Monday, October 22, 2012

पिकनिक

तितलियों  के पीछे पीछे
पेड़ों की छाँव के नीचे 
मखमली घास के गलीचे 
हम अपनी मस्ती से सींचे !

गुनगुनाते स्वरों की लहरी 
गदगद हो जाए   दोपहरी
मन में लहर उठे  गहरी 
यह   घड़ी बस रहे  ठहरी  !

शारदीय सुबह  की हौली ठंड
सब संगिनियों का हो संग 
तो मन करे बस एक पुकार 
आपसे  आने का  मनुहार !