Friday, November 28, 2008

26/11/2008

यह वेदना है, अपनी धरती के हाल पर
या आक्रोश उभरा है सीने में
सत्य ,अहिसा, की पावन भूमि पर
आज दर्द मिला है जीने में.

विक्षिप्त,विदीर्ण इस ह्रदय में
क्रोध भी है , क्रंदन भी
शर्म से झुक गयी आँख अगर
गर्व से उच्च मस्तक भी .

सहिश्रुता की सीमा कब तक
हमको यूँ तड़पायेगी
आतंक से समझौता
हमें ऐसे ही दिन दिखलाएगी

बर्दाश्त नहीं हो पाता है
एक भी हमवतन का रक्त बहे
नेता जान बचाएँ अपनी और
बारबार हम ज़ुल्म सहें।
http://hindi.webdunia.com/samayik/article/article/0811/28/1081128085_2.htm

Tuesday, August 26, 2008

चिट्ठी पर चिटठा !

आज बहुत दिनों बाद ऐसा मौका हुआ की कुछ जन्मदिन के कार्ड डाक से भेजने थे। एक अदद पत्र पेटिका ढूंढते ढूंढते कई सडकों के चक्कर लगाए । आख़िर काफ़ी देर बाद एक छोटे से पोस्ट आफिस के सामने लेटर बॉक्स मिला। शहर में रहनेवालों के लिए अब चिट्ठी ,स्टैंप,डाकघर मानों लुप्तप्राय से हो रहे हैं। अब ज़माना है कुरियर का,ईमेल का, मोबाइल से बात करने का। यह चिट्ठी - पत्री तो किसी गुज़रे ज़माने की बात हो गयी। यह सब सुविधाजनक तो है पर चिठ्ठी का रोमांस इन में कहाँ।

मुझे याद है जब मैं पहली बार घर छोड़कर दिल्ली नौकरी करने गई थी.हर चीज़ को देखकर अपने घरवालों से बांटने का इतना मन करता की चिट्ठी कम पोथी ज़्यादा घरवालों को मिलती। जवाब में भी एक पोथी ही मिलती.हर बात का ज़िक्र ,हर घटना का बड़ी तसल्ली से वर्णन .मेरी चिट्ठियों के तो हाशिये पर भी कुछ कुछ लिखा होता और अगर शब्दों से काम न चलता तो ग्राफिक्स भी बनाए जाते.फोन आता पर कम हफ्ते में एक बार और इसलिए उसका भी बड़ी बेसब्री से इंतज़ार रहता। हम भी अपने प्रशिक्षण केन्द्र से बाहर किसी "पी सी ओ" पर लाइन लगाते घर फोन मिलाने के लिए। और अब सोते जागते ,जब मन चाहे फोन लगा दिया जाता है,मोबाईल की सहूलियत है.पर इंतज़ार की वह बेकरारी नहीं।

इनबाक्स खोलिए तो बहुत सी ईमेल आपके पास आई होंगी पर हाथ से लिखी चिट्ठी की आत्मीयता शायद उनमें न मिले। संपर्क तो तुंरत स्थापित हो जाता है पर चिट्ठी की तरह हर बात बताने की तड़प उनमें नहीं झलकती।

घर बैठे कुरियर वाला आपकी डाक ले जायेगा पर डाकिये की साइकिल ,खाकी युनिफोर्म और घर परिवार की खुशी में वह नहीं सम्मलित होता.मुझे याद है अपोइन्ट्मेन्ट लेटर मिलते ही हमारा डाकिया जिद पकड़ लिया की यह तो तभी मिलेगा जब मेरी बख्शीश और मिठाई का डिब्बा बदले में दिया जायेगा.आख़िर बेबी की नौकरी लगी है ! बचपन से वह देखता आ रहा था हमें । काली कोने वाली चिठ्ठी भी उसी ने हमें दी जब दादाजी नहीं रहे और हमारी शादी का कार्ड भी उसी ने बांटा ।

पोस्टकार्ड की भी याद आती है.दूरदर्शन से प्रसारित सुरभि में पूछे प्रशनों के जवाब लिख कर भेजने के लिए पोस्टकार्ड आए। हमारे एक भाई को अपने हॉस्टल से चिट्ठी लिखने में आलस आती थी सो उन्हें पते लिखे पोस्टकार्ड थमा दिए गए की भैया इस पर अच्छा हूँ लिख कर डाल दिया करो !
प्रगति की नाम पर हमारी जिंदगी में आराम के साधन बहुत हैं पर वह रूमानियत नहीं।

