शुक्रवार, जून 20, 2008

सलाम काबुल-३

टिप्पणियों से हौसलाफजई हुई है...तशक्कुर . इसके जवाब में बड़ा ही मीठा सा " काबिले तशक्कुर नीस्त " सुनने को मिलता है. यह जवाब मुझे इतना मीठा लगता है की कहना नहीं भूलती .और आप भी शुक्रिया या तश्क्कुर का जवाब ऐसे पाएँगे सबकी ज़बान से... मिलने पर असलाम वालेकुम के बाद एक सिलसिला आपकी खैरियत पूछने का ।खूबस्ती, खाने-खैरतस्ती ,चतुरस्ति . और आप बोलेंगे खूब हस्तम चतुर हस्तम। अपना दाँया हाथ सीने पर रखकर स्वागत करते हैं लोग.


दिल्ली से काबुल के लिये एयर इंडिया की उडानें हैं जो बुधवार को छोड हर दिन जाती हैं.फिलहाल यह सवेरे ७.४० पर दिल्ली अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से चलती हैं.सफर तकरीबन पौने दो घंटे का है. आपको वीसा लेना पडेगा .वैसे अफगानिस्तान की दो और विमान सेवायें भी हैं काम एयर और आरियाना जो शायद ज़्यादा सस्ती हैं पर भरोसेनमंद नहीं .दिल्ली से किराया लगभग १४००० के आसपास है ( आने जाने का,इकोनमी क्लास! )।
आइये कुछ काबुल की सैर हो जाए ।



















काबुल की सबसे खूबसूरत जगह है "बाग़े बाबुर " जहाँ मुगल बादशाह बाबर का मकबरा है .बाबर समरकन्द से काबुल आये और फिर वहाँ से हिन्दुतान का रुख किया.पर हिन्दुस्तान का मौसम उन्हें पसन्द नहीं था.उनकी ख्वाहिश थी कि उन्हें उनके प्यारे काबुल में ही दफ़न किया जाए. उनकी इच्छा थी कि उन्हें आसमान के नीचे बिना ज़्यादा लाग लपेट के दफनाया जाए .सो उनकी कब्र भी खुले आसमन के नीचे है .सिर्फ चारों ओर बहुत ही सुन्दर जाली है।





तकरीबन २५ एकड़ में बने इस बाग़ को बाबर ने बनवाया था.गृह युद्ध में यह भी काबुल के अन्य स्थलों की तरह यह भी क्षतिग्रस्त हो गया था. इसके पीछे पहाड़ हैं जहाँ से गोले दागे जाते थे.इस बाग़ में बारूदी सुरंगे भी बिछाई गयीं.



अब आगा खान ट्रस्ट ,और संयुक्त राष्ट्र की मदद से इसको पुनः उसी रूप में लाया जा सका है.कहते हैं मुग़ल काल के बागों की विशिष्ट चारबाग नुमा रचना इसी बाग़ पर आधारित है .






यहाँ शाहजहाँ द्वारा बनायी गयी एक मस्जिद है













यह फोटो रेस्टोरेशन के काम से पहले की है और इसमें गोलों के निशान साफ़ नज़र आ रहे हैं.चित्र आभार http://www.bbc.co.uk/

बुधवार, जून 04, 2008

सलाम काबुल- २ (बुज़काशी )




बुज़काशी अफगानिस्तान का पारम्परिक राष्ट्रीय खेल है । यह घोडों पर सवार होकर खेला जाता है। घुड़सवारों की टीमें होती हैं और बीच में सफ़ेद रंग से एक गोला (दायरे- हलाल) बना दिया जाता है । एक बकरी को मारकर धड़ अलग कर उसके शरीर को बीच में रख देते हैं.घुड़सवार उस मृत बकरे, वजन १०० किग्र के आसपास होता है , को उठा कर उस गोले में डाल देते हैं। जाहिर है दूसरी टीम इस कार्य में उनका विरोध करती है और बकरा छीनने की कोशिश करते हैं। गोल करने वाले सवार की टीम को हर गोल पर इनाम मिलता है । इनाम वहाँ मौजूद विशिष्ट व्यक्ति देते हैं। इस खेल में कौशल है उन घोडों का जिनको खासतौर से बुज़कशी के लिए तैयार किया जाता है और सवारों का.यह काफी रफ खेल होता है जिस में घुड़सवार चाबुक चलने में कोई संकोच नही करते।
पुनश्च: बकरे १०० किग्रा का होता है यह पढ़कर अमित खूब हँसे और बोले बकरा है या हाथी। और वहाँ पर कोई भीम नही है की घोडे पर चढ़कर दौड़ते हुए १०० किग्र उठा ले .पर मैंने कहीं पढा था की यह १०० किग्र तक हो सकता है .सो लिख दिया.बरहाल बकरा कितना भी मोटा किया गया हो २५,३०,५० किग्रा का होगा।




