Tuesday, April 30, 2019

चाँदनी चौक की आध्यात्मिकता से परिचय

जब शाहजहाँ आगरा छोड़ दिल्ली बसने चले तो यमुना के तट पर मिली उन्हें माकूल जगह एक नया घरोंदा बनाने की। लाल किले का निर्माण शुरू हुआ और आबाद होने लगी आसपास की बस्ती। लोग आने लगे तो पालनहारी का आशीर्वाद मिले यह भी ज़रूरी था। यही मजमून था बीते रविवार की पैदल यात्रा का। दिल्ली कारवां  से ताल्लुक रखने वाले युवा जोश पर बुज़ुर्गाना शऊर लिए आसिफ खान देहलवी जब हमें "Spiritual Chandni Chowk" की सैर पर ले गए तो परत-दर-परत खुलती कहानियों ने हमें एक रूहानी कूची से रंग दिया।
             उर्दू बाजार से शुरू हुआ उर्दू मंदिर जो बाद में लाल मंदिर या दिगंबर जैन मंदिर के नाम से जाना गया दिल्ली का सबसे पुराना जैन मंदिर है। बस्ती है,व्यापार भी होना लाजिमी है। सो गुजरात से आये जैन-अग्रवाल व्यापारियों को यहाँ बसने की जगह दी गयी और उन्ही में से एक ने अपने खेमे में तीर्थंकर की प्रतिमा रखी और इसी ने अब इस मंदिर का स्वरूप ले लिए। दिलचस्प है कि इसी से जुड़ा एक चिड़ियों का अस्पताल है जो हम उस दिन नहीं देख पाए। जैन धर्म की सब जीवित प्राणियों के प्रति सहृदयता का प्रतीक। जैन मंदिर से लगा हुआ है गौरीशंकर मंदिर। कभी दिल्ली पर मराठा राज भी था और तब अप्पा गंगाधर ने यह शिव मंदिर बनवाया। नदी तट पर तब लाल किला नहीं था और अनेक शिवलिंग स्थापित थे। लोग स्नान कर इन पर जल चढ़ाते और फिर दिनचर्या शुरू होती।चांदी  के आधार पर शिवलिंग पर जल चढ़ता जा रहा है,सुविधा के लिए स्टील के लोटे रखे हैं। मन्त्र जपते, शिव  स्तुति करते भक्ति का ही सब ओर रंग है।
        दिल्ली की कहानी है रक्त-रंजित। सत्ता के गलियारे मज़हब,जात-पांत,उम्र,पेशा किसी की भी इज़्ज़त नहीं करते और हर युग में दिल दहला देने वाले किस्सों से दिल्ली का इतिहास भरा हुआ है। सिख गुरुओं की शहादत हो या मुग़ल बादशाह के छोटे मासूम बच्चों का कत्ल--यह सबका साक्षी रहा है। प्यार से बसाया गया शाहजहांबाद और उससे भी अधिक मुहब्बत से जहाँआरा बेगम ने चांदनी चौक तामील किया। कूचा,कटरा,कलान,बाड़ा बहुतेरी कहानियां सुनीं उस दिन। हवेलियां थीं,व्यापार था,चाँद के खेलने के लिए तालाब था,शाम को सैर की सहूलियत के लिए पानी डालते भिश्ती थे। और इन सब को पाकीज़गी की चादर उढ़ाये यह सब धर्म स्थल थे। सीसगंज गुरुद्वारा में श्रद्धा से सेवा कर रहे लोगों को चप्पलें सौंपीं,पवित्र कुए का पानी पीया और ऊपर जाकर शांत चित्त हो  मत्था टेका और सबकुछ रब पर छोड़ दिया।गुरु तेगबहादुर की शहादत के स्थल पर बने गुरूद्वारे में बहुत शक्ति है।
