूं एकटक। 

लड़ियों की माला पहने मुंडेर ने झाँक कर नीचे देखा
इतराती देहरी, मतवाले आँगन  से बोला
ऊपर भी मुझे निहारो
जगम ,मगन आज  सूनी माँग !

चारों दिशाओं में  फैले ज्योति, 
पथ  हो जाएँ आलोकित
हर घ ,हर ह्रदय  में हो ऐसा उजियारा
निराश आँखों में  चमक  
हताश सांसों में आशा
शुभ दीपावली  की अभिलाषा !      

सोमवार, अक्टूबर 22, 2012

पिकनिक

तितलियों  के पीछे पीछे
पेड़ों की छाँव के नीचे 
मखमली घास के गलीचे 
हम अपनी मस्ती से सींचे !

गुनगुनाते स्वरों की लहरी 
गदगद हो जाए   दोपहरी
मन में लहर उठे  गहरी 
यह   घड़ी बस रहे  ठहरी  !

शारदीय सुबह  की हौली ठंड
सब संगिनियों का हो संग 
तो मन करे बस एक पुकार 
आपसे  आने का  मनुहार !

गुरुवार, सितंबर 13, 2012

उम्मीद अभी कायम है

उम्मीद की एक किरण सूरज की रोशनी से भी ज्यादा प्रभावी हो सकती है। जीवन को दिशा देने में ,अँधेरे में रास्ता दिखाने में ,या फिर कोई मंजिल को उजागर करने में . नन्हे बच्चों का स्कूल है उम्मीद एक विद्या किरण। यह वो बच्चे हैं जिनके माता पिता की नौकरी हमारे घर में काम काज करना है।
स्कूल चलता है 1 से तीसरी कक्षा तक। यह तय हुआ की हब सब मिलकर हफ्ते में एक दिन कुछ ऐसा करें की इन बच्चों को भी एक बेहतर शिक्षा मिले .जो वह अपनी स्कूल के शिक्षकों से सीखते हैं उसके अलावा उन्हें कुछ  अधिक ज्ञान मिले। 
इसी सिलसिले की एक कड़ी के रूप में मैं भी पहुँची उम्मीद। सोचा क्या सिखाया  जाए। पूछा महाभारत के बारे में सुना   है तो जवाब न में मिला .ऐसा लगा बच्चों को ऐसी कहानी सुनायी जाये जो इन्हें अच्छी भी लगे और कुछ सन्देश भी मिले। अर्जुन और चिड़िया की आँख वाली कहानी याद आयी .सुनाना  शुरू किया। इस स्कूल में एक ख़ास बात है की कक्षा दो के सब बच्चे एक उम्र के हों ऐसा ज़रूरी  नहीं .कक्षा इस बात से तय होती है की  बच्चे ने कब पढाई शुरू की .मैंने दूसरी और तीसरी क्लास के विद्यार्थियों को लेकर यह दास्तानगोई का सिलसिला रखा था . पर उसमें कुछ बच्चे बहुत छोटे थे या फिर अच्छे स्कूलों के हिसाब से सही उम्र के,पर कुछ बच्चे बड़े भी थे। 
कहानी सुनाने में ख़ासा मज़ा आया .पर उससे ज्यादा मज़ा आया उस घटना का नाटय  रूपांतर  करने में।किसको अर्जुन बनाया जाये,किसको द्रोण ,किसको भीम और कौन पेड़ हो इसमें सबने अपना हाथ भी उठाया और किरदार के अनुरूप सुझाव भी दिए।भीम के लिए थोडा हट्टा - कट्टा बच्चा लिया गया तो  दुर्योधन के  लिए बच्चों ने अपने सबसे लड़ने वाले  साथी का नाम सुझाया .पांडवों और कौरवों की विशेषताओं से उनको थोड़ा परिचय हो गया था .एक बच्चा पेड़ भी बन गया .उनके अध्यापक एक छोटी मिट्टी की चिड़िया  भी ले आये .
पूरी कहानी का मंचन हुआ . आशा करती हूँ की इस लघु कथा से कुछ सीख मिली होगी ,जो अभी नहीं तो बड़े हो कर शायद काम आये .वैसे  सिर्फ सीख की ही बात नहीं है। कुछ किताबों के अलावा भी जानने को मिलता है तो हमेशा फायदा ही करता है। 

अब अगली बार के लिए कुछ तैयारी  करनी है। 


सोमवार, अगस्त 20, 2012

गोल्फ

          आजकल एक नया जुनून  चढ़ा है ,गोल्फ सीखने का . गोल्फ कोर्स पर तरह तरह के बोर्ड लगे हैं।  सबसे पहला हमें सवाधान करने के लिए है. ' गोल्फ एक प्यार की तरह है ,अगर आप उसे तवज्जुह  न दें तो  मज़ा नहीं है  , और अगर बहुत संजीदगी से खेलें तो दिल तोड़ देता है '.  शायद यही गोल्फ की सच्चाई है।
         मैंने भी शुरू किया सीखना . हर रोज़ सवेरे पहुँच जाती कोर्स पर शुरुआती कक्षाओं के  लिए। हर दिन यह बोर्ड  पढ़ती और सोचती ऐसा क्या है इस गेम की जो एक बार इसे  पकड़ता है,वो दीवाना हो जाता है। कुछ दिन छोटी सी गेंद मारते मारते ,पता ही नहीं चला कि  कब दिल में ऐसी जगह बन गयी कि उस टुक टुक  कर गेंद को मारने भर के लिए सवेरे उठना  एक दिली विविशता बन गयी। साथ में एक ट्रेनर और कैडी  है। कैडी है या बेचारा मेरी बेतहाशा इधर उधर पड़ती  और मेरे खेल को देखने  का कैदी ! क्लब पकड़ने का  तरीका उसने सिखाया और फिर कैसे सिर्फ हाथ को  ले जायें शरीर  को नहीं ,ऐसी असंभव सी ताकीद दी। जब   रखा और क्लब घुमाया तो  सरसराते हुए क्लब तो घूमा ,पर गेंद वहीं की वहीं ! ट्रेनर ने ताकीद दी  आप गेंद को देखते रहें   नज़र मत उठाएं . नज़र नीचे ही रखी  तो फोलो थ्रू ठीक नहीं था  . तौबा ! एक अदद गेंद को सही तरीके से मारना इतना भी आसन   नहीं। पर विडम्बना थी कि अगले दिन फिर पहुँच गए सीखने .
         आइरन ,क्लब,चिप ,पट ,होल ,टी ऑफ़ ,इन सबसे तो परिचय हो गया . पर 18 होल के कोर्स  जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही  हूँ .कहते हैं,गोल्फ का खेल तो आसन है,पर उसे खेलना मुश्किल .  

