शनिवार, जुलाई 04, 2020

नाश्ते के साथी

सुबह जब फ़्लफ़ीजी को नाश्ता दिया जाता है तो हमलोग भी उस समय  सवेरे की चाय का मज़ा ले रहे होते हैं साथ में और भी अतिथिगण की मौजूदगी हमारी सुबह को तरन्नुम से भर देती है।जंगल बैब्लर,मैना और भी बहुत सी चिड़ियों की चहचहाट तो भोर  होते ही सुनने को मिलती है पर इन सबमें सबसे धृष्ट या कह लें सबसे निर्भीक होता है कौआ।फ़्लफ़ी इधर खाना खा रहा होता है कौवों की जमघट लग जाती है।सब उसे घेर कर बैठे हैं कि कब वह खाना ख़त्म करे और कब वह सब बचे हुए पर टूट पड़ें।
आज हमने बड़े ध्यान से देखा।देखिए कैसे एक कौवा औरों से अधिक साहसी है और वह फ़्लफ़ी के क़रीब पहुँच जाता है उसे हिम्मत बांधनी पड़ती है।उनकी भाव भंगिमा मज़ेदार कहानी कहती है।एक कौवा औरों से आगे बढ़ता है ज़मीन पर कुछ रोटी के टुकड़े हैं जिन पर उसकी दृष्टि जमी हुई है पर वह आसपास को और फ़्लफ़ी को भी देख रहा है फ़्लफ़ी खाना खाने में मगन है पर वह,बल्कि सारे कौवे इस बात के लिए तैयार हैं कि जैसे उसने सिर उठाया तो तुरंत उड़ जाएँ ।वह धीरे धीरे करके तिरछे खिसकता हुआ पास आता है गर्दन टेढ़ी कर फ़्लफ़ी को देखता है फुर्ती से चोंच में एक टुकड़ा पकड़ खिसक जाता है
आसपास उसके प्रतियोगी भी हैं । हम देख रहे हैं कि एक और कौवा पहले वाले से होड़ लग रहा है।
सबकी क्रिया,प्रतिक्रिया,मुद्राएँ सम्मोहित करती हैं।फ़्लफ़ी जी तो अपना नाश्ता करने में इतना व्यस्त है की उसे इन सब से कोई दिलचस्पी नहीं कि आसपास क्या हो रहा है।हममे भी नहीं।उसके बग़ल में बैठकर हम विडीओ बना रहे थे पर उसने हमें देखा तक नहीं।कौवे उससे डर डर कर उसके आसपास बैठे थे या पास आने का दुस्साहस कर रहे थे।वह  इस बात से बेख़बर था या बेपरवाह।दूसरी ओर कौवे उसकी  ओर ध्यान से देख रहे थे,प्रतीक्षा में,कुछ हिम्मती, कुछ धैर्यवान,कुछ दबंग,कुछ प्रतिस्पर्धात्मक।
आज इनका एक विडीओ बना लिया।फ़्लफ़ी जैसे ही खाना ख़त्म करके बैठता है सब उसके बचे खाने की ओर इकट्ठा हो जाते है।हमलोग भी उसका डिब्बा लॉन में रखकर कुछ और रोटी डाल देते हैं वह भी एक अलग मनोरंजक दृश्य होता है
देखें सुबह सवेरे का यह दृश्य इस video में



शुक्रवार, अप्रैल 10, 2020

एक विचलित पुकार



तुम ऊपर से देख रहे होगे न 
इन काले बादलों के बीच से कहीं
 नीचे फैले शांत कोलाहल को 
रुई से बादलों में स्थिर अडिग 
नीचे सब डगमग डगमग 
उस  फीकी रोशनी की लकीर के बीच से कहीं 
नीचे स्याह,मलिन तुम्हारी दुनिया  
पेड़ तुम्हारे,हवा तुम्हारी 
नीचे एक काला साया?
कितना ठहरा  कितना अविचल 
नीचे कितना विचलित, बोझिल। 



शाम को एक बहुत सुन्दर फोटो खींची थी। वैसे भी केरल में आप कैमरा कहीं भी घुमा दीजिये,एक अप्रतिम तस्वीर उतर जायेगी। उस पर किसी के अनुरोध पर कुछ पंक्तियाँ लिखने पर,इस परेशान समय में यही निराशाजनक विचार आये। पर चित्र इतना सुन्दर और प्रकृति इतनी अनुपम है कि इस पर कुछ positive लिखने का भी खुद से वादा है। 