           सटी हुई है सुनहरी मस्जिद।यहाँ सुनी दास्तान नादिर शाह की जिसने कान के पास से गुज़रे एक आवरा तीर से नाराज़ हो कत्ले-आम का हुक्म दिया और यहीं से खड़े होकर वह खूनी मंजर देखता रहा। मुहम्मद शाह रंगीला का समय था और जब वह वापस गया तो सात किमी लंबा कारवाँ था लुटे हुए और उपहार में दिए गए सामान का। साथ में था तख़्त-ए -इ ताउस(Peacock throne) और कोहिनूर हीरा और सोने की चिड़िया कहा जाने वाले  हिन्दुस्तान को ख़ाक में  मिला देने वाला अंजाम। सड़क पार था एक गिरिजाघर 'बैप्टिस्ट चर्च '। आपको इतिहास से वही परिचय करा सकता है जो अतीत को वर्तमान से जोड़ता रहे। इसीलिये जब उन तीन लड़कियों के बारे में आसिफ ने हाल का ही किस्सा सुनाया जो चर्च के बंद दरवाज़े के बाहर से एक दरख्वास्त कर रही थीं कि दरवाज़ा खोल दो बस नमाज़ पढ़नी है तो और उन्हें अंदर दाखिल किया गया तो इबादत और भी संजीदा हो गयी। 1814 में बना यह चर्च दिल्ली के सबसे पुराने गिरिजाघरों में से है। यहीं कहानी सुनी वज़ीर खानम की और यही दास्ताँ सुनते हुए गिरिजाघर के बाहर बजती घंटियों में सदियों पहले हुई कोई प्रार्थना गूंजने लगी।
              सुनते-सुनाते उन तंग रास्तों पर जहां अब चांदनी चौक रेडेवेलप्मेंट का काम चल रहा है  हम आगे बढ़े।रास्ते में जलेबी खाई। वैसे भी चाँदनी चौक का इतिहास यहाँ के खानपान को भी समेटे हुए है और हर दुकान बादशाह सलामत के समय से चली आ रही मालूम होती है। हमारे लखनऊ की नाज़ुक जलेबियों की तरह नहीं, यह तो ठोस अपना वजन दिखाती जलेबी,कह लें जलेबा, थी। बेड़मी,कचौड़ी,नगोड़ी हलवा ---भूखे भजन न होय गोपला!
       हमारा यह सफर खत्म होना था इस जगह के सबसे मशहूर बाशिंदे की दहलीज पर। बहादुर शाह ज़फर और 1857 की बगावत के समय के मिर्ज़ा ग़ालिब  गली कासिम जान में दालान में बैठकर खत और शेर लिखते। हवेली के कुछ भाग को अब संभालकर रखा गया है पर सामने महराबदार दरवाज़े का आधा हिस्सा ग़ालिब के नाम और आधा किसी कारखाने के नाम किया हुआ है।
        हमारी इस "spiritual walk " के शुरू में एक नक्शा निकाल बहुत बारीकी से हमें परिचय कराया गया था एक ग़मगीन बाशाह के सपने से -लाल किले के ठीक सामने -उर्दू बाज़ार से,कोतवाली से,टाउन हॉल से, चांदनी चौक से मिर्ज़ा ग़ालिब की देहरी तक इतिहास के कई पड़ाव का सफर किया और साथ ही इबादत की कई सूरतें देखीं। इबादत की हर सड़क पहुंचाती सब एक जगह हैं। हवाओं में जब अर्धमगधी में मंत्रोच्चारण,अज़ान,जय भोलेनाथ,शबद के मीठे बोल और चर्च से आते गीतों के सम्मिलित स्वर गूंजते होंगे तो कितना पावन हो जाता होगा यहाँ का हर कोना। मिर्ज़ा ग़ालिब को ही कह लेने दें :
       
