Wednesday, June 04, 2008

सलाम काबुल -१

इस बार फ़िर गर्मी की छुट्टियों में काबुल जाने का कार्यक्रम बना। अफगानिस्तान का नाम सुनते ही लगता है की अरे यह भी कोई जगह हुई जाने की । दिल्ली से एयर इंडिया की उड़ान है सवेरे ७.४० पर। १ घंटे ४५ मिनट का सफर है और जब तक आप सवेरे की टूटी हुई नींद पूरी करते हैं,जहाज काबुल के ऊपर पहुँच जाता है। छोटा सा हवाई अड्डा है .कुछ जान पहचान होने के कारण अमित हमें हवाई जहाज की सीढी के पास ही मिल गए । निकलते समय वहां के लाउंज में एक अफगानी महिला अधिकारी से मुलाक़ात हुई.उनसे हुई बातचीत से ही पता चलता है भारत (हिन्दुस्तान ) के प्रति अफगाननिवासियों का प्रेम और भारत से उनकी आशाएं.शायद ५ मिनट की मुलाक़ात में उन्होंने गुजारिश की काबुल में इंडियन स्कूल फ़िर से खोले जाएँ। भारतीय वहाँ सबसे लोकप्रिय विदेशी हैं । लोग हिन्दी बखूबी समझते हैं और काफी लोग उर्दू बोल लेते हैं। भारतीय टीवी सीरियल का वहाँ बोलबाला है। एक टैक्सी चालक का कहना है तुलसी अगर यहाँ चुनाव में खडी हो जाएँ तो राष्ट्रपति चुन ली जायेंगीं!! अतिश्योक्ति ,पर इससे इन सास बहू वाले धारावाहिक की लोकप्रियता का अंदाजा लगाया जा सकता है।
यह एक रोचक रिपोर्ट है इसी से सम्बंधिंत ।
http://www.iwpr.net/?p=arr&s=f&o=344606&apc_state=henparr
भारतीय चैनलों के अलावा यह सीरियल दरी (वहाँ की भाषा ) में डब कर के जाते हैं। हाँ, पर जहाँ भी पोशाकें उनकी मर्यादा की सीमाओं को तोड़ने लगती हैं,उन पर फज़िनेस कर दी जाती है। अमिताभ बच्चन और शाहरुख़ खान पसंद किए जाते हैं ।दुकानों पर हमने तुलसी,मिहिर ,शाहरुख खान के पोस्टर देखे।



भारत वहाँ के पुनः निर्माण में बड़े पैमाने पर लगा है। इसलिए वहाँ की जनता में भारत और भारतीयों के प्रति बेहद आदर और सौहाद्र है। गर्मजोशी से स्वागत होता है।





8 comments:

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

दुकानो पर हिन्दी फ़िल्मो के सितारो का होना दिलचस्प है.. सोचा नही था काबुल में होगा ये भी.. खैर दूसरे भाग का इन्तेज़ार रहेगा..

रंजू ranju said...

अच्छा लगा इसको पढ़ना .मैंने भी १२ साल तक अफगानी बच्चो को पढाया है जब वह वहाँ लड़ाई के करण यहाँ दिल्ली में थे तकरीबन ५० के करीब परिवार थे जो हमारे घर के आस पास ही किराये पर रहते थे ..इन लोगो से एक भावात्मक रिश्ता जुड़ गया था ..अब यह वापस जा चुके हैं ..पर इनकी साथ गुजरे वक्त की यादे साथ है ..इंतज़ार रहेगा आपकी अगली कड़ी का हो सके तो वहाँ की कुछ फोटो भी लगाए

प्रियंकर said...

अरे भाई ! वैदिक समय से ही अफ़गानिस्तान से हमारा और उनका हमसे गहरा जुड़ाव रहा है .हमारा ऋग्वेद वहीं लिखा गया . कुछ विद्वानों का मत है कि राम की असली अयोध्या और सरयू नदी भी वहीं है . तो एक आत्मीय जुड़ाव के तंतु तो ऐतिहासिक रूप से मौजूद हैं जिसे मुंबइया फ़िल्में और हिंदी धारावाहिक और गति प्रदान कर रहे हैं .

Udan Tashtari said...

हमारे पड़ोसी अफगानी हैं काबुल से. उनसे किस्से सुनते रहते हैं. आप अपनी यात्रा का वृतांत विस्तार से लिखें. इन्तजार रहेगा. कुछ तस्वीरें भी दिखायें वहाँ की.

राजीव रंजन प्रसाद said...

आगे के विवरण और तस्वीरों की प्रतीक्षा है..

***राजीव रंजन प्रसाद

दीपान्शु गोयल said...

अच्छा लगा ये जानकर की भारत से भी लोग काबुल जाते हैं और वो भी छुट्टियां बिताने के लिए। आगे के विवरण का इंतजार रहेगा। काबुल कैसे जाया जा सकता है ये भी बताइयेगा।

बाल किशन said...

काफ़ी रोचक जानकारी.
आभार.

Mired Mirage said...

थोड़ी विस्तृत जानकारी दीजिये। वहाँ के बारे में जानने की बहुत इच्छा है।
घुघूती बासूती