Thursday, February 21, 2008

गुमसुम

HASTINGS: You have lived very much among them. In truth, I have been often surprised, that you who have seen so much of the world, with your natural good sense, and your many opportunities, could never yet acquire a requisite share of assurance.....

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MARLOW.: .....An impudent fellow may counterfeit modesty; but I'll be hanged if a modest man can ever counterfeit impudence.

("She Stoops to Conquer" Oliver Goldsmith )

हौले से परदा हटाकर ,वो झांकती है । ललचाता है उसका भी मन। हाय कैसे वह झट से जो मन में आता है बोल देती है। क्या विश्वास से चलती है.ज़रा भी हिचकिचाहट नही, है उसे न कोई संकोच। फट जाकर बात कर लेती है।

कैसे फुर्ती से उसने अपनी टीचर को जवाब दे दिया.क्या दोस्ताना तरीके से वह बात करती है अपने बास से.आँखें बंद कर वो सोचने लगी। पर तब भी नहीं ला पायी वो तफ्री वाला अंदाज़ .तफ्री में भी तो है.... और फ्री !! वो है की अपने सपनों में भी सिमटी ,सकुचाती।

दिल के एक छोटे से कोने में बैठती है उसकी यह परछाई । कभी कभी बाहर झांक कर हिम्मत करना चाहती है पर तुरंत फिर वही अपना सीप .उसे लगता है पर्दा हटाएगी तो कयामत हो जाएगी.लोग कुछ कहेंगे तो उसका जवाब दे पाएगी क्या .अपने तारीफों के पुल बांधना ...न बाबा .काम करो और आगे बढो । कैसे कहे वह अपने मुंह से की उसने कितना काम कर दिया। नुकसान तो बहुत है न कहने से .घर में भी और आफिस में भी.पर यह परदे के पीछे से झांकती लड़की बाहर ही नहीं आती।

आई तो थी एक दो बार .पर दो वाक्य से ज़्यादा बोलने पर लाल होते गाल उसे वापस भेज देते. हाँ काम की बात करनी हो तो उसका जवाब नहीं.क्या क्या नही जानती। पर" स्माल टोक " . उफ़, क्या मुसीबत है .

सपने में तो कुछ भी सोचा जा सकता है। पर वहाँ पर भी क्यों लगता है उसे की यह उसके बस का नहीं .कुछ तो सलीका होगा की पर्दा हटा सके थोडा सा ही सही .

3 comments:

राज भाटिय़ा said...

पुनम जी आप की गुमसुम कूछ कहना चाहती हे अपने दिल की बात,लेकिन शर्मा रही हे,

Pratyaksha said...

गुमसुम को गुम करो !

हरे प्रकाश उपाध्याय said...

aap bahut achchha likhti hain....dekhiye to apni prtyaksha g bhi idhr aakr padh rhi hain...ab etraj n ho to mai bhi aaya kroonga...aapki kvita bhi psnd hai mujhe....aur chhoti-chhoti tippniya bhi...badhaee