शनिवार, अगस्त 18, 2012

गुलज़ार ..... जन्म दिन की बधाईयाँ

हवा में तैरते किसी कण किसी क्षण  को आपने देखा 
बस उस देख भर से,
एक कविता,एक गीत ,एक कहानी निकल पड़ी. 
हर शब्द आपके स्पर्श का मोहताज ,
हर ज़र्रा इंतज़ार में है
कब आप उधर जाएँ
और अपनी हर  अनदेखी हरकत से 
वह भी वाकिफ हो जाए 

यह सिलसिला  बना रहे हमेशा ,
बहुत बेजान गुलज़ार होने हैं.
जन्म दिन की बधाईयाँ 

शुक्रवार, मार्च 30, 2012

सिम्बा

आज सिम्बा बहुत  नाराज़ है.घर में मेहमान आये हैं और उसे हमने बाहर छत  पर भगा दिया है. वह जाली के दरवाज़े से सबको देख तो रहा है पर चाह कर भी अन्दर नहीं आ पा रहा है. उसे सबके साथ बैठना बहुत पसंद है. सबको हेलो कर वह अपने एक किनारे बैठ जाता है. पर कुछ लोग हैं जो उसके बड़े शरीर को देख डर  जाते हैं.उसके अन्दर  के कोमल दिल को नहीं देख पाते हैं. अमूमन ,उसकी डीलडौल  से उसके नाज़ुक गर्मजोश   दिल को पहचान पाना ज़रा मुश्किल होता है. पहली नज़र में कोई भी सहम जाता है. सिम्बा के समझ से यह बात परे है.वह तो गले मिलकर सबका अभिवादन करता है ,और सबसे थोड़ी जानपहचान हो जाने पर , अकेले ही बैठना पसंद करता है. पर अभी वह इसी बात से दुखी है और गुस्सा भी.आखिर उसे क्यों सबसे मिलने नहीं दिया जा रहा ? उसे कौन समझाए की घर आया महमान उसके साथ मेलजोल बढ़ने में हिचक रहा है .
मुझे पता है क्या होने वाला है.मेहमान तो चले  जायेंगे और सिम्बा मुंह फुलाकर नाराज़ हो जाएगा.फिर लाख मनाने पर भी वह अन्दर नहीं आने वाला. मैं उसे बुलाने जाउंगी तो मुंह फेर  लेगा . अन्दर आएगा पर अपने हिसाब से. वह एस ही करता है अगर उसकी कोई भी ख्वाहिश पूरे करने में ज़रा देर हो जाए. सवेरे उठाकर उसे घूमने जाना पसंद है.घड़ी में ठीक छह बजाते ही वह हमारे आसपास चहलकदमी करने लग जाता है. जब तक हम कपडे बदले ,जूते पहने तब तक तो ठीक पर अगर कुछ भी और काम करने लगे तो सिम्बा जी नाराज़.फिर बहुत मनाना पड़ता है उन्हें बाहर चलने के  लिए. ऐसा ही करता है जब उसे सवेरे की दूध रोटी समय से नहीं मिलती .जैसे ही घूम  कर वापस आया  तो सीधे अपने  खाने की प्लेट के पास पहुँच जाता है. मैं  कहती हूँ  की थोड़ा तो समय लगेगा घर के अन्दर आकर तुम्हारी दूध रोटी डालने में पर वह बेसब्र है .कुह्ह देर रसोई  के सामने खड़ा रहेगा और फिर अगर मैंने नहीं दिया  तो मुंह फुलाकर वहीं ज़मीन पर लेट जाएगा. और फिर जब उसका मन करेगा तब सुबह का नाशता करेगा .
 वैसे उसे घूमना पसंद है.हम उसे घुमक्कड़  कहते हैं. घुमक्कड़ और खोजी .जब तक सूंघ सूंघ कर किसी चीज़ की पूरी जानकारी नहीं ले  लेता उसे चैन नहीं . उसके साथ घूमने का मतलब है हर एक कदम पर रुकना.वह उस जगह को सूंघेगा और कभी कभी तो मुझे लगता है किसी गड़े खजाने की महक लग जाती है उसे.सूंघेगा ,एक पैर से ज़रा ज़मीन खोदेगा ,फिर सूंघेगा और आगे बढ़ने को राजी नहीं. जब उसे तसल्ली हो जाती है की उस जगह की हर खुशबू-बदबू से वह वाकिफ हो गया है तभी आगे बढ़ता है. यह घड़ी घड़ी रुक रुक कर सैर करने में सिर्फ उसे ही मज़ा आ सकता है. उसे कार में बाहर जाना भी पसंद है. अगर हम कार से कहीं जा रहे हों ,ख़ास तौर से दूसरे शहर तो हम कोशिश करते हैं की ऐसी जगह रहे जहां कुत्ते को भी साथ रखने  की इजाज़त हो. वह कार में पीछे बैठकर पूरे सफ़र का मज़ा लेता है. कभी खड़ा हो जाता है,कभी सीट पर बैठकर , खिड़की से मुंह चिपकाकर बाहर देखता रहता है. रास्ते  भर हम लोगों के आकर्षण का केंद्र रहते हैं. आने जाने वाला ट्रेफिक,गाडी में इतने बड़े कुत्ते को देख कौतुक होता है. यात्रा के बाद घर वापस आने पर हम सब थके हो सकते हैं पर सिम्बा नहीं.उसे गाडी से उतरने में कोइ दिलचस्पी नहीं रहती है.बल्कि उतर कर अपना थोड़ा इधर उधर घूम कर वह फिर गाडी के पास खड़ा हो जाता है !हमें लगता है कि पीछे छोटी जगह में वह बड़ा बंधा सा महसूस कर रहा होगा और लम्बे सफ़र में थक गया होगा.पर सिम्बा तो उतरने को राजी नहीं.
वैसे अगर हम ऐसी जगह जा रहे होते हैं जहां सिम्बा को ले जाना संभव नहीं तो उसे घर पर छोड़ना ,अपने बच्चे को छोड़ने के बराबर होता है. जैसे ही हम सूटकेस वगैरह बाँध रहे होते हैं ,या जूते पहने कि सिम्बा को आभास हो जाता है कि हम कहीं निकलने वाले हैं.वह भी पूंछ हिलाता आसपास मंडराने लगता है. पर अगर उसका सामान न रखा गया तो उसे पता है कि वह तो साथ नहीं जा रहा . हम तो भावुक रहते ही हैं ,सिम्बा भी मायूस हो कर पूंछ नीचे चिपका कर रोनी सूरत लिए बैठ जता है.
कसौली में सिम्बा 

