Sunday, February 12, 2006

निकि के स्कूल जाने पर

आज निकि के स्कूल का पहला दिन है.उत्साहित है वह .उसकी ललक है पीठ पर बैग टाँग़ने की.जब भाई ने कहा कि उसके लिये नया बैग लाना है तो निकि का तुरन्त जवाब था "मै उसे पीठ पर टागूॅगी".उसकी प्यारी वाटर बौटल भी उसके कन्धे पर लटकी है.ज़ब उसकी मम्मी उसका दाखिला करा आई तब दोनो बहुत खुश थे वह बोली, "मुझे बडा अच्छा लग रहा है यह सोचकर कि निकि स्कूल जाएगी".और मुझे निकि की बुआ को.....एक डर सा मह्सूस हुआ.घर के स्नेह्पूर्ण वातावरण से निकल कर उसका दुनिया का सामना करने का पेहला कदम .य़हॉ घर पर दादी बाबा,बुआ,मम्मी पापा,नाना नानी सबको वह अपनी नन्ही उन्गलियो पर नचाती है.हम सब उसकी मासूमियत ,उसकी बातो मे व्यस्त रह्ते. एक नन्ही जान मे हम सब की जान बसी है.पर अब उसकी दुनिया का विस्तार होगा.दोस्त बनेगे.रूई के फाहो मे रखी इस कोमल कली की पहली पॅखुडी खुलने का वक्त आ गया है.मुझे लगता है मैँ उसे अपनी बाहो मे समेटे रहू.
पर यह तो प्रकृति का नियम है.सॅसार का चक्र कलियोँ के फूल बनने से ही चलता है.स्कूल तो उसे जाना ही है.विद्यालय भी और सान्सारिक स्कूल भी.मेरी इच्छा थी कि जब वो पहले दिन स्कूल जाए तब मै उसके साथ रहू.पर यह एकाधिकार तो माता पिता क होता है.इसलिये शायद विधाता ने मुझे औफिस के काम से दिल्ली भेज दिया.कैसा लगा होगा रन्जना आशू को उसे स्कूल ले जाते हुए?कैसा लग होगा मेरे माता पिता को जब उन्होने मुझे पहली बार स्कूल छोडा होगा?मैँ अपने भाई बहनो मै सबसे बडी हूँ.शायद एक भय मिश्रित उत्साह. प्रकृति के कुछ नियम और भावनाएँ हैँ जो पीढी दर पीढी एक समान रहते हैँ. चाहे हम कितने आधुनिक हो जाएँ.यह भी उन्हीँ शाश्वत भावनाओँ मेँ से एक है.
निकि यानि अदिति का यह सफर खुशियो से भरा रहे ,उसका व्यकत्तिव निखरे,वो एक सम्पूर्ण, सशक्त,विवेकपूर्ण नारी बने,सही गल्त की पहचान कर सके,एसी मँगलकामना करते हुए उसके इस नव निर्माण का मै स्वागत करती हूँ.

1 comment:

Pratyaksha said...

निकी अब स्कूल एंजोय करना सीख रही होगी.
और निकी की बूआ ऐसे ही लिखती रहे..लेख , कवितायें और भी बहुत कुछ

प्रत्यक्षा