Wednesday, October 13, 2010

घुमंती बेन पहुंची कुतुब मीनार्

मैंने अपनी दोनों बाँह से उस लोहे के खम्बे को जकड लिया है और यह मांग रही हूँ कि मुझे ऐसे ही विश्व विरासत स्थल देखने को मिलते रहे !"


अरे घुमंती बेन यह किस खम्बे की बात कर रही हैं ? और क्या किसी खम्बे को अपनी बाहों में जकड लेने से कोई भी इच्छा पूरी हो जाती है?

हाँ,इस लौह स्तम्भ के बारे में तो यही प्रसिद्ध है कि अगर अपने हाथ पीछे कर के कोई इस लौह स्तम्भ के पूरा घेर ले और एक हाथ दूसरे को छू तो वह जो माँगता है वह उसे मिल जाता है.

अच्छा ऐसी बात है तब तो फिर हम लोगों को भी उस जगह ले चलिए.

ले तो चलूँ .पर अब वहां उस स्तम्भ को  बाहर से घेर दिया गया है जिससे कि इसे नुक्सान न पहुंचे .
 पर वह जगह है कौन सी?

बहुत प्रसिद्ध ,.तुम सबने ज़रूर नाम सुना होगा.

अरे पहेलियाँ क्यों बुझा रही हैं .बताइये तो ?

यह स्तम्भ है हमारे देश कि राजधानी दिल्ली में क़ुतुब मीनार !

पर क़ुतुब मीनार क्या लोहे की  बनी है?

नहीं रे,अब इस बार तुम्हें क़ुतुब मीनार की सैर कराऊंगी तो सब पता चल जाएगा !

यह भी एक विश्व विरासत स्थल है तो चलो देखें दिल्ली की सबसे ऊंची मीनार और जाने उसकी कहानी .

सन ११९० में अफ़गान मुहम्मद घुर ने भारत पर आक्रमण किया और दिल्ली के राजा पृथ्वीराज चौहान को हराकर यहाँ पर अपनी शासन स्थापित किया. मुहम्मद गोरी तो वापस जहां से आया था वहां चला गया ,पर अपने राज्य की देखभाल की ज़िम्मेदारी अपनी सेना के प्रमुख क़ुतुबुद्दीन ऐबक को सौंप दी. यह बाद में दिल्ली का सुलतान बन गया . क़ुतुब मीनार का निर्माण इन्होने  ही शुरू करवाया था. इनके दो मकसद थे ,एक तो इतनी ऊंची मीनार बना कर अपने साथ आये सिपाहियों के हौसले बुलंद करना और दूसरा पराजित लोगों के बीच अपनी धाक ज़माना. इसलिए लाल इंटों से बनी यह मीनार दूर दूर तक दिखाई पड़ती है . अब तो अगर दिल्ली का नाम लो तो सबसे पहले याद आती है क़ुतुब मीनार .मुझे तो लगा कि उन्हीं के नाम पर इसे क़ुतुब मीनार कहते हैं ,पर इसमें भी एक राय यह है कि बग़दाद से एक बहुत ही मशहूर संत,ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी ,भारत में बस गए थे और इल्तुतमिश उनके बहुत भक्त थे,इसलिए इस मीनार को उनके नाम से जाना जाता है .वैसे तो क़ुतुब का मतलब है धुरी और इस मीनार को बनवाकर कुतुबुद्दीन ऐबक भारत में इसे इस्लाम की धुरी के लिहाज़ से बनवा रहे थे.

 दक्षिण दिल्ली में महरौली के पास हम मेट्रो से उतरे और पैदल ही चल पड़े इसे देखने. टिकट लिया और साथ में इसके बारे में जानकारी देता एक उपकरण " ओडियो गाइड ". इसको हमने अपने कान में लगाया और इस जगह की बहुत सी बातें उस में रिकोर्ड थीं जिससे हम इस जगह को देखने और समझने में बहुत सुविधा हुई. क़ुतुबुद्दीन ऐबक ने इस मीनार को ११९९ में बनवाना शुरू किया. ७२.५ मीटर ऊंची यह मीनार उनके बाद इल्तुतमिश ने पूरी करवाई और इसमें ३ मंजिल और जोडें. पर अभी तो यह पांच मंजिला इमारत है . हुआ यह कि इतनी ऊंची ईमारत पर दो बार बिजली गिरी और उसकी ऊपर की मंजिल ध्वस्त हो गयीं. फ़िरोज़ शाह तुगलक ने फिर से ऊपर की मंजिल बनवाई और उसे पांच मंजिला कर दिया. इतनी ऊंची मीनार हमें गर्दन टेढ़ी कर के ही देखनी पड़ती है. फिर भी ऊपर का भाग साफ़ नहीं दिखता. हाँ यह पता चलता है कि पहले की तीन मंजिलें लाल ईंट की हैं और ऊपर की संगमरमर की.इसके बाद भी यह मीनार कई बार टूटी.भूचाल से भी इसको नुकसान पहुंचा और बाद के सुल्तान सिकंदर लोदी ने इसकी मरम्मत कराई . अंग्रेजों के ज़माने में भी इसकी ऊपर की छतरी गिर गयी. एक मेजर स्मिथ को इसकी मरम्मत का काम दिया गया.उन्होंने कुछ ऐसी तरह की छतरी ऊपर लगाई कि वह बाकी मीनार से बिलकुल मेल नहीं खाती थी. इसको वाइसराय लोर्ड हार्डिंग ने उतरवा दिया और यह अभी भी वहां एक किनारे रखी दिखी ',स्मिथ'स फोली '(स्मिथ की बेवकूफी) के नाम से ! कुछ लोगों का मानना है कि यहाँ बनी कुव्वत -उल-इस्लाम मस्जिद में नमाज़ अदा करने के लिए मुआज़्ज़िन अज़ान देते थे. लेकिन फिर उतने ऊपर हर दिन चढ़कर जाना काफी मुश्किल जान पड़ता है. आखिर ३७९ सीढियां जो हैं ! पर अब तो अफसोस कि क़ुतुब मीनार के अन्दर जाना बिलकुल मना है. काफी साल पहले यहाँ पर्यटक ऊपर तक चढ़ सकते थे पर फिर एक बार १९८० के दशक में स्कूली बच्चों का एक दल इसको देखने आया. अचानक बिजली गुल हो गयी और बच्चे घबरा गए . भगदड़ मच गयी और काई बच्चे इसी में मर गए.तब से अन्दर जाने की मनाही हो गयी है. नहीं तो यह सीडियां हर मंजिल पर बनी बालकनी पर खुलती थीं और अंत में ऊपर बने प्लेटफार्म पर ख़त्म होतीं. अपने दादा दादी या नाना नानी से पूंछो ,वह बताएँगे कि देव आनंद और नूतन पर एक गाना ' दिल का भंवर करे पुकार..' इसकी सीड़ियों पर फिल्माया गया था ! मीनार पर कुरान शरीफ की आयतें खुदी हुई हैं और साथ ही बहुत बारीक नक्काशी भी देखने को मिली.