सलाम काबुल -१

इस बार फ़िर गर्मी की छुट्टियों में काबुल जाने का कार्यक्रम बना। अफगानिस्तान का नाम सुनते ही लगता है की अरे यह भी कोई जगह हुई जाने की । दिल्ली से एयर इंडिया की उड़ान है सवेरे ७.४० पर। १ घंटे ४५ मिनट का सफर है और जब तक आप सवेरे की टूटी हुई नींद पूरी करते हैं,जहाज काबुल के ऊपर पहुँच जाता है। छोटा सा हवाई अड्डा है .कुछ जान पहचान होने के कारण अमित हमें हवाई जहाज की सीढी के पास ही मिल गए । निकलते समय वहां के लाउंज में एक अफगानी महिला अधिकारी से मुलाक़ात हुई.उनसे हुई बातचीत से ही पता चलता है भारत (हिन्दुस्तान ) के प्रति अफगाननिवासियों का प्रेम और भारत से उनकी आशाएं.शायद ५ मिनट की मुलाक़ात में उन्होंने गुजारिश की काबुल में इंडियन स्कूल फ़िर से खोले जाएँ। भारतीय वहाँ सबसे लोकप्रिय विदेशी हैं । लोग हिन्दी बखूबी समझते हैं और काफी लोग उर्दू बोल लेते हैं। भारतीय टीवी सीरियल का वहाँ बोलबाला है। एक टैक्सी चालक का कहना है तुलसी अगर यहाँ चुनाव में खडी हो जाएँ तो राष्ट्रपति चुन ली जायेंगीं!! अतिश्योक्ति ,पर इससे इन सास बहू वाले धारावाहिक की लोकप्रियता का अंदाजा लगाया जा सकता है।
यह एक रोचक रिपोर्ट है इसी से सम्बंधिंत ।
http://www.iwpr.net/?p=arr&s=f&o=344606&apc_state=henparr
भारतीय चैनलों के अलावा यह सीरियल दरी (वहाँ की भाषा ) में डब कर के जाते हैं। हाँ, पर जहाँ भी पोशाकें उनकी मर्यादा की सीमाओं को तोड़ने लगती हैं,उन पर फज़िनेस कर दी जाती है। अमिताभ बच्चन और शाहरुख़ खान पसंद किए जाते हैं ।दुकानों पर हमने तुलसी,मिहिर ,शाहरुख खान के पोस्टर देखे।



भारत वहाँ के पुनः निर्माण में बड़े पैमाने पर लगा है। इसलिए वहाँ की जनता में भारत और भारतीयों के प्रति बेहद आदर और सौहाद्र है। गर्मजोशी से स्वागत होता है।





गुरुवार, मई 29, 2008

काबुल फ़िर से २००८


खँडहर कहते हैं इमारत की बुलंदियों की कहानी
काबुल का दारुल अमन (शान्ति का घर) जो एक समय यहाँ के राजा का महल था .१९२० में यहाँ के राजा अमानुल्लाह खान ने इसको बनवाया था और उनका इरादा था अफगानिस्तान में प्रजातंत्र स्थापित करना । नब्बे के दशक में यह शानदार इमारत मुजाहिदीन की लड़ाई में ध्वस्त हो गयी.अब यह बेजार पडी है .कुछ हिस्से NATO द्वारा चेक पोस्ट के लिए इस्तेमाल होते हैं।


