हमारा देश है धरोहर की अनंत खान। हर जगह के अपने रिवाज़,हर क्षेत्र की अपनी परम्पराएँ। सबसे आश्चर्य यह की हम दूसरे क्षेत्र और प्रांतों के बहुत ही लोकप्रिय त्योहारों और प्रथाओं से कितने अनभिज्ञ और बेखबर रहते हैं।
इस समय त्रिवेन्द्रम या फिर तिरुवनंतपुरम में रहने की वजह से यहाँ के सामान्य जीवन से परिचय हो रहा है। उत्तर भारतीय हैं सो होली की तैयारियों और उसके साथ जुड़े जोश और उमंग में ही मन रमा हुआ था। यहाँ पर होली की न तो दफ्तरों में छुट्टी है और न ही उसके प्रति कोई उत्साह। पर हाँ, सड़क पर एक दो दिन पहले निकले तो देखा दोनों तरफ ईंटें रखी हैं। सिर्फ एक या दो सड़कों पर नहीं पूरे शहर में। कौतूहल जागना स्वाभाविक ही था। पूछताछ की तो पता चला यह पोंगाला की तैयारी है।
आस्था है,श्रद्धा है और लोकमान्यताएं हैं। सब कुछ मिल जाता है तो उभर कर आती हैं प्रथाएं और ऐसी उपासना जो बिकुल अनोखी है।
अत्तुकल भगवती का मंदिर प्रसिद्ध पद्मनाभस्वामी मंदिर से कोई दो किमी की दूरी पर है। यहाँ की भगवती देवी के बारे में बहुत से कथाएं हैं। मानते हैं की मदुरई में कन्नगी नाम की एक महिला थीं। उनके धनी व्यापारी पति का एक नर्तकी से रिश्ता जुड़ गया और वह उस पर अपना धन लुटाने लगे। अन्ततः वह जब कंगाल हो गए तो कन्नगी के पास वापस आ गए । वह राजा के दरबार में कन्नगी की एक पायल बेचने पहुंचे। भाग्य का खेल उसी समय रानी की पायल चोरी हो गयी थी और व्यापारी कोवलन को चोर मानकर राजा ने उन्हें मृत्युदंड दे दिया। इस अन्याय से क्रोधित कन्नगी दूसरे पैर की पायल लेकर राजा के दरबार पहुँची। कन्नगी ने अपनी पायल तोड़कर दिखाई जिसके अंदर माणिक भरा हुआ था जबकि रानी के पायल में मोती थे। क्रोधित कन्नगी ने मदुरई को शाप दे दिया और शहर जलने लगा। कन्नगी फिर कोडुन्गल्लुर चली गयीं। वहाँ जाते हुए रास्ते में वह अत्तुकल में रुकीं। एक वृद्ध से मदद माँगी और रात जब वह उनके भोजन की तैयारी कर रहे थे तो गायब हो गयीं । पर उस व्यक्ति को स्वप्न में सन्देश दिया कि वहाँ वह एक मंदिर बनायें और उस स्थान को भी तीन रेखाओं से निशान बनाकर चिन्हित कर दिया। मंदिर बना और साथ शुरू हो गयीं यह परम्पराएँ। इस मंदिर से जुड़ीं और भी कथाएं हैं। पोंगाला के मायने होते हैं उफान आकर उबलना।स्त्रियां मीठे चावल यानी पायसम बनाकर देवी से अपने लिए वरदान मांगती हैं।
पर यह तो नौवें दिन की गतिविधि है। दरअसल पोंगाला दस दिन का त्यौहार है और शुरू होता है फरवरी-मार्च में कार्तिका नक्षत्र के दिन। दस दिन चलने वाले इस त्यौहार का चरम रूप होता है नौवें दिन जब पूरम नक्षत्र और पूर्णिमा होती है। मंदिर में नौ दिनों तक भजन,देवीगीत और कन्नगी की कथा चलती रहती है। महिलाएं कुछ दिन पहले से ही अपने चूल्हे की जगह सुरक्षित कर लेती हैं। तीन ईंटों का चूल्हा बनता है। पहले कभी मंदिर के आसपास ही यह होता रहा होगा। पर अब तो पूरे शहर में दस बारह किमी की दूरी पर भी लोग चूल्हा लगा लेते हैं। श्रद्धा और भक्ति की मिसाल है यह।