सोमवार, अगस्त 20, 2012

गोल्फ

          आजकल एक नया जुनून  चढ़ा है ,गोल्फ सीखने का . गोल्फ कोर्स पर तरह तरह के बोर्ड लगे हैं।  सबसे पहला हमें सवाधान करने के लिए है. ' गोल्फ एक प्यार की तरह है ,अगर आप उसे तवज्जुह  न दें तो  मज़ा नहीं है  , और अगर बहुत संजीदगी से खेलें तो दिल तोड़ देता है '.  शायद यही गोल्फ की सच्चाई है।
         मैंने भी शुरू किया सीखना . हर रोज़ सवेरे पहुँच जाती कोर्स पर शुरुआती कक्षाओं के  लिए। हर दिन यह बोर्ड  पढ़ती और सोचती ऐसा क्या है इस गेम की जो एक बार इसे  पकड़ता है,वो दीवाना हो जाता है। कुछ दिन छोटी सी गेंद मारते मारते ,पता ही नहीं चला कि  कब दिल में ऐसी जगह बन गयी कि उस टुक टुक  कर गेंद को मारने भर के लिए सवेरे उठना  एक दिली विविशता बन गयी। साथ में एक ट्रेनर और कैडी  है। कैडी है या बेचारा मेरी बेतहाशा इधर उधर पड़ती  और मेरे खेल को देखने  का कैदी ! क्लब पकड़ने का  तरीका उसने सिखाया और फिर कैसे सिर्फ हाथ को  ले जायें शरीर  को नहीं ,ऐसी असंभव सी ताकीद दी। जब   रखा और क्लब घुमाया तो  सरसराते हुए क्लब तो घूमा ,पर गेंद वहीं की वहीं ! ट्रेनर ने ताकीद दी  आप गेंद को देखते रहें   नज़र मत उठाएं . नज़र नीचे ही रखी  तो फोलो थ्रू ठीक नहीं था  . तौबा ! एक अदद गेंद को सही तरीके से मारना इतना भी आसन   नहीं। पर विडम्बना थी कि अगले दिन फिर पहुँच गए सीखने .
         आइरन ,क्लब,चिप ,पट ,होल ,टी ऑफ़ ,इन सबसे तो परिचय हो गया . पर 18 होल के कोर्स  जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही  हूँ .कहते हैं,गोल्फ का खेल तो आसन है,पर उसे खेलना मुश्किल .  

शनिवार, अगस्त 18, 2012

गुलज़ार ..... जन्म दिन की बधाईयाँ

हवा में तैरते किसी कण किसी क्षण  को आपने देखा 
बस उस देख भर से,
एक कविता,एक गीत ,एक कहानी निकल पड़ी. 
हर शब्द आपके स्पर्श का मोहताज ,
हर ज़र्रा इंतज़ार में है
कब आप उधर जाएँ
और अपनी हर  अनदेखी हरकत से 
वह भी वाकिफ हो जाए 

यह सिलसिला  बना रहे हमेशा ,
बहुत बेजान गुलज़ार होने हैं.
जन्म दिन की बधाईयाँ 

शुक्रवार, मार्च 30, 2012

सिम्बा

आज सिम्बा बहुत  नाराज़ है.घर में मेहमान आये हैं और उसे हमने बाहर छत  पर भगा दिया है. वह जाली के दरवाज़े से सबको देख तो रहा है पर चाह कर भी अन्दर नहीं आ पा रहा है. उसे सबके साथ बैठना बहुत पसंद है. सबको हेलो कर वह अपने एक किनारे बैठ जाता है. पर कुछ लोग हैं जो उसके बड़े शरीर को देख डर  जाते हैं.उसके अन्दर  के कोमल दिल को नहीं देख पाते हैं. अमूमन ,उसकी डीलडौल  से उसके नाज़ुक गर्मजोश   दिल को पहचान पाना ज़रा मुश्किल होता है. पहली नज़र में कोई भी सहम जाता है. सिम्बा के समझ से यह बात परे है.वह तो गले मिलकर सबका अभिवादन करता है ,और सबसे थोड़ी जानपहचान हो जाने पर , अकेले ही बैठना पसंद करता है. पर अभी वह इसी बात से दुखी है और गुस्सा भी.आखिर उसे क्यों सबसे मिलने नहीं दिया जा रहा ? उसे कौन समझाए की घर आया महमान उसके साथ मेलजोल बढ़ने में हिचक रहा है .
मुझे पता है क्या होने वाला है.मेहमान तो चले  जायेंगे और सिम्बा मुंह फुलाकर नाराज़ हो जाएगा.फिर लाख मनाने पर भी वह अन्दर नहीं आने वाला. मैं उसे बुलाने जाउंगी तो मुंह फेर  लेगा . अन्दर आएगा पर अपने हिसाब से. वह एस ही करता है अगर उसकी कोई भी ख्वाहिश पूरे करने में ज़रा देर हो जाए. सवेरे उठाकर उसे घूमने जाना पसंद है.घड़ी में ठीक छह बजाते ही वह हमारे आसपास चहलकदमी करने लग जाता है. जब तक हम कपडे बदले ,जूते पहने तब तक तो ठीक पर अगर कुछ भी और काम करने लगे तो सिम्बा जी नाराज़.फिर बहुत मनाना पड़ता है उन्हें बाहर चलने के  लिए. ऐसा ही करता है जब उसे सवेरे की दूध रोटी समय से नहीं मिलती .जैसे ही घूम  कर वापस आया  तो सीधे अपने  खाने की प्लेट के पास पहुँच जाता है. मैं  कहती हूँ  की थोड़ा तो समय लगेगा घर के अन्दर आकर तुम्हारी दूध रोटी डालने में पर वह बेसब्र है .कुह्ह देर रसोई  के सामने खड़ा रहेगा और फिर अगर मैंने नहीं दिया  तो मुंह फुलाकर वहीं ज़मीन पर लेट जाएगा. और फिर जब उसका मन करेगा तब सुबह का नाशता करेगा .
 वैसे उसे घूमना पसंद है.हम उसे घुमक्कड़  कहते हैं. घुमक्कड़ और खोजी .जब तक सूंघ सूंघ कर किसी चीज़ की पूरी जानकारी नहीं ले  लेता उसे चैन नहीं . उसके साथ घूमने का मतलब है हर एक कदम पर रुकना.वह उस जगह को सूंघेगा और कभी कभी तो मुझे लगता है किसी गड़े खजाने की महक लग जाती है उसे.सूंघेगा ,एक पैर से ज़रा ज़मीन खोदेगा ,फिर सूंघेगा और आगे बढ़ने को राजी नहीं. जब उसे तसल्ली हो जाती है की उस जगह की हर खुशबू-बदबू से वह वाकिफ हो गया है तभी आगे बढ़ता है. यह घड़ी घड़ी रुक रुक कर सैर करने में सिर्फ उसे ही मज़ा आ सकता है. उसे कार में बाहर जाना भी पसंद है. अगर हम कार से कहीं जा रहे हों ,ख़ास तौर से दूसरे शहर तो हम कोशिश करते हैं की ऐसी जगह रहे जहां कुत्ते को भी साथ रखने  की इजाज़त हो. वह कार में पीछे बैठकर पूरे सफ़र का मज़ा लेता है. कभी खड़ा हो जाता है,कभी सीट पर बैठकर , खिड़की से मुंह चिपकाकर बाहर देखता रहता है. रास्ते  भर हम लोगों के आकर्षण का केंद्र रहते हैं. आने जाने वाला ट्रेफिक,गाडी में इतने बड़े कुत्ते को देख कौतुक होता है. यात्रा के बाद घर वापस आने पर हम सब थके हो सकते हैं पर सिम्बा नहीं.उसे गाडी से उतरने में कोइ दिलचस्पी नहीं रहती है.बल्कि उतर कर अपना थोड़ा इधर उधर घूम कर वह फिर गाडी के पास खड़ा हो जाता है !हमें लगता है कि पीछे छोटी जगह में वह बड़ा बंधा सा महसूस कर रहा होगा और लम्बे सफ़र में थक गया होगा.पर सिम्बा तो उतरने को राजी नहीं.
वैसे अगर हम ऐसी जगह जा रहे होते हैं जहां सिम्बा को ले जाना संभव नहीं तो उसे घर पर छोड़ना ,अपने बच्चे को छोड़ने के बराबर होता है. जैसे ही हम सूटकेस वगैरह बाँध रहे होते हैं ,या जूते पहने कि सिम्बा को आभास हो जाता है कि हम कहीं निकलने वाले हैं.वह भी पूंछ हिलाता आसपास मंडराने लगता है. पर अगर उसका सामान न रखा गया तो उसे पता है कि वह तो साथ नहीं जा रहा . हम तो भावुक रहते ही हैं ,सिम्बा भी मायूस हो कर पूंछ नीचे चिपका कर रोनी सूरत लिए बैठ जता है.
कसौली में सिम्बा 

कैमरे के लिए पोज़ 
गजब का जज्बाती है . कहीं से बहुत दिनों के बाद आने पर वह ऐसे मिलता है जैसे न मिलने की आशा पर दुबारा मिल जाएँ.बेतहाशा चिपक  कर,गले लग कर वह आपके वहां होने का  एहसास    अपने में समेटता है. लाड प्यार जता कर ,तसल्ली कर कि वाकई आप हैं,फिर वह चुपचाप एक कोने में बैठ जायेगा. पर रह रह कर वह आकर प्यार करता है कि इस बीच आप चले तो नहीं गए.
अभी तो उसे बुखार है  सर्दी खांसी,गला खराब. छोटे बच्चे की तरह वह गोद में बैठा  रहा . गले में खराशहै  ,खाना भी नहीं खा रहा है.जिद है कि मैं अपने हाथ से उसे खिलाऊँ. सहलाती रहूँ ,उसके बालों में हाथ फेरती रहूँ.मेरे  पीछे पीछे घूम रहा है. जल्दी से ठीक हो जाए तो चैन आये . डोक्टर के पास ले गयी.कल उसे सुई लगी तो कुछ नहीं बोला .पर आज दुबारा जब ले गयी तो उसे दर्द याद आया और थोडा छिटकने लगा.
सिम्बा सेंत बर्नार्ड है .बड़ी कदकाठी का ,बेहद ही कोमल मिजाज़ का  ,भावुक ,स्नेहपूर्ण नस्ल का प्राणी है.अब हमें तलाश है उसकी हमसफ़र की .