गुरुवार, मार्च 27, 2008

जोधा अकबर

बोर्ड की परीक्षाएँ खत्म हुईं और प्रोग्राम बना जोधा अकबर देखने .फिल्म तो पिछले महीने रिलीस हो गई थी पर इम्तिहान के चलते देखने का मौका अब मिला। देखने का मुझे बहुत शौक नहीं है और ह्रितिक रोशन , ऐश्वर्य राय दोनों ही मुझे कोई ख़ास नहीं सुहाते पर आशुतोष गोवारिकर की फिल्म थी सो देखना था .वैसे भी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर बनी फिल्में मुझे पसंद हैं ।
साढ़े तीन घंटे की को मैंने ०-१० के स्केल पर ७.५ नम्बर दिया । फिल्म के सेट की शानो शौकत पसंद आयी .भव्य सेट जिसमें राजसी राजपूत महलों और मुगलिया दरबार का शाही अंदाज़ दोनों दिखाने में फिल्म के कर्ता धर्ता सफल रहे। ह्रितिक रोशन ने अच्छा अभिनय किया खासतौर पर जहाँ नज़ाकत से करना था।शाही अन्दाज़ भी अच्छे से निभाया। दो तीन जगह तो खासा प्रभावित किया जैसे कि जब वो जोधा से पहली बार मिले। हाँ ऐश्वर्या ने भी अपने अभिनय का अलग अन्दाज़ पेश किया। मुझे लगता उनके अभिनय ,उनके बोलने के तरीके, उनके नृत्य में कुछ ज़्यादा लटके झटके होते हैं। पर उन सबके विपरीत इस फिल्म में उन्होंने अपने संतुलित अभिनय से प्रभावित किया। एक राजपूतानी की गरिमा को बखूबी निभाया । ह्रितिक और ऐश्वर्या की जोडी में भी सामंजस्य अच्छा है। कुछ दृशय तो बहुत ही अच्छे लगे । जब जोधा अपना बनाया खाना चखती हैं और अकबर का कहना कि वह उसकी झूठी थाली में ही खायेंगे । तलवार की जुगलबंदी ,जोधा का सूरजमल के साथ दृशय ,ऐश्वर्य और इला अरुण के बीच का तनाव । अकबर जब आदम खान के समक्ष जोधा का सम्मान करता है तो लगा पति हो तो ऐसा। लडाई के दृश्यों में कुछ ऊब सी लगने लगती थी। कभी कभी यह भी लगता था जैसे निर्देशक कभी कभी जोधा अकबर के प्रेम को उतना न्याय नहीं दे पाए क्योंकि वह साथ में उस समय के राजनीतिक और ऐतिहासिक परिवेश को भी उतना ही महत्व देना चाह्ते थे जितना प्रेम कथा को। एक राजनीतिक सौदा कैसे प्यार में बदल गया इसका अहसास, जैसे जैसे फिल्म आगे चलती है ,होता जाता है। लेकिन यह बात है कि एक ऐसे बादशाह् को जो सब धर्मों की इज्जत करता था,प्यार से दिलों को जीतना चाह्ता था और बहुत ही सुलझे विचारों का था , उसके लिये जोधा का ज़िन्दगी में शरीक होना ,उसके व्यक्तित्व में नया आयाम ला देता है।
पूनम सिन्हा को पहली बार पर्दे पर देखा अकबर की वालिदा हमीदा बानो कि किरदार में।कितनी सुन्दर हैं।हम सब की नज़र पडी अकबर के चारों और घूमते खूंखार पहरेदारों पर . कलाकारों का चयन अच्छा था।मुझे पोशाकें पसंद आयीं ,वास्तविक लग रही थीं ।वैसी ही जैसे कि हमारे जहन में होती हैं जब हम उस समय के बारे में सोचते हैं । जोधा के गहने ,क्या कहने। " कहने को जश्ने बहारा " गुनगुनाते हुए बाहर आए ।
देखने के बाद अच्छा लगा लेकिन कुछ कमी सी भी लगी जैसे कुछ और हो सकता था.