कैमरे के लिए पोज़ 
गजब का जज्बाती है . कहीं से बहुत दिनों के बाद आने पर वह ऐसे मिलता है जैसे न मिलने की आशा पर दुबारा मिल जाएँ.बेतहाशा चिपक  कर,गले लग कर वह आपके वहां होने का  एहसास    अपने में समेटता है. लाड प्यार जता कर ,तसल्ली कर कि वाकई आप हैं,फिर वह चुपचाप एक कोने में बैठ जायेगा. पर रह रह कर वह आकर प्यार करता है कि इस बीच आप चले तो नहीं गए.
अभी तो उसे बुखार है  सर्दी खांसी,गला खराब. छोटे बच्चे की तरह वह गोद में बैठा  रहा . गले में खराशहै  ,खाना भी नहीं खा रहा है.जिद है कि मैं अपने हाथ से उसे खिलाऊँ. सहलाती रहूँ ,उसके बालों में हाथ फेरती रहूँ.मेरे  पीछे पीछे घूम रहा है. जल्दी से ठीक हो जाए तो चैन आये . डोक्टर के पास ले गयी.कल उसे सुई लगी तो कुछ नहीं बोला .पर आज दुबारा जब ले गयी तो उसे दर्द याद आया और थोडा छिटकने लगा.
सिम्बा सेंत बर्नार्ड है .बड़ी कदकाठी का ,बेहद ही कोमल मिजाज़ का  ,भावुक ,स्नेहपूर्ण नस्ल का प्राणी है.अब हमें तलाश है उसकी हमसफ़र की .







सोमवार, फ़रवरी 20, 2012

कुदरत का जादू उतरता ही नहीं

 सोचती हूँ  कि शहर में रह कर भी ऐसी जगह रहना जहाँ  हर सवेरे नंगे पाँव ओसमयी घास पर चलने का आनंद मिले और हर शाम, छोटी छोटी क्यारियों के बीच बैठकर चाय का लुत्फ़ उठाया जाए,यह खुशकिस्मत होने  की इन्तिहा होती  है। बचपन से युवावस्था तक घर शहर में होकर भी ऐसी कालोनी में था जहां पेड़ों के पत्तियों  से झांकते मकान दिखाई देते और शाम को मोर भी कभी कभी मेहमान हमारे होते।  कुदरत से यह नजदीकियां, बचपन के दिनों की सबसे सशक्त यादें  है। सावन के अंधे को सब हरा ही दीखता है। मुझे ऐसा लगता है की  वही सावन का अंधापन मेरी आँख में बस गया है। आज उस घर को छोड़े करीब बीस साल होने को हैं पर जब भी अपने शहर की याद आती है,  तो वही हरियाली सामने रहती है। बड़ा ही सलोना सा  किचन गार्डन  था। न बहुत बड़ा न बहुत छोटा। इतना बड़ा की कई तरह के पेड़ उसमें लगाए गए थे पर इतना छोटा  की अपनापन लगे।  दो दशहरी  आम के  पेड़ थे ,जो हमसे पहले उस घर के निवासियों ने  लगाए थे और  फल हमने खाए।  मज़े  की बात यह थी की वह  हमारे घर की चहारदीवारी के पास ही लगे थे। तो लाजिमी था की रास्ते चलते लोगों की नज़र उन पर लटके बड़े बड़े आमों पर पड़ ही जाती। गर्मी की दोपहरी में माँ उसकी रखवाली करतीं। और अगर कोई बच्चा उन आम को तोड़ने की हिमाकत करता तो उसपर बरस पड़तीं।  रसोई घर का  एक दरवाज़ा इन खेतों में खुलता।  मुझे अभी भी याद है,धनिया की चटनी बननी है तो तुरंत धनिया तोड़ी जाती।  उसका स्वाद कुछ अलग ही होता। या फिर नलके के पास से पुदीना हाथों हाथ मिल जाता।
केले का वह झुरमुट,जो इस तरह से बना था कि  बीच में थोड़ी सी खाली जगह थी।  मैंने अपने दसवीं और बारहवीं के इम्तिहान इसी झुरमुट के बीच पढ़कर दिए। पापा आफिस से आते तो जितने भी थके हों खुरपी उठाकर कुछ गुड़ाई कर लेते तो थकान दूर हो जाती।  कोई घर में नाराज़ है तो उसको यहीं कहीं किसी कोने में ढूँढा जाता।वह  या तो  कोने में जामुन के पेड़ के नीचे बैठा होगा या फिर किसी अमरूद के पास। अमरूद के भी चार  पेड़ थे। 