सोमवार, फ़रवरी 20, 2012

कुदरत का जादू उतरता ही नहीं

 सोचती हूँ  कि शहर में रह कर भी ऐसी जगह रहना जहाँ  हर सवेरे नंगे पाँव ओसमयी घास पर चलने का आनंद मिले और हर शाम, छोटी छोटी क्यारियों के बीच बैठकर चाय का लुत्फ़ उठाया जाए,यह खुशकिस्मत होने  की इन्तिहा होती  है। बचपन से युवावस्था तक घर शहर में होकर भी ऐसी कालोनी में था जहां पेड़ों के पत्तियों  से झांकते मकान दिखाई देते और शाम को मोर भी कभी कभी मेहमान हमारे होते।  कुदरत से यह नजदीकियां, बचपन के दिनों की सबसे सशक्त यादें  है। सावन के अंधे को सब हरा ही दीखता है। मुझे ऐसा लगता है की  वही सावन का अंधापन मेरी आँख में बस गया है। आज उस घर को छोड़े करीब बीस साल होने को हैं पर जब भी अपने शहर की याद आती है,  तो वही हरियाली सामने रहती है। बड़ा ही सलोना सा  किचन गार्डन  था। न बहुत बड़ा न बहुत छोटा। इतना बड़ा की कई तरह के पेड़ उसमें लगाए गए थे पर इतना छोटा  की अपनापन लगे।  दो दशहरी  आम के  पेड़ थे ,जो हमसे पहले उस घर के निवासियों ने  लगाए थे और  फल हमने खाए।  मज़े  की बात यह थी की वह  हमारे घर की चहारदीवारी के पास ही लगे थे। तो लाजिमी था की रास्ते चलते लोगों की नज़र उन पर लटके बड़े बड़े आमों पर पड़ ही जाती। गर्मी की दोपहरी में माँ उसकी रखवाली करतीं। और अगर कोई बच्चा उन आम को तोड़ने की हिमाकत करता तो उसपर बरस पड़तीं।  रसोई घर का  एक दरवाज़ा इन खेतों में खुलता।  मुझे अभी भी याद है,धनिया की चटनी बननी है तो तुरंत धनिया तोड़ी जाती।  उसका स्वाद कुछ अलग ही होता। या फिर नलके के पास से पुदीना हाथों हाथ मिल जाता।
केले का वह झुरमुट,जो इस तरह से बना था कि  बीच में थोड़ी सी खाली जगह थी।  मैंने अपने दसवीं और बारहवीं के इम्तिहान इसी झुरमुट के बीच पढ़कर दिए। पापा आफिस से आते तो जितने भी थके हों खुरपी उठाकर कुछ गुड़ाई कर लेते तो थकान दूर हो जाती।  कोई घर में नाराज़ है तो उसको यहीं कहीं किसी कोने में ढूँढा जाता।वह  या तो  कोने में जामुन के पेड़ के नीचे बैठा होगा या फिर किसी अमरूद के पास। अमरूद के भी चार  पेड़ थे। 

हम लोगों ने तो इस प्रकृति को अपने मन में बैठा ही लिया था पर  कुदरत के साथ  पच्चीस सालों का जो सबसे यादगार पल थे वह मिले  जब अगली  पीढी  आयी। बहन का बेटा, मानस , दो या तीन साल का रहा होगा।  वह घर आता तो उन्हीं खेत की पगडंडियों पर सारा समय गुजारता।  पापा के साथ पौधों में पानी डालना उसका  प्रिय काम था।  पानी नहीं भी पड़ना है तो भी वह आकर  कहता ,"नाना,पेड़  सूख  रहे  हैं,पानी डाल दीजिये  !' नाना बोलते ,"अरे  अभी तो सींच  दिया  है। "  जवाब में ,"पर कुछ जगह आपने छोड़ दी है, लाइए मैं ठीक से सींच देता हूँ।  आप  थक   गए होंगे। "  
चित्र  में वह नाना की मदद करते हुए , उनसे पाईप छीनकर  खुद  सिंचाई करने  की कोशिश  कर रहा है.

ऐसे  ही याद है जब उसे अमरूद पेड़ पर लटके दिखते। संयोग  से कुछ अमरूद की डालें इतनी झुकी थीं की उसकी छोटी सी पकड़  के पास थीं। उसका अमरूद खाने का अंदाज़ निराया था।  तस्वीर उसी अंदाज़ को बयान  करती है। 


शुक्रवार, फ़रवरी 10, 2012

कहीं समान्तर

दिल का  एक कोना था बिलकुल सन्नाटे में, शांत। किसी को खबर नहीं, कभी कभी उसे भी नहीं.
 पढाई पूरी कर, पहली नौकरी   लगी थी। उत्साह था लगता  खजाना मिल गया।  पर अब तक घर के रुई के फाहों के बीच सिमटी दुनिया छोड़  दिल्ली पहंची तो वह  "मिडल टाउन  गर्ल"  बड़े शहर में गुमसुम सी हो गयी। लोगों के बात करने का तरीका अलहदा ,शहर की तेज़ी उसके छोटे शहर के नर्म भावों से कोसों दूर।  वह भी  अपनी हकबक छुपाते हुए , स्मार्ट दिखने की कोशिश में लगी थी।  अभी तो ट्रेनिंग का समय था।  वहां तो ठीक,काम से काम रख हर बात का संक्षिप्त जवाब दे लेक्चर पर ही तो ध्यान देना था।  तमाम जगह से सहकर्मी थे। थे तो सब उसी के हमउम्र,पर सब के मिज़ाज अलग।  देख कर पता चल जाता कौन कैसा है।  उसकी तरह और भी शांत थे,शायद छोटी जगह तो नहीं पर हाँ घर से पहली बार निकले हुए।  कुछ ने पहले भी कहीं नौकरी की थी,उनके लहजे में उसकी ठसक थी.
चाय का ब्रेक हुआ।  अब तो लाउंज में मिलना जुलना ही पडेगा।  हाय हेलो करते,मुसकराते,  फिर  आदतन   भीड़- भाड़ और स्माल टॉक की दुनिया में वह असहाय सी अकेले पड़ गयी। शुरुआती अभिवादन तक तो ठीक था पर उसके बाद  कुरेदती अपने आप को,अब कहें तो क्या कहें।  पहली बार मिल रहे लोगों को स्कूल,कालेज,पढाई के बाद क्या बताएँ।  हमेशा यही तो होता आया है अभी तक।   न जाने कहाँ से लोग करते  हैं इतनी बातें।  किस बारे में अपनी राय जग जाहिर करते हैं।  क्या पूछे दूसरों से ; लगता जैसे पूछताछ कर रही हो। 
चाय का कप,एक अदद  बिस्किट और इस भरे कमरे में वह खामोश, सोचती बाकी क्या सोच रहे होंगे  उसके बारे में। कोई नज़दीक आता तो एक मुस्कान से हैलो  और फिर अकेले। 
इधर उधर,सबको वह अपनी नज़र से परखने की कोशिश कर रही थी। " हैलो ,एक हाथ बढ़ा। एक मुस्कान दिखी. "मैं....हूँ .".सकपका कर उसने देखा। लम्बे गोरे चेहरे पर वही खोया हुआ भाव ,जो शायद उसके अपने चेहरे की शिकन में दिख रहा था। वह भी मुस्कराई। परिचय दिया, और फिर दोनों हमफितरत की तरह  चुप. "नाईस टू मीट यू", और आगे बढ़ गया। 
आफिस के ही  किसी दफ्तर में वह भी था ,पर दूर किसी शहर में. पोस्टिंग, काम,दोस्त सब बने ,पर उसका वह कोना कोइ नहीं देख पाया। न वह फिर मिली उससे। कभी किसी कागज़ पर नाम देखती तो सहम जाती। लगता कोई उसकी चोरी न पकड़ ले।  उसको तो याद भी नहीं होगा की वह उससे  कभी मिला भी था। वह भी तो कैसे निपट गंवार की तरह सिर्फ मुसकरा भर दी थी। 
१५ साल में प्यार किया,शादी,बच्चे ,ज़िंदगी का अपना चक्र चल रहा था.... १ साल हुए  तबादला  हेड आफिस हो गया।  मीटिंग है। उसी कान्फरेन्स रूम में चाय के कप और एक ग्रुप के साथ कुछ कामकाज की बातें।  और फिर पुरानी आदत से मजबूर।  " हेलो अब कैसी हैं आप ! " उसे  अपनी 40  साल की सारी परिपक्वता की मदद लेते हुए, चेहरा लाल होने से रोका.. ओह तो वही कोना वहाँ  भी !


