Thursday, March 15, 2007

खुमार

फूँक फूँक कर रख रहे थे कदम हम
हर कदम पर फ़िर यह तूफ़ान कैसा

कहते हैं वक़्त मिटा देता है ज़ख्म
हर ज़ख्म का अब तक यह निशान कैसा

बहुत संभाल कर रखा था दामन हमने
उसके हाथों में मेरा यह आंचल कैसा

बद रखा था पलकों को भींच कर हमने
फिर ख्वाबों का इनमें यह घुसपैठ कैसा

न पी है न पिलायी है कभी हमने
फिर छाया है अजब सा यह खुमार कैसा .

6 comments:

Pratyaksha said...

खुमार के बारे में ;-) तो वो ही बतायेंगे ।

Udan Tashtari said...

:)

बढ़िया है.

manya said...

anchaahe hi koi aankhon me utar aaye.. koi bin chhuye bhi chhu jaaye... pahloo mein jab koi tufaanmachal jaaye... hamen to bin piye bhi unhe dekh kar nasha ho jaaye...

Manish said...

खुमारी क्यूँ और कैसे ?:)की बात से गुलजार का ये शेर याद आ गया ..

खुमार -ए- गम है महकती फिजा में जीते हैं
तेरे खयाल की आबोहवा में जीते हैं

miredmirage said...

अच्छी है ।
घुघूती बासूती

प्रवीण परिहार said...

Bahut Badiya.