हम लोगों ने तो इस प्रकृति को अपने मन में बैठा ही लिया था पर  कुदरत के साथ  पच्चीस सालों का जो सबसे यादगार पल थे वह मिले  जब अगली  पीढी  आयी। बहन का बेटा, मानस , दो या तीन साल का रहा होगा।  वह घर आता तो उन्हीं खेत की पगडंडियों पर सारा समय गुजारता।  पापा के साथ पौधों में पानी डालना उसका  प्रिय काम था।  पानी नहीं भी पड़ना है तो भी वह आकर  कहता ,"नाना,पेड़  सूख  रहे  हैं,पानी डाल दीजिये  !' नाना बोलते ,"अरे  अभी तो सींच  दिया  है। "  जवाब में ,"पर कुछ जगह आपने छोड़ दी है, लाइए मैं ठीक से सींच देता हूँ।  आप  थक   गए होंगे। "  
चित्र  में वह नाना की मदद करते हुए , उनसे पाईप छीनकर  खुद  सिंचाई करने  की कोशिश  कर रहा है.

ऐसे  ही याद है जब उसे अमरूद पेड़ पर लटके दिखते। संयोग  से कुछ अमरूद की डालें इतनी झुकी थीं की उसकी छोटी सी पकड़  के पास थीं। उसका अमरूद खाने का अंदाज़ निराया था।  तस्वीर उसी अंदाज़ को बयान  करती है। 


शुक्रवार, फ़रवरी 10, 2012

कहीं समान्तर

दिल का  एक कोना था बिलकुल सन्नाटे में, शांत। किसी को खबर नहीं, कभी कभी उसे भी नहीं.
 पढाई पूरी कर, पहली नौकरी   लगी थी। उत्साह था लगता  खजाना मिल गया।  पर अब तक घर के रुई के फाहों के बीच सिमटी दुनिया छोड़  दिल्ली पहंची तो वह  "मिडल टाउन  गर्ल"  बड़े शहर में गुमसुम सी हो गयी। लोगों के बात करने का तरीका अलहदा ,शहर की तेज़ी उसके छोटे शहर के नर्म भावों से कोसों दूर।  वह भी  अपनी हकबक छुपाते हुए , स्मार्ट दिखने की कोशिश में लगी थी।  अभी तो ट्रेनिंग का समय था।  वहां तो ठीक,काम से काम रख हर बात का संक्षिप्त जवाब दे लेक्चर पर ही तो ध्यान देना था।  तमाम जगह से सहकर्मी थे। थे तो सब उसी के हमउम्र,पर सब के मिज़ाज अलग।  देख कर पता चल जाता कौन कैसा है।  उसकी तरह और भी शांत थे,शायद छोटी जगह तो नहीं पर हाँ घर से पहली बार निकले हुए।  कुछ ने पहले भी कहीं नौकरी की थी,उनके लहजे में उसकी ठसक थी.
चाय का ब्रेक हुआ।  अब तो लाउंज में मिलना जुलना ही पडेगा।  हाय हेलो करते,मुसकराते,  फिर  आदतन   भीड़- भाड़ और स्माल टॉक की दुनिया में वह असहाय सी अकेले पड़ गयी। शुरुआती अभिवादन तक तो ठीक था पर उसके बाद  कुरेदती अपने आप को,अब कहें तो क्या कहें।  पहली बार मिल रहे लोगों को स्कूल,कालेज,पढाई के बाद क्या बताएँ।  हमेशा यही तो होता आया है अभी तक।   न जाने कहाँ से लोग करते  हैं इतनी बातें।  किस बारे में अपनी राय जग जाहिर करते हैं।  क्या पूछे दूसरों से ; लगता जैसे पूछताछ कर रही हो। 
चाय का कप,एक अदद  बिस्किट और इस भरे कमरे में वह खामोश, सोचती बाकी क्या सोच रहे होंगे  उसके बारे में। कोई नज़दीक आता तो एक मुस्कान से हैलो  और फिर अकेले। 
इधर उधर,सबको वह अपनी नज़र से परखने की कोशिश कर रही थी। " हैलो ,एक हाथ बढ़ा। एक मुस्कान दिखी. "मैं....हूँ .".सकपका कर उसने देखा। लम्बे गोरे चेहरे पर वही खोया हुआ भाव ,जो शायद उसके अपने चेहरे की शिकन में दिख रहा था। वह भी मुस्कराई। परिचय दिया, और फिर दोनों हमफितरत की तरह  चुप. "नाईस टू मीट यू", और आगे बढ़ गया। 
आफिस के ही  किसी दफ्तर में वह भी था ,पर दूर किसी शहर में. पोस्टिंग, काम,दोस्त सब बने ,पर उसका वह कोना कोइ नहीं देख पाया। न वह फिर मिली उससे। कभी किसी कागज़ पर नाम देखती तो सहम जाती। लगता कोई उसकी चोरी न पकड़ ले।  उसको तो याद भी नहीं होगा की वह उससे  कभी मिला भी था। वह भी तो कैसे निपट गंवार की तरह सिर्फ मुसकरा भर दी थी। 
१५ साल में प्यार किया,शादी,बच्चे ,ज़िंदगी का अपना चक्र चल रहा था.... १ साल हुए  तबादला  हेड आफिस हो गया।  मीटिंग है। उसी कान्फरेन्स रूम में चाय के कप और एक ग्रुप के साथ कुछ कामकाज की बातें।  और फिर पुरानी आदत से मजबूर।  " हेलो अब कैसी हैं आप ! " उसे  अपनी 40  साल की सारी परिपक्वता की मदद लेते हुए, चेहरा लाल होने से रोका.. ओह तो वही कोना वहाँ  भी !