सोमवार, जनवरी 23, 2012

गुमनाम गलियों में भी मिलते हैं मील के पत्थर कई !

दिल्ली क्या देखी अगर सिर्फ कुतुबमीनार ,लाल किला या हुमायूँ का मकबरा भर देखा.इस शहर में देखने को इतना कुछ है ,बहुत ऐसा जिसके  बारे में आमतौर से हम जानते ही नहीं. देहली से दिल्ली तक  में दिल्ली दरबार के सौ साल पर राजधानी की सात पीढ़ियों के बारे में जानने का मौका मिला. क़ुतुब मीनार बनवाने वाले क़ुतुब-उद-दीन ऐबक ने महरौली में राजधानी बनायी और यहाँ बनी बस्ती. पर क़ुतुब मीनार की मशहूर छाया में इसके आसपास की बस्ती नज़रंदाज़ होती गयी. इसके बारे में पता चला २००१-०२ में जाकर  .

कुली खान की कब्र से कुतुबमीनार 




  एक अनूठा मौक़ा मिला ,उन सबको देखने का ,वह भी एक जानकार के साथ. दिल्ली को जानने समझने का यह एक बढ़िया तरीका है. कनिका सिंह "डेल्ही हेरिटेज  वाल्क्स " नाम से दिल्ली के इस छुपे इतिहास से हमें रूबरू करवाती हैं. दो साल पहले मुझे इनके बारे में पता चला ,और तबसे हर सप्ताहांत सोचती रही इनके इस अभियान से जुड़ने के लिए. इस रविवार यह मौक़ा आया. प्रोग्राम था कुतुबमीनार से अलग महरौली घूमने का . सुबह ९.३० बजे इकट्ठा हुए अनुव्रत मार्ग में इसके प्रवेश द्वार पर. वैसे वहां कोई दरवाज़ा नहीं है,सिर्फ मेन रोड से एक कच्चा,पथरीला   रास्ता अन्दर जाता  है  . हमेशा की तरह मैं रास्ते से  आगे निकल गयी,घूम कर छतरपुर मेट्रो स्टेशन  के सामने से यू टर्न लिया ,और पहुंचे वहां जहां और लोग इंतज़ार कर रहे थे. फिर शुरू हुआ एक प्रबुद्ध दौरा उन खंडहरों का. 
खान शहीद की कब्र 
पहला पड़ाव था,बलबन के मकबरे का दरवाज़ा. पता चला इसके बाद जो साफ़ की हुई जगह दिख रही थी ,उसकी खुदाई एक साल पहले ही हुई थी. उससे पहले वह करीब चार पांच फुट मिट्टी के नीचे  नीचे दबा था. यह पार  कर पहुंचे बलबन के मकबरे .कब्र तो दिखी नहीं ,पर उसके वास्तु के बारे में पता चला की इमारतों में पहली बार True arch  मेहराब का प्रयोग यहाँ हुआ था. और साथ ही यह ही भारत के शिल्प का  पहला गुम्बद .गुम्बद तो रहा नहीं पर कैसे बना इसका अनुमान,वहां के पत्थरों से  लगाया जा सकता है. मामलुक  वंश के सबसे काबिल सुलतान बलबन , की मृत्यु जंग में नहीं हुई.वो टूट गए अपने प्यारे  बेटे खान शहीद की मौत से. खान शहीद की कब्र उनके मकबरे के बगल के कमरे में बनी  है और अभी तक सही सलामत मौजूद  है. अभी हाल ही के दिनों में ,आसपास के गाँव वालों ने इस पर अगरबत्ती जलाना  शुरू कर दिया है . शायद कुछ चमत्कार हुआ होगा ,या कोई मन्नत पूरी हुई होगी जिसने यह आस्था जगा दी ,  दीवार पर कुछ नीली टाईल के टुकड़े इस इमारत की खोयी  हुई सुन्दरता की  कहानी कहने की कोशिश कर रहे  थे.
जमाली कमाली की मस्जिद 
छत पर चित्रकारी 
वहां से निकल कर हम कुछ सीढियां चढ़ ऊपर पहुंचे जो शायद रहने की जगह थी. टूटी दीवारों से कमरे होने का एहसास हो रहा था .यहाँ से आगे  पहुंचे उस पुरातत्व उद्यान के सबसे मशहूर अवशेष जलाली कमाली के मस्जिद पर. चहारदीवारी के अन्दर पांच मेहराबों वाली मस्जिद ,जहां वज़ू  के लिए एक हौज़ बना था . मस्जिद के उत्तरी  तरफ तीन चार  सीढियां चढ़  , एक दरवाज़े से अन्दर जा पहुंचे जमाली कमाली के कब्र के आसपास के पाक अहाते में. सामने ही था उनका मकबरा .  सिकन्दर लोदी से हुमायूँ के समकालीन ,शेख फजलुल्लाह उर्फ़  जमाली सूफी फ़कीर और कवि थे.उनका मकबरा ख़ासा सुन्दर था. छत पर बढ़िया रंगों से और दीवारों पर रंगीन टाईल्स से चित्रकारी की हुई थी. ऊपर,चारोँ ओर, जमाली की रची कुछ पंक्तियाँ भी तराशी गयी थीं .  जमाली की कब्र बीच में थी और उनके एक ओर एक और कब्र . अनजान व्यक्ति की इस कब्र को कहा  गया है,उनके दोस्त की है और उन्हें  नाम दिया गया कमाली.वैसे अभी तक यह पता नहीं चल पाया है की जनाब कमाली की शख्सियत   क्या थी. आसपास की  तमाम जगह पर कई कब्रें दिखीं. यहाँ तक एक के ऊपर  तो छतरी भी बनी है.शायद किसी  ख़ास शख्स की होगी.
जमाली कमाली की कब्रें 
कुली खान का मकबरा 
मेटकाल्फ फोली 
बोट हाऊज़ से सूखी दरिया 
वहां से निकले तो पहुंचे  मुगलों के दरबार में ब्रिटिश रेसिडेंट थोमस मेटकाफ के घर . मेटकाफ ने मुगलों से महरौली का यह इलाका खरीद लिया था. इस में शामिल थे  यहाँ के  मकबरे ,मस्जिद,एक नहर सब कुछ . फिर उन्होंने इस में तब्दीलियाँ करनी शुरू कीं. टीले बनवाये  ,नदिया का रास्ता मोड़ एक केरिजवे बनवाया,लोदी काल की एक ईमारत  में फेर बदल कर  बोट हाउस बनवाया, बाग़ -बगीचे बनाए और नाम दिया दिलखुश ! यहाँ वह  वर्षा ऋतू का आनन्द लेने आते थे . कनिका कहती हैं यह दिल्ली का पहला फार्म हाउज़ था! अब तो महरौली के आसपास गाँवों की जगह फार्म हाउजों  ने ले ली है.  जमाली कमाली के पास में ही एक टीले पर है उनके द्वारा बनवाई गयी बारादारीनुमा मेटकाफ'स फ़ॉली  ' .यहाँ से नीचे उतरकर चले उस रास्ते जहां मेटकाफ    ने एक छोटी सी नदी की धार ही बदल दी और उसका बांधकर एक तालाब बनवाया . यहाँ से पहुंचे मेटकाफ के घर . पर यह घर वास्तव में कुली खान का मकबरा था. कुली खान ,अकबर ,की दाई माँ माहम  अंगा के बेटे आधम खान के भाई थे. आधम खान के मकबरे का गुम्बद दिखा,महरौली गाँव के घरों के बीच से,पर वहां जाना हमारी  इस सैर में शामिल नहीं था. कुली खान की कब्र वहां से हटा दी गयी और यह मकबरा बना मेटकाफ का घर .यहाँ से कुतुबमीनार भी पास दिखता   है .
राजों की बाओली 
अब था इस सैर का आख़िरी पड़ाव .इन सब से अलग एक बाओली .राजों की बाओली और उसके आगे गंधक की बाओली .हमने देखी सिर्फ राजगीर यानी मिस्त्रियों के लिए बनी राजों की बाओली . तीन  मंजिली ,नीचे तक पहुँचती सीढियां ,चारों ओर बैठने के लिए बने गलियारे  ,यह बाओली वाकई शानदार थी. कुछ देर सीढ़ियों पर बैठकर  उसकी कहानी सुनी  और फिर घूम कर ऊपर पहुंचे जहां बने थे एक १२ खम्बे की इमारत में एक कब्र और साथ एक  मस्जिद .इस मकबरे में साफ़ पता चल रहा था की नीचे एक चौकोर   चबूतरा  ऊपर पहुँचते पहुँचते कैसे गोलाकार हो जाता है और उसके ऊपर गुम्बद बनाना संभव होता है !निर्माण कला का एक पाठ मिला!
यह था एक सफ़र दिल्ली के कम लोकप्रिय पर उतने ही रोचक और ऐतिहासिक महरौली की बस्ती का. यहाँ दिल्ली पर राज करने वाले गुलाम वंश के बलबन से लेकर ,लोदी,मुग़ल वंश से होकर  ब्रिटिश काल की इमारतें और खंडहर माजूद हैं. सचमुच पन्ने दर पन्ने खुलता  इतिहास  !
  

शुक्रवार, दिसंबर 30, 2011

अदिति तीन साल की हो गई..(वैसे वह अगले अप्रैल में नौ की होगी )

 एक बहुत पुरानी पोस्ट  थी जो ड्राफ्ट में दिखी.दिल किया उस याद को ताज़ा करने का.


