Sunday, March 26, 2006

चलती का नाम गाडी

आज के "टाइम्स आफ इंडिया" में एक बेहद खूबसूरत लेख पढा "कीप मूविंग ".ज़िंदगी की असह्य तकलीफों को झेलने और उनसे निकलना का रास्ता हमारे ही हाथों में है. ज़रूरत है उन परिस्थितियों से आगे बढने की .पर यह कहना आसान है और शायद करना कठिन ,पर नामुमकिन नहीं. जो दो बातें हमें आगे बढने से रोकती हैं वो हैं ...हमारा आन्तरिक प्रतिरोध और अज्ञात का डर."द डेविल यू नो इस बेटर दैन द डेविल यू डोंट".इसलिये हम उस स्थिति से उबरने का प्रयत्न नहीं करते जो हमें तकलीफ़ दे रही हो.सिर्फ़ शारीरिक नहीं बल्कि मानसिक तकलीफ़ भी .
कोई नहीं चाहता कि उसकी ज़िंदगी में कोइ दुख के पल हों या कोइ ऐसी घटना घटे जो उसके खुशहाल जीवन में पतझड ला दे.कोइ अपना साथी खो देता है और सोचता है कि मेरे साथ ही क्यों ...?मैंने किसी का क्या बिगाडा..?काश कि मेरी ज़िंदगी पहले जैसी हो जाती! ऐसा सोचना पूर्णतया जायज़ है .और हर व्यक्ति कि यह रूहानी ज़रूरत है कि वो शोक मनाए ,गिला करे ,रोए ,भगवान के द्वारा किए गये अन्याय पर उससे नाराज़ हो. लेकिन यथार्थ तो यह है कि ज़िंदगी बदल गयी और बहुत पीडा ,व्यथा ,कष्ट दे गयी. और इस यथार्थ को स्वीकार करना भी एक आवश्यकता है. अन्यथा आप एक तकलीफ़देह स्थिति में बने रहेंगे.
बदली हुइ परिस्थितयों को स्वीकार करना पहला कदम है.आगे बढना दूसरा.इसी आगे बढने का नाम है ज़िंदगी .अपने आप को फ़िर से सपने देखने की इजाज़त दीजिये,दिल की आवाज़ सुनिये और भविष्य की ओर देखिये.कुछ सपने बदलने पड सकते हैं.नए रास्तों को अपनाना पड सकता है. जीने के मायनों में परिवर्तन करना पड सकता है.पर यह ज़रूरी है हकीकत का सामना करने के लिये और कदम आगे बढाने के लिये.
गाडी चलाने के लिये सामने देखना होता है.रियर वियू मिरर में देखते हुए कभी गाडी नहीं चलायी जा सकती है!!

6 comments:

Pratyaksha said...

बहुत सही लिखा और बहुत बढिया भी. अगर एक सपना पूरा नहीं हुआ तो क्या. दूसरा सपना देखना शुरु करना चाहिये.पहला कदम ही मुश्किल का होता है, आगे फिर राह कुछ तो आसान हो जाती है.

Vijay Wadnere said...

अरे वाह! बिल्कुल सही कहा...!!

"रियर व्यू मिरर को देखते हुये गाडी नहीं चलाई जा सकती"

ऎसा ही कुछ फ़लसफ़ा मेरा भी है, जो हो गया सो हो गया, उस पर (ज्यादा देर) गम मना कर भी कुछ फ़ायदा नहीं होगा, उल्टे खुद को ही ज्यादा देर तक तकलीफ़ पहुँचायेंगे हम.

एक कहावत भी है ना:
बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुधि लेहि.

Tarun said...

शोर फिल्‍म का ये गीत सुनते रहिये, फिर ऐसे किसी लेख पढ़ने की जरूरत नही रहेगी--

जीवन चलने का नाम
चलते रहो सुबहो शाम
जीवन चलने का नाम
चलते रहो सुबहो शाम
के रस्ता कट जाएगा मितरा
के बादल छट जाएगा मितरा
के दुख से झुकना ना मितरा
के इक पल रुकना ना मितरा
होए! जीवन चलने का नाम

जो जीवन से हार मानता
उसकी हो गई छुट्टी
नाक चढ़ा कर कहे ज़िन्दगी
तेरी मेरी हो गए कुट्टी

के रूठा यार मना मितरा
के यार को यार बना मितरा
न खुद से रहो खफा मितरा
खुदी से बने खुदा मितरा

ओSSS उजली उजली भोर सुनाती
तुतले तुतले बोल
उजली उजली भोर सुनाती
तुतले तुतले बोल
अन्धकार मे सूरज बैठा
अपनी गठड़ी खोल

के उससे आँख लड़ा मितरा
समय से आस मिला मितरा
के होजा किरन किरन मितरा
के चलता रहे चरन मितरा

के चली शाम के रंग महल में
तपती हुई दुपहरी
मिली गगन से साँझ की लाली
मिली गगन से साँझ की लाली
लेकर रूप सुनहरी

के रात बिखर जाएगी मितरा
के बात निखर जाएगी मितरा
के सूरज चढ़ जाएगा मितरा
काफिला बढ़ जाएगा मितरा

हिम्मत अपना दीन धरम है
हिम्मत है ईमान
हिम्मत अल्लाह हिम्मत वाहेगुरु
हिम्मत है भगवान

के इसपे मरता जा मितरा
के सजदा करता जा मितरा
के सीस झुकाता जा मितरा
के जग पर छाता जा मितरा

पूनम मिश्रा said...

गीत के लिये शुक्रिया तरुण .लेकिन कइ लोगो का यह मानना है कि गीत सुनसुनकर ज़िन्दगी कट जाए तो क्या बात है.

Tarun said...

पूनम, जिंदगी तो ना गीत सुनसुन कर कटती है, ना किताब पढ़ पढ़ कर। जिंदगी सिर्फ और सिर्फ कर्म कर के ही काटी जा सकती है।
बाकी गीत उसके लिये उत्‍साह वर्धन का ही काम करते हैं।

Manish said...

छिप छिप अश्रु बहाने वालों ........
मोती व्यर्थ लुटाने वालों
कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है
Poonam ji aapne bilkul sahi kaha hai. kaisa sanyog hai ki lagbhag aise hi vichar mere man mein bhi uthe jab Neeraj ki is kavita ko padh kar main blog pe likh raha tha.