Friday, November 28, 2008

26/11/2008

यह वेदना है, अपनी धरती के हाल पर
या आक्रोश उभरा है सीने में
सत्य ,अहिसा, की पावन भूमि पर
आज दर्द मिला है जीने में.

विक्षिप्त,विदीर्ण इस ह्रदय में
क्रोध भी है , क्रंदन भी
शर्म से झुक गयी आँख अगर
गर्व से उच्च मस्तक भी .

सहिश्रुता की सीमा कब तक
हमको यूँ तड़पायेगी
आतंक से समझौता
हमें ऐसे ही दिन दिखलाएगी

बर्दाश्त नहीं हो पाता है
एक भी हमवतन का रक्त बहे
नेता जान बचाएँ अपनी और
बारबार हम ज़ुल्म सहें।
http://hindi.webdunia.com/samayik/article/article/0811/28/1081128085_2.htm