    " न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता
      डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता"









Tuesday, April 23, 2019

मेरी अपनी गिलहरी

गर्मी तेज़ है। जैसी ही सर्दियां कम हुईं मैंने चिड़ियों और अन्य जीव जंतुओं के लिए एक बड़े से मिट्टी के बर्तन में पानी रख दिया था।आगे पीछे दोनों।बड़े इतरा कर मैं कहती हूँ  दिल्ली के एक ख़ास इलाके में रहती हूँ। घर की चारदीवारी के अंदर ही बहुत से पेड़ हैं। पशु पक्षियों दोनों का ही खेला लगा रहता है। चिड़िया चहचाती हैं,गिलहरी इधर उधर व्यस्तता में दौड़ती रहती है,बन्दर जब आते हैं तहस-नहस तो होना ही है।सिर उठाकर आसमान की ओर देखती हूँ तो एक पेड़ पर तोतों का ही राज है। बोलते,चहचहाते फुर्र से उड़कर कभी इधर कभी उधर,इस डाल उस पात।एक ऊंचा शायद  खजूर का पेड़ है जिसकी चोटी पर बाज बैठा है।तीखी नज़र से सब पर निशाना है उसका।और उसके विपरीत बरामदे में रखे पौधों पर एक नन्हीं सी चिड़िया पंख फड़फड़ाते हुए मंडरा रही है। बाहर कुर्सी मेज लगाकर इन्हें देखने में इतना आनंद आता है मानो सब मेरे ही हों। सिवाय बंदरों के। न वो मेरी सुनते हैं न कदर करते हैं। घंटों बैठ कर देख सकती हूँ इन सब को। आज सवेरे टहल रहे थे तो बगीचे में चिड़ियों के दाने पर गिलहरी का कब्ज़ा देखा। वैसे मैंने चिड़िया को चुगते हुए कभी नहीं देखा। ऐसा संयोग नहीं बन पाया। गिलहरी,क्या पता महादेवी वर्मा की गिल्लू की कोई वंशज होगी, बड़े इत्मीनान से नन्हे पैरों से दौड़ती आयी और उस पेड़ से लटकी थाली से सवेरे का नाश्ता करने लगी। मैंने भी आज उसे कैमरे में बटोरने की ठान ली थी। दबे पाँव गयी ... वैसे मेरा सिर्फ वहम है कि मैं दबे पाँव जाती हूँ। चिड़िया हो चाहे गिलहरी इन्हें दूर से ही आहट मिल जाती है।आज मेरे ऊपर कुछ मेहरबान थी या फिर कुछ विश्वास हो चला। मेरे करीब जाने पर वह भागी तो पर आसपास ही रही। कुछ किटकिट कर के खाती फिर मैं जैसे ही क्लोज़-अप के लिए एक कदम आगे बढ़ाती वह झटपट पत्तियों में भाग जाती। बहुत देर तक हमारा यही खेल चलता रहा और मैं उसका खाना रिकॉर्ड करती रही। काश गिल्लू की तरह वह भी मेरे साथ बैठती या मेरे कंधे पर चढ़ जाती। ऊके लिए मुझे उसी पेड़ के नीचे पड़ाव डालना पड़ेगा। वैसे यह भी है कि इतनी गिलहरियों में पहचानूँगी कैसे। नज़दीक आने नहीं देतीं,न आती हैं और दूर से सब एक जैसी। पर हैं सब बहुत नटखट। कितनी बार मैंने इन्हें एक दूसरे के पीछे भागते हुए देखा। पर जब वह दाना खाती हैं तो ह्रदय को बहुत खुशी मिलती है। 



Wednesday, January 09, 2019

माटी की बानी

  अपनी मिट्टी से प्रेम का  बंधन
अथाह,अगाध,अनादि,अनंत-आभार ,
जिसे हम कहते हैं हम,सब इस माटी का है
संस्कार,संस्कृति,कृति,दृष्टि
सब इस माटी की है।
मोहक,सम्मोहक,गुंजित,तरंगित
माटी के रंग अनेक।
पृथक विलक्षण,अद्भुत इंद्रधनुष।



मिट्टी के हैं बोल अमोल,क्या कहती,क्या  सुनती है। 
कहती है जो खुशबू मेरी,और कहीं न मिलती है । 
बारिश की वह पहली बूँदें,जब मिलती हैं कण कण से 
सोंधी सोंधी महक लिए, यह रची बसी  है रग रग में ।  

गगरी देखो,देख सुराही,देखो गाँव  की डगर डगर    
मन में तेरे गहरे बसे हैं,दूर कहीं हो फिर भी अगर।
इस माटी से जुड़ा हुआ है  जीवन का हर तार तेरा
माटी की बानी गूंजे है,झंकार करे हर साज तेरा। 