निकि यानि अदिति की इस चिट्ठा पृष्ठ पर पुनरावृत्ति है.आज ( 5 अप्रैल 2006) वो तीन साल की हो गई.२००३ में नवरात्र की पंचमी के दिन हमने अपने संसार में उसका स्वागत किया था.मैं ,उसकी बुआ  ,अदिति के बचपन का एक अभिन्न हिस्सा रही हूँ.उसको बढता देख अपने आप में एक अदभुत एहसास है.मैंने पाया कि उसके लिये कोइ बात "क्योंकि बड़े  कह रहे हैं" इसलिये मान लेना नामुमकिन सा है.वो सीधे इस तरह से नही कहती है पर उसके तीन  प्रिय शब्द हैं...क्या,क्यों और क्यों नहीं.इसमें एक और शब्द कभी कभी जुड़  जाता है....कैसे.लेकिन अभी यह कम आता है.शुरुआत हुइ थी क्या से.जब उसने बोलना सीखा था और उसकी नन्ही सी पकड़  से कोइ शब्द बाहर होता , वह तब तक 'क्या'का साथ नही छोडती जब तक उसकी संतुष्टि नही हो जाती.यह अधिकतर प्रयोग होता है जब वह किसी शब्द का उच्चारण नहीं पकड पा रही हो मुझे याद है"हैर ड्रायर " कहने में उसे खासी मुश्किल आई,और वह अभी भी 'ड्र ' नहीं समझ पायी है.पर उसकी कोशिश ज़ारी है और वह हमेशा मुझे बाल धोने और सुखाने को कहती है जिससे वह उसको देख सके और सुन सके कि वह है क्या!पर अब तो उसके किसी भी वार्तालाप का सार होता है 'क्यों 'और 'क्यों नही'.अगर हम कुछ कर रहे हैं तो क्यों और नहीं कर रहे तो क्यों नही.सूरज रात में कहीं चला जाता है तो क्यों और दिन में चाँद नही दिखता  तो क्यों नहीं.और जब क्यों की बारात निकलती है तो उसका कोई अन्त नहीं.
उम्मीद करती हूँ कि वह हमेशा यूँ ही उत्सुक, बेहिचक सवाल पूछती रहे, जानने सीखने की ललक बनी रहे .


इन पांच वर्षों  में उसमें बहुत बदलाव आये हैं ,पर उसके कुछ सीखने की लगन कम नहीं हुई है.

गुरुवार, दिसंबर 29, 2011

कुछ तो नया करो

नए साल में कुछ  नया करो
 ठंडी से एक आह भरो
 कोहरे भरे भोर  में   बाहर चलो
सांस निकालो,धुआं करो

रात अंधेरी सिहरते ओढो
 गली गली कुछ गाते घूमो
एक जलाओ अलाव कहीं
अलसाई  सी  कुछ राग छेड़ो

हसंते हुए कुछ याद करो
पुराने पल की  बात करो
पहले क्रश को बयान करो
कुछ खिसियाओ ,संकोच करो


कलेंडर को बदलते हुए
कुछ लम्हे संजो कर रखो
 क्या नया करना है सोचो
नए साल को सलाम करो  

मंगलवार, दिसंबर 06, 2011

दो शहरों स बनी एक राजधानी बुडापेस्ट



कम्युनिस्ट साम्राज्य का पश्चिमी छोर और अब केपिटलिस्ट यूरोप का पूर्वी किनारा   कहा जाने वाला हंगरी दो अस्तित्वों के बीच अपनी पहचान बनाने की जद्दोजहद कर रहा है. हम  दुबई से वियना और वहां से टिरोल एरलाईन  के एक छोटे विमान से  ४५ मिनट में बुडापेस्ट पहुँच गए . बूडा और पेश्त नाम के दो शहरों से बनी हंगरी की राजधानी ,बाकी यूरोपीय शहरों से भिन्न लगी .वियना जैसा  कड़क  अनुशासन  यहाँ ज़रा लचीला हो गया और हवा भी यूरोपीय शीतलता से भिन्न ,थोड़ी एशियाई गर्मी का अंश लेने लगी.
डेन्यूब नदी के तट पर एक कतार में कई होटल बने हैं,उन्ही में एक इंटर कोंतिनेनेतल में ठहरने का इंतजाम था. पर ऐसा नहीं लगा  कि उड़ान के बाद ,अब थोडा सुस्ताया जाये. नयी जगह के माहौल को महसूस करने की आतुरता खींच ले गयी हमें आसपास की चहल पहल तक. डेन्यूब का किनारा तो कमरे की खिड़की से दिख रहा था,और नदी के उस पार का राजसी महल.भी. गजब की रोशनी थी और गजब का दृश्य !नदी पर नाव और तट पर बने अनेक रेस्त्रों से चहल पहल थी. आसपास काफी महंगा  सा बाज़ार था,लेकिन हर यूरोपीय शहर की तरह यहाँ भी छोट छोट केफे के बाहर कुर्सी मेज़ लगा कर सुन्दर खाने का इंतज़ाम. रात ग्यारह बारह बजे तक लोग सडकों पर दिखती हैं सो वहां उस समय घूमना भी सुरक्षित है और बहुत लुभावना  भी.
करीब ढाई दिन के समय में इस शहर के साथ इन्साफ करना नामुमकिन है .इतना कुछ देखने को है और इतना कुछ करने को. पहले दिन हम शहर का 'पेस्त' वाला हिस्सा घूमने निकले ,जो नया है,आधुनिक है . शहर घूमने का मज़ा पैदल में  ही  है.यातायात बहुत अधिक नहीं था,सो चलने में मज़ा भी आ रहा था. पैदल के लिए गाड़ियां रुक जाती और हम  कुचले जाने के डर से मुक्त थे. डेन्यूब के किनारे निकले और रुख किया इस्त्फान बासिलिका का.यह बुडापेस्ट का सबसे बड़ा  चर्च है. अन्दर से बेहद खूबसूरत,इस चर्च में सेंत स्टीफन के दाए हाथ को परिरक्षित रखा हुआ है.   यूरोप की  सबसे बड़ी  पार्लियामेंट बिल्डिंग  की भव्य इमारत को देखते हुए हम आगे अन्द्रसी एवेन्यू पर चले.यह सड़क दूर तक जाते है औए बुडापेस्ट के मुख्य सड़क कही जा सकती है.विश्व विरासत स्थल की सूचे में इसका नाम है और कई मशहूर दुकानों और इमारतों को दखने का मौक़ा मिला. यह रास्ता ख़तम होता है हीरोस स्क्वेयर पर जहां हंगरी के राजाओं की प्रतिमाएं हैं . साथ ही आसपास है म्यूजियम ,ओपेरा हाऊस और कम्युनिस्ट समय के अत्याचओं की कहानी कहता हाऊस ऑफ़ टेरर .  बुडापेस्ट की एक खासियत है यहाँ के गर्म पानी के स्रोत और स्पा जहां नहाने से बेहतरीन आराम मिलता है.इसी स्क्वेयर के पास है ज़ेचेन्यी बाथ. बुडापेस्ट   का भूमिगत रेल ,दुनिया का सबसे पुराना है, और इसके स्टेशन को पूर्ववत रखने की कोशिश की गयी है.
किसी शहर की सैर खरीदारी के बिना अधूरे है. सो हम पहुंचे यहाँ के वाची उत्चा ,जो हमारे होटल के पीछे ही एक सड़क है जिसके दोनों तरफ बहुत सुन्दर दुकानें और बाज़ार है. ग्लोबलिज़ेशन के ज़माने में हर शहर की दुकानों में एकरसता  सी आ गयी है. जो दिल्ली में दीखता है वही वियना में औए वही बुडापेस्ट में. सो इस बाज़ार को छोड़ हम पहुंचे ग्रेट मार्केट हॉल . यह एक तीन तलों में बना बाज़ार है,घुसते ही सब्जियों की अनेकों दुकानें और पहले ताल पर हंगरी  की प्रसिद्ध  कढाई और अन्य उपहार की चीज़ें दिखीं. मोल भाव तो हुआ ही पर सामान महँगा लगा. शायद इसलिए क्योंकि हम उससे एक दिन पहले,बुडापेस्ट के बाहर एक छोटे से गाँव ,सेंतेंद्रे घूम कर आये थे. यहाँ जेबकतरों से भी सावधान रहने की इदायत दी गयी थी सो आधा दिमाग तो अपना बटुआ और मोबाइल बचाने मैं ही लगा था.
रात होते होते हम वापस होटल पहुंचे और डेन्यूब  किनारे के अद्भुत समाँ का आनंद लिया. यहाँ पर हर शाम बेंच पर बैठीं  कुछ औरतें भी कढ़ाई के मेजपोश आदि बेचती हैं.बातें हुईं, खरीदारी हुई और पता चला कि  जो नहीं खरीदा वह असल में चीन  से आया था. भारत  की तरह वहां भी चीन सस्ते माल भेज रहा है.यही बात हमें वेनिस में भी दिखी  . मन में एक सवाल उठा कि जो हमने इया वह क्या वाकई उन औरतें के गाँव का है या फिर चीन का ?

किनारे बनी छोटे  लडके की एक मूर्ती के पास बैठकर,यह सब भूल गए और मज़ा  लिया ,नदी पर तैरती नौकाओं का, उस पार जगमगाते महल का, तोकाजी का और हर इमारत,हर कदम के पीछे छुपी एक कथा का.