क़ुतुब मीनार के परिसर में और भी कई इमारतें हैं. इनमें सबसे प्रमुख है कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद जो कुतुबुद्दीन ऐबक ने ही बनवाई थी .

अपने घर से दूर अफ़गान सैनिकों के लिए सबसे पहले दो मस्जिद बनवाई गयीं,एक दिल्ली में और एक अजमेर में.दिल्ली की यह मस्जिद  भारत की पहली मस्जिद है. इस जगह पहले २७ हिन्दू और जैन मंदिर थे जिन्हें तोड़ कर यह मस्जिद खड़ी की गयी. अभी भी यहाँ की दीवारों पर उन मंदिरों के हिस्से देखने को मिलते हैं. कई खम्बे उन्हीं मंदिरों के हैं. वैसे तो यह सब अब बस खँडहर ही हैं पर देखने में बहुत ही रूचिकर. वहीं पास में है इल्तुतमिश का मकबरा मस्जिद में जाने के लिए एक बड़ा दरवाज़ा भी है जो बाद में अलाउद्दीन खिलजी ने  बनवाया.यह है अलाई दरवाज़ा .अलाउद्दीन खिलजी क़ुतुब मीनार के बगल में एक और मीनार बनवाना चाहते थे जो उससे भी ज़्यादा शानदार हो,सो उन्होंने अलाई मीनार का निर्माण शुरू करवाया. पर उसकी पहली मंजिल बनते हुए ही उनकी मृत्यु हो गयी और फिर किसी और राजा ने इसे ख़त्म नहीं किया. अलाउद्दीन खिलजी ने वहां पर पीछे की तरफ एक मदरसा भी बनवाया और उनका मकबरा उसी के पास है.

तुम लोग सोच रहे होगे कि यह सब तो घुमंती बेन तो लगता है सफ़र पूरा कर चुकी हैं पर उस लौह स्तम्भ का तो कुछ अता पता ही नहीं है! उसको भी मैंने देखा.वहीं मस्जिद के आँगन में. यह पहले उन्हीं मंदिरों में खड़ा था जिन्हें गिरा दिया गया था. कहते हैं कि यह खम्भा चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के समय बनाया गया था . सबसे आश्चर्य तो यह कि यह ९८% लोहा है लेकिन फिर भी इतनी शताब्दियों  बाद भी इसमें जंक नहीं लगी है यह एक बहुत ही रहस्यमय बात तो है ही साथ ही उस ज़माने के लुहारों की योग्यता के बारे में भी हमें अंदाजा लगता है. वो अपने काम में इतने निपुण थे कि आज भी यह लौह स्तभ वैसा ही है. ७.२ मी ऊंचा यह खम्भा एक दम चिकना है.इस पर ब्राह्मी लिपि में संस्कृत में कुछ लिखा हुस दिखा.अपने ऑडियो गाइड से पता चला कि यह भगवान विष्णु के ध्वज स्तम्भ के रूप में राजा चन्द्र ने बनवाया था .इस खम्बे की धातु को देखकर यह भी अंदाजा लगाया जाता है कि शायद किसी और जगह से यहाँ लाया गया .दिल्ली के राजा अनंगपाल,जिनका नाम भी इस खम्बे पर खुदा है , इसे मध्य प्रदेश में उदयगिरी से ले कर आये थे.बहरहाल मेरा यह सपना  कि अपनी हाथ से इसका घेरा नापूँ, अधूरा ही रह गया क्योंकि उसे हम जैसे लोगों से बचाने के लिए अब उसके चारों तरफ एक बेडा बना दिया गया है. वैसे जो सबसे रोचक कहानी है वह यह कि महाभारत के समय भीम ने इस को यहाँ उठाकर गाड़ दिया था .यह सापों के राजा के सिर पर गडी हुई है क्योंकि सांपो के राजा ने अर्जुन को काट लिया था