इकतारा बज उठता है पकी फसल के लहराने से
घूम घूम फ़कीर बावले,भक्ति के प्रेम तराने से।
फगवा गाते गली गली जब घूमे है टोली मस्तानी
माटी की बानी बोले है और राधा हो जाए दीवानी।

पुरखों की धरोहर संजो ली हर ताने बाने के धागे में,
पैरों की थिरकन में या फिर लोक कथा दुहराने में।
तन इसका मन भी इसका माथे पर इसका तिलक अनंत
माटी की बानी बोले है, वही आदि है वही है अंत।

Thursday, March 08, 2018

महिला दिवस पर ख़ास

हम हैं तो दुनिया हैं,
हम हैं तो रंग हैं ,
हम है तो जीवन चक्र है
हम हैं तो सहारे हैं।
 हम से ही परम्परा है
 हम से ही नवीनता है
हम से ही स्थिरता है
हम से ही हैं नयी उड़ानें।
हम से  रास्ते के उजाले हैं
हम में अंधेरों के गलियारे हैं।
हम से कायम हैं रिश्ते बहुत
हम से अपना रिश्ता है अहम बहुत ।
हम से रसोई की आग है
हम कर सकते हैं काज बहुत।
हम दिल के हाथों मजबूर हैं
हम दिल के बहुत मज़बूत हैं।
हम से ही हमारी पहचान है
हम नारी हैं ,
हमारी आवाज़ है,
हमारी आशा  है ,
हमारी शक्ति है,
हमारी सोच है
हमारा सम्मान है।

Friday, January 19, 2018

हमारे सिम्बाजी

कल रात सिम्बा नहीं रहा। वहां चला गया जहाँ उसे कोई कष्ट नहीं होगा। बीमार और कष्ट में तो वह कुछ महीनों से था पर पिछले एक महीने से अपने आप उठने में असमर्थ था। उसके पिछले पैर अशक्त हो गए थे और उसे उठाना पड़ता था। उसकी विवशता बहुत दुखदायी थी।पर उठाने  के बाद वह वही पुराना जोशीला सिम्बा हो जाता,हर चीज़ को सूंघना,बिस्किट खाने की ज़िद करना,रसोई के दरवाज़े पर बैठ खाने का इंतज़ार  करना या हमारी गोद  में सिर रख देना।  पिछले दो दिन से अचानक उसके सामने के पैर  भी जवाब दे गए और जब हमने डॉक्टर को दिखाया तो उन्होंने ने कहा इसका जीवन काल यही तक है। उसे एक हफ्ते का समय दिया और हमें सलाह दी कि हम सिम्बा को उसके कष्ट से मुक्ति दिलाने के लिए  उनकी मदद से सुला दें। यह एक ऐसा निर्णय था जो हम ले पाने में बिलकुल असमर्थ थे। यह जानते हुए कि इसमें उसकी भलाई  ही  है। पर विशाल दिल वाले यह भांप जाते हैं। बीमारी हालत में भी सिम्बा हमारी कश्मकश को समझ गया और शाम को कुछ कष्ट और तकलीफ के बाद  रात में ही वह हमें छोड़ गया। ग्यारह साल बाद आज पहला सवेरा उसके बिना। उसके भौकने  की आवाज़ का भ्रम होता है,रात में उसके होने का आभास बना रहा। परिवार के सदस्यों को खालीपन लग रहा है पर सबसे अधिक लग रहा है  हमारे साथ रहने वाले सफरुद्दीन को जो पिछले छह साल से उसकी देखभाल अपने बच्चे से भी बढ़ कर करता। उससे बातें करता,उसे डांटता,उसके घाव की सफाई करता,दवा खिलाता घुमाने ले जाता,नहलाता। छुट्टी  से लौट कर आता तो स्टेशन से  सीधे पहले सिम्बा से मिलता। उसे घुमाने ले जाता फिर सामान रखता। जो भी हमारे घर आता सिम्बा से प्यार करने पर मजबूर हो जाता। दो साल पहले वह  सिम्बा से सिम्बाजी हो गए ,वरिष्ठ सदस्य होने के नाते।
आभार है उसका हमारे जीवन को अपने प्यार, अपनी उपस्थिति से भरने का और अंत में भी हमें महफूज़ रखने का।


यह नीचे का लेख नवम्बर 2016   में लिखा था पर व्यस्तता के कारण यहां डाल  नहीं पायी ! आज उसकी याद में नम  आँखों से उसे समर्पित !  