रविवार, नवंबर 06, 2011

के बी सी बनाम बिग बॉस

श्योर    हैं  फ़ाइनल जवाब ...लॉक    कर दिया जाए ...मुस्कान और फिर सही जवाब का एक स्वर जिसमें उतना ही  आनंद भरा होता है जितना स्वयं प्रतिभागी के ह्रदय में. यह  सब के बी सी की पहचान  कराने वाली कुछ झांकियां हैं. 
चैनल  बदलिए....खुसपुस खुसपुस...तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझसे ऐसे बात करने की...यू ***....वह तो ऐसी है... अरे वह तो उसके सामने ऐसे बात करते हैं और हम लोगों से कुछ और बोलते हैं....!लगता है सब कुछ काला, मनहूसियत की छाया लिए .बिग बॉस का घर.

सीरियल से हटकर दो प्रोग्राम  जिनका प्रचार जोरशोर से हुआ और अब कई  सीसन कर चुके हैं. जब भी शाम को मैं टीवी देखती हूँ तो अनायास ही यह ख़याल आता है. एक ओर बिग बी का ठिकाना  ..जीवंत,हंसी ,जोश, उत्साह से भरपूर के बी सी का प्रोग्राम. सपरिवार एक साथ बैठ कर ज्ञान ,मनोरंजन और सबसे बड़ी बात पूरी तल्लीनता से मज़ा उठाने का  .अमिताभ बच्चन के गरिमामयी व्यक्तित्व   ,संयमित व्यवहार,सुन्दर स्वच्छ  भाषा ,से यह खेल इतना दर्शनीय है ,कि क्या कहने .बच्चे बड़े  सभी इसमें पूरी तरह से शामिल महसूस करते हैं.हाँ इस बार पंचकोती  महामणि कौन बनेगा करोडपति लगता है कुछ अधिक परोपकार की राह पर चल निकला है,पर दर्शकों की सहभागिता बनी रहती है. देखते हुए एक सकारात्मकता ,एक प्रसन्नता का अनुभव होता है.

कुछ आधे घन्टे बाद रात के अँधेरे में चलें बिग बॉस के घर दस्तक दें. क्या कुहराम है,क्या अस्त व्यस्त सा समां है. सब कोइ किसी साज़िश में लगा है. अगर कोइ सकारात्मकता दिखती भी है तो क्षणिक . उसे भी लगता है दबा दिया जाता है.क्या घर परिवार ऐसे ही होते हैं,चीखते चिल्लाते, एक दुसरे के विरुद्ध कुमंत्रण करते. ऐसे संसार के बारे में सोचना और फिर उसे रात दर रात पर्दे पर दखना कितना नकारात्मकता से भर देता है व्याकुलता होती है उसे देख कर.सामने कुछ पीछे कुछ और .काम करने से दूर भागते लोग,दिनचर्या बिग बौस के इशारे पर निर्धारित ,बिना किसी प्रयोजन के दिन काटते प्रतिभागी....खाली दिमाग शैतान का घर. तभी षड़यंत्र के साए उस बेहद धनी घर में छाये रहते हैं. देख कर एक विमुखता सी हो जाती है. न सहजता न सौम्यता ,न सकारात्मक  ऊर्जा का एहसास. 

अपनी टीवी तो १० बजे बंद हो जाता है !

गुरुवार, अक्टूबर 20, 2011

जिन्जा में देखा नाईल का उदगम

     तब अफ्रीका की प्राकृतिक सम्पदा एक रहस्य थी और यहाँ के नदी,तालाब,पहाड़ों के बारे में दुनिया अनभिज्ञ . ऐसे में कई अंग्रेज खोजी उस अनजान दुनिया के बारे में और अधिक जानने की जिज्ञासा लिए ,घने जंगलों ,जानवरों ,रोगों से झूझते ,कभी गुम हो जाते,कभी  मौत से  लड़ते  ,पहुँच जाते  नयी दुनिया की   खोज करने . ऐसे ही  एक   थे  जोन स्पीक . निकले थे नाईल का उदगम ढूँढने और जब विक्टोरिया झील से उस नदी को निकलते हुए देखा तो हक्का बक्का से  खड़े रह गए दो घंटे तक . आखिर इतनी मुश्किलों से उनकी यात्रा सफल हुई थी . आज  जिन्जा  शहर में  उसी   स्मारक   के तौर पर एक ओबेलिस्क बनाया गया है  .
     युगांडा के मर्चीसन  फोल्स के बाद अगले दिन हम वापस रवाना हुए कम्पाला के लिए. लेकिन हमारी मंजिल कम्पाला नहीं बल्कि यही शहर था जहां से निकलती है विश्व की सबसे लम्बी नदी . युगांडा का दूसरा सबसे बड़ा शहर और यहाँ का औद्योगिक केंद्र है जिन्जा.कम्पाला की भीड़ भरे यातायात से निकलकर गाँव ,खेत   हुए खलिहान से  पहुंचे इस  छोटे से शहर में.  रास्ते में मिली मेहता इंडस्ट्रीस और  गन्ने के खेत. चीनी  उत्पादन यहाँ का  एक प्रमुख उद्योग है. वैसे कम्पाला का यातायात बहुत बदनाम है  पर खुशकिस्मती से हम इस में फंसने से बच गए और पहुंचे जीन्जा  के मादा होटल जहां ठहरने का .
पहुंचकर लगा एक अलग ही दुनिया में आ गए .फिर उसी विशाल नाईल नदी का किनारा, केकट्स के बड़े बड़े वृक्ष के नाप के  पौधे  ,जीरो वाट बल्ब की रोशनी से रहस्यमयी लगते कमरे   और हर जगह वही  युगांडा में सर्वव्यापी हरियाली. पहले दिन तो शाम हो गयी थी सो कहीं बाहर जाना नहीं हुआ ,पर अँधेरे में नदी किनारे बैठकर , दूर तक फ़ैली निस्तब्धता में लीन हो जाना ,उसकी लहरों को महसूस करना , अँधेरे के फैलाव को समेटना ,यह सब महसूस करते हुए एक सिहरन सी होती थी .दूसरे  दिन सवेरे  निकल पड़े  उस  जगह, उस ख़ास झील को देखने . 'सोर्स ऑफ़ द नाईल'  के पास  लिए पहुंचे तो एक चिर परिचित नज़ारा देखने को मिला.५००० शिलिंग ,अच्छा २००० में ले लीजिये....हाँ वही भारत की तरह वहां भी सड़क किनारे लगी स्थानीय हस्तशिल्प के  नमूने  .पीछ करते वहां के स्थानीय निवासी और मोलभाव का वही अंदाज़ .पर उनके साथ ज्यादा समय न बिताकर हम आगे बढे  तो दिखी गांधीजी की प्रतिमा. जीन्जा के संपन्न परिवारों में बहुत भारतीय परिवार हैं, खासतौर से माधवानी परिवार ,जिसकी एक बहू हैं हमारी प्यारी नटखट अभिनेत्री  मुमताज़ .    
             नीचे उतरकर नाव पर बैठे और चले नदी की धारा के उलटे . युगांडा हो   ,या फिर अफ्रीका पशु पक्षियोंकी जितनी जातियां यहाँ देखने को मिलाती हैं शायद और कहीं नहीं . नदी में चलते के जहरीले सांप को देखा ,तो तट पर पड़े हुए सांपनुमा  एक लम्बे चौड़े गिरगिट  को भी .आसमान की तरफ देखा तो पेड़ पर पक्षियों के झुण्ड के झुण्ड नज़र आये. लहरों  के साथ खेलती नौका आगे बढ़ी और कुछ देर बाद दूर क्षितिज पर दिखनी  लगा किनारा .लगा जैसे नदी एक जगह जा कर फ़ैली और ठहर गयी. पर हम तो नदी की धारा के विपरीत जा रहे थे,सो यह तो संभव नहीं.हाँ,यह संभव था की वह जो नदी का विस्तार अचानक और विशाल हो गया वह तो वास्तव में एक झील थी और यही था इस प्रसिद्द नदी का स्रोत याने लेक विक्टोरिया .झील के मुंह पर एक छोटा द्वीप था ,जहां एक कुटिया और उस में कुछ हस्तशिल्प का सामान .हम टापू पर उतरे,फोटो वगैरह खींची और फिर बढ़ चले झील की  ओर. दरअसल यही झील हमें कम्पाला में भी मिली थी और एन्तेबी हवाई अड्डे पर भी . यह विश्वास करना मुश्किल होता है की इतनी लम्बी नदी एक ताल से निकलती है!
http://googlesightseeing.com/2009/09/the-source-of-the-nile/
       पर स्पीक ने जो दृश्य देखा था वह यह नहीं है.उस समय यहाँ पर एक झरना था जिसका नाम उन्होंने रखा रिपोन फोल्स. पर अब उस जगह एक बिजलीघर के लिए बाँध बना दिया गया है ,ओवेन डैम और रिपोन फोल्स डूब गया उस बाँध के नीचे. आदमी की ज़रूरतों के लिए प्रकृति को यदा कदा झुकना ही  पड़ जाता है. बहुत देर तक झील में चक्कर लगाने के बाद हम वापस लौट अपने निवास की ओर.पर यात्रा थी अविस्मरीनीय .  यह सोचकर रोमांचक लगा की अगर हम इसी नदी से आगे बढ़ते तो पिछली पोस्ट में जिस मर्चिसन फोल्स का ज़िक्र किया था वहां पहुँच जाते . लेकिन दरियाई घोड़ों और  मगरमच्छ वहां तक पहुँचने की इजाज़त देते तब .

यहाँ की बंजी जम्पिंग , दुनिया के बेहतरीन बंजी जम्पिंग स्थलों में से एक है ,पर अफ़सोस समयाभाव के कारण ,इसका आनंद नहीं ले पाए .





