"इटरनेट की गलियों में घूमते हुए कभी-कभी कोई ऐसा मोती हाथ लग जाता है, जो दिल को छू ले। मुझे भी ऐसा ही एक अनमोल मोती मिला — जनकवि कैलाश गौतम जी की कविता ‘बड़की भौजी’। पहले इसे एक रील में सुना और फिर जाकर पढ़ा। मैं न तो साहित्य का विद्यार्थी हूँ और न ही कोई लेखक, इसलिए जब इस तरह की लोकप्रिय और प्रसिद्ध रचनाएँ मेरे सामने आती हैं तो लगता है खजाना मिल गया । इतने सहज भाव, इतनी सादगी और फिर भी कितनी -कितनी गहराई — यही इस कविता की खूबसूरती है।
"कैलाश गौतम जी पूर्वांचल और भोजपुरी भाषा के अद्भुत कवि हैं। उनकी कविताएँ पढ़ना और सुनना ऐसा लगता है जैसे गाँव की खुशबू, खेत-खलिहान की सरसराहट और आँगन की चहल-पहल हमारे भीतर उतर रही हो। उनकी रचनाएँ हमें याद दिलाती हैं कि साहित्य तभी जीवंत होता है जब उसमें लोकजीवन की आत्मा बसती है।"
हमारे आसपास हर परिवार में कोई न कोई ‘बड़की भौजी’ ज़रूर होती है, जो अपनी हँसी और अपनापन से पूरे माहौल को जीवंत बना देती है।"
जब देखो तब बड़की भौजी हँसती रहती है
हँसती रहती है कामों में फँसती रहती है ।
झरझर झरझर हँसी होंठ पर झरती रहती है
घर का खाली कोना भौजी भरती रहती है ।।
डोरा देह कटोरा आँखें जिधर निकलती है
बड़की भौजी की ही घंटों चर्चा चलती है ।
ख़ुद से बड़ी उमर के आगे झुककर चलती है
आधी रात गए तक भौजी घर में खटती है ।।
कभी न करती नखरा-तिल्ला सादा रहती है
जैसे बहती नाव नदी में वैसे बहती है ।
सबका मन रखती है घर में सबको जीती है
गम खाती है बड़की भौजी गुस्सा पीती है ।।
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