इस महीने हमने एक विशिष्ट जन्मदिन मनाया। हमारा  सिम्बा दस   साल का हो गया । वो फर का गोला अब बूढा हो चला। कुत्तों के लिहाज़ से दस  साल वृद्धावस्था है। खास कर उस जैसे बड़ी कद काठी वाली नस्ल के लिए जिनकी उम्र कम ही होती है।अब उसकी हरकतों में भी बुढ़ापा झलकता है। रात में कराहता है। कई कई बार उठता है। वो हमारे ही कमरे में सोता है और मैं महसूस करती हूँ कि वह बहुत चहलकदमी कर रहा है। कई बार मेरे सिरहाने अपना मुंह रख देता है। मनुष्यों की तरह ही हर कुत्ते की अपनी अलग आदतें और व्यक्तित्व होता है। सिम्बा कभी बिस्तर पर सोना नहीं चाहता। उसका अपना एक गद्दा है और अगर रात में वह नहीं बिछा है तो वह दरवाज़े पर खड़ा होकर या तो इंतज़ार करेगा या फिर शिकायत भरी दृष्टि से हमें देखेगा। उसको लोगों के साथ रहना अच्छा तो लगता है पर अपना एकांत भी प्यारा है। लिहाज़ा वह कुछ देर पास बैठने के बाद या फिर प्यार दिखाने के बाद  दूर चला जाता है। यही हाल होता है जब घर में मेहमान आये हों। हम अगर उसे घर आने वाले हर आगंतुक से न मिलवाएं तो वह नाराज़ हो जाता है। इसमें परेशानी यह होती कि है हर मेहमान सिम्बा की नज़दीकी से सहज नहीं होता। जबकि वह है कि  सिर्फ सूंघ कर सबसे जान पहचान कर एक किनारे बैठ जाता है। वह सेंट बर्नार्ड है जो देखने में भारी भरकम होते हैं पर दिल के बहुत कोमल। उसे देखकर लोग डर जाते हैं। पर उस सफ़ेद और काले बाल वाले भीमकाय शरीर में धड़कता दिल बहुत प्यारा है। उस प्यार का इज़हार भी पल पल  में करता रहता है। आप कहीं भी बैठे  हों अचानक  आपकी गोद में एक गुदगुदी सी होगी। धीरे से एक नाक ,फिर एक सिर आपकी गोद में आएगा और फिर पूरा शरीर उसमें बैठने की कोशिश कर रहा होगा। सोचिये एक ५५-६० किलो का वजन किसी भी तरह उसमें समाने की कोशिश कर रहा हो।  अगर आप उसे सहलाते नहीं तो वह पंजा मारकर आपको अपने होने का एहसास दिलाएगा । यह स्नेह खाना खाने के बाद और भी मुखर हो जाता है। अभी तो वह सिर्फ गोद में सिर रख देता है या पास आ कर सटता जाता है। पर एक साल पहले तक वह अपनी गीली दाढी लिए ऊपर ही चढ़ जाता था। और दो पैरों पर खड़ा सिम्बा हम से लम्बा ही है। वह उछल कर हमारे कन्धों पर अपने आगे के दोनों पैर टिका देता और चाहता कि हम उस सहलाएं या गले लगाएं । हम सब सावधान रहते हैं उसे प्यार वाले मूड देखते थे तो जाते  या तो ज़मीन पर पैर जमा देते। नहीं तो गिरना पक्का था।