मंदिर के आसपास की जगह पर तो बहुत दिनों से लोग अपना अधिकार जमा लेते हैं। दूर -दूर से स्त्रियां आती हैं। प्रवासी भारतीय भी इसे मनाने के लिए इस समय केरल पहुँच जाते हैं। स्त्रियां उस दिन व्रत रखती हैं,सूती नयी साड़ी अथवा सेतु मुंडू पहनती हैं और सवेरे चार- पांच बजे से ही अपने चुने हुए स्थान पर पहुँचने लग जाती हैं। दरअसल इस समय सड़कों पर बहुत भीड़ होती है। घर के लोग उन्हें वहां पहुंचाने जो आते हैं। नए बर्तन या तो मिट्टी के या स्टील,एल्युमीनियम के ही चूल्हे पर चढ़ेंगे।यह पोंगाला साड़ी भी दुकानदार बहुत कम कीमत पर रखते हैं जिससे गरीब से गरीब भी यह पूजा कर सके। कई जगह कपडे खरीदने जाओ तो चावल या बर्तन साथ में दे दिए जाते हैं। मकसद बस इतना कि इस सामूहिक आयोजन करने से कोई वंचित न रह जाए। और क्या चाहिए देवी को। उनकी पूजा में सब मिल जाएँ। चारों और फैले सुख और समृद्धि।
अब हम मंदिर के द्वार तक पहुँच गए थे। मंदिर के बाहर बहुत खाली जगह है पर उस समय सब जगह यह पवित्र चूल्हे बने हुए थे। मुहूर्त का समय था दस बजकर बीस मिनट पर। मंदिर के गर्भगृह की रसोई में चूल्हा जला,उसकी आग से बाहर मंदिर के ही प्रांगण में बना ईंटों का चूल्हा जलाया गया जिसपर देवी का प्रसाद चढ़ेगा। उसी आग से फिर सैकड़ों चूल्हे जलने लगे। दूर बैठी श्रद्धालुओं के लिए लाऊडस्पीकर पर घोषणा हो रही थी। वैसे तो मंदिर के चूल्हे की लकड़ी से ही सबको अपना चूल्हा जलाना होता है पर दूरी के कारण यह संभव नहीं।
उधर मंदिर भी देवी दर्शन के लिए खुल गया और जो लोग पोंगाला नहीं बना रही थीं वह सब दर्शन के लिए पंक्तिबद्ध हो गयीं। बाहर निकले तो सब ओर धुआँ और सब ओर उबलते पानी में चावल डालतीं महिलाएं। सबके चेहरे पर श्रद्धा और पूजा का भाव। हाथ जोड़ नतमस्तक सब देवी से अपने और अपने परिवार के कल्याण और हित की प्रार्थना करती जा रही थीं। जिसका पोंगाला उबल जाता वह और भी भक्ति भाव से प्रार्थना करती और मुंह से कुछ ध्वनि निकालती। चूंकि दो तीन पतली-पतली सूखी नारियल की टहनियों की आग से ही पकाना है इसलिए इसमें समय लगता है।
देवी को प्रसाद या नैवेद्यम अर्पण करने का भी मुहूर्त है। दोपहर दो बजकर बीस मिनट पर जब देवी को प्रसाद चढ़ाया जाएग तब सबका पोंगाला उतरेगा और तब स्त्रियां भी प्रसाद ले सकती हैं। उसके बाद जब मंदिर के चूल्हे की आग को पानी से बुझाया जाता है तो उसी पानी से बाकी सब चूल्हे भी बुझते हैं। सबका बंदोबस्त दुरुस्त है। सब प्रबंध है। मंदिर से पानी पहुँचाने का भी। अब सब अपने घर जा सकते हैं। और फिर शुरू होता है वापसी का काफिला। पोंगाला का प्रसाद घर पहुंचकर सबको दिया जाता है।
इस त्योहार में कई अन्य अनुष्ठान भी हैं जैसे कुथियोट्टम जो तेरह साल से कम उम्र के लड़कों द्वारा किया जाता है और लड़कियों की तलपोलि। इस दस दिवसीय त्योहार का समापन होता है देवी को पहले दिन पहनाई गयी "कप्पु" या चूड़ी उतार कर और "कुरुति तर्पणम" के यज्ञ से।
पर जो अद्भुत है और बिलकुल अनूठी वह है पोंगाला बनाने की यह परम्परा।आस्था की अग्नि में अपने अहम को जलाकर अपना मन देवी को अर्पित करती हैं। हर मनुष्य का अंतर्मन पवित्र है पर वह लालच,अहंकार,क्रोध वगैरह से दब गया है। उबलते चावल इस बात का प्रतीक हैं कि यह सब प्रवृत्तियां भाप बन कर उड़ जाती हैं और मनुष्य फिर से दिव्य और पवित्र हो जाता है।
1 टिप्पणी:
Very interesting Ma'am, had no idea about this tradition. Very lucidly and clearly put across.
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