गुरुवार, मार्च 13, 2008

मेरा अपने से क्या रिश्ता है

कितने रिश्ते बनाते हैं हम
और न जाने कितने रिश्ते निभाते हैं हम
पर अपने से कोई रिश्ता बनाया है क्या हमने
कभी ख़ुद से कुछ निभाया है हमने ?

सब रिश्ते बेमानी हैं अगर
ख़ुद को नहीं पहचाना है हमने
भाई बहन ,माँ बाप,पति, पत्नी,
पिता,पुत्र, पुत्री,मित्र,सहेली
दोस्त
सबका वजूद तभी है
जब हम हैं ।
अगर अपनी पहचान झूठी है
तों रिश्तों की सच्च्चाई क्या है ?

शनिवार, मार्च 08, 2008

नाम में क्या रखा है

कहने को तो नाम में क्या रखा है । अपनी पहचान तो उसी से होती है।और आजकल तो सही नाम रखने के लिये न्यूमारालोजी का सहारा भी लिया जाता है। पर विश्व की सबसे सफल कंपनियों के नाम के पीछे की कहानी काफी रोचक है। गौरतलब है कि उनमें से किसी ने ज्योतिष या न्युमेरोलोजी का सहारा नहीं लिया पर सफलता के शिखर पर हैं.

एपल कंप्यूटर के संस्थापक स्टीव जोब्स को सेब बहुत पसंद थे। उनको अपनी कंपनी का नाम नत्थी कराने में तीन महीने का विलम्ब हो गया .जब उनके साथी कोई वाजिब नाम नहीं सुझा पाए तो उन्होंने अपनी कंपनी का नाम रखा एप्पल कम्प्यूटर्स।

CISCO सुनने से लगता है किसी का परिवर्णी शब्द होगा पर वास्तव में यह सान फ्रांसिस्को से लिया गया है।

LOTUS का नाम लिया गया है योग के पद्मासन यानी लोटस मुद्रा से।


माइक्रोसॉफ्ट बना है माइक्रोकमप्यूटर और सॉफ्टवेर के हिस्सों को जोड़कर ।

मोटोरोला के पाल गल्विन ने कारों के लिए रेडियो बनाने शुरू किए और उस समय की लोकप्रिय कम्पनी वित्रोला के नाम पर रख दिया मोटोरोला।

गूगल का नाम इस विचार से बना की इससे कितनी जानकारी खोजी जा सकती है.शायद गूगोल यानी की १ के बाद सौ शून्य.जब सेर्गे बरीं और लैरी पेज ने एक निवेशक को यह प्रोजेक्ट बताया तो उन्हें चेक मिला गूगल के नाम से और गूगल महाराज के क्या कहने !

याहू बनाया था गलिवार्स ट्रेवलस के प्रसिद्ध लेखक जोनाथन स्विफ्ट ने उन जीवों के लिए जो देखने में अरूचिकर हैं और जिन्हें मुश्किल से मनुष्य कहा जा सकता था। याहू के प्रवर्तकों जेरी यांग और डेविड फिलो का मानना था की वे याहू हैं!

ह्यूलेट पैकर्ड के संस्थापक बिल ह्यूलेट और डेव पैकर्ड ने सिक्का उछाल कर इस बात का निर्णय कर लिया की कम्पनी का नाम ह्यूलेट पैकर्ड हो या पैकर्ड ह्यूलेट .और कौन जीता यह तो पता ही है!

बुधवार, फ़रवरी 27, 2008

शतक ,दोहरा शतक और अर्द्ध शतक

कई चिट्ठे पढे जिनमें सौंवी पोस्ट या दो सौंवी पोस्ट का ज़िक्र हुआ और जश्न मना। बधाई उन सबको जो यह मील के पत्थर गाड़ पाये। कई तो घर से निकले मेरे काफी बाद पर इन स्टेशनों पर उनकी रेलगाडी पहुँच गई बहुत पहले । यहाँ तो ट्रेन मालगाडी की तरह रुक रुक कर आगे बढ़ रही है.सुस्ताती ज़्यादा समय है ,चलती कम । और अन्य तेज़ रफ्तार वाली गाड़ियों के लिए रुक जाती है.कई बार तो पटरी से उतरी हुई लगी। पर यह ऐसा ट्रैक है की वापस पटरी पर लाना मुश्किल नहीं।