Sunday, August 17, 2008

बाबू समझो इशारे हार्न पुकारे पम पम पम

कुछ दिन पहले यूँ ही न जाने कैसे गाडी का हार्न ख़राब हो गया.वैसे बाद में याद आया .बगल में बैठी बेटी ने सीट बेल्ट नहीं लगाई थी पर पुलिस वाले ने जब किनारे रोकने का इशारा किया तो हमारी बुद्धि जगी और उसने तुंरत बेल्ट लगा ली..पुलिसवाला भी समझदार था.हमें अपनी ग़लती का एहसास हो गया सो उसने भी चालान नहीं किया .पर शायद इसका सदमा था की उसी वक्त से हार्न बजाना बंद हो गया!पहले लगा की हे भगवान अब गाडी कैसे चलाएंगे. चलो एक मेकानिक ढूँढो .आखिर हम लोगों की आदत है बिना हार्न बजाये गाडी दो कदम नहीं बढती .आप सड़क पर निकल जाइए .बेवज़ह पों पों सुनाई पड़ ही जाता है. अरे पीछे ट्रक है उसको रास्ता चाहिए.ट्रक वाला तो बड़े ही सुरीले अंदाज़ में हार्न बजाएगा. क्या उसको दिखाई पड़ रहा है की मेरे बायें और भी साइकिल सवारों और दो पहिया वालों की कतार है .उसको रास्ता दूँ तो कैसे? पर जनाब का पों पों बंद ही नहीं होता.सिर्फ़ तर्क चालक ही क्यूँ.कभी टाटा सूमो या क्वालिस के ड्राईवर आपके पीछे पड़ जाएँ तो देखिये आर्केस्ट्रा बजता है. जी करता है उतर कर उनका हार्न निकाल लूँ.यह कुछ नवयुवक हैं जो अपनी मोटरसाइकिल दौडा रहे हैं और साथ में लगातार हार्न बजाते जाते हैं.अरे भाई पहले तो यह ज़िग ज़ैग गाडी चलाना ही ठीक नहीं और ऊपर से यह हार्न की थाप के साथ .सबसे सुंदर नज़ारा है रेड लाइट पर या फ़िर बंद रेलवे फाटक पर.जैसी ही बत्ती हरी हुई की लाइन में बारहवें नंबर पर खडे कारचालक ने अपनी पों पों शुरू कर दी.अरे बाबू क्या तुम्हारी पों पों सुनकर तुम्हारी गाडी पहले नंबर पर पहुँच जाएगी या फ़िर हरी बत्ती होते ही बाकी गाड़ियों की रफ़्तार प्रकाश की तेजी ले लेंगी .सब्र करो तुम्हारा भी नम्बर आएगा इस बार नहीं तो अगली बार!
ऐसा नहीं की गुनाहगार हम नहीं.ख़ुद भी कई बार बेवज़ह हार्न का इस्तेमाल करने से नहीं चूकते .आराम से ट्रैफिक चल रही है की दिल में आया ज़रा यूं ही बस यूँ ही थोडा शोरगुल हो जाए और शुरू कर दिया राग यमन में पों पों. पर सच तो यह है की हार्न ख़राब होने के बाद एहसास हुआ की बिना उसका ईस्तेमाल किए भी गाडी चलाई जा सकती है . दो दिन तक मेकानिक के पास जाने का मौका नहीं लगा.पर क्या शान्ति से गाडी चलाई.हाँ ज़रूरत महसूस हुई किसी मोड़ , पर खासकर अंधे मोड़ पर या फ़िर तब जब कोई हमारी कार के सामने आकर जान देने को तत्पर हो जाता था.हाँ कभी थोड़ी धीमे गति से चलानी पडी या फ़िर थोडा दूरंदेशी से ।पर चलाने में असुविधा उतनी नहीं थी जितना की हम सोच रहे थे। असुविधा थी बस मानसिक कि हार्न के बिना गाडी चला रहे हैं.दो दिन बाद ठीक भी करा लिया। पर फ़िर यह संकल्प किया कि इसका इस्तेमाल कम से कम करेंगे और तभी जब अति आवश्यक हो।

