Monday, February 20, 2012

कुदरत का जादू उतरता ही नहीं

मेरा  मानना है की शहर में रह कर भी ऐसी जगह रहना जहां हर सवेरे नंगे पाँव ओसमयी घास पर चलने का आनंद मिले और हर शाम ,छोटी छोटी क्यारियों के बीच बैठकर चाय का लुत्फ़ उठाया जाए ,यह खुशकिस्मत होने  की इन्तिहा होती   है.बचपन से युवावस्था तक   घर शहर में होकर भी ऐसी कालोनी में था जहां पेड़ों के पत्तियों  से झांकते मकान दिखाई देते ,और शाम को मोर भी कभी कभी मेहमान हमारे होते. कुदरत से यह नजदीकियां ,बचपन के दिनों की सबसे सशक्त यादें  है.सावन के अंधे को सब हरा ही दीखता है.मुझे ऐसा लगता है की  वही सावन का अंधापन मेरी आँख में बस गया है. आज उस घर को छोड़े करीब बीस साल होने को हैं पर जब भी  अपने शहर की याद आती है,तो वही हरियाली सामने रहती है.बड़ा ही सलोना सा  किचन गार्डन  था .न बहुत बड़ा न बहुत छोटा.इतना बड़ा की कई तरह के पेड़ उसमें लगाए गए थे पर इतना छोटा  की  अपनापन लगे  .  दो दशहरी  आम के  पेड़ थे  ,जो हमसे पहले उस घर के निवासियों ने  लगाए थे और  फल हमने खाए. मज़े  की बात यह थी की वह  हमारे घर की चहारदीवारी के पास ही लगे थे.तो लाजिमी था की आने वाले की नज़र उन पर लटके बड़े बड़े आमों पर पड़ ही जाती.गर्मी की दोपहरी में माँ उसकी रखवाली करतीं. और अगर कोई बच्चा उन आम को तोड़ने की हिमाकत करता तो उसपर बरस पड़तीं. रसोई घर का  एक दरवाज़ा इन खेतों में खुलता. मुझे अभी भी याद है,धनिया की चटनी बननी है तो तुरंत धनिया तोड़ी जाती. उसका स्वाद कुछ अलग ही होता .या फिर नलके के पास से पुदीना हाथों हाथ मिल जाता.
केले का वह झुरमुट ,जो इस तरह से बना था,की बीच में थोड़ी सी खाली जगह थी. मैंने अपने दसवीं और बारहवीं के इम्तिहान इसी झुरमुट के बीच पढ़कर दिए. पापा आफिस से आते तो जितने भी थके हों खुरपी   उठाकर कुछ गुडाई कर लेते तो थकान दूर हो जाती. कोई घर में नाराज़ है तो उसको यहीं कहीं किसी कोने में ढूँढा जाता.या तो वो कोने में जामुन के पेड़ के नीचे बैठा होगा,या फिर किसी अमरूद के पास.अमरूद के भी चार  पेड़ थे.
हम लोगों ने तो इस प्रकृति को अपने में बैठा ही लिया था,पर  कुदरत के साथ  पच्चीस सालों का जो सबसे यादगार लम्हा था,वह मिला जब अगली  पीढी  आयी . बहन का बेटा,मानस , दो या तीन साल का रहा होगा. वह घर आता तो उन्हीं खेत की पगडंडियों पर सारा समय गुजारता . पापा ,के साथ पौधों में पानी डालना, उसका  प्रिय काम था. पानी नहीं भी पड़ना  है ,तो भी वह आकर  कहता  ,"नाना ,पेड़  सूख  रहे  हैं ,पानी डाल दीजिये  !' नाना बोलते ,"अरे  अभी तो सींच  दिया  है '. जवाब में ,"पर कुछ जगह आपने छोड़ दी है,लाइए मैं कर  देता हूँ . आप  थक   गए होंगे " .  चित्र   में वह नाना की मदद करते हुए ,उनसे पाईप छीनकर   खुद  सिंचाई करने   की कोशिश  कर रहा है.




