Tuesday, January 25, 2011

अंडमान यात्रा ..काला पानी जहाँ आज़ादी के सिपाही को मिला धरती पर नर्क

५७२ द्वीपों में सिर्फ ३८ ही आबाद हों. बाकी सब जगह सिर्फ जंगल ही जंगल. अंडमान -निकोबार द्वीप समूह ऐसा ही है जहां प्रकृति  की छटा हर तरफ बड़ी ही उदारता  से दिखाई देती है. बड़ी ही नरमी से बात करने वाले लोग, आराम से चलती ज़िंदगी ,समुद्र का साथ ,पेड़ों से दोस्ती ,इस जगह को नायाब बना गयी है. पहले दिन रोस टापू का दौरा किया और शाम को सेल्युलर  जेल यानी भयावह काला पानी . दिन में इसे हमने अगले दिन देखा. ह्रदय में इतना तूफ़ान ,इतनी तड़प  इसे देखते समय महसूस हुई कि बयान करना मुश्किल  है  . भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद अंग्रेजों ने यहाँ ऐसा जेल बनाया जिससे बाहर निकलना नामुमकिन था. समुद्र के किनारे ,जंगलों के बीच मुख्य भारत से दूर ,उन्होंने स्वंत्रता संग्राम के सेनानियों  को यहाँ अपने घर परिवार से दूर निर्वासित किया. १८९६ में इस जेल का निर्माण शुरू हुआ और इसमें काम करने वाले वही बहादुर सिपाही  और आसपास के टापू पर बने जेलों के बंदी थे  ,जिन्हें आजीवन कारावास की सजा के तौर पर यहाँ भेजा गया था. १९०६ में यह बनकर तैयार हुआ . इसका नक्शा इस तरह का था कि एक  मध्य बुर्ज को केंद्र मानकर सात खंड बाहों जैसे बाहर निकलते  हैं. एक खंड का पिछवाडा दूसरे खंड के सामने है जिससे कैदीयों की  आपस में कोई भी बातचीत न हो  सकें. अब तो सिर्फ तीन खंड ही बचे हैं. इसके दो खंड पहले अंग्रेजों ने गिरवा दिए और दो बाद में भारतीय सरकार ने. पर अब इसे राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा दिया गया  है . कारागार बनाने वालों का मानना था कि
"prison regime must be punitive and humiliating even more dreadful than hangman`s noose" so as to employ deterrence through fear both against those subjected to it and for the `potential dangers`
इसके अन्दर पहुँचने पर दोनों तरफ कमरा है जिसमें वहां जिन वीरों ने समय बिताया था और उस जेल के विषय में  प्रदर्शनी है. वहां पर दिए गए कष्टों को हम रात के शो में देख चुके थे.उनकी तसवीरें देखकर दिल दहल गया . पैरों में पड़ने वाली बेड़ियाँ,सजा के तौर पर पहनाई जाने वाले  बोरे के कपडे आदि. वहां से निकल कर अन्दर पहुंचे कारावास के प्रांगण  में. नज़र पडी कोड़े मारने वाली जगह पर. यहाँ पर कैदियों को बांधकर कोड़े मारे जाते. बीच में बना था एक कोल्हू. बैल की जगह  यहाँ के  बंदी   उसमें बांधे जाते और तेल निकालते . सामने एक ऊंची कुर्सी पर दरोगा बैठ कर उनको  चौकसी रखता . कई लोग इस में घायल हो जाते.  आखिर स्वतंत्रता के लिए अपना सब कुछ बलिदान करने वालों को इतना अपमान असह्य हो जाता . यही तो अँग्रेज  चाहते थे. बौद्धिक और शारीरिक स्तर पर स्वतंत्रता  के वीरों  को तोड़ देना.राजनीतिक कैदियों,हाथ में कलम से लड़ाई  करने वालों,  युवा अवस्था में पदार्पण कर रहे साहसी क्रांतिकारियों  के साथ अमानवीय ,अविश्वसनीय क्रूर व्यवाहार होता था.








तीन मंजिला जेल ,कालकोठरी की एकाकी सजा के लिए बना था.
बुर्ज से चारों ओर पहरा आसानी से दिया जाता था .एक भाग केदूसरे मंजिल पर वह कमरा भी देखा जिसमें वीर  सावरकर को रखा गया था. इस कमरे से सीधे वह जगह दिखती थी जहाँ मृत कैदियों का अंतिम संस्कार होता था. शायद वीर सावरकर को मानसिक यंत्रणा देने के लिए ही उन्हें इस कक्ष में रखा गया. नीचे आकर फिर देखा वह स्थान जहाँ फांसी दी जाती थी . उसे देखकर खौफ सा लग गया . न जाने क्यों उस की फोटो खींचने में हाथ कांपने लगे. काला पानी  के कारावास को देखकर एहसास हुए कि जिन्होंने अपनी जवानी ,अपनी ज़िंदगी आज़ादी के लिए कुर्बान कर दी , उनकी दी गयी विरासत को हम कितनी लापरवाही से रख रहे हैं. एक दिन पहले आपस में यह बहस छिड़ी थी कि क्यों ब्रिटिश काल के नामों को बदल कर हम हिन्दुस्तानी नाम दे रहे हैं. एक बार को मुझे भी लगा कि नाम नहीं बदलने चाहिए,वह भी हमारा इतिहास है ,अच्छा  या बुरा. पर फिर काला पानी के उस स्मारक को देख कर लगा कि जिन्होंने इतनी असह्य  तकलीफें हमारे देशवासियों को दीं ,उनके नाम पर अपने   देश में क्यों कोइ जगह,कोइ सड़क,कोइ शहर ,कोइ स्टेशन रहे.