मंगलवार, सितंबर 27, 2011

हम, आप और अन्ना

अन्ना हजारे का उपवास जारी था.हम  सवेरे आफिस के लिए निकले और दिल्ली से गुरगांव वाले रास्ते पर यही सब मनन चिंतन करते हुए चले जा रहे थे. क्राउन  प्लाज़ा पर  एक्सप्रेसवे से बाहर निकलना था. सामने देखा कुछ जेम सा नज़र आया .शायद आगे की बत्ती लाल हो. उस बाहर जाने वाले रास्ते से पहले एक अन्दर आने का रास्ता है. देखा लोगों ने गाडी मोड़ दी और उस अन्दर के रास्ते  से बाहर की ओर जाने लग गए.एक और जेम शुरू हो गया .क्या नियमों का उल्लंघन करना ठीक था ? 

कल हमारे  घर में काम करने वाला बड़ा खुश दिखा .दिन भर कहीं गायब था. मैंने पूछा ,क्या हो गया ? बोला आज कार चलाने का लाईसेंस बनवा लिया! मैंने पूछा ,"किसका?" अपना  ! अरे कार साफ़ करने के अलावा तो तुमने कार आज तक छुई नहीं है. एक हज़ार रुपये दिए और मुझे लाईसेंस मिल गया. दो हज़ार बोल रहा था पर मैंने भी एक हज़ार पर जिद्द पकड़ ली थी. कार क्या उसने आजतक साइकिल छोड़ कर स्कूटर तक को हाथ नहीं लगाया है. 

मेमसाहब आपके आफिस में कोई जगह नहीं निकलती,मेरे भाई को लगवा दीजिये.पर वो तो घूमता रहता है.आठवीं के बाद पढ़ा ही नहीं है. और नौकरी के लिए कम से कम इंटर तो होना चाहिए. अरे मेमसाहब , सर्टिफिकेट तो मैंने बनवा लिया है .
पी ऍफ़ से एक लाख रुपये निकालने हैं.क्या हो गया. बच्चे की शादी हो रही है क्या? नहीं ,सरकारी दफ्तर में नौकरी के लिए देने हैं. पर उसकी तनखाह कितनी होगी . १५००० महीने  शायद .तब तो १ लाख कितने साल में वापस आयेगा. अरे नौकरी लगने के बाद बहुत से कमाई के रास्ते खुल जायेंगे.

बिजली का बिल सालों से मीटर न लगे होने की वजह से भरा नहीं गया है.अब सरकार ने मुहिम छेड़ी है ,बकाया पैसे वसूलने की. कैसे भरेंगे इतने रुपये.फ़िक्र मत करो, चलो दफ्तर चलते हैं. सौदा तय हुआ,बिल कम हो गया . सरकारी खजाना किसी और का हो गया . 

यह सब वास्तविक ज़िंदगी के उदाहरण हैं. अन्ना हजारे के अनशन से यह सब प्रश्न  भी सामने आते हैं.क्या हम नैतिक तौर से भ्रष्टाचार हटाने  के लिए तैयार हैं. क्या हम भारतीयों के चरित्र मैं ही कोई त्रुटी है कि  हम नियमों का उल्लंघन   करने , किसी काम के लिए मेहनत न कर शोर्ट -कट लेने , देश की संपत्ति का आदर न करने ,इन सब में  माहिर हैं .क्या भ्रष्टाचार ऐसे ही आचरण से दूर हो पायेगा.? जन लोकपाल बिल तो ठीक है पर इन सबका इलाज तो हमारे अपने पास ही है.हर नागरिक वैयक्तिक स्तर  पर ज़िम्मेदार है हमारे देश के इस हाल के लिए.

 

शुक्रवार, अगस्त 26, 2011

देहली से दिल्ली तक...दिल्ली दरबार के सौ साल


              
 "
ख़ामोशी में निहाँ खूँगश्तः लाखों आरजुएँ हैं,
चिराग़े-मुर्दः हूँ मैं बेज़बाँ गोरे गरीबाँ का ।"

"
जिस प्रकार परदेसियों और पथिकों की क़ब्रों के बुझे हुए दीपक उनकी लाखों कामनाओं को अपने कलेजे में छिपाए होते हैं वैसे ही मेरे मौन में भी रक्तरंजित लाखों कामनाएँ निहित है !"
  क्या सोचा होगा गालिब ने  कि उनका यह शेर कभी उनकी दिल्ली की ही दास्तान  बयान   करेगा.दिल्ली का नाम  लेते  ही ,पर्यायवाची की सूची की तरह  लाल किला,क़ुतुब मीनार, इण्डिया गेट   तुरंत ज़हन में आ जाते हैं. पर क्या दिलवालों की दिल्ली का  वजूद बस इन्हीं   में सिमटा  हुआ  है.? यहाँ की सडकों पर चलते  हुए यह एहसास सबको ज़रूर हुआ होगा जैसे  इतिहास के पन्ने भी हम अपने वर्तमान के साथ साथ पलटते जा रहे हैं.  तारीख के  कितने ही  मुकाम इस शहर पर  अपने  निशान छोड़ चुके हैंहर  मोड़  पर  दिखते  खँडहर   से झांकती है कितने ही   सुल्तानों, राजाओं, बादशाहों की रूहें. 
            सात शहरों के इतिहास को अपने दामन में समेटे आज की दिल्ली ज़माने के साथ बदलती भी है और  पुराने जामे को पहने भी रहती है. कैसे बसी दिल्ली, कहाँ से आईं  इसकी तहें दर तहें ?  तुगलकाबाद, सिरी,शाहजहानाबाद ,   इनसे गुज़र कर दिल्ली यहाँ तक पहुँची कैसे?  
            वैसे तो दिल्ली के आसपास  बस्ती  बहुत  पहले  से थी  लेकिन तोमर वंश के राजपूत राजा अनंगपाल ने लाल कोट नाम का किला बनवाया , और इसी किले का विस्तार पृथ्वीराज चौहान ने किया  राय किला पिथौरा के रूप में किया. यहीं से शुरुआत हुई दिल्ली की. किला राय  पिथौरा को माना जाता है पहला शहर .
      वैसे दिल्ली का  नाम कैसे पड़ा इसकी भी एक रोचक दास्तान  है .  तोमर राजा अनंगपाल अपने पोते के जन्म का जश्न मनाना चाहते थे . एक महात्मा से पूछा तो उन्होंने उसी वक्त को सबसे शुभ माना और यह भी कहा कि अगर अभी किया तो आपका राज बहुत मज़बूत होगा और ज़मीन के नीचे बैठे शेषनाग तक इसकी जडें जायेंगी.राजा ने अविश्वास प्रकट किया तो संत  ने एक खम्बा ज़मीन में गाड़ा और निकाल लिया.निकालने  पर खम्बा सांप के खून से लथपथ निकला. तोमर राज्य के लिए भविष्यवाणी हो गयी कि राजा के टाल मटोल करने के कारण उनका राज्य भी इसी खम्बे की तरह ढीला होगा.  "किल्ली तो ढिल्ली भाई, तोमर भया मतिहीन". इसी से इस जगह का नाम दिल्ली पड़ा. वैसे तो इस लोहे के खम्बे को कई लोग उसी खम्बे से जोड़ते हैं जो सबने क़ुतुब मीनार के पास देखा होगा ! तो फिर देखिये क़ुतुब मीनार के पास पहली दिल्ली की यह निशानी  ,
   क़ुतुब मीनार को बनवाने वाले कुतुबदीन ऐबक  ने ही चौहान वंश को मात देकर भारत में    गुलाम वंश की स्थापना की. महरौली की आसपास घूमते हुए  मिलेगी बलबन की कब्र ,जमाली कमाली की कब्रें और वहां की  मशहूर फूलों की मंडी . इसी जगह पर बसी थी दूसरी  दिल्ली , महरौली की .
          आगे  हौज़ ख़ास की ओर बढ़ते हुए आप पहुंचेगे तीसरी दिल्ली के पास.  खिलजी सुलतान अला-उ-द्दीन खिलजी ने मंगोल  आक्रमण  से  बचने के  लिए     एक शानदार किला और महल बनवाया .कहते  हैं  इसकी  डेढ़  किमी  लम्बी  दीवार  में दस  हज़ार  मंगोल   सैनिकों  के  सिर  काट  कर  दफ़न  किये  गए  हैं .इसके  कारण  इसको नाम दिया सिरी . अब  आप  खेल  गाँव   और  सिरी  फोर्ट  इलाके  से  गुज़रें  तो    इतिहास  के  इस  खूनी   पन्ने पर  भी  गौर  करें . पर  इन्हीं राजा  ने  अपनी प्रजा का ख्याल रखते हुए , निवासियों  के  लिए  पानी  का इंतज़ाम किया और बंवाया   हौज़ ख़ास .   
   
