Thursday, February 10, 2011

अंडमान - हरे सांप और जैव विविधता से मुलाकात

नोर्थ बे और रोस आईलेंड    की यात्रा के बाद लगा कि अंडमान के जंगलों को भी देखना चाहिए.यहाँ पर हर तरफ पेड़ ही पेड़ दिखते हैं  . फिर दो दिन लगातार यह छोटी समुद्री यात्राएं करने के बाद थोडा ज़मीन पर चलने का मन भी कर रहा था. पोर्ट ब्लेर में बहुत कुछ देखने को है. चैथम  सौ मिल ,बड़ी पुरानी लकड़ी की मिल है.पर अफसोस उस दिन बंद थी. पर उसको छोड़ हम आगे बढे अंडमान,निकोबार द्वीपों  की दूसरी सबसे  ऊंची पहाडी चोटी माउन्ट हेरियट की ओर . वैसे तो यह पोर्ट ब्लेर से ५५ किमी दूर है ,लेकिन नाव से जाने में सिर्फ २० मिनट में वहां पहुंचा जा सकता है. चैथम घाट से दूसरी पार , बैम्बू फ्लेट तक हम नाव से गए. हम ही नहीं हमारी गाडी भी साथ में उसी नाव में हो ली. यह फेरी वहां के निवासियों के लिए  बस सेवा की तरह है . सब अपनी कार,स्कूटर,मोटरसाइकल उसी पर चढ़ाकर  इधर  से उधर जा रहे थे .                                                                           
बम्बू फ्लेट भी एक छोटा कस्बा सा है जहां से हम चले   माउन्ट हेरियट की ओर. रास्ते में पार किया एक प्राइमरी स्कूल .










आगे जाकर ड्राइवर ने गाडी रोक एक किनारे लगा दी और नारियल के बीच समुद्र,दूर दिखते  दो टापू और एक लाइटहाउस की तरफ इशारा किया. बोला फोटो खींचिए और फिर देखिये क्या पहचानी सी लग रही है. हम ने खींच ली और ध्यान से देखा. खैर सिर खुजाते रहे ,पर कुछ पहचान नहीं आया . उसी ने बताया कि बीस रुपये के नोट पर यही दृश्य छापा जाता  है! अद्भुत !आगे बढे तो माउन्ट हेरियट का चेक पोस्ट था.नाम पता लिखवाया गया,कुछ प्रवेश शुल्क अदा किया और फिर चले अन्दर . वैसे यहाँ पर गाडी रोक कर आगे तक ट्रेकिंग की जा सकती है. पर हम गाडी  और पहुँच गए माउंट हेरियट  . यहीं  पर  एक तरफ बैठने के लिए मचान सी बनी थी. हम लोग तो आगे बढ़ गए पर परिवार के बुज़ुर्ग वहीं बैठकर आसपास के प्राकृतिक  सौन्दर्य  का मज़ा लेते रहे.मचान से नीचे उतर कर हमने ट्रेक शुरू की. यहाँ ट्रेकिंग की दो मंजिलें हैं. छोटी करीब डेढ़ किमी वाली कालापत्थर तक और लम्बी ,  मधुबन और समुद्र तट तक . हम पगडंडी से  अन्दर घुस गए. पूरा रास्ता सिर्फ पेड़,जंगल, तरह तरह के  पौधे. ऊपर पेड़ों की  चलनी से छन छन कर आती धूप ,नीचे धूप छाँव से बनते छायाचित्र  .करीब आधे घंटे बाद लगा वापस चलें . लौटने के लिए मुड़े  तो देखा एक लड़का बड़े ध्यान से ज़मीन में लताओं को देख रहा है. पूछा तो उसने इशारा किया ,एक हरा सांप वहां लेटा था.
हम भी रुक गए. उसने सिर उठाया ,फन फैलाया  ,इधर उधर देखा और आगे बढ़ गया. यह भी अच्छा रहा . वनस्पति की इतनी विविधता दिखाई पडी. कोई पेड़ किसी और का सहारा ले आसमान छूना  चाहता है, कहीं जड़ ही आकाश की तरफ उठ गयी .वापस आकर कुछ देर उसी मचान पर बैठकर आराम से चारों के दृश्य देखते रहे. हरियाली को आँखों में बसा लेने का प्रयास. अब तक भूख  लगने लगी थी और वापस चैथम की फेरी पकड़नी थी.