मंगलवार, मार्च 17, 2020

अत्तुकल भगवती का पोंगाला महोत्सव








हमारा देश है धरोहर की अनंत खान। हर जगह के अपने रिवाज़,हर क्षेत्र की अपनी परम्पराएँ। सबसे आश्चर्य यह की हम दूसरे  क्षेत्र और प्रांतों के  बहुत ही लोकप्रिय त्योहारों और प्रथाओं से कितने अनभिज्ञ और बेखबर  रहते हैं।
इस समय त्रिवेन्द्रम या फिर तिरुवनंतपुरम में रहने की वजह से यहाँ के सामान्य जीवन से परिचय हो रहा है।  उत्तर भारतीय हैं  सो होली की तैयारियों और उसके साथ जुड़े जोश और उमंग में ही मन रमा हुआ था। यहाँ पर होली की न तो दफ्तरों में छुट्टी है और न ही उसके प्रति कोई उत्साह। पर हाँ, सड़क पर एक दो दिन पहले निकले तो देखा दोनों तरफ ईंटें रखी हैं। सिर्फ एक या दो सड़कों पर नहीं पूरे शहर में। कौतूहल जागना स्वाभाविक ही था। पूछताछ की तो पता चला यह पोंगाला की तैयारी है।
आस्था है,श्रद्धा है और लोकमान्यताएं हैं। सब कुछ मिल जाता है तो उभर कर आती हैं प्रथाएं और ऐसी उपासना जो बिकुल अनोखी है।
अत्तुकल  भगवती का मंदिर प्रसिद्ध  पद्मनाभस्वामी मंदिर से कोई दो किमी की दूरी पर है। यहाँ की भगवती देवी के बारे में बहुत से कथाएं हैं। मानते हैं की मदुरई  में कन्नगी नाम की एक महिला थीं। उनके धनी व्यापारी पति का एक नर्तकी से रिश्ता जुड़ गया और वह उस पर अपना धन लुटाने लगे। अन्ततः वह जब कंगाल हो गए  तो कन्नगी के पास वापस आ गए । वह राजा के दरबार में कन्नगी की  एक पायल बेचने पहुंचे। भाग्य का खेल उसी समय रानी की पायल चोरी हो गयी थी और व्यापारी कोवलन को चोर मानकर राजा ने उन्हें मृत्युदंड दे दिया। इस अन्याय से क्रोधित  कन्नगी दूसरे पैर की पायल लेकर राजा के दरबार पहुँची। कन्नगी ने अपनी पायल तोड़कर दिखाई जिसके अंदर माणिक भरा हुआ था जबकि रानी के पायल में मोती थे। क्रोधित कन्नगी ने मदुरई को शाप दे दिया और शहर जलने लगा। कन्नगी फिर कोडुन्गल्लुर चली  गयीं। वहाँ जाते हुए रास्ते में वह अत्तुकल में रुकीं। एक वृद्ध से मदद माँगी और रात जब वह उनके भोजन की तैयारी कर रहे थे तो गायब हो गयीं । पर उस व्यक्ति को स्वप्न में सन्देश दिया कि वहाँ  वह  एक मंदिर बनायें और उस स्थान को भी तीन रेखाओं से निशान बनाकर चिन्हित कर दिया। मंदिर बना और साथ शुरू हो गयीं यह परम्पराएँ। इस मंदिर से जुड़ीं और भी कथाएं हैं। पोंगाला के मायने होते हैं उफान आकर उबलना।स्त्रियां मीठे चावल यानी पायसम बनाकर देवी से अपने लिए वरदान मांगती हैं।
    पर यह तो नौवें दिन की गतिविधि है। दरअसल पोंगाला दस दिन का त्यौहार है और शुरू होता है फरवरी-मार्च में कार्तिका नक्षत्र के दिन। दस दिन चलने वाले इस त्यौहार का चरम  रूप होता है नौवें दिन जब पूरम नक्षत्र और पूर्णिमा होती है। मंदिर में नौ दिनों तक भजन,देवीगीत और कन्नगी की कथा चलती रहती है। महिलाएं कुछ दिन पहले से ही अपने चूल्हे की जगह सुरक्षित कर लेती हैं। तीन ईंटों का चूल्हा बनता है। पहले कभी मंदिर के आसपास ही यह होता रहा होगा। पर अब तो पूरे शहर में दस बारह किमी की दूरी पर भी लोग चूल्हा लगा लेते हैं। श्रद्धा और  भक्ति की मिसाल है यह।मंदिर के आसपास की जगह पर तो बहुत दिनों से लोग अपना अधिकार जमा लेते हैं। दूर -दूर से स्त्रियां आती हैं। प्रवासी भारतीय भी इसे मनाने के लिए इस समय केरल पहुँच जाते हैं। स्त्रियां उस दिन व्रत रखती हैं,सूती नयी साड़ी अथवा सेतु मुंडू पहनती हैं और सवेरे चार- पांच बजे से ही अपने चुने हुए स्थान पर पहुँचने लग जाती हैं। दरअसल इस समय सड़कों पर बहुत भीड़ होती है। घर के लोग उन्हें वहां पहुंचाने जो आते हैं। नए बर्तन या तो मिट्टी के या स्टील,एल्युमीनियम के ही चूल्हे पर चढ़ेंगे।यह पोंगाला साड़ी भी दुकानदार बहुत कम कीमत पर रखते हैं जिससे गरीब से गरीब भी यह पूजा कर सके। कई जगह कपडे खरीदने जाओ तो चावल या बर्तन साथ में दे दिए जाते हैं। मकसद बस इतना कि इस सामूहिक आयोजन करने से कोई वंचित न रह जाए। और क्या चाहिए देवी को। उनकी पूजा में सब मिल जाएँ। चारों और फैले सुख और समृद्धि।
