Wednesday, December 13, 2006

तुम मेरे हो

बडा अच्छा लगता है
तुम्हें निहारना
पलकों की कूची से
तुम्हारे चेह्ररे पर
निशान छोड जाना.


मत खोलो मुंदी आँखें
अभी
कैद सपनों में
रंग तो भर
देने दो.

1 comment:

गिरिराज जोशी said...

भावों की अतिसुन्दर अभिव्यक्ति...

वाह वाह कर ताली बजाने को मन कर रहा है.

हो सकता है कुछ लोग टिप्पणी कर इसे और वृहत करने की गुजारिश करें मगर आप मत कीजियेगा, क्योंकि -

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मत खोलो मुंदी आँखें
अभी
कैद सपनों में
रंग तो भर
देने दो.


:)