गुरुवार, फ़रवरी 12, 2026

"उतनी दूर मत ब्याहना बाबा!


https://youtu.be/WW0Dtr3BusY?si=X1odWo00wO3I0o0s

फिर वही रील्स देखते हुए एक बहुत ही शानदार वीडियो सामने आया।  निर्मला पुतुलजी कविता पाठ कर रही थीं।  कविता थी "उतनी दूर मत ब्याहना बाबा!" अद्भुत कविता और हर स्त्री के मन को झकझोरती कविता। शादी के बाद न सिर्फ अपने घर,अपने परिवार,अपने गाँव,अपने माहौल से दूर जाने की पीड़ा है बल्कि यह भी भय कि कैसा होगा नया परिवेश। लेकिन इस आदिवासी लड़की  के आग्रह में छुपा है गाँव से प्यार,सरल जीवन का मोह और विवाह के बाद की भौगोलिक और भावनात्मक दूरी की आशंका।इतनी परतों में कविता लिखी है।  एक लड़की की संवेदनाओं के अलावा ग्रामीण जीवन की शुद्धता के साथ साथ वहां की कमियों पर भी बात करती है। सुनिए और सराहिये इसके विभिन्न पहलुओं को।  

निर्मला पुतुलजी झारखण्ड की भूमि की प्रसिद्ध आदिवासी कवियित्री हैं जो संथाली और हिंदी दोनों में लिखती हैं।उनका सशक्त लेखन आदिवासी समाज की आवाज़ को लोगों तक पहुंचाती हैं। 

बाबा!
मुझे उतनी दूर मत ब्याहना
जहाँ मुझसे मिलने जाने ख़ातिर
घर की बकरियाँ बेचनी पड़े तुम्हें

मत ब्याहना उस देश में
जहाँ आदमी से ज़्यादा
ईश्वर बसते हों

जंगल नदी पहाड़ नहीं हों जहाँ
वहाँ मत कर आना मेरा लगन

वहाँ तो क़तई नहीं
जहाँ की सड़कों पर
मन से भी ज़्यादा तेज़ दौड़ती हों मोटरगाड़ियाँ
ऊँचे-ऊँचे मकान और
बड़ी-बड़ी दुकानें
उस घर से मत जोड़ना मेरा रिश्ता
जिस में बड़ा-सा खुला आँगन न हो
मुर्ग़े की बाँग पर होती नहीं हो जहाँ सुबह
और शाम पिछवाड़े से जहाँ
पहाड़ी पर डूबता सूरज न दिखे

मत चुनना ऐसा वर
जो पोचई और हड़िया में डूबा रहता हो अक्सर
काहिल-निकम्मा हो
माहिर हो मेले से लड़कियाँ उड़ा ले जाने में
ऐसा वर मत चुनना मेरी ख़ातिर

कोई थारी-लोटा तो नहीं
कि बाद में जब चाहूँगी बदल लूँगी
अच्छा-ख़राब होने पर
जो बात-बात में
बात करे लाठी-डंडा की
निकाले तीर-धनुष, कुल्हाड़ी
जब चाहे चला जाए बंगाल, असम या कश्मीर
ऐसा वर नहीं चाहिए हमें

और उसके हाथ में मत देना मेरा हाथ
जिसके हाथों ने कभी कोई पेड़ नहीं लगाए
फ़सलें नहीं उगाईं जिन हाथों ने
जिन हाथों ने दिया नहीं कभी किसी का साथ
किसी का बोझ नहीं उठाया
और तो और!
जो हाथ लिखना नहीं जानता हो ‘ह’ से हाथ
उसके हाथ मत देना कभी मेरा हाथ!

