Thursday, March 13, 2008

मेरा अपने से क्या रिश्ता है

कितने रिश्ते बनाते हैं हम
और न जाने कितने रिश्ते निभाते हैं हम
पर अपने से कोई रिश्ता बनाया है क्या हमने
कभी ख़ुद से कुछ निभाया है हमने ?

सब रिश्ते बेमानी हैं अगर
ख़ुद को नहीं पहचाना है हमने
भाई बहन ,माँ बाप,पति, पत्नी,
पिता,पुत्र, पुत्री,मित्र,सहेली
दोस्त
सबका वजूद तभी है
जब हम हैं ।
अगर अपनी पहचान झूठी है
तों रिश्तों की सच्च्चाई क्या है ?

9 comments:

ajay kumar jha said...

jo jindagee hai wahee rishte hain aur sach to ye hai ki dono hee ke baare mein hum nahin jaante ya jo jaante hain wo sabke liye alag alag hai.

मीत said...

सही है. और ख़ुद को पहचानने की ज़रूरत महसूस करना सही दिशा में सही क़दम. अच्छा ख़याल. अच्छी रचना.

Ramesh Ramnani said...

बहुत सुन्दर पूनम जी। सच कहा आपने स्वंय से बनाया रिश्ता ही सच्चा रिश्ता है। बहुत खूब।

रमेश

Udan Tashtari said...

खोजिये...खोजिये..हम बैठे हैं सुनने को. :)

अबरार अहमद said...

लिखते रहिए

विनय प्रजापति 'नज़र' said...

it sounds cool...

swati said...

rishton ke bina jeevan bemani hai .rishten hai to nij hriday machalta hai

Abhishek said...

रिश्ते किसी के साथ भी बनें, निभाएं जाएं ईमानदारी से!
लिखती रहिये!

मीनाक्षी said...

सबका वजूद तभी है
जब हम हैं । --- इस बात ने तो दिल मोह लिया.