Monday, November 23, 2009

मोनार्क तितलियों का अद्भुत प्रवास

उत्तरी अमेरिका महाद्वीप के मेक्सिको देश में एक और विश्व विरासत स्थल है . ठण्ड के मौसम में पक्षियों को गर्म देश में उड़ने के बारे में हम सबने सुना है . लेकिन तितलियाँ भी ऐसा करती हैं !

मोनार्क तितलियाँ नारंगी और काले रंग की होती हैं और संयुक्त राष्ट्र अमेरिका (USA) और कनाडा में पाई जाती हैं..लेकिन सितम्बर महीने के बाद जब वहां ठण्ड पड़ने लग जाती है तो यह झुंड की झुंड बना कर दक्षिण की ओर आ जाती हैं.मेक्सिको में सियारा मादरे पहाडों के बीच ऐसा ही एक क्षेत्र है जहाँ यह ठण्ड में आती हैं.तितलियों का इस तरह का देशप्रवास (migration) बहुत ही अद्भुत घटना है. इसलिए इस क्षेत्र को विश्व धरोहर का दर्जा दिया गया जिससे इस को सुरक्षित रखा जाये और तितलियों का सर्दियों में यहाँ आना जारी रहे.तितलियों का इस तरह से सर्दियों में आना कोई मामूली घटना नहीं है.करोड़ो करोड़ो तितलियाँ ३५०० किमी का फासला तय करती हैं.जब यह तितलियाँ एक साथ उडती हैं तो पूरा आसमान भर जाता है और इनके पंख के फडाफडाने से ऐसी आवाज़ होती है जैसे हल्की सी बारिश हो रही हो .सोचो कितना सुन्दर लगता होगा यह दृश्य .जिधर देखो उधर तितली उड़ रही है और टिपटिप बूंदों सी आवाज़ आ रही है. मेक्सिको के इस क्षेत्र को कहते हैं मोनार्क बतरफली बायोस्फियर रिज़र्व .