     मुझे याद आ रहा है। वह तीन महीने का था जब  हमारे पास आया था। उस समय परिस्थितयां ऐसी विषम हीं कि मैं उसे घर में लाने के निर्णय से बिलकुल  सहमत  नहीं थी और नाराज़ भी। पर कुछ ही महीनों में  वह  झबरीले  पिल्ला  दिल में आकर बैठ गया। वह  इस बात से ज़रा भी निरूत्साहित  नहीं था कि मैं उससे रूखा व्यवहार कर रही हूँ।  वह पूंछ हिलाते प्यार के लिए पहुँच ही जाता। तब से  वह परिवार का सदस्य है और अपने को हमसे अलग नहीं मानता। वह  हमारी हर गतिविधि में शामिल होता है। अगर बाहर जा रहे हों तो पहले कार के पास खड़ा हो जाता है। यह मुमकिन नहीं कि उसे हर जगह ले जाया जाए पर उसे घर छोड़ते हुए जितनी निराशा उसे होती उससे कहीँ अधिक दुःख हम सबको। खासकर जब हमें कहीं शहर से बाहर जाना होता है । उस तक यह बात पहुँचाना असंभव है की हम अमुक दिन वापस आएंगे। वह भी  मुँह लटकाकर बैठ जाता है और  उसकी पूँछ  पैरों के बीच छुप जाती है। अगर उसने कहीं सूटकेस देख लिया तो उसकी बैचैनी का कोई अंत नहीं।  वह उसी के पास बैठा या लेटा रहेगा। वैसे अगर घर में किसी की तबीयत खराब होती है तो भी वह उस सदस्य के पास से  नहीं हटता है।
   सेंत बर्नार्ड नस्ल के कुत्ते स्विट्ज़रलैंड में पाये जाते हैं और उनके बारे में मशहूर है कि वह पहाड़ों में बर्फ में दबे लोगों को खोजने में बहुत मदद करते थे।इनकी सूंघने की शक्ति बहुत विक्सित है और यह बर्फ में बहुत नीचे दबे लोगों का भी सूंघ कर पता लगा सकते हैं। एक से डेढ़ फुट ऊंचा,लंबे बालों वाला ,शक्तिशाली और वजनदार  यह कुत्ता बहुत ही नरम,वफ़ादार और दोस्ताना मिजाज़ का होता है। इसके बाल काले और सफ़ेद होते हैं या फिर भूरे और सफ़ेद होते हैं। हमारा सिम्बा काला और सफ़ेद है। उसे देख कर लगता कि वह अपना कम्बल साथ ले कर चल रहा हो। उसकी दुम काफी घनी और दमदार है और अगर सिम्बा ने खुशी से पूंछ घुमाई तो समझ लीजिये कि आसपास रखी चीज़ें तो ज़रूर टूटेंगी।
    एक बड़ी दिलचस्प बात यह भी है कि उसे भुट्टे खाने का बड़ा शौक है। वह बड़े चाव से खाता है और अगर हम भुट्टा खा रहे हैं तो वह घर में वह कहीं भी है ,दौड़ा चला आएगा। इसलिए जब भी भुट्टा आता है उसके लिए अलग से एक आता है। वैसे वह दूध रोटी  ,दही,पनीर का पानी और मटन पसंद करता है। उसकी एक अच्छी आदत है  कि वह बड़े ही अनुशासित तरीके से अपने नियत समय , खाने वाली जगह पर ही खाना खाता है। सवेरे छह बजते ही वह अपनी नाक मेरे मुंह के पास सटा देता है। हमारा मॉर्निंग अलार्म वह ही है। चलो मुझे बाहर निकालो , घुमाओ और मेरा खाना दो।
   हमें लगता है कि हमारी दिनचर्या उसी के इर्द गिर्द घूमती है। थोड़ी देर के लिए  दिखाई न पड़े तो उसकी खोज शुरू हो जाती है। सब लोग ऑफिस से लौटने पर सबसे पहले उसको सहलाते हैं नहीं तो वह अपने भौंकने के अंदाज़ से नाराज़गी जता देता है। कोई कितना भी  परेशान हो ,परिवार के इस सदस्य का दुलार हर पीड़ा को हल्का कर देता है। प्यार भी बिलकुल अथाह और बेशर्त। वह बूढा होने पर भी बच्चा है ,हमारी भाषा न बोल पाने के बावजूद सर्वाधिक अभिव्यंजक है और सच तो यह है कि उसके बिना सब कुछ अधूरा लगता है।
     