ऐसे  ही याद है जब उसे  अमरूद पेड़ पर लटके दिखते . संयोग  से कुछ अमरूद की डालें इतनी झुकी थीं की उसकी छोटी सी पकड़  के पास थीं.उसका अमरूद खाने  का अंदाज़ निराया था. तस्वीर उसी अंदाज़ को बयां करती है




Friday, February 10, 2012

कहीं समान्तर

दिल का  एक कोना था,बिलकुल चुपचाप,बिलकुल शांत.किसी को खबर नहीं ,कभी कभी उसे भी नहीं.
 पढाई पूरी कर , पहली नौकरी   लगी थी.उत्साह था लगता  खजाना मिल गया . पर अब तक घर के रुई के फाहों के बीच सिमटी दुनिया छोड़  दिल्ली पहंची तो वह  मिडल टाउन  गर्ल  बड़े शहर में गुमसुम सी हो गयी . लोगों के बात करने का तरीका अलहदा ,शहर की तेज़ी उसके छोटे शहर के नर्म भावों से कोसों दूर. वह भी  अपनी हकबक छुपाते हुए ,स्मार्ट दिखने की कोशिश में लगी थी. अभी तो ट्रेनिंग का समय था. वहां तो ठीक ,काम से काम रख हर बात का संक्षिप्त जवाब दे लेक्चर पर ही तो ध्यान देना था. तमाम जगह से सहकर्मी थे.थे तो सब उसीके हमउम्र ,पर सब के मिज़ाज अलग. देख कर पता चल जाता कौन कैसा है. उसकी तरह और भी शांत थे,शायद छोटी जगह तो नहीं पर हाँ घर से पहली बार निकले. कुछ ने पहले भी कहीं नौकरी की थी ,उनके लहजे में उसकी ठसक थी.
चाय का ब्रेक हुआ . अब तो लाउंज में मिलना जुलना ही पडेगा. हाय हेलो करते,मुसकराते ,  फिर  आदतन   भीड़  भाड़ और स्माल टॉक की दुनिया में वह असहाय सी अकेले पड़ गयी.शुरुआती अभिवादन ,तक तो ठीक था .फिर कुरेदती अपने आप को,अब कहें तो क्या कहें. पहली बार मिल रहे लोगों को स्कूल ,कालेज,पढाई के बाद क्या बताएँ. हमेशा यही तो होता आया है अभी तक.  न जाने कहाँ से लोग करते  हैं इतनी बातें. किस बारे में अपनी राय जग जाहिर करते हैं.  क्या पूछे दूसरों से.लगता जैसे पूछताछ कर रही हो.
चाय का कप,एक अदद  बिस्किट और इस भरे कमरे में वह खामोश, सोचती बाकी क्या सोच रहे होंगे . उसके बारे में. कोई नज़दीक आता तो एक मुस्कान से हैलो  और फिर अकेले.
इधर उधर,सबको वह अपनी नज़र से परखने की कोशिश कर रही थी." हैलो ",एक हाथ बढ़ा .एक मुस्कान दिखी."मैं....हूँ .".सकपका कर उसने देखा .लम्बे गोरे चेहरे पर वही खोया हुआ भाव ,जो शायद उसके अपने चेहरे की शिकन में दिख रहा था. वह भी मुस्कराई  . परिचय दिया, और फिर दोनों हमफितरत की तरह , चुप. "नाईस टू मीट यू", और आगे बढ़ गया .
आफिस के ही  किसी दफ्तर में वह भी था ,पर दूर किसी शहर में. पोस्टिंग, काम,दोस्त सब बने ,पर उसका वह कोना कोइ नहीं देख पाया. न वह फिर मिली उससे . कभी किसी कागज़ पर नाम देखती तो सहम जाती.लगता कोई उसकी चोरी न पकड़ ले. उसको तो याद भी नहीं होगा की वह उससे  कभी मिला भी था .वह भी तो कैसे निपट गंवार की तरह सिर्फ मुसकरा  भर दी थी .
१५ साल में प्यार किया,शादी,बच्चे ,ज़िंदगी का अपना चक्र चल रहा था..१ साल हुए   तबादला   हेड आफिस हो गया . मीटिंग है .उसी कान्फरेन्स रूम में चाय के कप और एक ग्रुप के साथ कुछ कामकाज की बातें. और फिर पुरानी आदत से मजबूर . " हेलो अब कैसी हैं आप ! " उसे  अपनी 40  साल की सारी परिपक्वता की मदद लेते हुए, चेहरा लाल होने से रोका.. ओह तो वही कोना वहां भी !