सोमवार, जनवरी 23, 2012

गुमनाम गलियों में भी मिलते हैं मील के पत्थर कई !

दिल्ली क्या देखी अगर सिर्फ कुतुबमीनार ,लाल किला या हुमायूँ का मकबरा भर देखा.इस शहर में देखने को इतना कुछ है ,बहुत ऐसा जिसके  बारे में आमतौर से हम जानते ही नहीं. देहली से दिल्ली तक  में दिल्ली दरबार के सौ साल पर राजधानी की सात पीढ़ियों के बारे में जानने का मौका मिला. क़ुतुब मीनार बनवाने वाले क़ुतुब-उद-दीन ऐबक ने महरौली में राजधानी बनायी और यहाँ बनी बस्ती. पर क़ुतुब मीनार की मशहूर छाया में इसके आसपास की बस्ती नज़रंदाज़ होती गयी. इसके बारे में पता चला २००१-०२ में जाकर  .

कुली खान की कब्र से कुतुबमीनार 




  एक अनूठा मौक़ा मिला ,उन सबको देखने का ,वह भी एक जानकार के साथ. दिल्ली को जानने समझने का यह एक बढ़िया तरीका है. कनिका सिंह "डेल्ही हेरिटेज  वाल्क्स " नाम से दिल्ली के इस छुपे इतिहास से हमें रूबरू करवाती हैं. दो साल पहले मुझे इनके बारे में पता चला ,और तबसे हर सप्ताहांत सोचती रही इनके इस अभियान से जुड़ने के लिए. इस रविवार यह मौक़ा आया. प्रोग्राम था कुतुबमीनार से अलग महरौली घूमने का . सुबह ९.३० बजे इकट्ठा हुए अनुव्रत मार्ग में इसके प्रवेश द्वार पर. वैसे वहां कोई दरवाज़ा नहीं है,सिर्फ मेन रोड से एक कच्चा,पथरीला   रास्ता अन्दर जाता  है  . हमेशा की तरह मैं रास्ते से  आगे निकल गयी,घूम कर छतरपुर मेट्रो स्टेशन  के सामने से यू टर्न लिया ,और पहुंचे वहां जहां और लोग इंतज़ार कर रहे थे. फिर शुरू हुआ एक प्रबुद्ध दौरा उन खंडहरों का. 
खान शहीद की कब्र 
पहला पड़ाव था,बलबन के मकबरे का दरवाज़ा. पता चला इसके बाद जो साफ़ की हुई जगह दिख रही थी ,उसकी खुदाई एक साल पहले ही हुई थी. उससे पहले वह करीब चार पांच फुट मिट्टी के नीचे  नीचे दबा था. यह पार  कर पहुंचे बलबन के मकबरे .कब्र तो दिखी नहीं ,पर उसके वास्तु के बारे में पता चला की इमारतों में पहली बार True arch  मेहराब का प्रयोग यहाँ हुआ था. और साथ ही यह ही भारत के शिल्प का  पहला गुम्बद .गुम्बद तो रहा नहीं पर कैसे बना इसका अनुमान,वहां के पत्थरों से  लगाया जा सकता है. मामलुक  वंश के सबसे काबिल सुलतान बलबन , की मृत्यु जंग में नहीं हुई.वो टूट गए अपने प्यारे  बेटे खान शहीद की मौत से. खान शहीद की कब्र उनके मकबरे के बगल के कमरे में बनी  है और अभी तक सही सलामत मौजूद  है. अभी हाल ही के दिनों में ,आसपास के गाँव वालों ने इस पर अगरबत्ती जलाना  शुरू कर दिया है . शायद कुछ चमत्कार हुआ होगा ,या कोई मन्नत पूरी हुई होगी जिसने यह आस्था जगा दी ,  दीवार पर कुछ नीली टाईल के टुकड़े इस इमारत की खोयी  हुई सुन्दरता की  कहानी कहने की कोशिश कर रहे  थे.
जमाली कमाली की मस्जिद 
छत पर चित्रकारी 
वहां से निकल कर हम कुछ सीढियां चढ़ ऊपर पहुंचे जो शायद रहने की जगह थी. टूटी दीवारों से कमरे होने का एहसास हो रहा था .यहाँ से आगे  पहुंचे उस पुरातत्व उद्यान के सबसे मशहूर अवशेष जलाली कमाली के मस्जिद पर. चहारदीवारी के अन्दर पांच मेहराबों वाली मस्जिद ,जहां वज़ू  के लिए एक हौज़ बना था . मस्जिद के उत्तरी  तरफ तीन चार  सीढियां चढ़  , एक दरवाज़े से अन्दर जा पहुंचे जमाली कमाली के कब्र के आसपास के पाक अहाते में. सामने ही था उनका मकबरा .  सिकन्दर लोदी से हुमायूँ के समकालीन ,शेख फजलुल्लाह उर्फ़  जमाली सूफी फ़कीर और कवि थे.उनका मकबरा ख़ासा सुन्दर था. छत पर बढ़िया रंगों से और दीवारों पर रंगीन टाईल्स से चित्रकारी की हुई थी. ऊपर,चारोँ ओर, जमाली की रची कुछ पंक्तियाँ भी तराशी गयी थीं .  जमाली की कब्र बीच में थी और उनके एक ओर एक और कब्र . अनजान व्यक्ति की इस कब्र को कहा  गया है,उनके दोस्त की है और उन्हें  नाम दिया गया कमाली.वैसे अभी तक यह पता नहीं चल पाया है की जनाब कमाली की शख्सियत   क्या थी. आसपास की  तमाम जगह पर कई कब्रें दिखीं. यहाँ तक एक के ऊपर  तो छतरी भी बनी है.शायद किसी  ख़ास शख्स की होगी.
जमाली कमाली की कब्रें 
कुली खान का मकबरा 
मेटकाल्फ फोली 
बोट हाऊज़ से सूखी दरिया 