ब्याहना हो तो वहाँ ब्याहना
जहाँ सुबह जाकर
शाम तक लौट सको पैदल
मैं जो कभी दुख में रोऊँ इस घाट
तो उस घाट नदी में स्नान करते तुम
सुनकर आ सको मेरा करुण विलाप

महुआ की लट और
खजूर का गुड़ बनाकर भेज सकूँ संदेश तुम्हारी ख़ातिर
उधर से आते-जाते किसी के हाथ
भेज सकूँ कद्दू-कोहड़ा, खेखसा, बरबट्टी
समय-समय पर गोगो के लिए भी
मेला-हाट-बाज़ार आते-जाते
मिल सके कोई अपना जो
बता सके घर-गाँव का हाल-चाल
चितकबरी गैया के बियाने की ख़बर
दे सके जो कोई उधर से गुज़रते
ऐसी जगह मुझे ब्याहना!

उस देश में ब्याहना
जहाँ ईश्वर कम आदमी ज़्यादा रहते हों
बकरी और शेर
एक घाट पानी पीते हों जहाँ
वहीं ब्याहना मुझे!

उसी के संग ब्याहना जो
कबूतर के जोड़े और पंडुक पक्षी की तरह
रहे हरदम साथ
घर-बाहर खेतों में काम करने से लेकर
रात सुख-दुख बाँटने तक

चुनना वर ऐसा
जो बजाता हो बाँसुरी सुरीली
और ढोल-माँदल बजाने में हो पारंगत
वसंत के दिनों में ला सके जो रोज़
मेरे जूड़े के ख़ातिर पलाश के फूल
जिससे खाया नहीं जाए
मेरे भूखे रहने पर
उसी से ब्याहना मुझे!

(निर्मला पुतुल)




मंगलवार, फ़रवरी 03, 2026

बड़की भौजी


"इटरनेट की गलियों में घूमते हुए कभी-कभी कोई ऐसा मोती हाथ लग जाता है, जो दिल को छू ले। मुझे भी ऐसा ही एक अनमोल मोती मिला — जनकवि कैलाश गौतम जी की कविता ‘बड़की भौजी’। पहले इसे एक रील में सुना और फिर जाकर पढ़ा। मैं न तो साहित्य का विद्यार्थी हूँ और न ही कोई लेखक, इसलिए जब इस तरह की लोकप्रिय और प्रसिद्ध रचनाएँ मेरे सामने आती हैं तो लगता है खजाना मिल गया ।  इतने सहज भाव, इतनी सादगी और फिर भी कितनी -कितनी गहराई — यही इस कविता की खूबसूरती है।


"कैलाश गौतम जी पूर्वांचल और भोजपुरी भाषा के अद्भुत कवि हैं। उनकी कविताएँ पढ़ना और सुनना ऐसा लगता है जैसे गाँव की खुशबू, खेत-खलिहान की सरसराहट और आँगन की चहल-पहल हमारे भीतर उतर रही हो। उनकी रचनाएँ हमें याद दिलाती हैं कि साहित्य तभी जीवंत होता है जब उसमें लोकजीवन की आत्मा बसती है।"

 हमारे आसपास हर परिवार में कोई न कोई ‘बड़की भौजी’ ज़रूर होती है, जो अपनी हँसी और अपनापन से पूरे माहौल को जीवंत बना देती है।"


जब देखो तब बड़की भौजी हँसती रहती है
हँसती रहती है कामों में फँसती रहती है ।
झरझर झरझर हँसी होंठ पर झरती रहती है
घर का खाली कोना भौजी भरती रहती है ।।

डोरा देह कटोरा आँखें जिधर निकलती है
बड़की भौजी की ही घंटों चर्चा चलती है ।
ख़ुद से बड़ी उमर के आगे झुककर चलती है
आधी रात गए तक भौजी घर में खटती है ।।

कभी न करती नखरा-तिल्ला सादा रहती है
जैसे बहती नाव नदी में वैसे बहती है ।
सबका मन रखती है घर में सबको जीती है
गम खाती है बड़की भौजी गुस्सा पीती है ।।

(कैलाश गौतम)