      

Tuesday, January 18, 2011

अंडमान की यात्रा ..जहाँ अभी भी नैसर्गिक सौन्दर्य रिझाता है.

इस वर्ष तय हुआ कि साल की शुरुआत कहीं सैर सपाटे करते हुए,घर से दूर करेंगे.सो पहुँच गए ठण्ड से निजात पाने पोर्ट ब्लेर , भारत का एक खूबसूरत शहर .वैसे तो इंडियन एरलाईन के कारण शुरुआत काफी  रोमांचक हुई ,यहाँ तक  की ऐसा लग रहा था कि हमें   घर वापस जाना होगा. हवाई अड्डे पहुँचने पर बताया गया कि जिस प्लेन में हमारा टिकट है वह तो भर चुकी  है और हमें बैठाया नहीं जाएगा. लेकिन उस में भी एक मोड़ था.हमारे ६ सदस्य के परिवार दल के तीन सदस्यों को उन्होंने बोर्डिंग कार्ड दे दिया था . तो आधा परिवार चेन्नई में और आधा दिल्ली में.खैर कुछ बहसबाजी कर हम बाकी तीन भी चेन्नई पहुँच गए , रात के बारह बजे.
पर सवेरे  पोर्ट ब्लेर का जहाज समय पर चला और हम ८ बजे के करीब एक सुन्दर हरे  भरे शहर में पहुंचे.सर्किट हॉउस में ठहराने का प्रबंध था .फिर शुरू हुआ प्राकृतिक सौन्दर्य और इतिहास के संगम का सफ़र . दोपहर बाद हम गए पोर्ट ब्लेर से कुछ  किमी दूर   रॉस टापू. एबरडीन जेटी  से ही यह ऐतिहासिक द्वीप दिखाई पड़ता है. वहां के लिए जहाज जाते हैं और उसी दिन वापस भी आना पड़ता है.आख़िरी जहाज ४.३० बजे हमें वापस ले आया. अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में ५७२ द्वीप हैं जिनमें सिर्फ ३८ ही आबाद हैं. बाकी जंगल ही जंगल.
रॉस टापू पर पहुँचते ही लगा कि हम इतिहास के पन्ने पलट रहे हैं. जहाज से उतारते ही एक जापानी युद्ध काल का  बन्कर दिखा.
रॉस आईलैंड का इतिहास रोचक है. १८५७ के स्वतंत्रता संग्राम के बाद अंग्रेजों ने  स्वतंत्रता सेनानियों और बंदियों को अंडमान भेजने का निर्णय किया . रॉस आइलैंड को संचालन केंद्र बनाया गया और यहाँ चीफ कमिशनर का दफ्तर बना . आज रॉस टापू एक दम वीराना है. भारत की नौसेना का यहाँ एक अड्डा है और उस ने यहाँ एक छोटा म्युसियम बना है. पर एक ज़माना   था जब यहाँ  चहल पहल थी  और चीफ कमिश्नर का खूबसूरत   बंगले में  बॉलरूम  था ,एक सुन्दर चर्च ,वाटर ट्रीटमेंट प्लांट , अस्पताल,छापाखाना ,बाज़ार,बेकरी आदि सब थे. अब सिर्फ इनके खँडहर दिखाई पड़ते हैं. लेकिन खंडहर बताते हैं इमारत की बुलंदियों की कहानी . शानदार चर्च  अब टूट फूट गया है. इमारतों के खँडहर में वहां पाए जाने  वाले वृक्ष की जड़ों ने जकड लिया . जैसे कि बीते ह्युए कल से बदला ले रहे  हों  , भारतीयों  पर किये गेये ज़ुल्मों का.
 एक कब्रिस्तान भी दिखा .अंग्रेजों के ज़माने में पूर्व का पेरिस कहा जाता था यह टापू. १९४२ में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापानियों ने अन्य अंडमान के द्वीपों की तरह  यहाँ भी कब्जा कर लिया और १९४५ में यह वापस अंग्रेजों के पास आया. जापानी आवास के समय नेताजी भी यहाँ पधारे थे और यहाँ के मुख्यालय पर भारतीय झंडा लहराया था . लेकिन १९४५ के बाद अंग्रेजों ने इसे त्याग ही दिया और पोर्ट ब्लेर में अपना मुख्यालय  स्थापित किया.




वहां पहुंचकर , नौसेना सबसे एक रजिस्टर में नाम दर्ज करवाती है और २० रुपये प्रवेश शुल्क है. घूमते रहे और देखते रहे इतिहास को. पेड़ों की भरमार तो है ही,लगता ही नहीं यहाँ कोई रहता है. हिरन के झुण्ड घूमते नज़र आयेंगे और अगर आप हाथ बढ़ाकर बिस्किट दें तो कभी अपनी झिझक छोड़ कर  आपके नज़दीक भी आ जाते हैं..
चर्च की पीछे की तरफ है एक छुपा   हुआ समुद्र तट  'फेरार बीच' .कम लोग वहां तक जाते हैं इसलिए बड़ा अच्छा लगा वहां बैठना .समुद्र में लटकती पेड़ की एक शाखा पर हम डगमगाते, डरते जा बैठे. पेड़ों के बीच पगडंडियों  पर,खंडहरों के इर्द गिर्द  घूमते वापस जाने का समय हो गया . सोच कर लगा कि कैसे एक भरा पूरा कस्बा अब सिर्फ सैलानी आँखों  की कौतुहल का विषय रह गया है .