Monday, January 23, 2012

गुमनाम गलियों में भी मिलते हैं मील के पत्थर

दिल्ली क्या देखी अगर सिर्फ कुतुबमीनार ,लाल किला या हुमायूँ का मकबरा भर देखा.इस शहर में देखने को इतना कुछ है ,बहुत ऐसा जिसके  बारे में आमतौर से हम जानते ही नहीं. देहली से दिल्ली तक  में दिल्ली दरबार के सौ साल पर राजधानी की सात पीढ़ियों के बारे में जानने का मौका मिला. क़ुतुब मीनार बनवाने वाले क़ुतुब-उद-दीन ऐबक ने महरौली में राजधानी बनायी और यहाँ बनी बस्ती. पर क़ुतुब मीनार की मशहूर छाया में इसके आसपास की बस्ती नज़रंदाज़ होती गयी. इसके बारे में पता चला २००१-०२ में जाकर  .

कुली खान की कब्र से कुतुबमीनार 




  एक अनूठा मौक़ा मिला ,उन सबको देखने का ,वह भी एक जानकार के साथ. दिल्ली को जानने समझने का यह एक बढ़िया तरीका है. कनिका सिंह "डेल्ही हेरिटेज  वाल्क्स " नाम से दिल्ली के इस छुपे इतिहास से हमें रूबरू करवाती हैं. दो साल पहले मुझे इनके बारे में पता चला ,और तबसे हर सप्ताहांत सोचती रही इनके इस अभियान से जुड़ने के लिए. इस रविवार यह मौक़ा आया. प्रोग्राम था कुतुबमीनार से अलग महरौली घूमने का . सुबह ९.३० बजे इकट्ठा हुए अनुव्रत मार्ग में इसके प्रवेश द्वार पर. वैसे वहां कोई दरवाज़ा नहीं है,सिर्फ मेन रोड से एक कच्चा,पथरीला   रास्ता अन्दर जाता  है  . हमेशा की तरह मैं रास्ते से  आगे निकल गयी,घूम कर छतरपुर मेट्रो स्टेशन  के सामने से यू टर्न लिया ,और पहुंचे वहां जहां और लोग इंतज़ार कर रहे थे. फिर शुरू हुआ एक प्रबुद्ध दौरा उन खंडहरों का. 
खान शहीद की कब्र 
पहला पड़ाव था,बलबन के मकबरे का दरवाज़ा. पता चला इसके बाद जो साफ़ की हुई जगह दिख रही थी ,उसकी खुदाई एक साल पहले ही हुई थी. उससे पहले वह करीब चार पांच फुट मिट्टी के नीचे  नीचे दबा था. यह पार  कर पहुंचे बलबन के मकबरे .कब्र तो दिखी नहीं ,पर उसके वास्तु के बारे में पता चला की इमारतों में पहली बार True arch  मेहराब का प्रयोग यहाँ हुआ था. और साथ ही यह ही भारत के शिल्प का  पहला गुम्बद .गुम्बद तो रहा नहीं पर कैसे बना इसका अनुमान,वहां के पत्थरों से  लगाया जा सकता है. मामलुक  वंश के सबसे काबिल सुलतान बलबन , की मृत्यु जंग में नहीं हुई.वो टूट गए अपने प्यारे  बेटे खान शहीद की मौत से. खान शहीद की कब्र उनके मकबरे के बगल के कमरे में बनी  है और अभी तक सही सलामत मौजूद  है. अभी हाल ही के दिनों में ,आसपास के गाँव वालों ने इस पर अगरबत्ती जलाना  शुरू कर दिया है . शायद कुछ चमत्कार हुआ होगा ,या कोई मन्नत पूरी हुई होगी जिसने यह आस्था जगा दी ,  दीवार पर कुछ नीली टाईल के टुकड़े इस इमारत की खोयी  हुई सुन्दरता की  कहानी कहने की कोशिश कर रहे  थे.
जमाली कमाली की मस्जिद 
छत पर चित्रकारी 