       हम सवेरे नौ बजे के करीब पोंगाला और उससे जुड़ी तैयारियाँ देखने पहुंच गए। साथ लिया अस्वथि को जो यहाँ की रहने वाली हैं और जिन्होंने मुझे इस परंपरा की बारीकियों से परिचित कराया। आभार है उनका। एम्बुलेंस के अलावा कोई गाड़ी उन सडकों पर नहीं थी। लोग पैदल चल रहे थे। कई जगह लोगों के खाने-पीने और पानी के इंज़मात थे । सभी दुकनें  खुली थीं। सब घरों के दरवाज़े खुले थे।  पूरे शहर में किनारे चूल्हे बने हैं और बर्तन चढ़े हुए हैं। यहाँ तक की लोगों  ने घरों के सामने की जगह पर,मंदिर के परिसर में,किसी सामूहिक भवन के परिसर में भी चूल्हे बना रखे थे। मस्जिद हो या चर्च सब स्थानों पर आज पानी की व्यवस्था थी और सब हाथ बढ़ा रहे थे।  धर्म से ऊपर उठकर यह शायद एक सांस्कृतिक आयोजन था जिसमें हर केरलवासी हिस्सेदार होता है। आग अभी नहीं जली है। वह तो तभी जलेगी जब देवी का पोंगाला बनना  शुरू होगा। धीरे धीरे हम मंदिर की ओर  बढे। बड़ी अचम्भे की बात थी कि इतने बड़े आयोजन के बावजूद सबकुछ बहुत व्यवस्थित और शिष्ट। हमने सोचा मंदिर के पास भीड़ होगी और वहाँ  तक पहुँचना मुश्किल होगा। पर सड़कें खाली ही थीं। बस किनारे सब लोग धैर्य से शुभ मुहूर्त की प्रतीक्षा कर रहे थे। कई चूल्हों के पास केले के पत्ते  पर चावल,अगरबत्ती,नारियल आदि रखा हुआ। दिया जला हुआ है। माना जाता है कि  इस समय उस चूल्हे पर देवी बैठी हैं। सब अपने साथ चावल और अन्य सामान लाये थे। सिर्फ मीठे चावल ही नहीं प्रसाद के रूप में इस समय लोग और भी पकवान बनाते हैं। सबमें चावल होता है जैसे मंदा पुट्टु ,थिराली अप्पम और करवाना। थराली अप्पम तो चावल का आटा ,गुड़ और नारियल को ताज़े तेज पत्ते में बाँध कर भाप पर पकाया जाता है। कोई बहुत कुछ बनाता है,कोई सिर्फ पोंगाला। किसी ने  मन्नत माँगी है तो वह पाँच छह चूल्हे भी जलाती हैं।
अब हम मंदिर के द्वार तक पहुँच गए थे। मंदिर के बाहर बहुत खाली जगह है पर उस समय सब जगह यह पवित्र चूल्हे बने हुए थे। मुहूर्त का समय था दस बजकर बीस मिनट पर। मंदिर के गर्भगृह की रसोई में चूल्हा जला,उसकी आग से बाहर मंदिर के ही प्रांगण में बना ईंटों का चूल्हा जलाया गया जिसपर देवी का प्रसाद चढ़ेगा। उसी आग से फिर सैकड़ों चूल्हे जलने लगे। दूर बैठी श्रद्धालुओं के लिए लाऊडस्पीकर पर घोषणा हो रही थी।  वैसे तो मंदिर के चूल्हे की लकड़ी से ही  सबको अपना चूल्हा जलाना होता है पर दूरी के कारण यह संभव नहीं।
 उधर मंदिर भी देवी दर्शन के लिए खुल गया और जो लोग पोंगाला नहीं बना रही थीं वह सब दर्शन के लिए पंक्तिबद्ध हो गयीं। बाहर निकले तो सब ओर धुआँ  और सब ओर  उबलते पानी में चावल डालतीं महिलाएं। सबके चेहरे पर श्रद्धा और पूजा का भाव। हाथ जोड़ नतमस्तक सब  देवी से अपने और अपने परिवार के कल्याण और हित की प्रार्थना करती जा रही थीं। जिसका पोंगाला उबल जाता वह और भी भक्ति  भाव से प्रार्थना करती और मुंह से कुछ ध्वनि निकालती। चूंकि दो तीन पतली-पतली सूखी नारियल की टहनियों  की आग से ही पकाना है इसलिए इसमें समय लगता है।
देवी को प्रसाद या नैवेद्यम अर्पण करने का भी मुहूर्त है। दोपहर दो बजकर बीस मिनट पर जब देवी को प्रसाद चढ़ाया जाएग तब सबका पोंगाला उतरेगा और तब स्त्रियां भी प्रसाद ले सकती हैं।  उसके बाद जब मंदिर के चूल्हे की आग को पानी से बुझाया जाता है तो उसी पानी से बाकी सब चूल्हे भी बुझते  हैं। सबका बंदोबस्त दुरुस्त है। सब प्रबंध है। मंदिर से पानी पहुँचाने का भी। अब सब अपने घर जा सकते हैं। और फिर शुरू होता है वापसी का काफिला। पोंगाला का प्रसाद घर पहुंचकर सबको दिया जाता है।


