Monday, October 12, 2009

इन्द्रधनुष ..एक बाल पत्रिका



हिमाचल में मंडी-कुल्लू सीमा पर एक छोटा सा गाँव है शोझा .यहाँ पहुचने के लए ६ किमी की कठिन चढाई करनी पड़ती है. वहां से एक निवासी हर महीने एक निश्चित तारीख को इसलिए नीचे आता है की उसे ४ प्रति इन्द्रधनुष की लेनी है अपने गाँव के बच्चों के लिए. १२ रुपये की एक प्रति भी ३-४ बच्चे मिलकर खरीदते हैं. यह सिलसिला पिछले ५ साल से चला आ रहा है.
इन्द्रधनुष , हिमाचल के उन बच्चों तक पहुचने का लक्ष्य रखती है जहाँ ज्ञान अर्जन के और कोई साधन नहीं है.समाचार पत्र भी मुश्किल से पहुँच पाते हैं. और पढने के नाम पर सिर्फ स्कूल की किताबें. राष्ट्रीय साक्षरता अभियान के कुछ सदस्यों ने हिमाचल के ग्रामीण इलाकों में दौरा करते समय वहां की महिलाओं से पूछा की वह क्या पढ़ती हैं तो उनका जवाब था इन्द्रधनुष!
इन्द्रधनुष एक मासिक हिंदी पत्रिका है जो स्वयंसेवी प्रयत्नों से प्रकाशित हो रही है..इस वर्ष सितम्बर में उसने ५ साल पूरे कर लिए और पहाडी इलाकों में वितरण की समस्याओं ,लक्षित पाठकों के सीमित साधनों ,बिना किसी ओपचारिक ढांचे और बिना किसी व्यवासयिक सहायता के ६० अंक निकाले.यह एक बड़ी उपलब्धि , यह पत्रिका पूर्णतः एक छोटे से समर्पित स्वयंसेवकों के प्रयासों से चल रही है.इनका लक्ष्य ९ से १५ साल के उन बच्चों तक पहुंचना है जिनके पास कुछ अच्छा पढने के साधन सीमित हैं या न के बराबर हैं. इन्होने हिमाचल , उत्तराँचल,छतीसगढ़ ,उत्तर प्रदेश और बिहार के गाँवों में यह पत्रिका पहुँचने की कोशिश की है .अभी तक इसकी मुद्रण संख्या ४०००-१०००० के बीच उतरती चढ़ती रहती है.५२ पृष्ठों की इस पत्रिका का मूल्य सिर्फ १२ रुपये है पर कई जगह इस रकम को जुटाने के लिए भी दो चार बच्चों को जुड़ना पड़ता है. पत्रिका में बच्चों के पाठन और रुचि के लेख होते हैं. यह सरल भाषा में विज्ञान पर आधारित लेख, कहानियां ,चुटकुले, अपने आप कर के देखिये ,पहेलियाँ,फोटो,तथ्य आदि बहुत कुछ रहता है.
आई आई टी ,कानपुर की मेकनिकल इंजीनयर ,अंशुमाला गुप्ता ,शिमला के साक्षरता अभियान से जुडी थीं .इस कार्य के दौरान उन्होंने पाया की हिमाचल के ग्रामीण अंचल के बच्चों के पास ऐसा कोई साधन नहीं था जो उनकी पढ़ने की ललक को शांत कर सके .हिन्दी में इस तरह की पत्रिकाओं का अभाव है.उनका सपना था बच्चों के कोतुहल और जिज्ञासा को न सिर्फ तृप्त करना बल्कि बढ़ाना भी..उनका यह सपना और जोश इन्द्रधनुष के रूप में परिवर्तित हुआ.उनके साथ साथ हिमाचल ज्ञान विज्ञानं समिति ,अखिल भातरीय जन विज्ञानं नेटवर्क के लोगों के प्रयास और निष्ठां भी जुडी हुई है.कल मैं मिली डा टी वी वेंकटेश और डा इरफाना से जिनका सक्रिय योगदान इस पत्रिका के निकलने में है.
पत्रिका के सफलता इस बात से आंकी जा सकती है की बच्चे इसे ने सिर्फ चाव से पढ़ते हैं ,बल्कि आने वाले अंकों का इंतजार बेसब्री से करते हैं,और कई पुराने अंकों की भी मांग करते हैं.परन्तु इन्द्रधनुष हमेशा ऐसा सतरंगी रहे इसमें बहुत सी चुनौतियों हैं जिनसे अंशुमाला और उनकी टीम झूझती रहती है. लेखों की गुणवत्ता बनाए रखना अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है ,क्योंकि बाल पाठकों की अपेक्षाओं पर खरे उतरना एक जिम्मेदारी भी है.अच्छे लेखों के लिए लेखकों को प्रेरित करना तथा सामग्री जुटाना ,ज्ञान विज्ञान की जानकारी बच्चों को देना,अन्य भाषा के उत्तम साहित्य को अच्छे अनुवाद से पाठक को प्रस्तुत करना यह सब चुनोतियाँ हैं .और सबसे बड़ी बात है की वित्तीय नुकसानों को झेलते हुए भी हर अंक समय पर और उच्च स्तर का निकालना, जिससे की बच्चों को निराशा न हो . इस चिठ्ठे का उद्देश्य इस उत्तम पत्रिका की और ध्यान आकर्षित करना तो है ,यह अंशुमाला और उनकी टीम के लिए मेरा योगदान है. आप सब भी इस नेक कार्य में योगदान दे सकते हैं .लेख भेज कर या वत्तीय योगदान करके,या फिर इसकी जानकारी औरों को दे कर जो की इस पत्रिका को पढ़ना चाहते हैं .



2 comments:

M VERMA said...

पत्रिका का कलेवर तो काफी खूबसूरत है.

महफूज़ अली said...

bahut achchi lagi yeh jaankari........ patrika khoobsoorat hai....

aapko deepawali va bhaiya dooj ki haardik shubhkaamnayen...