Tuesday, July 08, 2008

काबुल --एक दर्द भरा दिन

काबुल हमेशा सुंदर दिखे यह ज़रूरी नहीं.कल के हादसे में भारतीय दूतावास को निशाना बनाया गया । भारत के ब्रिग मेहता और भारतीय विदेश सेवा के वेंकटेश्वर राव तथा इंडो टिबेटन बार्डर पुलिस के दो जवान शहीद हो गए। एम्बसी के गेट के सामने ही एक बारूद भरी कार ने इनकी लैंड क्रुसर से भिड कर आत्मघाती हमला किया। नियामत (लैंड क्रुसार का ड्राईवर ) बड़ी खुशमिजाजी से हमें काबुल में मिलता था .वह भी इस आक्रमण में शहीद हो गया । भगवान इनके परिवारों को हिम्मत दे .और ऐसा हमला करने वालों को सदबुद्धि।

Friday, July 04, 2008

आइये शाम का नाश्ता मेरे साथ

दाल चावल रोटी की खुशबू से खिंची जब उस रसोई में पहुँची तो एक से एक शानदार रेसिपी दिखीं .मेरे मन मुताबिक,बनाने में आसान और स्वाद में बेमिसाल.सोचा ,आज सोचना छोड़ कुछ कर लिया जाए. सो आफिस से घर पहुँचते ही पुदीने के पत्ते किचेन गार्डन से तोडे. बेसन घर में रहता ही है. शाम की चाय पी और जुट गए रसोई में.लीजिये हमारी बनाई आरेंज स्टिक का मज़ा लीजिये ! रचनाजी को धन्यवाद सहित . न जाने इसकी शकल सूरत अगर कोई निपुण बनाता तो कैसी होती मेरी वाली तो ऐसी थीं.




सब सामान एक जगह इकट्ठा कर लिया है.



यह है बेसन, पुदीना ,लाल मिर्च,हरी मिर्च,नमक का रंगीन मिलन !!



तेल मिलाकर संतरे नुमा गोला भी तैयार है.

पानी उबलते समय और गोले के फोटो नहीं ले पायी क्योंकि भाप की वजह से थोड़ा कैमरा ख़राब होने का डर था.हाँ गोला उपर तैरने लगे उसमें धैर्य रखना पङता है.


बेसनी संतरे की फांके भी कट गयीं .




स्वादिष्ट,चटपटी ओरेंज फ्राईज़ तैयार हैं .

लीजिये नोश फरमाइए !!

Wednesday, June 25, 2008

सलाम काबुल-४ (पंजशीर)

काबुल में अभी बहुत कुछ है देखने को पर पहले सैर करते हैं पंजशीर की. हमारे दोस्त सैफुलाह साहब और एक और भारतीय परिवार ने प्रोग्राम बनाया एक दिन पंजशीर जाने का.हम मेहमान थे वहाँ के एक सरदार जनरल मीर जान के जिन्होंने पहाड़ की चोटी पर बने अपने गेस्ट हाउस में हमें खाने की दावत दी. यह इलाका अफगानिस्तान का सबसे खूबसूरत इलाका है . काबुल से करीब 150 किमी पर है पंजशीर घाटी .पंजशीर नदी के किनारे किनारे बनी सड़क ,आपको जन्नत सा दृश्य दिखाती हैं. यह नदी भी निर्मल निर्जल है.न कोई प्रदूषण ,न कोई गंदगी.साफ़ तेज बहता जल .ऊंचे पहाडों के बीच कल कल बहती नदी , मनोरम वादी और हलकी ठंडक लिए हवा .







रास्ते में जगह जगह इस तरह युद्ध के चिन्ह दिखाई देते हैं . यह हैं पुराने रूसी टैंक .





























पंजशीर जाना जाता है अहमद शाह मसूद के नाम से जिनको पंजशीर का शेर कह कर लोग याद करते हैं. काबुल में भी इन्हीं के बड़े पोस्टर नज़र आते हैं. इन्होने अपनी नोर्दर्न अलियांस का गठन किया.सोवियत आक्रमण और कब्जे के दौरान पंजशीर का इलाका ही रूसी सेनाओं को रोका सका था और यहाँ सोवियत का अधिकार नहीं स्थापित हो पाया था.मसूद ने तालिबान को भी रोका था और पंजशीर प्रांत में उनका दखल नहीं हो पाया . पंजशीर घाटी में उनके गाँव के पास एक पहाड़ पर उनका मकबरा बन रहा है .





































