Monday, February 02, 2009

सलाम काबुल....७ ( कुछ खरीदारी हो जाए)

काबुलीवाला जब हिंदुस्तान आता था तो उसके झोले में रहते थे सूखे मेवे । अफगानिस्तान का बादाम,किशमिश,अखरोट , अंजीर और पिस्ता बहुत दुनिया भर में पसंद किए जाते हैं. वहाँ का मौसम खुश्क रहता है इसलिए इन सूखे मेवों का ख़राब होने का डर नहीं रहता। काबुल में है मंडई बाज़ार जो दिल्ली के चांदनी चौक की तरह पुराने, थोक दामों वाला बाज़ार। पिछले बार हम वहाँ गए थे कुछ मेवे खरीदने ।

अफगानिस्तान के कालीन भी काफी मशहूर हैं और यह यहाँ के कई प्रान्तों में बुने जाते हैं। कालीन यहाँ का मुख्य निर्यात है .यहाँ के मजार-ऐ-शरीफ , तुर्कमेनिस्तान ओर हेरात के कालीन विशेष तौर पर बहुत अच्छे होते हैं। अब तो इस उद्योग को बढ़ावा दिने के लिए वहां कुछ कदम लिए जा रहे हैं .बहुत अफ़सोस इस बात का है की अधिकांश कालीन बुने तो अफगानिस्तान में जाते हैं पर पाकिस्तान और इरान जा कर इन में वहां का लेबल लग जाता है। इससे बुनकरों को कुछ फायदा नहीं होता और न ही उनका नाम होता है। अब कुछ सहकारी संस्थाएं बन रही हैं .ऎसी ही एक दुकान पर हम पहुंचे ...'ज़रदोजी' ।

कालीन की बारीकियाँ समझते हुए ।


अफगानिस्तान लेपिस लजूली यानी लाजवर्त का सबसे बड़ा उत्पादक है। वहाँ लेपिस लजूली की बने गहने बहुत मिलते हैं. गहने ही नहीं सजावट की चीज़ें भी इसकी बनती हैं। वैसे यहाँ अन्य रत्नों के भी आभूषण मिलते हैं पर लाजवर्त सबसे आम है.
काबुल की एक मशहूर बाज़ार है कूचा-ऐ-मुर्ग यानी "चिकन स्ट्रीट" .यह वहां के सैलानियों के लिए बड़ी प्रिय बाज़ार है.एक लम्बी सड़क के दोनों और तरह तरह की दुकानें . कालीन, जेवरात,पुरानी व अनोखी वस्तुएं ,सुदूर जनजातियों की हस्तशिल्प आदि . यहाँ जम कर मोल भाव करिए और पाइए की यहाँ तीन तरह के दाम हैं. एक अफगानियों के लिए, उससे थोड़ा ज़्यादा हिन्दुस्तानियों के लिए और एक खारिजी भाव पश्चिम के खरीदारों के लिए!
हमारी आम धारणा है की काबुल में बुर्खा प्रचलित होगा. लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है । बाहर निकलने पर औरतें सिर ढँक लेती हैं .बुर्खा पहने का रिवाज़ कम है . शादियों में तो एक से एक खूबसूरत गाऊन पहने जाते हैं ,बिल्कुल आधुनिक फैशन के.
काबुल में कीमतें बहुत ज़्यादा हैं.अधिकतर सामान बाहर से आता है. खालिद होसिनी की Kite Runner मैंने देखी १७५० अफगानी की जिसका रूपये में मूल्य भी उतना ही होगा! सब्जी भी पाकिस्तान या दक्षिण अफगानिस्तान से आती है. इसलिय एक सुपर बाज़ार में यह पाकेट देखकर बहुत अच्छा लगा.यह अफगानिस्तान के लोगों का स्वालंबन की ओर महत्वपूर्ण कदम है.

4 comments:

PN Subramanian said...

काबुल के बाज़ार का सुंदर सचित्र वर्णन पढ़ कर स्वयं वहां होने का अहसास बना. कुछ बातें हमारे पल्ले नहीं पड़ रहीं हैं. यह लेपिस लजूली - लगता है कोई रत्न का नाम होगा. एक जगह आपने बाज़ार का नाम ही मंडई बाज़ार बताया है. दिलचस्प बात यह कि मध्य प्रदेश के दक्षिण में जो छत्तीसगढ़ है वहां कई जगहों पर वार्षिक मेले लगते हैं .उन्हें भी मंडई कहते हैं अपने काबुल प्रवास के अनुभव बांटने के लिए आभार..

विनय said...

बहुत सुन्दर शब्द प्रयोग

----------
ज़रूर पढ़ें:
हिन्द-युग्म: आनन्द बक्षी पर विशेष लेख

Science Bloggers Association of India said...

आपने बडी ज्ञानवर्द्धक जानकारियँ दी हैं, शुक्रिया।

MUFLIS said...

kaabul ke baare mein itni
vistrit jaankaari uplabdh
karvaane ke liye shukriyaa...
---MUFLIS---