वहां से निकल कर हम कुछ सीढियां चढ़ ऊपर पहुंचे जो शायद रहने की जगह थी. टूटी दीवारों से कमरे होने का एहसास हो रहा था .यहाँ से आगे  पहुंचे उस पुरातत्व उद्यान के सबसे मशहूर अवशेष जलाली कमाली के मस्जिद पर. चहारदीवारी के अन्दर पांच मेहराबों वाली मस्जिद ,जहां वज़ू  के लिए एक हौज़ बना था . मस्जिद के उत्तरी  तरफ तीन चार  सीढियां चढ़  , एक दरवाज़े से अन्दर जा पहुंचे जमाली कमाली के कब्र के आसपास के पाक अहाते में. सामने ही था उनका मकबरा .  सिकन्दर लोदी से हुमायूँ के समकालीन ,शेख फजलुल्लाह उर्फ़  जमाली सूफी फ़कीर और कवि थे.उनका मकबरा ख़ासा सुन्दर था. छत पर बढ़िया रंगों से और दीवारों पर रंगीन टाईल्स से चित्रकारी की हुई थी. ऊपर,चारोँ ओर, जमाली की रची कुछ पंक्तियाँ भी तराशी गयी थीं .  जमाली की कब्र बीच में थी और उनके एक ओर एक और कब्र . अनजान व्यक्ति की इस कब्र को कहा  गया है,उनके दोस्त की है और उन्हें  नाम दिया गया कमाली.वैसे अभी तक यह पता नहीं चल पाया है की जनाब कमाली की शख्सियत   क्या थी. आसपास की  तमाम जगह पर कई कब्रें दिखीं. यहाँ तक एक के ऊपर  तो छतरी भी बनी है.शायद किसी  ख़ास शख्स की होगी.
जमाली कमाली की कब्रें 
कुली खान का मकबरा 
मेटकाल्फ फोली 
बोट हाऊज़ से सूखी दरिया 
वहां से निकले तो पहुंचे  मुगलों के दरबार में ब्रिटिश रेसिडेंट थोमस मेटकाफ के घर . मेटकाफ ने मुगलों से महरौली का यह इलाका खरीद लिया था. इस में शामिल थे  यहाँ के  मकबरे ,मस्जिद,एक नहर सब कुछ . फिर उन्होंने इस में तब्दीलियाँ करनी शुरू कीं. टीले बनवाये  ,नदिया का रास्ता मोड़ एक केरिजवे बनवाया,लोदी काल की एक ईमारत  में फेर बदल कर  बोट हाउस बनवाया, बाग़ -बगीचे बनाए और नाम दिया दिलखुश ! यहाँ वह  वर्षा ऋतू का आनन्द लेने आते थे . कनिका कहती हैं यह दिल्ली का पहला फार्म हाउज़ था! अब तो महरौली के आसपास गाँवों की जगह फार्म हाउजों  ने ले ली है.  जमाली कमाली के पास में ही एक टीले पर है उनके द्वारा बनवाई गयी बारादारीनुमा मेटकाफ'स फ़ॉली  ' .यहाँ से नीचे उतरकर चले उस रास्ते जहां मेटकाफ    ने एक छोटी सी नदी की धार ही बदल दी और उसका बांधकर एक तालाब बनवाया . यहाँ से पहुंचे मेटकाफ के घर . पर यह घर वास्तव में कुली खान का मकबरा था. कुली खान ,अकबर ,की दाई माँ माहम  अंगा के बेटे आधम खान के भाई थे. आधम खान के मकबरे का गुम्बद दिखा,महरौली गाँव के घरों के बीच से,पर वहां जाना हमारी  इस सैर में शामिल नहीं था. कुली खान की कब्र वहां से हटा दी गयी और यह मकबरा बना मेटकाफ का घर .यहाँ से कुतुबमीनार भी पास दिखता   है .
राजों की बाओली 
अब था इस सैर का आख़िरी पड़ाव .इन सब से अलग एक बाओली .राजों की बाओली और उसके आगे गंधक की बाओली .हमने देखी सिर्फ राजगीर यानी मिस्त्रियों के लिए बनी राजों की बाओली . तीन  मंजिली ,नीचे तक पहुँचती सीढियां ,चारों ओर बैठने के लिए बने गलियारे  ,यह बाओली वाकई शानदार थी. कुछ देर सीढ़ियों पर बैठकर  उसकी कहानी सुनी  और फिर घूम कर ऊपर पहुंचे जहां बने थे एक १२ खम्बे की इमारत में एक कब्र और साथ एक  मस्जिद .इस मकबरे में साफ़ पता चल रहा था की नीचे एक चौकोर   चबूतरा  ऊपर पहुँचते पहुँचते कैसे गोलाकार हो जाता है और उसके ऊपर गुम्बद बनाना संभव होता है !निर्माण कला का एक पाठ मिला!
यह था एक सफ़र दिल्ली के कम लोकप्रिय पर उतने ही रोचक और ऐतिहासिक महरौली की बस्ती का. यहाँ दिल्ली पर राज करने वाले गुलाम वंश के बलबन से लेकर ,लोदी,मुग़ल वंश से होकर  ब्रिटिश काल की इमारतें और खंडहर माजूद हैं. सचमुच पन्ने दर पन्ने खुलता  इतिहास  !
  