इस त्योहार में कई अन्य अनुष्ठान भी हैं जैसे कुथियोट्टम जो तेरह साल से कम उम्र के लड़कों द्वारा किया जाता है  और लड़कियों की तलपोलि।  इस दस दिवसीय त्योहार का समापन होता है देवी को पहले दिन पहनाई गयी "कप्पु" या चूड़ी  उतार कर और "कुरुति तर्पणम" के यज्ञ से।
पर जो अद्भुत है और बिलकुल अनूठी वह है पोंगाला बनाने की यह परम्परा।आस्था की अग्नि में अपने अहम को जलाकर अपना मन देवी को अर्पित करती हैं। हर मनुष्य का अंतर्मन पवित्र है  पर वह लालच,अहंकार,क्रोध वगैरह से दब गया है। उबलते चावल इस बात का प्रतीक हैं कि यह सब प्रवृत्तियां भाप बन कर उड़ जाती हैं और मनुष्य फिर से दिव्य और पवित्र हो जाता है।


मंगलवार, अप्रैल 30, 2019

चाँदनी चौक की आध्यात्मिकता से परिचय

जब शाहजहाँ आगरा छोड़ दिल्ली बसने चले तो यमुना के तट पर मिली उन्हें माकूल जगह एक नया घरोंदा बनाने की। लाल किले का निर्माण शुरू हुआ और आबाद होने लगी आसपास की बस्ती। लोग आने लगे तो पालनहारी का आशीर्वाद मिले यह भी ज़रूरी था। यही मजमून था बीते रविवार की पैदल यात्रा का। दिल्ली कारवां  से ताल्लुक रखने वाले युवा जोश पर बुज़ुर्गाना शऊर लिए आसिफ खान देहलवी जब हमें "Spiritual Chandni Chowk" की सैर पर ले गए तो परत-दर-परत खुलती कहानियों ने हमें एक रूहानी कूची से रंग दिया।
             उर्दू बाजार से शुरू हुआ उर्दू मंदिर जो बाद में लाल मंदिर या दिगंबर जैन मंदिर के नाम से जाना गया दिल्ली का सबसे पुराना जैन मंदिर है। बस्ती है,व्यापार भी होना लाजिमी है। सो गुजरात से आये जैन-अग्रवाल व्यापारियों को यहाँ बसने की जगह दी गयी और उन्ही में से एक ने अपने खेमे में तीर्थंकर की प्रतिमा रखी और इसी ने अब इस मंदिर का स्वरूप ले लिए। दिलचस्प है कि इसी से जुड़ा एक चिड़ियों का अस्पताल है जो हम उस दिन नहीं देख पाए। जैन धर्म की सब जीवित प्राणियों के प्रति सहृदयता का प्रतीक। जैन मंदिर से लगा हुआ है गौरीशंकर मंदिर। कभी दिल्ली पर मराठा राज भी था और तब अप्पा गंगाधर ने यह शिव मंदिर बनवाया। नदी तट पर तब लाल किला नहीं था और अनेक शिवलिंग स्थापित थे। लोग स्नान कर इन पर जल चढ़ाते और फिर दिनचर्या शुरू होती।चांदी  के आधार पर शिवलिंग पर जल चढ़ता जा रहा है,सुविधा के लिए स्टील के लोटे रखे हैं। मन्त्र जपते, शिव  स्तुति करते भक्ति का ही सब ओर रंग है।
        दिल्ली की कहानी है रक्त-रंजित। सत्ता के गलियारे मज़हब,जात-पांत,उम्र,पेशा किसी की भी इज़्ज़त नहीं करते और हर युग में दिल दहला देने वाले किस्सों से दिल्ली का इतिहास भरा हुआ है। सिख गुरुओं की शहादत हो या मुग़ल बादशाह के छोटे मासूम बच्चों का कत्ल--यह सबका साक्षी रहा है। प्यार से बसाया गया शाहजहांबाद और उससे भी अधिक मुहब्बत से जहाँआरा बेगम ने चांदनी चौक तामील किया। कूचा,कटरा,कलान,बाड़ा बहुतेरी कहानियां सुनीं उस दिन। हवेलियां थीं,व्यापार था,चाँद के खेलने के लिए तालाब था,शाम को सैर की सहूलियत के लिए पानी डालते भिश्ती थे। और इन सब को पाकीज़गी की चादर उढ़ाये यह सब धर्म स्थल थे। सीसगंज गुरुद्वारा में श्रद्धा से सेवा कर रहे लोगों को चप्पलें सौंपीं,पवित्र कुए का पानी पीया और ऊपर जाकर शांत चित्त हो  मत्था टेका और सबकुछ रब पर छोड़ दिया।गुरु तेगबहादुर की शहादत के स्थल पर बने गुरूद्वारे में बहुत शक्ति है।