Thursday, February 03, 2011

अंडमान - नार्थ बे में की पहली बार स्नोर्कलिंग

दूसरे दिन सवेरे सवेरे हम निकल पड़े अंडमान के एक और नज़दीकी टापू 'नोर्थ बे आईलेंड '.यह भी पोर्ट ब्लेर से साफ़ नज़र आता है. एबेर्दीन जेट्टी से खड़े हो कर देखने पर सीधे रोस आईलेंड है और बाईं तरफ थोड़ी और दूर पर नोर्थ बे. यहाँ पहुँचने में कोई २० मिनट लगा .नाव पर ही हमें कहा गया कि अगर स्नोर्केलिंग करनी है तो  ५०० रुपये प्रति व्यक्ति जमा करा दें. अंडमान के समुद्र के कोरल के बारे में बहुत सुन रखा था . सो तुरंत  पैसे दे दिए गए. यह भी पता चला कि समुद्र में जाने में डर लगता है तो ख़ास शीशे के तले वाली पारदर्शी नाव भी है जिसमें बैठ कर  कोरल का आनंद लिया जा सकता है.
नज़दीक आता नोर्थ बे टापू
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नोर्थ बे पहुंचे तो एक पतला समुद्र तट और बाकी सिर्फ जंगल दिखे. इस तट पर लोगों के लिए कामचलाऊ इन्तेज़ामात किये गए हैं,.टाट से ढके एक छोटा सा कमरा जिसमें लोग समुद्र में जाने से पहले कपडे बदल सकते हैं ,कुछ दुकानें चाय,ढाब ,वगरह के लिए. अगर कोई एक जोड़ी कपडे नहीं लाया है तो तीस रुपये में कपडे भी मिल रहे थे. समुद्र के खारे पानी से निकल कर १० रुपये बाल्टी में साफ़ पानी आपके ऊपर डालने का भी प्रबंध था . इन सबके बारे में बाद में चर्चा करेंगे लेकिन पहले लिया कोरल देखने का मज़ा .स्नोर्केलिंग गियर और लाइफ जैकेट पहनकर  हम चार लोग ने एक दूसरे का हाथ थाम लिए और एक का हाथ गाइड ने पकड़ लिया . फिर वह हमें ले गया समुद्र में. सिर पानी के  नीचे किया और दिखाई पड़े पहले तो भूरे मूँगों की बस्ती. जैसे जैसे आगे बढे कुछ रंगीन भी दिखने लगे. कोरल जीवित सूक्ष्म प्राणी होते हैं जो पानी से केल्शियम की एक सतह बना लेते हैं और बहुत ही सुन्दर लगते हैं. यह तट के नज़दीक ही पाए जाते हैं. इनकी बस्ती को कहते हैं रीफ. यह बहुत नाज़ुक होते हैं और इनकी सतह पर ज़रा सी खरोंच लगने पर इन्हें संक्रमण लग जाता है. पर अफ़सोस मैंने पाया कि हमारे गाइड और अन्य तैराक भी इन पर रख रहे थे. शायद तट के पास के मूंगे मर चुके होंगे.थोडा  आगे जाने पर रंगीन मछलियाँ भी दिखीं. तरह तरह के कोरल,कोई पत्थर की शकल लिए,कोई मशरूम, कोई फूलगोभी. पर मैं तो तैराक नहीं हूँ,सो मुझे थकान भी लगने लगी और हाँ,स्नोर्कलिंग करने में भी मुंह से सांस लेनी पड़ती है जो कि आसान नहीं. वापस तट पर आकर आराम से समुद्र में ही मौज मस्ती होने लगी. निकल कर वही १० रुपये बाल्टी के पानी से खारापन हटाया गया और फिर टाट की कुटिया में किसी तरह गीले कपडे बदले गए. बालू के बीच में ही एक कतार से छोटी छोटी दुकानें थीं.जब तक वापस ले जाने वाली नाव नहीं आयी तब तक वहीं बैठकर आराम से समुद्र का मज़ा लिया गया.तस्वीरों से दिखता है वह कामचलाऊ सैलानी स्थल.पीछे अंडमान वन विभाग की ज़मीन थी जहां सुपारी,आम की अदरक, वेनीला  के पेड़ थे.यहाँ जाना मना था. पर वहां तख्ती लगी थी इन सबके दाम की, सो उत्सुकता वश अन्दर पहुंचे.एक छोटी सी दुकान या फिर आफिस कह लीजिये .वेनीला की कुछ डंडियाँ,और अदरक खरीदी. वहां बैठे शख्स ने बताया इसे सवेरे खाली पेट खाने से गठिया  का इलाज हो जाता है. मज़े की बात तो यह कि आबादी से दूर बैठकर भी उसने हमें एमवे की दवाई खरीदने  की सलाह दे डाली !
अच्छा लग रहा था,समुद्र की मस्ती के बाद वहां बैठना ,पर आसपास देखकर बहुत दुःख हुआ.अंडमान सरकार ने यहाँ की प्राकृतिक सम्पदा बचाने के नाम पर ,सैलानोयों के लिए कोई भी सुविधा नहीं दी है. कम से कम कपडे बदलने के लिए दो तीन पोर्ट केबिन ही लगाए जा सकते थे. कपड़ों से छाये कमरे में असुविधा हुई और मज़ा आधा हो जाता है. यही हाल अन्य जगह का भी था चाहे वह ह्वालौक टापू हो या फिर बहुत ही सुंदर  ' जौली  बॉय '. सैलानियों से आखिर कमाई सरकार को भी और वहां के लोगों को भी होती है तो फिर कुछ बुनियादी सहूलियतें तो मुहैय्या कराने उनका फ़र्ज़ है. यह भी इस तरह से कि कुदरत को नुकसान भी न हो और सबका काम चल जाए.
अंडमान यात्रा में वहां के अन्य  समुद्र तटों को देख कर महसूस हुए कि नार्थ बे जाना व्यर्थ ही था और काफी महंगा भी .इससे अच्छा  हेवालोक  और जौली बॉय देखिये और इसे अपने दौरे में न शामिल किया जाए तो भी ठीक है.