Friday, December 30, 2011

अदिति तीन साल की हो गई..(वैसे वह अगले अप्रैल में नौ की होगी )

 एक बहुत पुरानी पोस्ट  थी जो ड्राफ्ट में दिखी.दिल किया उस याद को ताज़ा करने का.


निकि यानि अदिति की इस चिट्ठा पृष्ठ पर पुनरावृत्ति है.आज ( 5 अप्रैल 2006) वो तीन साल की हो गई.२००३ में नवरात्र की पंचमी के दिन हमने अपने संसार में उसका स्वागत किया था.मैं ,उसकी बुआ  ,अदिति के बचपन का एक अभिन्न हिस्सा रही हूँ.उसको बढता देख अपने आप में एक अदभुत एहसास है.मैंने पाया कि उसके लिये कोइ बात "क्योंकि बड़े  कह रहे हैं" इसलिये मान लेना नामुमकिन सा है.वो सीधे इस तरह से नही कहती है पर उसके तीन  प्रिय शब्द हैं...क्या,क्यों और क्यों नहीं.इसमें एक और शब्द कभी कभी जुड़  जाता है....कैसे.लेकिन अभी यह कम आता है.शुरुआत हुइ थी क्या से.जब उसने बोलना सीखा था और उसकी नन्ही सी पकड़  से कोइ शब्द बाहर होता , वह तब तक 'क्या'का साथ नही छोडती जब तक उसकी संतुष्टि नही हो जाती.यह अधिकतर प्रयोग होता है जब वह किसी शब्द का उच्चारण नहीं पकड पा रही हो मुझे याद है"हैर ड्रायर " कहने में उसे खासी मुश्किल आई,और वह अभी भी 'ड्र ' नहीं समझ पायी है.पर उसकी कोशिश ज़ारी है और वह हमेशा मुझे बाल धोने और सुखाने को कहती है जिससे वह उसको देख सके और सुन सके कि वह है क्या!पर अब तो उसके किसी भी वार्तालाप का सार होता है 'क्यों 'और 'क्यों नही'.अगर हम कुछ कर रहे हैं तो क्यों और नहीं कर रहे तो क्यों नही.सूरज रात में कहीं चला जाता है तो क्यों और दिन में चाँद नही दिखता  तो क्यों नहीं.और जब क्यों की बारात निकलती है तो उसका कोई अन्त नहीं.
उम्मीद करती हूँ कि वह हमेशा यूँ ही उत्सुक, बेहिचक सवाल पूछती रहे, जानने सीखने की ललक बनी रहे .