Sunday, July 09, 2017

हम फिदाए लखनऊ


लखनऊ है तो महज़ गुम्बद-ओ मीनार नहीं,सिर्फ एक शहर नहीं,कूचा ओ बाज़ार नहीं,
इसके दामन में मोहब्बत के फूल खिलते हैं, इसकी गलियों में फरिश्तों के पते मिलते हैं,
'लखनऊ हम पर फ़िदा, और हम फिदाए लखनऊ 
क्या है ताकत आसमां की, जो छुडाये लखनऊ

लखनऊ कह लें या नखलऊ........ अवध के नवाबों ने बड़े नाज़ से इस शहर को आबाद किया। उनके हर शौक की निशनियां यहां बिखरी हैं । बड़ा इमामबाड़ा की भूलभलैया  में छिपी है  नवाब आसफ-उद -दौला की वह कहानी जो अकाल में जनता की मदद के लिए स्वयं उसको बनाने में जुट  गए। वह भावना दिलचस्प है जो नवाबी खानदान से जुड़े लोगों की  शाख़  में गुस्ताखी लाये बिना उनकी ज़रूरतों को पूरा करने का उपाय ढून्ढ लाई । लखनऊ  में हर मोड़ पर उस ज़माने की इमारतें रास्ता रोके खड़ी हैं। छोटा इमामबाड़ा, रूमी दरवाज़ा, छत्तर मंज़िल ,रेजीडेंसी,बारादरी,दिलकुशा ,शाहनजफ का इमामबाड़ा ऐसे कितने ही अद्भुत स्मारक चिन्ह लखनऊ को एक अलग पहचान देते हैं।  अंग्रेज़ों  की बसाई छावनी के गिरिजाघर हों या आज का हज़रतगंज स्थित बृहत् केथेड्रल ,सब इस शहर को चार चाँद लगाते हैं। वैसे चाँद की चाँदनी की बात करें तो यहाँ के नज़ाकत और नफासत वाली हवाओं के लिए वह भी बहुत गर्म हैं। यहाँ तो हज़रतगंज में शाम की सैर करने पर भी ज़ुखाम हो जाने के चर्चे हैं ! शाम -ए -अवध का मज़ा उठाना हो तो  गंजिंग करना अनिवार्य है। मेफेयर का ज़माना अब नहीं रहा। उसका मलाल हमेशा रहेगा।  जनपथ है,रॉयल कैफ़े है ,शुक्लाजी की चाट है ,रामआसरे की मिठाई है , हनुमान मंदिर है। राम आडवाणी की पुस्तकनिधि है, रोवर्स के सामने  भीड़  है, खियामल की साड़ियां हैं।
  पर अगर असली खरीदारी करनी है तो चौक की गलियों में आरी,जाल ,मूरी ,फंदा,टेपची और न जाने कितने कमाल दिखाती चिकनकारी को देखिये। वैसे अमीनाबाद का गड़बड़झाला और नजीराबाद भी कम नहीं। कुछ आगे है लखनऊ का सबसे पुराना बाजार नक्खास। यहाँ अब भी  चिड़ियों का एक अनूठा बाज़ार लगता है।  लखनऊ का नाम लेते ही बहुत से नाम तुरंत याद आ जाते हैं। चिकन की महीन कशीदाकारी तो है ही , साथ में कितनी और कलाओं का पर्याय है यह शहर। यहाँ हर शौक को परिष्कृत कर एक ललित कला का रूप दे दिया गया । पहले आप और आदाब के इंतहाई अदब के साथ साथ यहाँ मशहूर हैं नफासत के कई किस्से। नवाब साहब का दाँत टूट गया  तो उनके खानसामा ने तुरंत गल जाने वाले गलावटी कबाब पेश  किये । ज़रा सोचिये इसमें सौ से भी अधिक मसालों  का इस्तेमाल होता है। क्या आपने जरकुश और बओबीर का  नाम  सुना है कभी ? क्या चन्दन को मसाले की तरह सोचा है कभी ?इसका मज़ा लेना हो तो टुंडे कबाबी के  यहाँ जाइये। कोयलों की  धीमी आंच पर घंटों पकता खाना  दम पुख्त के नाम से मशहूर  है और इससे  शुरू हुई लज़ीज़ पकवानों की एक अलग ही श्रृंखला।  पर शाही रसोई के बाहर भी यहाँ के खाने का मज़ा बेमिसाल है। अमीनाबाद की प्रकाश कुल्फी , वहीं पीछे कबरवाली दुकान की कचौड़ियां या दोपहर बाद लगता तिवारी की चाट  का ठेला  ...यहाँ का हर निवाला एक सवेदनशील ह्रदय की अभिव्यक्ति है।
जिस शहर में नवाब अपने निष्कासन  की पीड़ा  ठुमरी में व्यक्त करें ,वहां सुरों का राज न हो यह नामुमकिन है। " बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाये" सुनकर फूटफूट कर रोने का दिल करता है।  गायकी का ज़िक्र आये और लखनऊ का हर बाशिंदा बेगम अख्तर से  राब्ता न बनाए यह हो ही नहीं सकता । बेगम साहिबा जब "ए मुहब्ब्त तेरे अंजाम पर रोना आया " गातीं तो हर लखनऊ वाला  शाम पर रोने के किस्से याद करता है।  वह शाम जो  कत्थक के लखनऊ घराने के थिरकते पैरों के घुंघरुओं से खनक जाती है ।   या वो शामें जो नीचे गोमती की लहरों और ऊपर  अठखेलियां करती पतंगों पर कुर्बान हैं ।
कहते हैं लखनऊ की सड़कें मंज़िल तक नहीं पहुंचाती हैं। वो खुद ही मंज़िल  होती हैं।  इसीलिये मुस्कराइए की आप लखनऊ में हैं।
तहज़ीब कोई मेरी नज़र में जंचेगी क्या
मेरी निगाहे शौक ने देखा है लखनऊ।



