जोधा अकबर
साढ़े तीन घंटे की को मैंने ०-१० के स्केल पर ७.५ नम्बर दिया । फिल्म के सेट की शानो शौकत पसंद आयी .भव्य सेट जिसमें राजसी राजपूत महलों और मुगलिया दरबार का शाही अंदाज़ दोनों दिखाने में फिल्म के कर्ता धर्ता सफल रहे। ह्रितिक रोशन ने अच्छा अभिनय किया खासतौर पर जहाँ नज़ाकत से करना था।शाही अन्दाज़ भी अच्छे से निभाया। दो तीन जगह तो खासा प्रभावित किया जैसे कि जब वो जोधा से पहली बार मिले। हाँ ऐश्वर्या ने भी अपने अभिनय का अलग अन्दाज़ पेश किया। मुझे लगता उनके अभिनय ,उनके बोलने के तरीके, उनके नृत्य में कुछ ज़्यादा लटके झटके होते हैं। पर उन सबके विपरीत इस फिल्म में उन्होंने अपने संतुलित अभिनय से प्रभावित किया। एक राजपूतानी की गरिमा को बखूबी निभाया । ह्रितिक और ऐश्वर्या की जोडी में भी सामंजस्य अच्छा है। कुछ दृशय तो बहुत ही अच्छे लगे । जब जोधा अपना बनाया खाना चखती हैं और अकबर का कहना कि वह उसकी झूठी थाली में ही खायेंगे । तलवार की जुगलबंदी ,जोधा का सूरजमल के साथ दृशय ,ऐश्वर्य और इला अरुण के बीच का तनाव । अकबर जब आदम खान के समक्ष जोधा का सम्मान करता है तो लगा पति हो तो ऐसा। लडाई के दृश्यों में कुछ ऊब सी लगने लगती थी। कभी कभी यह भी लगता था जैसे निर्देशक कभी कभी जोधा अकबर के प्रेम को उतना न्याय नहीं दे पाए क्योंकि वह साथ में उस समय के राजनीतिक और ऐतिहासिक परिवेश को भी उतना ही महत्व देना चाह्ते थे जितना प्रेम कथा को। एक राजनीतिक सौदा कैसे प्यार में बदल गया इसका अहसास, जैसे जैसे फिल्म आगे चलती है ,होता जाता है। लेकिन यह बात है कि एक ऐसे बादशाह् को जो सब धर्मों की इज्जत करता था,प्यार से दिलों को जीतना चाह्ता था और बहुत ही सुलझे विचारों का था , उसके लिये जोधा का ज़िन्दगी में शरीक होना ,उसके व्यक्तित्व में नया आयाम ला देता है।
पूनम सिन्हा को पहली बार पर्दे पर देखा अकबर की वालिदा हमीदा बानो कि किरदार में।कितनी सुन्दर हैं।हम सब की नज़र पडी अकबर के चारों और घूमते खूंखार पहरेदारों पर . कलाकारों का चयन अच्छा था।मुझे पोशाकें पसंद आयीं ,वास्तविक लग रही थीं ।वैसी ही जैसे कि हमारे जहन में होती हैं जब हम उस समय के बारे में सोचते हैं । जोधा के गहने ,क्या कहने। " कहने को जश्ने बहारा " गुनगुनाते हुए बाहर आए ।
देखने के बाद अच्छा लगा लेकिन कुछ कमी सी भी लगी जैसे कुछ और हो सकता था.