खिलजी  वंश  के  बाद  सत्ता  पहुँची  तुगलकों   के  हाथ   में और  गियासुद्दीन      तुगलक   ने   बसाई  चौथी  दिल्ली . आज  के  महरौली  बदरपुर   मार्ग   पर तुगलकाबाद  किले  के  अवशेष हैं . बहुत     ही  ऊंची किले  की  दीवारों    के  अन्दर  एक  पूरा  शहर  बसा   था  . पर  दिल्ली  के  प्रमुख    रास्तों    से   थोडा    अलग    होने के  कारण  यहाँ   देखने वाले  कम     आते हैं. तुगलाकाबाद में पानी की समस्या थी ,सो फिरोज़शाह तुगलक ने यमुना के पास अपने लिये एक शहर बसाया फिरोज़ाबाद. आज के आइ टी ओ और बहादरशाह ज़फर मार्ग के पास बसा यह था पांचवी दिल्ली,जिसका विस्तार पहले के शहरों से ज़्यादा था.क्रिकेट  प्रेमी तो फिरोज़ शाह कोटला  के नाम से परिचित होंगे.यह इन्हीं तुगलक की विरासत है.शानदार  किले के अब खंडहर  के नाम पर बचे हैं जामी  मस्जिद,एक बाओली,और अशोक स्तम्भ जो फिरोज़शाह अम्बाला से ले आये थे .
भारत के सबसे लम्बे समय तक राज करने वाले मुगल कैसे पीछे रह सकते थे . हुमायुँ ने बनायी अपनी रजधानी और नाम दिया दीनपनाह .  शेरशाह सूरी ने सभी भवनों को नष्ट करके  इसी जगह पर बनवाया था शेरगढ. आज के  पुराना किला के इर्द गिर्द बसा यह शहर छठी दिल्ली था.पुराना किला तो आते जाते दिख जाता है ,पर अब यहाँ से गुज़रते  हुए सोचियेगा कि इतिहास के किस मुकाम के आप रूबरू हैं .

       अकबर  ने दिल्ली में नया शहर न बनवाकार राजधानी ही आगरा पहुंचा दी ! पर शाहजहाँ वापस दिल्ली आये और इसको दिया इसका सातवाँ अवतार ,शाह्जाहाँबाद के रूप में . लाल किला ,जामा मस्जिद ,चांदनी चौक सब इस इमारतों के शौकीन बादशाह की देन हैं.

आज की दिल्ली अपनी इन पुरानी पीढीयों की विरासत तो है ही पर नयी दिल्ली के रूप में हम जिसे जानते हैं वह देन है अंग्रेज़ों की. लुटयेंस दिल्ली के नाम से जाने जाना   वाला  चौडी सडकों, भव्य कोठियों , कनाट प्लेस के अनोखे अन्दाज़ वाला यह आधुनिक शहर  भारत का दिल है . आगे का रूप कैसा होग यह कह पाना मुश्किल है,पर इतना ज़रूर है कि दिल्ली है बडी निराली.

शुक्रवार, जुलाई 22, 2011

अगर कुछ अच्छा दिखे तो उसे ज़रूर बयान करना चाहिए (Ugandan proverb )

अफ्रीका  के जंगलों, वहां के रहन सहन, वहां की दुनिया के बारे में उत्सुकता और कौतूहल हमेशा से था और जब युगांडा जाने का अवसर मिला तो जैसे कोई बड़ी मुराद पूरी हो गयी ऐसा महसूस हुआ  .अफ्रीका के लगभग मध्य में स्थित यह देश उसका भौगोलिक   दिल कहा जा सकता है .
           दुबई से करीब 7 घंटे के हवाई सफ़र के बाद एन्टेबी हवाई अड्डे पहुंचे .पहली नज़र में सब तरफ हरा हरा दिखा . हवाई जहाज से नीचे झाँकने पर  विक्टोरिया लेक का बहुत सुन्दर दर्शन पहले ही हो चुका था.दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी मीठे पानी की यह झील युगांडा के दक्षिण छोर पर है.  एन्टेबी हवाई अड्डा इतिहास के पन्नों में जाना जाता है ,इजरायली कमांडो की  एक बहुत जांबाज़ कार्यवाही के लिए.१९७६ में इजराईल के कमांडो दस्ते ने अपहरण किये हुए हवाई जहाज को मुक्त करवाया था.
          सड़क के रास्ते निकल पड़े फिर कम्पाला ,जहाँ पर ठहरने का इंतज़ाम था. यह भी कम्पाला के बाहर मुन्योंनयो   नाम की जगह पर सुन्दर सा सैरगाह था स्पेक रेसोर्ट. उसी विक्टोरिया झील के तट पर बना यह होटल मन को भा गया. मुसकराते लोगों ने कमरे  तक सामान पहुंचाया .सामान  तो पहुँच गया पर खुद मैं पहुँची  उसके काफी बाद. कारण था रिसेप्शन से कमरे तक का रास्ता भरा हुआ था सुन्दर ,कभी न देखे हुए फूलों और पौधों से. रुक रुक कर चल रही थी,कि याद आया ,यहाँ तो दो दिन का पड़ाव है,सो तसल्ली से इसका आनंद उठाया  जा सकता है. 
पांच सितारा की भौतिक सुख सुविधाएं और प्रकृति की सात सितारा विलासिता के संगम में रहना प्रफुल्लित , आनंदित कर रहा था. शाम को तो सैर की ही, सवेरे भोर में उठ गए और पहुंचे झील किनारे. देखा पक्षी का एक झुण्ड वहां पडी मेज कुर्सियों पर अपने सवेरे का सफ़र कर रहा है और साफ़ सफाई का काम भी . पूरब की तरफ सूरज चढ़ रहा था, और उसकी किरणें झील के पानी से मिलतीं, कण कण में  चमकतीं,  झिलमिल करतीं.तभी देखा एक नाव चली आ रही है,सूरज की उन किरणों की और , उनके बीच से गुज़रते कैमरे में कैद कर लिया .
लेक विक्टोरिया पर सुबह
मंत्रमुग्ध होकर  मैं वहां फूलों और वनस्पति की विविधता देखती,छोटे बच्चे की तरह हर तरफ दौडती और आँखें फटी की फटी.  .
यहाँ के नजारों के बाद चले कम्पाला की दिल्ली हाट नुमा जगह,नॅशनल थियेटर में बना  क्राफ्ट्स विलेज . गजब के सुन्दर हस्तशिल्प के नमूने,दिखे.एक दूकान से दूसरी ,मोलभाव करते,टोपी,लकड़ी के मुखौटे,चप्पलें, कुछ बातें कीं ,कुछ हंसी मज़ाक ,कुछ ना नुकुर, थोड़ा  लुट जाने की शिकायत और फिर सौदा तय कर हाथ जोड़ नमस्कार कर अगली अनोखी वस्तु की ओर.कम्पाला तो राजधानी है, हर बड़े शाहर की तरह सड़क पर जाम ,  सुन्दर घर  ,माल ,डिस्को सब कुछ देखने को था.
पर मुझे तो इंतज़ार था उस घड़ी का जब हम अफ्रीका के जाने माने जंगलों को देखेंगे. दूसरे दिन हमारी मंजिल थी मर्चीसन फाल्स और इसी नाम का नॅशनल पार्क.कम्पाला से करीब ३०५ किमी की दूरे पर स्थित यह युगांडा का सबसे बड़ा वन विहार है. रास्ते में मासिन्दी के १९२३ में बने युगांडा के सबसे पुराने , मासिन्दी होटल में भोजन  कर  हम शाम ५ बजे पहुंचे "परा" सफारी लाज .नाईल नदी  को पार कर "परा"  पहुँचने का आनन्द , आने वाले अनुभवों की एक  झलक   था  .दरियाई  घोड़े का पहला दर्शन हुआ .अच्छा हुआ क्योंकि परा का मतलब है दरियाई घोड़ा ! नाईल नदी के किनारे बना यह विश्राम गृह, अफ्रीका के जंगल में घूमते,खोजी जांबाजों के रोमांच को सजीव करता है. सबकुछ उसी तर्ज़ पर . लेकिन  सफ़र का सुनहरा क्षण था,सवेरे उठकर  बस में उस नॅशनल पार्क  में घूमना.अन्दर घुसते ही अफ्रीकी हाथी के परिवार ने सड़क के बीचों बीच खड़े होकर स्वागत किया  ,पर हमने भी कहा कि दूर से ही दुआ सलाम हो जाए तो ठीक है ."आप  सड़क पार कर लें ,हमें जल्दी नहीं है !"
आगे बढे तो हिरन की प्रजाति के  युगांडा  कोब  , हार्तबीस्त और वाटरबक दिखे. 'लायन  किंग' की याद सबको आयी जब  एक वोर्टहोग को देख अनायास ही पुम्बा का नाम निकल गया. हम बारबार बस रुकवा रहे थे और हमारे साथ के रेंजर और वाहन चालक चेतावनी देते जा रहे थे की यहाँ रुकने से हम सफारी की सबसे बड़ी विशेषता से वंचित रह सकते हैं. पर दिल कहाँ मानने वाला. एक जिराफ दिखा तो लगा फोटो खींचो. और जिराफ के झुण्ड दिखे तो बस क्यों आगे बढे. वो भी तो बेफिक्री से फोटो खींचने की मुद्रा में खड़े हो रहे थे. और फिर दुबारा ऐसे सुडौल,आसमान से बातें करते, पेड़ों के ऊपर से ताकझांक करते पशु को देखना इतनी जल्दी तो होने वाला नहीं था. पर हमें यह अनुमान नहीं था की यहाँ जितनी देर हम करते जा रहे थे ,जंगल के राजा को देखने की संभावना उतनी धूमिल होती जा रही थी. आगे बढे तो सूरज ऊपर चढ़  आया था और शेर अपना सवेरे का नाश्ता कर किसी झाडी में विश्राम करने चले गए थे.अब उनको ढूँढना  काफी मुश्किल हो गया था. बावजूद इसके और थोडा नियमों का उल्लंघन करते हुए ,हमारे बस चालक और गाईड ने रास्ता छोड़,घास में गाडी  घुमा दी . अफ्रीका के सवान्ना घास भूमि में घने जंगल नहीं दिखते,बस झाड़ियाँ और मध्यम आकार के पेड और दूर तक सपाट पीली पीली से घास. क्षितिज पर नज़र दौडाने पर एक पतली रेखानुमा नदी दिखाई पड़ने का एहसास होता है .
लेक एल्बर्ट
यहाँ कहीं छुपा था वनराज
हर झाडी के अन्दर झांक झांक कर देखते देखते हमें निराशा ही हाथ लग रही थे और हम मायूस वापस जाने की तैयारी  कर रहे थे की एक लौटती बस ने हमें उस झाड़ी का पता ठिकाना बताया जहाँ शेर आराम फरमा रहा था. फिर क्या ,मुस्कराहटें, आहें और इंतज़ार में रुकी सांसें . सही पता बताया था उन लोगों,अन्दर झाडी में  उस रोबदार  , शाही सिंह को बस के अन्दर से खिड़की से कोण बदल बदल कर देखने लगे. कुछ जोश में जोर से बातें भी होने लगी की रेंजर ने हमें सावधान किया की हम उस राजा के आराम में खलल  डाल रहे है सो शांत रहने में ही बेहतरी है ! .कुछ देर बाद हम आगे बढे, अगली सैलानियों  की बस को " रिंगसाईड वियू " देने के लिये. पर हमारी किस्मत के ताले तो खुल चुके थे.कुछ दूर आगे ,एक शेरनी के ठिकाना का आभास हुआ. यहाँ तो सचमुच  कमाल था. शेर तो पत्तों की झुरमुट में बहुत अन्दर था और उसके दर्शन थोड़े मुश्किल से हुए. पर यहाँ तो शेरनी अपने शयनागार के दरवाज़े पर ही बैठी थी. शरनी ने हमें राजोचित उपेक्षा दिखाते हुए अपना विश्राम जारी रखा , और हम उसे विस्मय से देखते रहे. सफारी के शिष्टाचार नियमों का पालन करते हुए हम अगले ग्रुप को देखने का मौक़ा देने के लिए आगे बढे. 
ताल मिले नदी के जल से ,नदी मिले सागर में. लेकिन आगे चलकर देखा कि  यहाँ तो  नदी  एक ताल  में मिल रही थी .विक्टोरिया   नाईल , लेक एलबर्ट में मिलती है और यहाँ से बनकर निकलती है एलबर्ट नाईल .यहाँ आखिरकार हमें बस से उतरने तो दिया गया पर हिदायत   के साथ कि बहुत दूर नहीं जाना है. मगरमच्छ का खतरा है . ताल में दिखे फिर बहुत से दरियाई घोड़े  ,गर्मी से बचते,नहाते,डुबकी लगाते , खेलते,आह क्या डाह से जल गए हम . 
मर्चीसन फाल्स 
       वापस लौटना भी ज़रूरी था क्योंकि योजनानुसार  दोपहर के बाद हम एक और विस्मयकारी यात्रा करने वाले थे. नाईल पर नौका सैर और साथ ही दुनिया के सुन्दरतम जलप्रपात में से एक  का दर्शन  . "अफ्रीका क्वीन" पर एक घंटे की नौका सैर  से देखने को मिले हाथी के झुण्ड,हिप्पो ,मगरमच्छ और जंगलों  में सबसे खतरनाक माने जाने वाले जंगली भैंस. नदी  के किनारे पानी पीने आये जानवरों का  भी एक वर्गीक्रम होता है.जब हाथी पानी पीने की इच्छा ज़ाहिर करता है तो अन्य जानवर पीछे हट जाते हैं. पर जब जंगली भैंस  आती हा तो हाथी भी इस हठी,तुनकमिजाज जानवर से नहीं जूझता . यहाँ  नदी के किनारों पर पेड़ कुछ अधिक थे ,और सब जानवर अपने अपने झुण्ड में दिखाई पड़े. पक्षी दल भी नज़र आये,ख़ास तौर से युगांडा का राष्ट्रीय पक्षी गोल्डेन क्रेस्टेड क्रेन.पक्षी प्रेमियों के लिए तो यह सुनहरा सफ़र था. हमारी यात्रा की मजिल थी एक ऐसी जगह जहां  नाईल नदी की विस्तारता को ६ मीटर की तंग दरार  ने सीमित किया तो वह ४३ मीटर की ऊँचाई से नीचे गिरी और बनाया   शक्तिशाली , जलप्रपात ,मर्चिसन फाल्स ! हमारी नाव हमें उसके बेस तक ही पहुंचा पायी पर वहां से भी दृश्य  इतना सुन्दर था कि उस झरने को पास से देखने की उतावली  होने लगी. . चारों और जंगल और उनके बीच में ऊंची पहाड़ से गिरता पानी ,बहते बहते ही वह एक शांत नदी का रूप ले लेता है .अवर्णनीय ! 