वहां से निकले तो पहुंचे  मुगलों के दरबार में ब्रिटिश रेसिडेंट थोमस मेटकाफ के घर . मेटकाफ ने मुगलों से महरौली का यह इलाका खरीद लिया था. इस में शामिल थे  यहाँ के  मकबरे ,मस्जिद,एक नहर सब कुछ . फिर उन्होंने इस में तब्दीलियाँ करनी शुरू कीं. टीले बनवाये  ,नदिया का रास्ता मोड़ एक केरिजवे बनवाया,लोदी काल की एक ईमारत  में फेर बदल कर  बोट हाउस बनवाया, बाग़ -बगीचे बनाए और नाम दिया दिलखुश ! यहाँ वह  वर्षा ऋतू का आनन्द लेने आते थे . कनिका कहती हैं यह दिल्ली का पहला फार्म हाउज़ था! अब तो महरौली के आसपास गाँवों की जगह फार्म हाउजों  ने ले ली है.  जमाली कमाली के पास में ही एक टीले पर है उनके द्वारा बनवाई गयी बारादारीनुमा मेटकाफ'स फ़ॉली  ' .यहाँ से नीचे उतरकर चले उस रास्ते जहां मेटकाफ    ने एक छोटी सी नदी की धार ही बदल दी और उसका बांधकर एक तालाब बनवाया . यहाँ से पहुंचे मेटकाफ के घर . पर यह घर वास्तव में कुली खान का मकबरा था. कुली खान ,अकबर ,की दाई माँ माहम  अंगा के बेटे आधम खान के भाई थे. आधम खान के मकबरे का गुम्बद दिखा,महरौली गाँव के घरों के बीच से,पर वहां जाना हमारी  इस सैर में शामिल नहीं था. कुली खान की कब्र वहां से हटा दी गयी और यह मकबरा बना मेटकाफ का घर .यहाँ से कुतुबमीनार भी पास दिखता   है .
राजों की बाओली 
अब था इस सैर का आख़िरी पड़ाव .इन सब से अलग एक बाओली .राजों की बाओली और उसके आगे गंधक की बाओली .हमने देखी सिर्फ राजगीर यानी मिस्त्रियों के लिए बनी राजों की बाओली . तीन  मंजिली ,नीचे तक पहुँचती सीढियां ,चारों ओर बैठने के लिए बने गलियारे  ,यह बाओली वाकई शानदार थी. कुछ देर सीढ़ियों पर बैठकर  उसकी कहानी सुनी  और फिर घूम कर ऊपर पहुंचे जहां बने थे एक १२ खम्बे की इमारत में एक कब्र और साथ एक  मस्जिद .इस मकबरे में साफ़ पता चल रहा था की नीचे एक चौकोर   चबूतरा  ऊपर पहुँचते पहुँचते कैसे गोलाकार हो जाता है और उसके ऊपर गुम्बद बनाना संभव होता है !निर्माण कला का एक पाठ मिला!
यह था एक सफ़र दिल्ली के कम लोकप्रिय पर उतने ही रोचक और ऐतिहासिक महरौली की बस्ती का. यहाँ दिल्ली पर राज करने वाले गुलाम वंश के बलबन से लेकर ,लोदी,मुग़ल वंश से होकर  ब्रिटिश काल की इमारतें और खंडहर माजूद हैं. सचमुच पन्ने दर पन्ने खुलता  इतिहास  !
  

शुक्रवार, दिसंबर 30, 2011

अदिति तीन साल की हो गई..(वैसे वह अगले अप्रैल में नौ की होगी )

 एक बहुत पुरानी पोस्ट  थी जो ड्राफ्ट में दिखी.दिल किया उस याद को ताज़ा करने का.


निकि यानि अदिति की इस चिट्ठा पृष्ठ पर पुनरावृत्ति है.आज ( 5 अप्रैल 2006) वो तीन साल की हो गई.२००३ में नवरात्र की पंचमी के दिन हमने अपने संसार में उसका स्वागत किया था.मैं ,उसकी बुआ  ,अदिति के बचपन का एक अभिन्न हिस्सा रही हूँ.उसको बढता देख अपने आप में एक अदभुत एहसास है.मैंने पाया कि उसके लिये कोइ बात "क्योंकि बड़े  कह रहे हैं" इसलिये मान लेना नामुमकिन सा है.वो सीधे इस तरह से नही कहती है पर उसके तीन  प्रिय शब्द हैं...क्या,क्यों और क्यों नहीं.इसमें एक और शब्द कभी कभी जुड़  जाता है....कैसे.लेकिन अभी यह कम आता है.शुरुआत हुइ थी क्या से.जब उसने बोलना सीखा था और उसकी नन्ही सी पकड़  से कोइ शब्द बाहर होता , वह तब तक 'क्या'का साथ नही छोडती जब तक उसकी संतुष्टि नही हो जाती.यह अधिकतर प्रयोग होता है जब वह किसी शब्द का उच्चारण नहीं पकड पा रही हो मुझे याद है"हैर ड्रायर " कहने में उसे खासी मुश्किल आई,और वह अभी भी 'ड्र ' नहीं समझ पायी है.पर उसकी कोशिश ज़ारी है और वह हमेशा मुझे बाल धोने और सुखाने को कहती है जिससे वह उसको देख सके और सुन सके कि वह है क्या!पर अब तो उसके किसी भी वार्तालाप का सार होता है 'क्यों 'और 'क्यों नही'.अगर हम कुछ कर रहे हैं तो क्यों और नहीं कर रहे तो क्यों नही.सूरज रात में कहीं चला जाता है तो क्यों और दिन में चाँद नही दिखता  तो क्यों नहीं.और जब क्यों की बारात निकलती है तो उसका कोई अन्त नहीं.
उम्मीद करती हूँ कि वह हमेशा यूँ ही उत्सुक, बेहिचक सवाल पूछती रहे, जानने सीखने की ललक बनी रहे .