इन पांच वर्षों  में उसमें बहुत बदलाव आये हैं ,पर उसके कुछ सीखने की लगन कम नहीं हुई है.

Thursday, December 29, 2011

कुछ तो नया करो

नए साल में कुछ  नया करो
 ठंडी से एक आह भरो
 कोहरे भरे भोर  में   बाहर चलो
सांस निकालो,धुआं करो

रात अंधेरी सिहरते ओढो
 गली गली कुछ गाते घूमो
एक जलाओ अलाव कहीं
अलसाई  सी  कुछ राग छेड़ो

हसंते हुए कुछ याद करो
पुराने पल की  बात करो
पहले क्रश को बयान करो
कुछ खिसियाओ ,संकोच करो


कलेंडर को बदलते हुए
कुछ लम्हे संजो कर रखो
 क्या नया करना है सोचो
नए साल को सलाम करो  

Tuesday, December 06, 2011

दो शहरों स बनी एक राजधानी बुडापेस्ट



कम्युनिस्ट साम्राज्य का पश्चिमी छोर और अब केपिटलिस्ट यूरोप का पूर्वी किनारा   कहा जाने वाला हंगरी दो अस्तित्वों के बीच अपनी पहचान बनाने की जद्दोजहद कर रहा है. हम  दुबई से वियना और वहां से टिरोल एरलाईन  के एक छोटे विमान से  ४५ मिनट में बुडापेस्ट पहुँच गए . बूडा और पेश्त नाम के दो शहरों से बनी हंगरी की राजधानी ,बाकी यूरोपीय शहरों से भिन्न लगी .वियना जैसा  कड़क  अनुशासन  यहाँ ज़रा लचीला हो गया और हवा भी यूरोपीय शीतलता से भिन्न ,थोड़ी एशियाई गर्मी का अंश लेने लगी.
डेन्यूब नदी के तट पर एक कतार में कई होटल बने हैं,उन्ही में एक इंटर कोंतिनेनेतल में ठहरने का इंतजाम था. पर ऐसा नहीं लगा  कि उड़ान के बाद ,अब थोडा सुस्ताया जाये. नयी जगह के माहौल को महसूस करने की आतुरता खींच ले गयी हमें आसपास की चहल पहल तक. डेन्यूब का किनारा तो कमरे की खिड़की से दिख रहा था,और नदी के उस पार का राजसी महल.भी. गजब की रोशनी थी और गजब का दृश्य !नदी पर नाव और तट पर बने अनेक रेस्त्रों से चहल पहल थी. आसपास काफी महंगा  सा बाज़ार था,लेकिन हर यूरोपीय शहर की तरह यहाँ भी छोट छोट केफे के बाहर कुर्सी मेज़ लगा कर सुन्दर खाने का इंतज़ाम. रात ग्यारह बारह बजे तक लोग सडकों पर दिखती हैं सो वहां उस समय घूमना भी सुरक्षित है और बहुत लुभावना  भी.
करीब ढाई दिन के समय में इस शहर के साथ इन्साफ करना नामुमकिन है .इतना कुछ देखने को है और इतना कुछ करने को. पहले दिन हम शहर का 'पेस्त' वाला हिस्सा घूमने निकले ,जो नया है,आधुनिक है . शहर घूमने का मज़ा पैदल में  ही  है.यातायात बहुत अधिक नहीं था,सो चलने में मज़ा भी आ रहा था. पैदल के लिए गाड़ियां रुक जाती और हम  कुचले जाने के डर से मुक्त थे. डेन्यूब के किनारे निकले और रुख किया इस्त्फान बासिलिका का.