           सटी हुई है सुनहरी मस्जिद।यहाँ सुनी दास्तान नादिर शाह की जिसने कान के पास से गुज़रे एक आवरा तीर से नाराज़ हो कत्ले-आम का हुक्म दिया और यहीं से खड़े होकर वह खूनी मंजर देखता रहा। मुहम्मद शाह रंगीला का समय था और जब वह वापस गया तो सात किमी लंबा कारवाँ था लुटे हुए और उपहार में दिए गए सामान का। साथ में था तख़्त-ए -इ ताउस(Peacock throne) और कोहिनूर हीरा और सोने की चिड़िया कहा जाने वाले  हिन्दुस्तान को ख़ाक में  मिला देने वाला अंजाम। सड़क पार था एक गिरिजाघर 'बैप्टिस्ट चर्च '। आपको इतिहास से वही परिचय करा सकता है जो अतीत को वर्तमान से जोड़ता रहे। इसीलिये जब उन तीन लड़कियों के बारे में आसिफ ने हाल का ही किस्सा सुनाया जो चर्च के बंद दरवाज़े के बाहर से एक दरख्वास्त कर रही थीं कि दरवाज़ा खोल दो बस नमाज़ पढ़नी है तो और उन्हें अंदर दाखिल किया गया तो इबादत और भी संजीदा हो गयी। 1814 में बना यह चर्च दिल्ली के सबसे पुराने गिरिजाघरों में से है। यहीं कहानी सुनी वज़ीर खानम की और यही दास्ताँ सुनते हुए गिरिजाघर के बाहर बजती घंटियों में सदियों पहले हुई कोई प्रार्थना गूंजने लगी।
              सुनते-सुनाते उन तंग रास्तों पर जहां अब चांदनी चौक रेडेवेलप्मेंट का काम चल रहा है  हम आगे बढ़े।रास्ते में जलेबी खाई। वैसे भी चाँदनी चौक का इतिहास यहाँ के खानपान को भी समेटे हुए है और हर दुकान बादशाह सलामत के समय से चली आ रही मालूम होती है। हमारे लखनऊ की नाज़ुक जलेबियों की तरह नहीं, यह तो ठोस अपना वजन दिखाती जलेबी,कह लें जलेबा, थी। बेड़मी,कचौड़ी,नगोड़ी हलवा ---भूखे भजन न होय गोपला!
       हमारा यह सफर खत्म होना था इस जगह के सबसे मशहूर बाशिंदे की दहलीज पर। बहादुर शाह ज़फर और 1857 की बगावत के समय के मिर्ज़ा ग़ालिब  गली कासिम जान में दालान में बैठकर खत और शेर लिखते। हवेली के कुछ भाग को अब संभालकर रखा गया है पर सामने महराबदार दरवाज़े का आधा हिस्सा ग़ालिब के नाम और आधा किसी कारखाने के नाम किया हुआ है।
        हमारी इस "spiritual walk " के शुरू में एक नक्शा निकाल बहुत बारीकी से हमें परिचय कराया गया था एक ग़मगीन बाशाह के सपने से -लाल किले के ठीक सामने -उर्दू बाज़ार से,कोतवाली से,टाउन हॉल से, चांदनी चौक से मिर्ज़ा ग़ालिब की देहरी तक इतिहास के कई पड़ाव का सफर किया और साथ ही इबादत की कई सूरतें देखीं। इबादत की हर सड़क पहुंचाती सब एक जगह हैं। हवाओं में जब अर्धमगधी में मंत्रोच्चारण,अज़ान,जय भोलेनाथ,शबद के मीठे बोल और चर्च से आते गीतों के सम्मिलित स्वर गूंजते होंगे तो कितना पावन हो जाता होगा यहाँ का हर कोना। मिर्ज़ा ग़ालिब को ही कह लेने दें :
       