इन पांच वर्षों  में उसमें बहुत बदलाव आये हैं ,पर उसके कुछ सीखने की लगन कम नहीं हुई है.

गुरुवार, दिसंबर 29, 2011

कुछ तो नया करो

नए साल में कुछ  नया करो
 ठंडी से एक आह भरो
 कोहरे भरे भोर  में   बाहर चलो
सांस निकालो,धुआं करो

रात अंधेरी सिहरते ओढो
 गली गली कुछ गाते घूमो
एक जलाओ अलाव कहीं
अलसाई  सी  कुछ राग छेड़ो

हसंते हुए कुछ याद करो
पुराने पल की  बात करो
पहले क्रश को बयान करो
कुछ खिसियाओ ,संकोच करो


कलेंडर को बदलते हुए
कुछ लम्हे संजो कर रखो
 क्या नया करना है सोचो
नए साल को सलाम करो  

मंगलवार, दिसंबर 06, 2011

दो शहरों स बनी एक राजधानी बुडापेस्ट



कम्युनिस्ट साम्राज्य का पश्चिमी छोर और अब केपिटलिस्ट यूरोप का पूर्वी किनारा   कहा जाने वाला हंगरी दो अस्तित्वों के बीच अपनी पहचान बनाने की जद्दोजहद कर रहा है. हम  दुबई से वियना और वहां से टिरोल एरलाईन  के एक छोटे विमान से  ४५ मिनट में बुडापेस्ट पहुँच गए . बूडा और पेश्त नाम के दो शहरों से बनी हंगरी की राजधानी ,बाकी यूरोपीय शहरों से भिन्न लगी .वियना जैसा  कड़क  अनुशासन  यहाँ ज़रा लचीला हो गया और हवा भी यूरोपीय शीतलता से भिन्न ,थोड़ी एशियाई गर्मी का अंश लेने लगी.
डेन्यूब नदी के तट पर एक कतार में कई होटल बने हैं,उन्ही में एक इंटर कोंतिनेनेतल में ठहरने का इंतजाम था. पर ऐसा नहीं लगा  कि उड़ान के बाद ,अब थोडा सुस्ताया जाये. नयी जगह के माहौल को महसूस करने की आतुरता खींच ले गयी हमें आसपास की चहल पहल तक. डेन्यूब का किनारा तो कमरे की खिड़की से दिख रहा था,और नदी के उस पार का राजसी महल.भी. गजब की रोशनी थी और गजब का दृश्य !नदी पर नाव और तट पर बने अनेक रेस्त्रों से चहल पहल थी. आसपास काफी महंगा  सा बाज़ार था,लेकिन हर यूरोपीय शहर की तरह यहाँ भी छोट छोट केफे के बाहर कुर्सी मेज़ लगा कर सुन्दर खाने का इंतज़ाम. रात ग्यारह बारह बजे तक लोग सडकों पर दिखती हैं सो वहां उस समय घूमना भी सुरक्षित है और बहुत लुभावना  भी.
करीब ढाई दिन के समय में इस शहर के साथ इन्साफ करना नामुमकिन है .इतना कुछ देखने को है और इतना कुछ करने को. पहले दिन हम शहर का 'पेस्त' वाला हिस्सा घूमने निकले ,जो नया है,आधुनिक है . शहर घूमने का मज़ा पैदल में  ही  है.यातायात बहुत अधिक नहीं था,सो चलने में मज़ा भी आ रहा था. पैदल के लिए गाड़ियां रुक जाती और हम  कुचले जाने के डर से मुक्त थे. डेन्यूब के किनारे निकले और रुख किया इस्त्फान बासिलिका का.यह बुडापेस्ट का सबसे बड़ा  चर्च है. अन्दर से बेहद खूबसूरत,इस चर्च में सेंत स्टीफन के दाए हाथ को परिरक्षित रखा हुआ है.   यूरोप की  सबसे बड़ी  पार्लियामेंट बिल्डिंग  की भव्य इमारत को देखते हुए हम आगे अन्द्रसी एवेन्यू पर चले.यह सड़क दूर तक जाते है औए बुडापेस्ट के मुख्य सड़क कही जा सकती है.विश्व विरासत स्थल की सूचे में इसका नाम है और कई मशहूर दुकानों और इमारतों को दखने का मौक़ा मिला. यह रास्ता ख़तम होता है हीरोस स्क्वेयर पर जहां हंगरी के राजाओं की प्रतिमाएं हैं . साथ ही आसपास है म्यूजियम ,ओपेरा हाऊस और कम्युनिस्ट समय के अत्याचओं की कहानी कहता हाऊस ऑफ़ टेरर .  बुडापेस्ट की एक खासियत है यहाँ के गर्म पानी के स्रोत और स्पा जहां नहाने से बेहतरीन आराम मिलता है.इसी स्क्वेयर के पास है ज़ेचेन्यी बाथ. बुडापेस्ट   का भूमिगत रेल ,दुनिया का सबसे पुराना है, और इसके स्टेशन को पूर्ववत रखने की कोशिश की गयी है.
किसी शहर की सैर खरीदारी के बिना अधूरे है. सो हम पहुंचे यहाँ के वाची उत्चा ,जो हमारे होटल के पीछे ही एक सड़क है जिसके दोनों तरफ बहुत सुन्दर दुकानें और बाज़ार है. ग्लोबलिज़ेशन के ज़माने में हर शहर की दुकानों में एकरसता  सी आ गयी है. जो दिल्ली में दीखता है वही वियना में औए वही बुडापेस्ट में. सो इस बाज़ार को छोड़ हम पहुंचे ग्रेट मार्केट हॉल . यह एक तीन तलों में बना बाज़ार है,घुसते ही सब्जियों की अनेकों दुकानें और पहले ताल पर हंगरी  की प्रसिद्ध  कढाई और अन्य उपहार की चीज़ें दिखीं. मोल भाव तो हुआ ही पर सामान महँगा लगा. शायद इसलिए क्योंकि हम उससे एक दिन पहले,बुडापेस्ट के बाहर एक छोटे से गाँव ,सेंतेंद्रे घूम कर आये थे. यहाँ जेबकतरों से भी सावधान रहने की इदायत दी गयी थी सो आधा दिमाग तो अपना बटुआ और मोबाइल बचाने मैं ही लगा था.
रात होते होते हम वापस होटल पहुंचे और डेन्यूब  किनारे के अद्भुत समाँ का आनंद लिया. यहाँ पर हर शाम बेंच पर बैठीं  कुछ औरतें भी कढ़ाई के मेजपोश आदि बेचती हैं.बातें हुईं, खरीदारी हुई और पता चला कि  जो नहीं खरीदा वह असल में चीन  से आया था. भारत  की तरह वहां भी चीन सस्ते माल भेज रहा है.यही बात हमें वेनिस में भी दिखी  . मन में एक सवाल उठा कि जो हमने इया वह क्या वाकई उन औरतें के गाँव का है या फिर चीन का ?

