Thursday, March 27, 2008

जोधा अकबर

बोर्ड की परीक्षाएँ खत्म हुईं और प्रोग्राम बना जोधा अकबर देखने .फिल्म तो पिछले महीने रिलीस हो गई थी पर इम्तिहान के चलते देखने का मौका अब मिला। देखने का मुझे बहुत शौक नहीं है और ह्रितिक रोशन , ऐश्वर्य राय दोनों ही मुझे कोई ख़ास नहीं सुहाते पर आशुतोष गोवारिकर की फिल्म थी सो देखना था .वैसे भी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर बनी फिल्में मुझे पसंद हैं ।
साढ़े तीन घंटे की को मैंने ०-१० के स्केल पर ७.५ नम्बर दिया फिल्म के सेट की शानो शौकत पसंद आयी .भव्य सेट जिसमें राजसी राजपूत महलों और मुगलिया दरबार का शाही अंदाज़ दोनों दिखाने में फिल्म के कर्ता धर्ता सफल रहे। ह्रितिक रोशन ने अच्छा अभिनय किया खासतौर पर जहाँ नज़ाकत से करना था।शाही अन्दाज़ भी अच्छे से निभाया। दो तीन जगह तो खासा प्रभावित किया जैसे कि जब वो जोधा से पहली बार मिले। हाँ ऐश्वर्या ने भी अपने अभिनय का अलग अन्दाज़ पेश किया। मुझे लगता उनके अभिनय ,उनके बोलने के तरीके, उनके नृत्य में कुछ ज़्यादा लटके झटके होते हैं। पर उन सबके विपरीत इस फिल्म में उन्होंने अपने संतुलित अभिनय से प्रभावित किया। एक राजपूतानी की गरिमा को बखूबी निभाया । ह्रितिक और ऐश्वर्या की जोडी में भी सामंजस्य अच्छा है। कुछ दृशय तो बहुत ही अच्छे लगे । जब जोधा अपना बनाया खाना चखती हैं और अकबर का कहना कि वह उसकी झूठी थाली में ही खायेंगे । तलवार की जुगलबंदी ,जोधा का सूरजमल के साथ दृशय ,ऐश्वर्य और इला अरुण के बीच का तनाव । अकबर जब आदम खान के समक्ष जोधा का सम्मान करता है तो लगा पति हो तो ऐसा। लडाई के दृश्यों में कुछ ऊब सी लगने लगती थी। कभी कभी यह भी लगता था जैसे निर्देशक कभी कभी जोधा अकबर के प्रेम को उतना न्याय नहीं दे पाए क्योंकि वह साथ में उस समय के राजनीतिक और ऐतिहासिक परिवेश को भी उतना ही महत्व देना चाह्ते थे जितना प्रेम कथा को। एक राजनीतिक सौदा कैसे प्यार में बदल गया इसका अहसास, जैसे जैसे फिल्म आगे चलती है ,होता जाता है। लेकिन यह बात है कि एक ऐसे बादशाह् को जो सब धर्मों की इज्जत करता था,प्यार से दिलों को जीतना चाह्ता था और बहुत ही सुलझे विचारों का था , उसके लिये जोधा का ज़िन्दगी में शरीक होना ,उसके व्यक्तित्व में नया आयाम ला देता है।
पूनम सिन्हा को पहली बार पर्दे पर देखा अकबर की वालिदा हमीदा बानो कि किरदार में।कितनी सुन्दर हैं।हम सब की नज़र पडी अकबर के चारों और घूमते खूंखार पहरेदारों पर . कलाकारों का चयन अच्छा था।मुझे पोशाकें पसंद आयीं ,वास्तविक लग रही थीं ।वैसी ही जैसे कि हमारे जहन में होती हैं जब हम उस समय के बारे में सोचते हैं । जोधा के गहने ,क्या कहने। " कहने को जश्ने बहारा " गुनगुनाते हुए बाहर आए ।
देखने के बाद अच्छा लगा लेकिन कुछ कमी सी भी लगी जैसे कुछ और हो सकता था.

10 comments:

राज भाटिय़ा said...

पुनम जी हम ने डऊन लोड कर के रखी हुई हे, लेकिन देखी नही,आप ने इतनी तरीफ़ की हे इस फ़िल्म की तो आज इसे भी देख लेते हे.वेसे आज कल की फ़िल्म देखने के लायक नही होती.

Manish said...

आपने जिन पहलुओं की तारीफ की वो फिल्म के सशक्त पहलू थे। पर निर्देशक के सामने एक ओर तो अकबर के व्यक्तित्व के बहुत सारे पहलू चित्रित करने का option था पर उन्होंने साढ़े तीन घंटे इस प्रेम कथा और उसके साथ चलते राजनीतिक माहौल पर लगाए। नतीजा ये रहा की २१० मिनटों की ये कहानी मन में एक यादगार ऍतिहासिक कथा की छवि लेने से दूर ही रह गई।
मुझे अभी भी अकबर के संपूर्ण जीवन को चित्रित करती ऐतिहासिक फिल्म का इंतज़ार है।

डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल said...

यह एक संयोग ही है कि मैंने फिल्म देखकर खत्म की और उसके तुरंत बाद आपका ब्ळॉग पढा. आपने फिल्म का बहुत सूक्ष्मता से विश्लेषण किया है. मैंने फिल्म वीडियो पर देखी इस लिए उसकी भव्यता से उतना प्रभावित नहीं हो सका. मेरे राजस्थान में तो यहाँ फिल्म रिलीज़ ही नहीं होने दी गई. मुझे दो तीन बातें अच्छी लगीं. एक तो यहाँ कि जहां हमारी करीब करीब सारी ही फिल्मों के केन्द्र में प्रेम होता है, आशुतोष ने तत्कालीन राजनीतिक दांव पेंच को केन्द्र में रखने का साहस दिखाया. दूसरी बात यहाँ कि अकबर की धार्मिक सहिष्णुता यहां बहुत खूबसूरती से उभरी है, और कहना अनावश्यक है कि आज के माहौल में यहाँ फिल्म की सबसे बडी उपलब्धि है. हां, रहमान के संगीत ने मुझे निराश किया. संगीत उस काल से हमें जोड पाने में समर्थ नहीं हो सका, वह आधुनिक ही बना रहा, सिवा एक कव्वाली के अपवाद

Udan Tashtari said...

हमने देख ली..अच्छी होने के बावजूड जरुरत से ज्यादा लम्बी है..फिर भी चल गई.

Pramod Singh said...

जाकर देख आऊं? पैसे डूबेंगे तो नहीं? डूबे तो दोष किस पर मढूंगा? मढ़ पाऊंगा?.. बेहतर है चिरकुटई की नाटकबाजी देखने से खुद को बचाऊंगा..

राजीव जैन Rajeev Jain said...

हमने भी फिल्‍म अभी देखी है।
अपनी राय भी लिखी है, आप चाहें तो इधर भी गौर फरमा सकती हैं।

राजीव जैन Rajeev Jain said...

http://shuruwat.blogspot.com/2008/03/blog-post_28.html

Abhishek said...

मैं बताऊँ क्या कमी लगी आपको? जोधा और सूरजमल के रिश्ते को बेहद सरसरी तौर पर दिखाया जाना, एक राजपूत राजकुमारी को मुग़ल शासक के साथ विवाह करने को मजबूर करते समय माता पिता का बेहद सतही तौर पर चित्रण. मुझे यह बातें थोडी खली। अन्यथा तो काफ़ी अच्छी फ़िल्म है.

acrm yadav said...

RMA

acrm yadav said...

ACRM YADAV BHARAT DESH TAB SA AAJ TAK