    " न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता
      डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता"









मंगलवार, अप्रैल 23, 2019

मेरी अपनी गिलहरी

गर्मी तेज़ है। जैसी ही सर्दियां कम हुईं मैंने चिड़ियों और अन्य जीव जंतुओं के लिए एक बड़े से मिट्टी के बर्तन में पानी रख दिया था।आगे पीछे दोनों।बड़े इतरा कर मैं कहती हूँ  दिल्ली के एक ख़ास इलाके में रहती हूँ। घर की चारदीवारी के अंदर ही बहुत से पेड़ हैं। पशु पक्षियों दोनों का ही खेला लगा रहता है। चिड़िया चहचाती हैं,गिलहरी इधर उधर व्यस्तता में दौड़ती रहती है,बन्दर जब आते हैं तहस-नहस तो होना ही है।सिर उठाकर आसमान की ओर देखती हूँ तो एक पेड़ पर तोतों का ही राज है। बोलते,चहचहाते फुर्र से उड़कर कभी इधर कभी उधर,इस डाल उस पात।एक ऊंचा शायद  खजूर का पेड़ है जिसकी चोटी पर बाज बैठा है।तीखी नज़र से सब पर निशाना है उसका।और उसके विपरीत बरामदे में रखे पौधों पर एक नन्हीं सी चिड़िया पंख फड़फड़ाते हुए मंडरा रही है। बाहर कुर्सी मेज लगाकर इन्हें देखने में इतना आनंद आता है मानो सब मेरे ही हों। सिवाय बंदरों के। न वो मेरी सुनते हैं न कदर करते हैं। घंटों बैठ कर देख सकती हूँ इन सब को। आज सवेरे टहल रहे थे तो बगीचे में चिड़ियों के दाने पर गिलहरी का कब्ज़ा देखा। वैसे मैंने चिड़िया को चुगते हुए कभी नहीं देखा। ऐसा संयोग नहीं बन पाया। गिलहरी,क्या पता महादेवी वर्मा की गिल्लू की कोई वंशज होगी, बड़े इत्मीनान से नन्हे पैरों से दौड़ती आयी और उस पेड़ से लटकी थाली से सवेरे का नाश्ता करने लगी। मैंने भी आज उसे कैमरे में बटोरने की ठान ली थी। दबे पाँव गयी ... वैसे मेरा सिर्फ वहम है कि मैं दबे पाँव जाती हूँ। चिड़िया हो चाहे गिलहरी इन्हें दूर से ही आहट मिल जाती है।आज मेरे ऊपर कुछ मेहरबान थी या फिर कुछ विश्वास हो चला। मेरे करीब जाने पर वह भागी तो पर आसपास ही रही। कुछ किटकिट कर के खाती फिर मैं जैसे ही क्लोज़-अप के लिए एक कदम आगे बढ़ाती वह झटपट पत्तियों में भाग जाती। बहुत देर तक हमारा यही खेल चलता रहा और मैं उसका खाना रिकॉर्ड करती रही। काश गिल्लू की तरह वह भी मेरे साथ बैठती या मेरे कंधे पर चढ़ जाती। ऊके लिए मुझे उसी पेड़ के नीचे पड़ाव डालना पड़ेगा। वैसे यह भी है कि इतनी गिलहरियों में पहचानूँगी कैसे। नज़दीक आने नहीं देतीं,न आती हैं और दूर से सब एक जैसी। पर हैं सब बहुत नटखट। कितनी बार मैंने इन्हें एक दूसरे के पीछे भागते हुए देखा। पर जब वह दाना खाती हैं तो ह्रदय को बहुत खुशी मिलती है। 