हसीना के साथ जिसने हमें बड़े प्यार से खाना खिलाया और पहाड़ पर मेरा हाथ थाम कर चढ़ने में मदद की !











ऐसा नहीं है की पंजशीर जाते समय कोई मंजिल है जहाँ पहुंचना है. हम लोगों को तो जनरल साहब के ठिकाने तक जाना था पर रास्ता इतना सुंदर है की आप उसक आनन्द लेते हुए सफर को ही मंजिल मानिये.
रास्ते में ही एक गाँव के लोगों ने हमारे मेहमाननवाजी की .अफगानी चाय,नान,शहतूत हमारे लिये आसपास के लोगों ने भेजा. पर वहाँ खड़ी लड़कियों की तस्वीर लेने से मना कर दिया !

रास्ते में नदी में ठंडी होती कोल्ड ड्रिंक की बोतलें!

Friday, June 20, 2008

सलाम काबुल-३

टिप्पणियों से हौसलाफजई हुई है...तशक्कुर . इसके जवाब में बड़ा ही मीठा सा " काबिले तशक्कुर नीस्त " सुनने को मिलता है. यह जवाब मुझे इतना मीठा लगता है की कहना नहीं भूलती .और आप भी शुक्रिया या तश्क्कुर का जवाब ऐसे पाएँगे सबकी ज़बान से... मिलने पर असलाम वालेकुम के बाद एक सिलसिला आपकी खैरियत पूछने का ।खूबस्ती, खाने-खैरतस्ती ,चतुरस्ति . और आप बोलेंगे खूब हस्तम चतुर हस्तम। अपना दाँया हाथ सीने पर रखकर स्वागत करते हैं लोग.


दिल्ली से काबुल के लिये एयर इंडिया की उडानें हैं जो बुधवार को छोड हर दिन जाती हैं.फिलहाल यह सवेरे .४० पर दिल्ली अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से चलती हैं.सफर तकरीबन पौने दो घंटे का है. आपको वीसा लेना पडेगा .वैसे अफगानिस्तान की दो और विमान सेवायें भी हैं काम एयर और आरियाना जो शायद ज़्यादा सस्ती हैं पर भरोसेनमंद नहीं .दिल्ली से किराया लगभग १४००० के आसपास है ( आने जाने का,इकोनमी क्लास! )
आइये कुछ काबुल की सैर हो जाए



















काबुल की सबसे खूबसूरत जगह है "बाग़े बाबुर " जहाँ मुगल बादशाह बाबर का मकबरा है .बाबर समरकन्द से काबुल आये और फिर वहाँ से हिन्दुतान का रुख किया.पर हिन्दुस्तान का मौसम उन्हें पसन्द नहीं था.उनकी ख्वाहिश थी कि उन्हें उनके प्यारे काबुल में ही दफ़न किया जाए. उनकी इच्छा थी कि उन्हें आसमान के नीचे बिना ज़्यादा लाग लपेट के दफनाया जाए .सो उनकी कब्र भी खुले आसमन के नीचे है .सिर्फ चारों ओर बहुत ही सुन्दर जाली है।





तकरीबन २५ एकड़ में बने इस बाग़ को बाबर ने बनवाया था.गृह युद्ध में यह भी काबुल के अन्य स्थलों की तरह यह भी क्षतिग्रस्त हो गया था. इसके पीछे पहाड़ हैं जहाँ से गोले दागे जाते थे.इस बाग़ में बारूदी सुरंगे भी बिछाई गयीं.



अब आगा खान ट्रस्ट ,और संयुक्त राष्ट्र की मदद से इसको पुनः उसी रूप में लाया जा सका है.कहते हैं मुग़ल काल के बागों की विशिष्ट चारबाग नुमा रचना इसी बाग़ पर आधारित है .






यहाँ शाहजहाँ द्वारा बनायी गयी एक मस्जिद है













यह फोटो रेस्टोरेशन के काम से पहले की है और इसमें गोलों के निशान साफ़ नज़र आ रहे हैं.चित्र आभार http://www.bbc.co.uk/