Tuesday, March 07, 2017

मेरे घर आयी खुशी की बहार

आज शाम बहुत सी मुस्कराहटें
इधर उधर से उड़ती हुईं
मेरी बगिया में आईं।
कुछ हंसती चहकती  अंदर आईं
कुछ सकुचाती मुस्कराहट थी ,कुछ खामोश
कुछ में सहमा सा डर था,कुछ में दिल्लगी
पर मुस्कराहटें सब थीं।
फूलों,कलियों,पेड़ के दरख्तों ,वो वहां टिकी साईकिल,उधर
रखा एक छाता

एक एक कर सब पर बैठ गयी थीं मुस्कानें।

धीरे धीरे खुशबू की तरह सब और फ़ैल गयी मुस्कानें।
बगिया  तो चहक उठी,महक उठी
चंचल हो उठी,बावरी हो गयी
देख सब मुस्कानें।
किसी मुस्कान में पीताम्बर बसा
किसी ने ओढी थी हरी चुनरिया
उन्मुक्त हंसी में बदली एक मुस्कान ,एक ने खिलखिला  कर दिया जवाब।
लिहाज़ के बंधन   में बंधी पर फूटने को बेताब  एक मुस्कान दिखी
कुछ हरी घास पर बिखरी मुस्कानें थीं,कुछ उत्सुक निहारती  मुस्कानें थीं।
हाथ थामें मुस्कानें थीं,कुछ भागती मुस्कानें थीं,
दिल का दरवाज़ा खोल झांकती मुस्कानें थीं।
मेरी,उसकी,इसकी,किसकी  सबकी आँखों से झलकती मुस्कानें थीं।

आज शाम इधर उधर से
बहुत सी मुस्कानें मेरी बगिया में आईं
बगिया मदहोश है
और मेरी मुस्कान
सब मुस्कानों का रंग चुरा
हो गयी है  उमंग से लबरेज़  मुस्कान ।