बुधवार, जनवरी 09, 2019

माटी की बानी

  अपनी मिट्टी से प्रेम का  बंधन
अथाह,अगाध,अनादि,अनंत-आभार ,
जिसे हम कहते हैं हम,सब इस माटी का है
संस्कार,संस्कृति,कृति,दृष्टि
सब इस माटी की है।
मोहक,सम्मोहक,गुंजित,तरंगित
माटी के रंग अनेक।
पृथक विलक्षण,अद्भुत इंद्रधनुष।



मिट्टी के हैं बोल अमोल,क्या कहती,क्या  सुनती है। 
कहती है जो खुशबू मेरी,और कहीं न मिलती है । 
बारिश की वह पहली बूँदें,जब मिलती हैं कण कण से 
सोंधी सोंधी महक लिए, यह रची बसी  है रग रग में ।  

गगरी देखो,देख सुराही,देखो गाँव  की डगर डगर    
मन में तेरे गहरे बसे हैं,दूर कहीं हो फिर भी अगर।
इस माटी से जुड़ा हुआ है  जीवन का हर तार तेरा
माटी की बानी गूंजे है,झंकार करे हर साज तेरा। 

इकतारा बज उठता है पकी फसल के लहराने से
घूम घूम फ़कीर बावले,भक्ति के प्रेम तराने से।
फगवा गाते गली गली जब घूमे है टोली मस्तानी
माटी की बानी बोले है और राधा हो जाए दीवानी।

पुरखों की धरोहर संजो ली हर ताने बाने के धागे में,
पैरों की थिरकन में या फिर लोक कथा दुहराने में।
तन इसका मन भी इसका माथे पर इसका तिलक अनंत
माटी की बानी बोले है, वही आदि है वही है अंत।

गुरुवार, मार्च 08, 2018

महिला दिवस पर ख़ास

हम हैं तो दुनिया हैं,
हम हैं तो रंग हैं ,
हम है तो जीवन चक्र है
हम हैं तो सहारे हैं।
 हम से ही परम्परा है
 हम से ही नवीनता है
हम से ही स्थिरता है
हम से ही हैं नयी उड़ानें।
हम से  रास्ते के उजाले हैं
हम में अंधेरों के गलियारे हैं।
हम से कायम हैं रिश्ते बहुत
हम से अपना रिश्ता है अहम बहुत ।
हम से रसोई की आग है
हम कर सकते हैं काज बहुत।
हम दिल के हाथों मजबूर हैं
हम दिल के बहुत मज़बूत हैं।
हम से ही हमारी पहचान है
हम नारी हैं ,
हमारी आवाज़ है,
हमारी आशा  है ,
हमारी शक्ति है,
हमारी सोच है
हमारा सम्मान है।