किनारे बनी छोटे  लडके की एक मूर्ती के पास बैठकर,यह सब भूल गए और मज़ा  लिया ,नदी पर तैरती नौकाओं का, उस पार जगमगाते महल का, तोकाजी का और हर इमारत,हर कदम के पीछे छुपी एक कथा का.


रविवार, नवंबर 06, 2011

के बी सी बनाम बिग बॉस

श्योर    हैं  फ़ाइनल जवाब ...लॉक    कर दिया जाए ...मुस्कान और फिर सही जवाब का एक स्वर जिसमें उतना ही  आनंद भरा होता है जितना स्वयं प्रतिभागी के ह्रदय में. यह  सब के बी सी की पहचान  कराने वाली कुछ झांकियां हैं. 
चैनल  बदलिए....खुसपुस खुसपुस...तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझसे ऐसे बात करने की...यू ***....वह तो ऐसी है... अरे वह तो उसके सामने ऐसे बात करते हैं और हम लोगों से कुछ और बोलते हैं....!लगता है सब कुछ काला, मनहूसियत की छाया लिए .बिग बॉस का घर.

सीरियल से हटकर दो प्रोग्राम  जिनका प्रचार जोरशोर से हुआ और अब कई  सीसन कर चुके हैं. जब भी शाम को मैं टीवी देखती हूँ तो अनायास ही यह ख़याल आता है. एक ओर बिग बी का ठिकाना  ..जीवंत,हंसी ,जोश, उत्साह से भरपूर के बी सी का प्रोग्राम. सपरिवार एक साथ बैठ कर ज्ञान ,मनोरंजन और सबसे बड़ी बात पूरी तल्लीनता से मज़ा उठाने का  .अमिताभ बच्चन के गरिमामयी व्यक्तित्व   ,संयमित व्यवहार,सुन्दर स्वच्छ  भाषा ,से यह खेल इतना दर्शनीय है ,कि क्या कहने .बच्चे बड़े  सभी इसमें पूरी तरह से शामिल महसूस करते हैं.हाँ इस बार पंचकोती  महामणि कौन बनेगा करोडपति लगता है कुछ अधिक परोपकार की राह पर चल निकला है,पर दर्शकों की सहभागिता बनी रहती है. देखते हुए एक सकारात्मकता ,एक प्रसन्नता का अनुभव होता है.

कुछ आधे घन्टे बाद रात के अँधेरे में चलें बिग बॉस के घर दस्तक दें. क्या कुहराम है,क्या अस्त व्यस्त सा समां है. सब कोइ किसी साज़िश में लगा है. अगर कोइ सकारात्मकता दिखती भी है तो क्षणिक . उसे भी लगता है दबा दिया जाता है.क्या घर परिवार ऐसे ही होते हैं,चीखते चिल्लाते, एक दुसरे के विरुद्ध कुमंत्रण करते. ऐसे संसार के बारे में सोचना और फिर उसे रात दर रात पर्दे पर दखना कितना नकारात्मकता से भर देता है व्याकुलता होती है उसे देख कर.सामने कुछ पीछे कुछ और .काम करने से दूर भागते लोग,दिनचर्या बिग बौस के इशारे पर निर्धारित ,बिना किसी प्रयोजन के दिन काटते प्रतिभागी....खाली दिमाग शैतान का घर. तभी षड़यंत्र के साए उस बेहद धनी घर में छाये रहते हैं. देख कर एक विमुखता सी हो जाती है. न सहजता न सौम्यता ,न सकारात्मक  ऊर्जा का एहसास. 

अपनी टीवी तो १० बजे बंद हो जाता है !