यह बुडापेस्ट का सबसे बड़ा  चर्च है. अन्दर से बेहद खूबसूरत,इस चर्च में सेंत स्टीफन के दाए हाथ को परिरक्षित रखा हुआ है.   यूरोप की  सबसे बड़ी  पार्लियामेंट बिल्डिंग  की भव्य इमारत को देखते हुए हम आगे अन्द्रसी एवेन्यू पर चले.यह सड़क दूर तक जाते है औए बुडापेस्ट के मुख्य सड़क कही जा सकती है.विश्व विरासत स्थल की सूचे में इसका नाम है और कई मशहूर दुकानों और इमारतों को दखने का मौक़ा मिला. यह रास्ता ख़तम होता है हीरोस स्क्वेयर पर जहां हंगरी के राजाओं की प्रतिमाएं हैं . साथ ही आसपास है म्यूजियम ,ओपेरा हाऊस और कम्युनिस्ट समय के अत्याचओं की कहानी कहता हाऊस ऑफ़ टेरर .  बुडापेस्ट की एक खासियत है यहाँ के गर्म पानी के स्रोत और स्पा जहां नहाने से बेहतरीन आराम मिलता है.इसी स्क्वेयर के पास है ज़ेचेन्यी बाथ. बुडापेस्ट   का भूमिगत रेल ,दुनिया का सबसे पुराना है, और इसके स्टेशन को पूर्ववत रखने की कोशिश की गयी है.
किसी शहर की सैर खरीदारी के बिना अधूरे है. सो हम पहुंचे यहाँ के वाची उत्चा ,जो हमारे होटल के पीछे ही एक सड़क है जिसके दोनों तरफ बहुत सुन्दर दुकानें और बाज़ार है. ग्लोबलिज़ेशन के ज़माने में हर शहर की दुकानों में एकरसता  सी आ गयी है. जो दिल्ली में दीखता है वही वियना में औए वही बुडापेस्ट में. सो इस बाज़ार को छोड़ हम पहुंचे ग्रेट मार्केट हॉल . यह एक तीन तलों में बना बाज़ार है,घुसते ही सब्जियों की अनेकों दुकानें और पहले ताल पर हंगरी  की प्रसिद्ध  कढाई और अन्य उपहार की चीज़ें दिखीं. मोल भाव तो हुआ ही पर सामान महँगा लगा. शायद इसलिए क्योंकि हम उससे एक दिन पहले,बुडापेस्ट के बाहर एक छोटे से गाँव ,सेंतेंद्रे घूम कर आये थे. यहाँ जेबकतरों से भी सावधान रहने की इदायत दी गयी थी सो आधा दिमाग तो अपना बटुआ और मोबाइल बचाने मैं ही लगा था.
रात होते होते हम वापस होटल पहुंचे और डेन्यूब  किनारे के अद्भुत समाँ का आनंद लिया. यहाँ पर हर शाम बेंच पर बैठीं  कुछ औरतें भी कढ़ाई के मेजपोश आदि बेचती हैं.बातें हुईं, खरीदारी हुई और पता चला कि  जो नहीं खरीदा वह असल में चीन  से आया था. भारत  की तरह वहां भी चीन सस्ते माल भेज रहा है.यही बात हमें वेनिस में भी दिखी  . मन में एक सवाल उठा कि जो हमने इया वह क्या वाकई उन औरतें के गाँव का है या फिर चीन का ?

