Sunday, August 17, 2008

बाबू समझो इशारे हार्न पुकारे पम पम पम

कुछ दिन पहले यूँ ही न जाने कैसे गाडी का हार्न ख़राब हो गया.वैसे बाद में याद आया .बगल में बैठी बेटी ने सीट बेल्ट नहीं लगाई थी पर पुलिस वाले ने जब किनारे रोकने का इशारा किया तो हमारी बुद्धि जगी और उसने तुंरत बेल्ट लगा ली..पुलिसवाला भी समझदार था.हमें अपनी ग़लती का एहसास हो गया सो उसने भी चालान नहीं किया .पर शायद इसका सदमा था की उसी वक्त से हार्न बजाना बंद हो गया!पहले लगा की हे भगवान अब गाडी कैसे चलाएंगे. चलो एक मेकानिक ढूँढो .आखिर हम लोगों की आदत है बिना हार्न बजाये गाडी दो कदम नहीं बढती .आप सड़क पर निकल जाइए .बेवज़ह पों पों सुनाई पड़ ही जाता है. अरे पीछे ट्रक है उसको रास्ता चाहिए.ट्रक वाला तो बड़े ही सुरीले अंदाज़ में हार्न बजाएगा. क्या उसको दिखाई पड़ रहा है की मेरे बायें और भी साइकिल सवारों और दो पहिया वालों की कतार है .उसको रास्ता दूँ तो कैसे? पर जनाब का पों पों बंद ही नहीं होता.सिर्फ़ तर्क चालक ही क्यूँ.कभी टाटा सूमो या क्वालिस के ड्राईवर आपके पीछे पड़ जाएँ तो देखिये आर्केस्ट्रा बजता है. जी करता है उतर कर उनका हार्न निकाल लूँ.यह कुछ नवयुवक हैं जो अपनी मोटरसाइकिल दौडा रहे हैं और साथ में लगातार हार्न बजाते जाते हैं.अरे भाई पहले तो यह ज़िग ज़ैग गाडी चलाना ही ठीक नहीं और ऊपर से यह हार्न की थाप के साथ .सबसे सुंदर नज़ारा है रेड लाइट पर या फ़िर बंद रेलवे फाटक पर.जैसी ही बत्ती हरी हुई की लाइन में बारहवें नंबर पर खडे कारचालक ने अपनी पों पों शुरू कर दी.अरे बाबू क्या तुम्हारी पों पों सुनकर तुम्हारी गाडी पहले नंबर पर पहुँच जाएगी या फ़िर हरी बत्ती होते ही बाकी गाड़ियों की रफ़्तार प्रकाश की तेजी ले लेंगी .सब्र करो तुम्हारा भी नम्बर आएगा इस बार नहीं तो अगली बार!
ऐसा नहीं की गुनाहगार हम नहीं.ख़ुद भी कई बार बेवज़ह हार्न का इस्तेमाल करने से नहीं चूकते .आराम से ट्रैफिक चल रही है की दिल में आया ज़रा यूं ही बस यूँ ही थोडा शोरगुल हो जाए और शुरू कर दिया राग यमन में पों पों. पर सच तो यह है की हार्न ख़राब होने के बाद एहसास हुआ की बिना उसका ईस्तेमाल किए भी गाडी चलाई जा सकती है . दो दिन तक मेकानिक के पास जाने का मौका नहीं लगा.पर क्या शान्ति से गाडी चलाई.हाँ ज़रूरत महसूस हुई किसी मोड़ , पर खासकर अंधे मोड़ पर या फ़िर तब जब कोई हमारी कार के सामने आकर जान देने को तत्पर हो जाता था.हाँ कभी थोड़ी धीमे गति से चलानी पडी या फ़िर थोडा दूरंदेशी से ।पर चलाने में असुविधा उतनी नहीं थी जितना की हम सोच रहे थे। असुविधा थी बस मानसिक कि हार्न के बिना गाडी चला रहे हैं.दो दिन बाद ठीक भी करा लिया। पर फ़िर यह संकल्प किया कि इसका इस्तेमाल कम से कम करेंगे और तभी जब अति आवश्यक हो।

4 comments:

Pratyaksha said...

मन्नुभाई मोटर चली पम पम पम !

Nitish Raj said...

बेवज़ह ही पों पों बजाने वालों से मैं त्रस्त हूं, लेकिन क्या करूं साइड तो देनी ही पड़ती है। और ये गलती कई बार खुद भी हो जाती है।

Anil Pusadkar said...

ganimat hai aapke shahar me traffik police seat belt nahi lagane waalon ko bhi nahi chhodti.mujhe to yaad hi nahi hai ki delhi jaane par seat belt lagane ke alaawa kabhi uska upyog kiya ho.ye meri bahaduri nahi hai galti hai magar uska yahan chalan hi nahi hai.han bevajah horn bazane waalon se mujhe bhi chidh hai,magar uska koi ilaaj nahi.khair bahut achha likha aapne. bahut bahut badhai

समयचक्र - महेद्र मिश्रा said...

apki ye pam pam vali post to behad rochak hai. motar chali pam pam.