नवम्बर के महीने तक इनका आख़िरी झुण्ड मेक्सिको पहुँच जाता है.इनके साथ बड़ी सावधानी बरतनी पड़ती है. यह जगह हम जैसे सैलानियों के लिए नवम्बर के बाद ही खुलती है जिससे कोमल तितलियों को हमसे कोई नुक्सान न हो .मेक्सिको में पाए जाने वाले ओयामल फर के हरे पेड़ इन तितलियों के बोझ से झुक जाते हैं और नारंगी और काले दिखने लगते हैं.इन पेड़ों पर यह जाड़े भर सोती हैं और फिर फरवरी के महीने से वापस कनाडा जाना शुरू कर देती हैं.
अगस्त के अंत में और सितम्बर में जब यह तितलियाँ अपना सफ़र शुरू करती हैं, तो इतनी लम्बी दूरी तय करने में इन्हें बड़ी मेहनत करनी पड़ती है.रास्ते में तूफ़ान,तेज़ हवाएं, कार आदि से टकराकर कई तितलियाँ मर जाती हैं .कई तो थकान के कारण भी मर जाती हैं या फिर चिड़िया इन्हें खा लेती हैं. रास्ते में यह फूलों का पराग पीती हैं जिनसे इनके शरीर में चर्बी जमा होती रहे और इन्हें थकान न हो.यही चर्बी जाड़े के मौसम में इनके काम आती है जब यह सुस्त रहती हैं और खाने की तलाश में नहीं जा सकती हैं.मेक्सिको पहुँचने पर भी कई तितलियाँ बर्फ ,तूफ़ान या तेज़ हवाओं के कारण मर जाती हैं .पर फिर भी सोचो ज़रा, मेक्सिको के ओयामल जंगलों में ३० करोड़ तितलियाँ हर जाड़े में पहुँचती हैं ! हैं न अद्भुत बात?
फरवरी के मध्य में जब ठंडक कम हो जाती है तब यह तितलियाँ फिर से सक्रिय हो जाती हैं और फिर अंडे देने के लिए भी तैयार हो जाती हैं.अब शुरू होता है इनका अपने गर्मी के घरों में वापस जाने का सिलसिला . जितनी तितलियाँ जाड़े में आयी होते हैं उनमें से सिर्फ आधी ही वापस जाने के लिए जिंदा बच पाती हैं.बाकी ठण्ड या अन्य कारण से मर जाती हैं . जब यह तितलियाँ वापस जाती हैं तो रास्ते में मिल्क्वीद नाम के पौधे पर अंडे देती हैं .इनसे नयी तितलियाँ जन्म लेती हैं और वह फिर कनाडा वापस पहुँचती हैं. आश्चर्य की बात तो यह है कि जो तितलियाँ ठण्ड शुरू होने पर प्रवास शुरू करती हैं वह कोई भी गर्मी वाले घर में वापस नहीं पहुंचतीं.उनकी उम्र इन तितलियों में सबसे लम्बी होती है ,६-७ महीने की. और वापस लौटते समय मर जाती हैं. एक और आश्चर्य की बात यह है कि जो तितलियाँ वापसी के रास्ते में पैदा होती हैं उनको यह बताने वाला कोई नहीं होता कि उनका गर्मी का घर कौन सा है पर वह सही ठौर ठिकाने पर पहुँच जाती हैं. यह तितलियों १-२ महीने तक ही जीवित रहती हैं ,इसलिए वापस लौटने पर 3 से 4 पीढी बाद की तितलियाँ ही पहुँच पाती हैं.अब इनसे निकलती तीसरी चौकाने वाली बात ,कि जो तितलियाँ सितम्बर में दक्षिण की और उडेंगी उन्होंने पहले कभी यह रास्ता नहीं देखा ,न उन्हें कोई बताने वाला है कि जाना कहाँ है, पर वह सब सही जगह पहुंच जाती हैं ! यह बड़ी रहस्यमय बात है.
तो यह थी मोनार्क तितलियों के प्रवास की अति अद्भुत कहानी और प्रकृति का एक और नायाब स्वरूप.

5 comments:

रंजना [रंजू भाटिया] said...

अदभुत रोचक पहली बार पढ़ा यह ...शुक्रिया तितली भी यूँ करती है

अनिल कान्त : said...

पहली बार जाना ये सब
शुक्रिया ये सब बताने के लिए

Sujata said...

कभी कभी ब्राउजर की वजह से ऐसा दिखता है, अगर आप पेज रिफ्रेश करेंगी तो सब दिखने लगेगा

जाकिर अली रजनीश said...

पूनम जी, आपका ब्लॉग सचमुच बहुत प्यारा है। इतनी प्यारी प्यारी जानकारियां देखकर चमत्कृत हूं।
तितलियों के बारे में जानकर अतीव प्रसन्नता हुई।
हमारी हार्दिक इच्छा है कि आप साइंस ब्लॉगर्स असोसिएशन से जुडें। आपको साथ पाकर हमें बहुत प्रसन्नता होगी। आपकी प्रतिक्रिया की इस पते पर प्रतीक्षा रहेगी।
zakirlko@gmail.com
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भीड़ है कयामत की, फिरभी हम अकेले हैं।
इस चर्चित पेन्टिंग को तो पहचानते ही होंगे?

अर्शिया said...

पूनम जी, साइंस ब्लॉगर्स असोसिएशन के जैव विविधता पर लिखा आपका लेख आज प्रकाशित हो गया है। मैं आपका लेख पढकर अभिभूत हूं। यकीन मानिए, आपने बहुत ही सुंदर लेख लिखा है। एक बार फिर से हमारी ओर से बधाई स्वीकारें।
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ये तो बहुत ही आसान पहेली है?
धरती का हर बाशिंदा महफ़ूज़ रहे, खुशहाल रहे।