सोचती हूँ ऐसा क्या है की औरों के शतक , दुहरे शतक बन गए और अपना अर्ध शतक भी न बना.बाक़ी खेल रहे हैं एक दिवसीय मैच और मैं अभी भी वही पुराने लहजे में टेस्ट मैच! और टेस्ट मैच में भी कुछ श्रीकांत की तरह बैटिंग कर रहे है और मैं हूँ गावस्करनुमा या फ़िर रवि शास्त्रीनुमा। गावस्कर ने कमसेकम शतक तो बनाए।

कछुआ चाल है ,खरामा खरामा बढ़ रही है। बीच बीच में अपने कवच के अन्दर घुस कर फ़िर हौले से बाहर कि दुनिया देखी । आगे पीछे कोई ख़तरा तो नहीं और फिर बढे आगे।

सोचिये मैंने पहली पोस्ट लिखी थी फरवरी २००६ में .तब से दो साल के अंतराल पर लिख पायी कुल ४० पोस्ट्स । सोचती हूँ क्या कारण है।
समयाभाव तो सबसे पहले नंबर पर है ।फुरसत कम , काम ज्यादा ...किसी काम को न करने का सबसे सस्ता टिकाऊ बहाना!! लेकिन समयाभाव के साथ साथ अभाव है उत्प्रेणन का.एक जूनून का कि न सिर्फ़ कुछ लिखूं बल्कि बहुत उत्कृष्ट लिखूं। आलस का घर है यह मन मेरा.कौन इतनी मेहनत करे ,इस बारे में सोचने का कि अब किसा विषय पर लिखा जाए ,एक रूपरेखा तैयार की जाए और फ़िर टंकण .तौबा करो.वैसे भी मुझे कौन सा गोल्ड मेडल लाना है चिट्ठा लेखन में। और यह जो सब सर्वश्रेष्ट चिट्ठे आदि के अभियान है.....उहूँ यहाँ भी वही ऑफिस जैसी रेटरेस .न बाबा मुझे नही पसंद .अपना चिट्ठा बनाया अपनी रफ़्तार से लिखेंगे। नायाब तरीके है अपनी अकर्मण्यता को उचित ठहराने के लिए ।

सृजनात्मक आलस भी है.बुद्धि लगानी पड़ेगी सोचने में कि क्या लिखें कैसे लिखें । रचनात्मकता की अंतर्जात सीमाएं है जिससे बंधी हूँ कि बस इतना ही सोच सकती हूँ, इतना ही लिख सकती हूँ.अभिव्यक्ति की परिधि है छोटी और कई बार विचार ,कल्पना और भाव को व्यक्त करने में असमर्थ हो जाती हूँ .ऐसे समय न सिर्फ़ अपने सीमित भाषा ज्ञान पर क्रोध आता है बल्कि असहाय महसूस करती हूँ। विषय असीमित हैं,रुचियाँ भी कम नहीं ,ज्ञान का विस्तार है शायद औरों की अपेक्षा कम पर फ़िर भी कामलायक,उम्र के चालीस से ज्यादा बसंत देखने के बाद अनुभव भी विविध है.फ़िर क्या हो सकता है?
चिट्ठा जगत में आए दो साल हो गए अभी तक टिकी हूँ शायद यह भी एक उपलब्धि ही है.दो साल पूरे करने पर "थ्री चियर्स "!!!

गुरुवार, फ़रवरी 21, 2008

गुमसुम

HASTINGS: You have lived very much among them. In truth, I have been often surprised, that you who have seen so much of the world, with your natural good sense, and your many opportunities, could never yet acquire a requisite share of assurance.....

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MARLOW.: .....An impudent fellow may counterfeit modesty; but I'll be hanged if a modest man can ever counterfeit impudence.