रात होने वाली थी,जंगल  में निशाचर हैं,खतरनाक पशु हैं ,सो वापस मुड़ना  ही था.पर इस अफ़सोस के साथ कि इस भव्य जलप्रपात को पास से देखने का संयोग नहीं बन पाया .शायद इस अधूरे  काम को पूरा करने के लिए फिर युगांडा घूमने का मौका लगे. इंशाल्लाह !

 
   

गुरुवार, फ़रवरी 10, 2011

अंडमान - हरे सांप और जैव विविधता से मुलाकात

नोर्थ बे और रोस आईलेंड    की यात्रा के बाद लगा कि अंडमान के जंगलों को भी देखना चाहिए.यहाँ पर हर तरफ पेड़ ही पेड़ दिखते हैं  . फिर दो दिन लगातार यह छोटी समुद्री यात्राएं करने के बाद थोडा ज़मीन पर चलने का मन भी कर रहा था. पोर्ट ब्लेर में बहुत कुछ देखने को है. चैथम  सौ मिल ,बड़ी पुरानी लकड़ी की मिल है.पर अफसोस उस दिन बंद थी. पर उसको छोड़ हम आगे बढे अंडमान,निकोबार द्वीपों  की दूसरी सबसे  ऊंची पहाडी चोटी माउन्ट हेरियट की ओर . वैसे तो यह पोर्ट ब्लेर से ५५ किमी दूर है ,लेकिन नाव से जाने में सिर्फ २० मिनट में वहां पहुंचा जा सकता है. चैथम घाट से दूसरी पार , बैम्बू फ्लेट तक हम नाव से गए. हम ही नहीं हमारी गाडी भी साथ में उसी नाव में हो ली. यह फेरी वहां के निवासियों के लिए  बस सेवा की तरह है . सब अपनी कार,स्कूटर,मोटरसाइकल उसी पर चढ़ाकर  इधर  से उधर जा रहे थे .                                                                           
बम्बू फ्लेट भी एक छोटा कस्बा सा है जहां से हम चले   माउन्ट हेरियट की ओर. रास्ते में पार किया एक प्राइमरी स्कूल .










आगे जाकर ड्राइवर ने गाडी रोक एक किनारे लगा दी और नारियल के बीच समुद्र,दूर दिखते  दो टापू और एक लाइटहाउस की तरफ इशारा किया. बोला फोटो खींचिए और फिर देखिये क्या पहचानी सी लग रही है. हम ने खींच ली और ध्यान से देखा. खैर सिर खुजाते रहे ,पर कुछ पहचान नहीं आया . उसी ने बताया कि बीस रुपये के नोट पर यही दृश्य छापा जाता  है! अद्भुत !आगे बढे तो माउन्ट हेरियट का चेक पोस्ट था.नाम पता लिखवाया गया,कुछ प्रवेश शुल्क अदा किया और फिर चले अन्दर . वैसे यहाँ पर गाडी रोक कर आगे तक ट्रेकिंग की जा सकती है. पर हम गाडी  और पहुँच गए माउंट हेरियट  . यहीं  पर  एक तरफ बैठने के लिए मचान सी बनी थी. हम लोग तो आगे बढ़ गए पर परिवार के बुज़ुर्ग वहीं बैठकर आसपास के प्राकृतिक  सौन्दर्य  का मज़ा लेते रहे.मचान से नीचे उतर कर हमने ट्रेक शुरू की. यहाँ ट्रेकिंग की दो मंजिलें हैं. छोटी करीब डेढ़ किमी वाली कालापत्थर तक और लम्बी ,  मधुबन और समुद्र तट तक . हम पगडंडी से  अन्दर घुस गए. पूरा रास्ता सिर्फ पेड़,जंगल, तरह तरह के  पौधे. ऊपर पेड़ों की  चलनी से छन छन कर आती धूप ,नीचे धूप छाँव से बनते छायाचित्र  .करीब आधे घंटे बाद लगा वापस चलें . लौटने के लिए मुड़े  तो देखा एक लड़का बड़े ध्यान से ज़मीन में लताओं को देख रहा है. पूछा तो उसने इशारा किया ,एक हरा सांप वहां लेटा था.
हम भी रुक गए. उसने सिर उठाया ,फन फैलाया  ,इधर उधर देखा और आगे बढ़ गया. यह भी अच्छा रहा . वनस्पति की इतनी विविधता दिखाई पडी. कोई पेड़ किसी और का सहारा ले आसमान छूना  चाहता है, कहीं जड़ ही आकाश की तरफ उठ गयी .वापस आकर कुछ देर उसी मचान पर बैठकर आराम से चारों के दृश्य देखते रहे. हरियाली को आँखों में बसा लेने का प्रयास. अब तक भूख  लगने लगी थी और वापस चैथम की फेरी पकड़नी थी.