किनारे बनी छोटे  लडके की एक मूर्ती के पास बैठकर,यह सब भूल गए और मज़ा  लिया ,नदी पर तैरती नौकाओं का, उस पार जगमगाते महल का, तोकाजी का और हर इमारत,हर कदम के पीछे छुपी एक कथा का.


Sunday, November 06, 2011

के बी सी बनाम बिग बॉस

श्योर    हैं  फ़ाइनल जवाब ...लॉक    कर दिया जाए ...मुस्कान और फिर सही जवाब का एक स्वर जिसमें उतना ही  आनंद भरा होता है जितना स्वयं प्रतिभागी के ह्रदय में. यह  सब के बी सी की पहचान  कराने वाली कुछ झांकियां हैं. 
चैनल  बदलिए....खुसपुस खुसपुस...तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझसे ऐसे बात करने की...यू ***....वह तो ऐसी है... अरे वह तो उसके सामने ऐसे बात करते हैं और हम लोगों से कुछ और बोलते हैं....!लगता है सब कुछ काला, मनहूसियत की छाया लिए .बिग बॉस का घर.

सीरियल से हटकर दो प्रोग्राम  जिनका प्रचार जोरशोर से हुआ और अब कई  सीसन कर चुके हैं. जब भी शाम को मैं टीवी देखती हूँ तो अनायास ही यह ख़याल आता है. एक ओर बिग बी का ठिकाना  ..जीवंत,हंसी ,जोश, उत्साह से भरपूर के बी सी का प्रोग्राम. सपरिवार एक साथ बैठ कर ज्ञान ,मनोरंजन और सबसे बड़ी बात पूरी तल्लीनता से मज़ा उठाने का  .अमिताभ बच्चन के गरिमामयी व्यक्तित्व   ,संयमित व्यवहार,सुन्दर स्वच्छ  भाषा ,से यह खेल इतना दर्शनीय है ,कि क्या कहने .बच्चे बड़े  सभी इसमें पूरी तरह से शामिल महसूस करते हैं.हाँ इस बार पंचकोती  महामणि कौन बनेगा करोडपति लगता है कुछ अधिक परोपकार की राह पर चल निकला है,पर दर्शकों की सहभागिता बनी रहती है. देखते हुए एक सकारात्मकता ,एक प्रसन्नता का अनुभव होता है.

कुछ आधे घन्टे बाद रात के अँधेरे में चलें बिग बॉस के घर दस्तक दें. क्या कुहराम है,क्या अस्त व्यस्त सा समां है. सब कोइ किसी साज़िश में लगा है. अगर कोइ सकारात्मकता दिखती भी है तो क्षणिक . उसे भी लगता है दबा दिया जाता है.क्या घर परिवार ऐसे ही होते हैं,चीखते चिल्लाते, एक दुसरे के विरुद्ध कुमंत्रण करते. ऐसे संसार के बारे में सोचना और फिर उसे रात दर रात पर्दे पर दखना कितना नकारात्मकता से भर देता है व्याकुलता होती है उसे देख कर.सामने कुछ पीछे कुछ और .काम करने से दूर भागते लोग,दिनचर्या बिग बौस के इशारे पर निर्धारित ,बिना किसी प्रयोजन के दिन काटते प्रतिभागी....खाली दिमाग शैतान का घर. तभी षड़यंत्र के साए उस बेहद धनी घर में छाये रहते हैं. देख कर एक विमुखता सी हो जाती है. न सहजता न सौम्यता ,न सकारात्मक  ऊर्जा का एहसास. 

अपनी टीवी तो १० बजे बंद हो जाता है !