सोमवार, अक्टूबर 12, 2026

अलमारी भरल ठसाठस, पहिने के कुछो ना!

 अलमारी के दरवज्जे पर मेहरारू खड़े  निहारें 

कऊन  कपरवा पहनी हम, पास न कुछो हमारे! 

नीचे से एक लहंगा बोले, तनिक इधर भी देखो 

हम न देखन दुनिया अब तक, हमरो दिन भी फेरो।


चुनरी बोले तीज त्यौहार पर हमहूँ के  निकालो 

हम लगबे सुन्दर तुम पर, एक बेर तो डालो। 

ई रंग तनिक  जंचत न हम पर, ऊ पर इतना चमकउआ

फुआ दिहीन रहीं  हमका, पसंद बड़ी भड़कउआ !


साड़ी पूरी सौ पड़ी है, ब्लाउज न फ़िटीहैं एको 

मोटी पतली होवत सबहिं,ब्लाउज कहाँ तक खिंचीहों 

सारी बोले, ए ब्लॉउस  मुआ तुम, साथ हमारा छुड़ियो 

हम चलत हैं सालों साल, तुम बीच डगर  बिछरियो!


सूटवा मिमियाए कल  हमको लाइ हो, हम  तुमको ढेर भाइल 

गट्ठर ऊपर  हम पड़त रहीं हैं,तुमको नजर न आईल 

माथा फूटल रहा हमार, जो तुमको हम घर ले आईन 

सहेली ख़रीदत रही अइसन एक, हमरो मन ललचाइन।   


कछु हमका समझ न आवे, कौन्हो न लागे नीक 

कपार पाकर कर कपरवा ताकत, कोई न आवे ठीक।  

ई अलमारी झुठ्ठे भर जावत, दिखात है जो ठसाठस 

पहने के बखत कछु न मिलिहै, लागत सब बकवास! 










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