("She Stoops to Conquer" Oliver Goldsmith )

हौले से परदा हटाकर ,वो झांकती है । ललचाता है उसका भी मन। हाय कैसे वह झट से जो मन में आता है बोल देती है। क्या विश्वास से चलती है.ज़रा भी हिचकिचाहट नही, है उसे न कोई संकोच। फट जाकर बात कर लेती है।

कैसे फुर्ती से उसने अपनी टीचर को जवाब दे दिया.क्या दोस्ताना तरीके से वह बात करती है अपने बास से.आँखें बंद कर वो सोचने लगी। पर तब भी नहीं ला पायी वो तफ्री वाला अंदाज़ .तफ्री में भी तो है.... त और फ्री !! वो है की अपने सपनों में भी सिमटी ,सकुचाती।

दिल के एक छोटे से कोने में बैठती है उसकी यह परछाई । कभी कभी बाहर झांक कर हिम्मत करना चाहती है पर तुरंत फिर वही अपना सीप .उसे लगता है पर्दा हटाएगी तो कयामत हो जाएगी.लोग कुछ कहेंगे तो उसका जवाब दे पाएगी क्या .अपने तारीफों के पुल बांधना ...न बाबा .काम करो और आगे बढो । कैसे कहे वह अपने मुंह से की उसने कितना काम कर दिया। नुकसान तो बहुत है न कहने से .घर में भी और आफिस में भी.पर यह परदे के पीछे से झांकती लड़की बाहर ही नहीं आती।

आई तो थी एक दो बार .पर दो वाक्य से ज़्यादा बोलने पर लाल होते गाल उसे वापस भेज देते. हाँ काम की बात करनी हो तो उसका जवाब नहीं.क्या क्या नही जानती। पर" स्माल टोक " . उफ़, क्या मुसीबत है .

सपने में तो कुछ भी सोचा जा सकता है। पर वहाँ पर भी क्यों लगता है उसे की यह उसके बस का नहीं .कुछ तो सलीका होगा की पर्दा हटा सके थोडा सा ही सही .

गुरुवार, फ़रवरी 07, 2008

मुलाकात मकबूल फिदा हुसैन से

मकबूल फ़िदा हुसैन के बारे में एक पोस्ट पढी .मुझे भी एक वाक़या याद आया जब मैंने उनसे औटोग्राफ लिया था.बात १९९३ की है.फरीदाबाद का मशहूर सूरज कुंड मेला चल रह था.थक हार कर शाम को हम बाहर निकले तो मेरी नज़र पडी एक लंबे गोरे हैंडसम शख्स पर .सफ़ेद बाल और सफ़ेद दाढी .ध्यान से देखा तो नंगे पाँव .दिमाग में कुछ पढा हुआ याद आया.कहीं पढा था कि एम ऍफ़ हुसैन जूते नहीं पहनते .वो कुछ आगे तेज़ी से चलते जा रहे थे और मैं भीड़ में फंसी.पर फिर भी दौड़ लगाई और पहुँची उनके पास। औटोग्राफ के लिए कागज़ ढूँढने लगी पर साथ में तो बटुवा भी नहीं था.तुरंत अपना शाल आगे बढ़ा दिया .पर अब कलम नहीं. हुसैन साहब ने मुस्कराकर अपने झोले से पेन निकाली और मेरे पीले शाल के कोने में अपने ह्स्ताक्षर कर दिए।
सिर पर हाथ फेरा.मैंने भी शुक्रिया किया और सूरज कुंड के उस मेले का यह अमोल तोहफा संभाल कर रख लिया.कहना न होगा वह शाल पहनने के काम तो फिर न आया .पर यह घटना सुनाते समय और वह क्षणिक मुलाक़ात को याद करने के लिए में बडे बाल सुलभ उत्साह से उसे दिखाती हूँ ।

सोमवार, जनवरी 21, 2008

संदेस

चाँदनी में लिपटे
कुछ
ख्वाबों को भेजा है
पास तुम्हारे।

रात के अंधेरे में
चाँद पाएगा एकाकी तुम्हें
रखेगा हौले से ख्वाब मेरे
तुम्हारी पलकों पर

और जवाब में लाएगा
वो तुम्हारी सिहरन
हलकी सी मुस्कान की
वो मिसरी
नमी तुम्हारे आँखों
के कोरों की

मैं चाँद को निहारती
चाँदनी को हथेली में मलती
तुम्हारे सपनों को ढालूंगी
अपनी आँखों में।